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नई प्रविष्टियाँ

पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – स्वामी स्वरुपदास

| कड़ी – १७६  | पंचदश मयूख | शल्यपर्व
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित।
| व्याख्या: डा. चन्द्र प्रकाश देवल


अर्जुन उवाच
प्रथम हरन किय द्रौपदी, दुतिय हत्यो सुत मोर।
तातैं भगनीपति हतन, कियो संकळप घोर।।७७।।
गांधारी के ऐसे वचन सुन कर अर्जुन बोला कि हे माता! जयद्रथ ने प्रथम द्रौपदी का हरण किया फिर दुसरा उसने मेरे पुत्र ( अभिमन्यू) की हत्या की, तभी मैंने अपने बहनोई को मारने का ऐसा दुष्कर संकल्प लिया।[…]

रँग शीलां रखवाल़िया,जोर झिणकली झाड़!!

एक जमानो हो जद अठै रा नर-नारी मरट सूं जीवण जीवता अर सत रै साथै पत रै मारग बैवता। हालांकै धरती बीज गमावै नीं आज ई ऐड़ा लोग है जद ई तो ओ आकाश बिनां थांभै ऊभो है पण उण दिनां री बातां बीजी।

बीसवैं सईकै री बात है भाडली(जैसल़मेर) रा भाटी रुघजी मानसिंहजी रा (रुघराजजी /रुघनाथजी) धाट रै गांम छौल़ रै सोढां रै अठै परण्योड़ा हा। उणां री जोड़ायत सोढीजी, जापो करावण सारू आपरै पीहर छौल़ गयोड़ा हा। जापो हुयो। सोढीजी बेटे री मा बणिया। दोनां जागा बधाइयां बंटी। हरख हुयो।[…]

चिड़कली

तूं तो भोल़ी भाऴ चिड़कली।
दुनिया गूंथै जाऴ चिड़कली।।

धेख धार धूतारा घूमै।
आल़ै आल़ै आऴ चिड़कली।।

मारग जाणो मारग आणो
हुयगी अब तो गाऴ चिड़कली।।

बुत्ता दे बस्ती भरमावै।
वै ई पैरै माऴ चिड़कली।।[…]

राजस्थानी भाषा

संसार की किसी भी भाषा की समृद्धता उसके शब्दकोष और अधिकाधिक संख्या मे पर्यायवाची शब्दो का होना ही उसकी प्रामाणिकता का पुष्ट प्रमाण होता है। राजस्थानी भाषा का शब्दकोष संसार की सभी भाषाओं से बड़ा व समृद्धशाली बताया जाता है। राजस्थानी में ऐक ऐक शब्दो के अनेकत्तम पर्यायवाची शब्द पाये जाते है, उदाहरण स्वरूप कुछेक बानगी आप के अवलोकनार्थ सेवा में प्रस्तुत है।

।।छप्पय।।

।।ऊंट के पर्यायवाची।।

गिडंग ऊंट गघराव जमीकरवत जाखोड़ो।
फीणानांखतो फबत प्रचंड पांगऴ लोहतोड़ो।
अणियाऴा उमदा आखांरातंबर आछी।
पीडाढाऴ प्रचंड करह जोड़रा काछी।[…]

प्रशंसा

प्रशंसा बहुत प्यारी है,
सभी की ये दुलारी है,
कि दामन में सदा इसके,
खलकभर की खुमारी है।

फर्श को अर्श देती है,
उमंग उत्कर्ष देती है,
कि देती है ये दातारी,
हृदय को हर्ष देती है।[…]

भूरजी, बलजी पर बड़ौ साणौर गीत – महाकवि हिंगलाजदानजी कविया

लखे घोर घमसांण ऊडांण ग्रीधण लहै,
अपछरां पांण बरमाऴ ओपै।
ऊगतो विचारै भांण आरंभ इसा,
किसा कुऴ भांण रै सीस कोपै।।

बाट उप्रवाट बहता थका बाहरू,
उरस अड़ि अबीढै घाट आया।
दाटणा जिका कुज्रबाट दीपक दहूं,
थाटणा थाट मुह मेऴ थाया।।[…]

साहित्य श्रृंखला

पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – स्वामी स्वरुपदास

| कड़ी – १७६  | पंचदश मयूख | शल्यपर्व
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित।
| व्याख्या: डा. चन्द्र प्रकाश देवल


अर्जुन उवाच
प्रथम हरन किय द्रौपदी, दुतिय हत्यो सुत मोर।
तातैं भगनीपति हतन, कियो संकळप घोर।।७७।।
गांधारी के ऐसे वचन सुन कर अर्जुन बोला कि हे माता! जयद्रथ ने प्रथम द्रौपदी का हरण किया फिर दुसरा उसने मेरे पुत्र ( अभिमन्यू) की हत्या की, तभी मैंने अपने बहनोई को मारने का ऐसा दुष्कर संकल्प लिया।[…]

श्री दुर्गा-बहत्तरी – महाकवि हिंगऴाजदान कविया

।।छन्द भुजंगप्रयात।।
मनंछा परब्रह्म हिंगोऴ माता।
समैं सात पौरां रमै दीप साता।
जंबू दीप में जाम एको जिकांरो।
दिशा पच्छमी दूर प्रासाद द्वारो।।1।।

जिको धोकबा काज जावै जमातां।
अपा पाप थावै बजै सिध्द आतां।
करामात री बात साखात कैई।
सता मातरी चन्द्र कूपादि सैई।।2।।[…]

हालाँ झालाँ रा कुँडळिया – ईसरदास जी बारहट

“हालाँ झालाँ रा कुँडळिया” ईसरदास जी की सर्वोकृष्ट कृति है। यह डिंगल भाषा के सर्वश्रेष्ट ग्रंथों में से है। इसकी रचना के सम्बन्ध में निन्नलिखित किंवदंती प्रसिद्ध है।
एक बार हलवद नरेश झाला रायसिंह ध्रोळ राज्य के ठाकुर हाला जसाजी से मिलने के लिए ध्रोळ गये। ये उनके भानजे होते थे। एक दिन दोनों बैठकर चौपड़ खेलने लगे। इतने में कहीं से नगाड़े की आवाज इनके कानों में पड़ी। सुनकर असाजी क्रोध से झल्ला उठे और बोले – “यह ऐसा कौन जोरावर है जो मेरे गांव की सोमा में नगाड़ा बजा रहा है” फौरन नौकर को भेजकर पता लगवाया गया।[…]

मेहाई सतसई

मेहाई सतसई

कवि नरपत आसिया “वैतालिक” कृत

अमर शबद रा बोकडा, रमता मेल्या राज।
आई थारे आंगणैं, मेहाई महराज॥
(शब्द रूपी अमर बकरा हे माँ आई मेहाई महराज आपरा मढ रे आंगण में रमता मेल रियो हूँ।)

मेहाई-महिमा – हिगऴाजदान जी कविया

।।आर्य्या छन्द।।
पुरूष प्रराण प्रकती, पार न पावंत शेष गणपती।
श्रीकरनी जयति सकत्ती, गिरा गो अतीत तो गत्ती।।1।।

।।छप्पय छन्द।।
ओऊंकार अपार, पार जिणरो कुण पावै।
आदि मध्य अवसाण, थकां पिंडा नंह थावै।
निरालम्ब निरलेप, जगतगुरू अन्तरजामी।
रूप रेख बिण राम, नाम जिणरो घणनामी।
सच्चिदानन्द व्यापक सरब,
इच्छा तिण में ऊपजै।
जगदम्ब सकति त्रिसकति जिका,
ब्रह्म प्रकृति माया बजै।।2।।[…]

सालगिरह शतक – महाकवि हिंगऴाजदान जी कविया

।।गीत – झमाऴ।।

[१]
करत निरंतर निकट कट, झंकारव अलि झुंड।
विधु ललाट बारण बदन, सिंदूरारूण सुंड।।
सिंदूरारूण सुंड, धजर बिख-धारणै।
हद उजवल रद हेक, बदन रै बारणै।।
कर-मोदक करनल्ल, जनम जस गाणनूं।
जग जाहर घण जाण, नमो गणराज नूं।।

भावार्थ: जिनकी कनपटी के पास लगातार भौंरों के झुंड झंकार की ध्वनि करते रहते हैं, जिनके ललाट पर चंद्रमा है, हाथी के मुंह वाले जिनकी सूंड सिंदुरी रंग की है। सूंड सांप के फ़न की भांति शोभायमान है, जिनका एक ही दांत, जो मुँह के द्‌वार पर है, बहुत उजवल हैं। जिनके हाथ में लड्‌डू है। उन जगत-विख्‌यात व बहुविज्ञ गणनायक गणेश जी को मैं करनीजी के जन्मोत्सव का यशगान करने के लिये नमस्कार करता हूँ।[…]

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