Tag Cloud (पोस्ट पढने के लिए कृपया सम्बंधित टैग पर क्लिक करें)

अतुकांत आलेख उलाहना ऐतिहासिक घटना करुण कविता कवित्त कहानी काव्य/खंडकाव्य/ग्रन्थ खरी-खरी गज़ल / नज्म गणपति गीत गीत चित इलोल़ गीत जांगड़ो गीत त्रिकूटबंध गीत प्रहास गीत वेलिया गीत साणोर गीत सुपंखरो गीत सोहणो घनाक्षरी चारण चारणा री बातां चारणों के गाँव चिरजा छंद छंद चर्चरी छंद त्रिभंगी छंद त्रोटक छंद नाराच छंद भुजंगी छंद मोतीदाम छंद रेणकी छंद रोमकंद/रूप मुकुंद/दुर्मिल छंद सारसी छप्पय जमर/सती/तेलिया/तागा त्यौहार देश दशा देशभक्ति दोहा/सोरठा नीति नेतागिरी परिचय पुस्तक समीक्षा प्रकृति बेटी भक्ति भगवान शिव भेरूजी मनोरंजक मरसिया माँ अम्बा माँ आवड़ माँ इन्द्र बाई माँ करणी माँ काली माँ खोडियार माँ चंदू माँ चामुंडा माँ चाळकनेच माँ तेमड़ाराय माँ देवल माँ बीरवड़ी माँ मोगल माँ सरस्वती माँ सायर माँ सोनल माँ हिंगलाज माताजी राजस्थान लोकनायक वात्सल्य विडियो विभिन्न विरह विष्णु अवतार वीर रस श्रंगार संबोधन काव्य समसामयिक सवैया सीख स्लाइड शो हनुमान ગિરા ગુર્જરી

नई प्रविष्टियाँ

ठिरड़ै रा ठाट

।। ई काणिये मारिया पा?।।

शेर नै ई सवाशेर‘ अर ‘बाबै के ई बाबो‘ जैड़ा कैतांणा बणिया है तो कीं न कीं कारण रह्यो है। तो आ ई साची है कै सौ दिन चोर रा अर एक दिन घणी रो हुवै। इयां तो आ ई साची है कै खावैलो जिणरो खेतियो ईज खावैलो ! अर खेतिया रा खावैला उणरो खो जावैलो पण जिकै खो जावण सूं नीं डरै वै ईज खेतिये रा खावण री हूंस राखै।

ऐड़ो ई एक शेखावाटी में भलो मिनख बसै। घर रै नीं बाड़ अर नीं झूंपड़ै रै किंवाड़ पण आंटीली मूंछां अर डील रो डकरेल। बातां रा लठीड़ काढै तो कमाई रै नाम माथै उण कनै रामो ई राम हरे, पण एक ठाकरां सूं बेलीपा। उणरै एक बाई। बाई परणावण सावै हुई जणै जोड़ायत कह्यो कै – “भलै मिनखां छोरी नै पराए घरै मेलणी है कीं तो करो ! घरां जैड़ो घर है अर थे जोगता मिनख ! इयां बातां सूं कियां पार पड़सी?”[…]

विजयी एवं पराजयी मानसिकता

युवाओं के हृदय सम्राट एवं भारतीय मनीषा के महनीय आचार्य स्वामी विवेकानन्द के साहित्य का अध्ययन करने पर सार रूप में यह समझ आया कि व्यक्ति की हार एवं जीत में उसकी मानसिकता का अहम योगदान रहता है। कबीर ने भी ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत‘ कह कर इस तथ्य को पूर्व में ही स्वीकृति दी है। स्वामीजी के अनुसार मानव समाज में दो तरह की मानसिकताएं सदैव साथ-साथ काम करती है। एक ही काम, एक ही व्यक्ति एवं एक ही विषय पर हमारी अलग-अलग राय के पीछे ये मानसिकताएं ही काम करती है। ये हैं – 1. विजयी मानसिकता एवं 2. पराजयी मानसिकता। इसे हम सकारात्मक एवं नकारात्मक भी कह सकते हैं तो आशावादी एवं निराशावादी मानसिकता भी कह सकते हैं।[…]

अभिराम छबि घनश्याम की

।।कवित्त।।

मोरपंखवारा सिर, मुकुट सु धारा न्यारा,
नंद का कुमारा ब्रज, गोप का दुलारा है।
कारा कारा देह, मन मोहता हमारा गिध,
गनिका उबारा अजामिल जिन तारा है।
वेद श्रुति सारा “नेति नेति” जे पुकारा, जसु-
मति जीव-प्यारा मैने, उर बिच धारा है।
आँखिन की कारा बिच घोर हा अँधारा, सखि !
कृष्ण दीप बारा, तातें फैला उजियारा है।।१[…]

हूं कांई? होको तो खुद डोकरो खांचै!

मेवाड़ धरा रा राणा जितरा सूरमापणै में अजरेल उतरा ई उदारता में टणकेल। महाराणा प्रताप जिता वीरता रा पूजारी,उतरा ई कविता रा पारखी। आजादी री अलख रै उण आगीवाण महासूरमै माथै समकालीन मोकल़ै कवियां काव्य रचियो।

एक दिन राणा रो दरबार लागोड़ो हो। कूंट-कूंट रा कवेसर आप आपरी गिरा गरिमा री ओल़खाण दे रह्या हा। उणी बखत कानैजी सांदू ई आपरो एक गीत पढियो। गीत सुण’र महाराणा घणा राजी हुया अर इणांनै गोढवाड़ रो गांम मिरगेसर इनायत कियो-

गोढाण धरा वाल्ही गढे,
आछा अरहर गांम अत।
परताप राण तांबा-पतर,
दियो मिरगेसर गांम दत।।[…]

आंधै विश्वास तणो अंधियारो!

।।गीत जांगड़ो।।

आंधै विश्वास तणो अंधियारो,
भोम पसरियो भाई।
पज कुड़कै में लिखिया पढिया,
गैलां शान गमाई।।1

फरहर धजा बांध फगडाल़ा,
थांन पोल में ठावै।
बण भोपा खेल़ा पण बणनै,
विटल़ा देव बोलावै।।2[…]

अरे भइया ! आ तो गधा गाल़णी धरती है!

एकर एक थल़ी रो बासण घड़णियो कुंभार आपरै गधे माथै ढांचो मेलियो अर उणमें पारी, चाडा, तामणिया, कुल़डकी, चुकली, भुड़की आद घाल’र पोकरण कानी निकल़ियो।

पोकरण पूगो पण उण सोचियो कै गांमड़ां में मजूरी ठीक हुसी सो उवो पोकरण सूं दिखणादी-आथूणी कूंट में निकल़ियो।
थोड़ोक आगै निकल़ियो तो उणनै सुणिज्यो कै लारै सूं कोई मिनख हेलो कर रह्यो है। उवो हेलो सुण’र ठंभियो। हेलो करणियो मिनख नैड़ो आयो अर खराय’र साम्हैं जोवतै पूछियो-
“कयो(कौन) है रे!”

कुंभार कह्यो – “बा ! हूं तो थल़ी कानलो फलाणो कुंभार हूं।”[…]

साहित्य श्रृंखला

श्री दुर्गा-बहत्तरी – महाकवि हिंगऴाजदान कविया

।।छन्द भुजंगप्रयात।।
मनंछा परब्रह्म हिंगोऴ माता।
समैं सात पौरां रमै दीप साता।
जंबू दीप में जाम एको जिकांरो।
दिशा पच्छमी दूर प्रासाद द्वारो।।1।।

जिको धोकबा काज जावै जमातां।
अपा पाप थावै बजै सिध्द आतां।
करामात री बात साखात कैई।
सता मातरी चन्द्र कूपादि सैई।।2।।[…]

हालाँ झालाँ रा कुँडळिया – ईसरदास जी बारहट

“हालाँ झालाँ रा कुँडळिया” ईसरदास जी की सर्वोकृष्ट कृति है। यह डिंगल भाषा के सर्वश्रेष्ट ग्रंथों में से है। इसकी रचना के सम्बन्ध में निन्नलिखित किंवदंती प्रसिद्ध है।
एक बार हलवद नरेश झाला रायसिंह ध्रोळ राज्य के ठाकुर हाला जसाजी से मिलने के लिए ध्रोळ गये। ये उनके भानजे होते थे। एक दिन दोनों बैठकर चौपड़ खेलने लगे। इतने में कहीं से नगाड़े की आवाज इनके कानों में पड़ी। सुनकर असाजी क्रोध से झल्ला उठे और बोले – “यह ऐसा कौन जोरावर है जो मेरे गांव की सोमा में नगाड़ा बजा रहा है” फौरन नौकर को भेजकर पता लगवाया गया।[…]

मेहाई सतसई

मेहाई सतसई

कवि नरपत आसिया “वैतालिक” कृत

अमर शबद रा बोकडा, रमता मेल्या राज।
आई थारे आंगणैं, मेहाई महराज॥
(शब्द रूपी अमर बकरा हे माँ आई मेहाई महराज आपरा मढ रे आंगण में रमता मेल रियो हूँ।)

पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – स्वामी स्वरुपदास

मंगलाचरण

छंद – अनुष्टुप्
गुणालंकारिणो वीरौ, धनुष्तोत्र विधारिणौ।
भू भार हारिणौ वन्दे, नर नारायणो उभौ।।१।।
दोहा
ध्यान-कीरतन-वंदना, त्रिविध मंगलाचर्न।
प्रथम अनुष्टुप बीच सो, भये त्रिधा शुभ कर्न।।२।।
नमो अनंत ब्रह्मांड के, सुर भूपति के भूप।
पांडव यशेंदु चंद्रिका, बरनत दास स्वरूप।।३।।
स्वामी के पीछे रहै, आदि होहि उच्चार।
नर नारायण शब्द कों, दास स्वरूप विचार।।४।।[…]

मेहाई-महिमा – हिगऴाजदान जी कविया

।।आर्य्या छन्द।।
पुरूष प्रराण प्रकती, पार न पावंत शेष गणपती।
श्रीकरनी जयति सकत्ती, गिरा गो अतीत तो गत्ती।।1।।

।।छप्पय छन्द।।
ओऊंकार अपार, पार जिणरो कुण पावै।
आदि मध्य अवसाण, थकां पिंडा नंह थावै।
निरालम्ब निरलेप, जगतगुरू अन्तरजामी।
रूप रेख बिण राम, नाम जिणरो घणनामी।
सच्चिदानन्द व्यापक सरब,
इच्छा तिण में ऊपजै।
जगदम्ब सकति त्रिसकति जिका,
ब्रह्म प्रकृति माया बजै।।2।।[…]

सालगिरह शतक – महाकवि हिंगऴाजदान जी कविया

।।गीत – झमाऴ।।

[१]
करत निरंतर निकट कट, झंकारव अलि झुंड।
विधु ललाट बारण बदन, सिंदूरारूण सुंड।।
सिंदूरारूण सुंड, धजर बिख-धारणै।
हद उजवल रद हेक, बदन रै बारणै।।
कर-मोदक करनल्ल, जनम जस गाणनूं।
जग जाहर घण जाण, नमो गणराज नूं।।

भावार्थ: जिनकी कनपटी के पास लगातार भौंरों के झुंड झंकार की ध्वनि करते रहते हैं, जिनके ललाट पर चंद्रमा है, हाथी के मुंह वाले जिनकी सूंड सिंदुरी रंग की है। सूंड सांप के फ़न की भांति शोभायमान है, जिनका एक ही दांत, जो मुँह के द्‌वार पर है, बहुत उजवल हैं। जिनके हाथ में लड्‌डू है। उन जगत-विख्‌यात व बहुविज्ञ गणनायक गणेश जी को मैं करनीजी के जन्मोत्सव का यशगान करने के लिये नमस्कार करता हूँ।[…]

यू ट्यूब चेनल