परिचय: राजकवि खेतदान दोलाजी मीसण – प्रेषित: आवड़दान ऊमदान मीसण

चारण समाज में ऐसे कई नामी अनामी कवि, साहित्यकार तथा विभिन्न कलाओं के पारंगत महापुरुष हुए हैं जो अपने अथक परिश्रम और लगन के कारण विधा के पारंगत हुए लेकिन विपरीत संजोगो से उनके साहित्य और कला का प्रसार न हो पाने के कारण उन्हें जनमानस में उनकी काबिलियत के अनुरूप स्थान नहीं मिल पाया। अगर उनकी काव्य कला को समाज में पहुचने का संयोग बेठता तो वे आज काफी लोकप्रिय होते।

उनमे से एक खेतदान दोलाजी मीसण एक धुरंधर काव्य सृजक एवं विद्वान हो गए है।[…]

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🌺हिंगल़ाज वंदना🌺

🍀नाराच छंद🍀
शिवा! अनूपमेय! शक्ति! सांभवी! मनोहरी! ।
त्रिशूलिनी! भुजंग-कंकणा! , त्रिलोकसुंदरी।
सुभव्यभाल, केश-व्याल, माल -लाल, कंजनी।
भजामि मात हिंगल़ाज भक्त भीड भंजणी।।१।।
ध्वनि मृदंग ध्रंग ध्रंग चारू चंग बज्जही।
झमाल झांझ, औ पखाज, वेणु वाजती मही।
डमाल डाक डं डमाक राग तान रंजणी
भजामि मात हिंगल़ाज भक्त भीड भंजणी।।२[…]

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कविराज गणेशपुरीजी रो एक रोचक प्रसंग – ठा. नाहर सिंह जसोल

गणेशपुरीजी राेहड़िया पातावत शाखा रा चारण हा। गांव चारणावास। मारवाड़ मैं बळूंदा ठिकाना रा पोलपात। पैहलौ नाम पदमसिंह। पछै राम स्नेही वे गया। सूरजमलजी मीसण रा शिष्य। पछै नांम गोस्वामी गणेशपुरी राख्यो।

महाराणा सज्जनसिंहजी मेवाड़ विद्वान अर विद्वानों रा पारखू। वांरै दरबार में केतांन विद्वान, जिण में गणेश पुरी जी एक।

दयानंद, गणेश पुरी स्वामी, उभय सुजान,
लई संगत इनकी, भयौ सज्जन, सज्जन रांण।।
बख्तावर राव पुनी, ग्याता रस सिगार,
इनकी कविता माधुर्य, लई सकै को पार।।
मोडसिंह महियारियाै अरु आ सिया जवान,
इन आदिक मेवाड़ मनो, हुति कवियन की खान।।

राज दरबार लगा हुआ है। महाराणा सिंहासन पर बिराजमान है। कविसर अपने अपने आसन पर बिराजमान हैं। बहुत ही गंभीर समस्या के समाधान हेतु विचार हाे रहा है। समस्या है, महाभारत के पात्रों में श्रेष्ठ कौन ?[…]

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1857 का स्वातंत्र्य संग्रामऔर चारण साहित्य-डॉ. अंबादान रोहड़िया

भारत पर विदेशियों के आक्रमण की परंपरा सुदीर्घ नज़र आती है। अनेक विदेशी प्रजा यहाँ भारतीय प्रजा को परेशान करती रही है। इनमें ब्रितानियों ने समग्र भारतीय प्रजा और शासकों को अपनी गिरफ़्त में ले लिया था। भारतीय प्रजा को जब अपनी ग़ुलामी का अहसास हुआ तो उन्होंने यथाशक्ति, यथामति विदेशी हुकूमत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। इस आंदोलन की शुरुआत थी 1857 का प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम। 1857 के स्वातंत्र्य संग्राम के प्रभावी संघर्षों तथा उनकी विफलता के कारणों के बारे में विपुल मात्रा मे ऐतिहासिक ग्रंथ लिखे जा चुके हैं। किंतु फिर भी, बहुत सी जानकारी, घटनाएँ, प्रसंग या व्यक्तियों के संदर्भ में ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं होती है। 1857 के संग्राम विषयक इतिहास की अप्रस्तुत कड़ियों को श्रृंखलाबद्ध करने हेतु इतिहास, साहित्य और परंपरा का ज्ञान तथा संशोधन की आवश्यकता है। इसके द्वारा ही सत्य के क़रीब पहुँचा जा सकता है। यहाँ 1857 के स्वातंत्र्य संग्राम में सहभागी चारण कवि कानदास महेडु की रचनाओं को प्रस्तुत करने का एक विनम्र प्रयास है।[…]

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कविराज श्री खूमदानजी बारहठ

भारतवर्ष की चारण काव्य महापुरुष परम्परा में कविराज श्री खूमदानजी बारहठ का नाम विशेष सम्मान और गौरव का प्रतीक है। कविराज श्री खूमदानजी बारहठ का जन्म पाकिस्तान के चारणवास ग्राम भीमवेरी, तहसील-नगरपारकर, जिला-थरपारकर, सिंध प्रदेश में दिनांक 08 फरवरी 1911, विक्रम संवत 1968 माघ शुक्ल द्वादशी, शुक्रवार को श्री लांगीदानजी बारहठ ( पुनसी बारहठ, मूल निवासी भादरेस, बाड़मेर) के घर हुआ था।

कविराज जन्म से ही प्रतिभा संपन्न बालक थे। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा तत्कालीन विख्यात संत श्री संतोषनाथजी के श्रीचरणों में सम्पूर्ण हुई थी। गुरु श्रीचरणों में आपको गुजराती, हिंदी एवं सिंधी भाषाओँ का ज्ञान प्राप्त हुआ। आपने अल्पायु में रामायण, गीता, महाभारत, चारों वेद, रघुनाथ रूपक, सत्यार्थ प्रकाश, रूपद्वीप पिंगल आदि प्रमुख धर्म ग्रंथो का विधिवत अध्ययन कर लिया था। गुरु अनुकम्पा एवं शाश्त्रों के गहन अध्ययन से आपके विचारों में परिपक्वता बढ़ी और आप काव्य रचना की और अग्रसर हुए।[…]

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अम्मा तेरी है क मेरी

आ दुनिया अलबेली है। इणमें बडाबडी रा डेरूं बाजै। अेक सूं अेक उपरला पीर पैदा हुवै। हर मिनख खुद नैं दुनिया रो सबसो स्याणो अर सही आदमी मानै अर दूजोड़ां रै कामां में कमियां निकाळै। खुद री अकल माथै इधको गुमेज राखै। कई बार जाणबूझतां लोग जागतां नैं पगांथियां न्हाखण री असफळ कोसीसां करै। कई बार तो फब ज्यावै पण कई बार खुद रो वार खुद पर भारी पड़ ज्यावै। आपसूं उपरलो उस्ताद मिल्यां आंख्या चरड़-चरड़ खुल ज्यावै। नहलै पर दहलो मारणियां रो घाटो कोनी, इण खातर घणी हुंस्यारी दिखाण सूं पैली आदमी नैं सोचणो जरूर चाईजै।

आपणै अठै घरां मांय सासू अर बहू री छोटी-मोटी खींचताण आम बात मानीजै। सासू अर बहू री खींचताण में दुधारी तलवार रा रगड़का बापड़ै बीं मिनख रै लागै जको अेक रो बेटो अर अेक रो घरधणी है। बो दो पाटां रै बिचाळै पिसीजै। बात घणी बधज्यावै जणां न्यारा-न्यारा होवणो पड़ै। अेकर इयांकलै ई जंजाळ में फंस्योड़ै अेक मोट्यार राड़ आडी बाड़ करण री सोच’र आपरी मा नैं गाम में राखी अर बहू नैं शहर मांय ले आयो। पण न्यारी हुयां पछै ई बहू रै मन में सासू रै प्रति भाव सागण ई रैया। सासू-बहू रै ठीकरी में घाली ई नीं रळै। बहू आपरी सासू नैं सबक सिखावणो चावै।[…]

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वीर मेहा मांगल़िया संबंधी भ्रामक धारणाएं व निराकरण

पाबू हरभू रामदे, मांगल़िया मेहा।
पांचू पीर पधारिया, भड़ गोगा जेहा।।

इस लोक रसना पर अवस्थित दोहे में मध्यकालीन पांच जननायकों के सुयश की सौरभ गांव-गांव, ढाणी-ढाणी में अपनी सुवास लिए आज भी संचरित हो रही है। उल्लेखनीय यह बात है कि गोगाजी, पाबूजी, रामदेवजी, आदि का जहां प्रामाणिक जीवन परिचय यहां की ख्यातों, बातों, लोक काव्य व डिंगल काव्य में उपलब्ध है वहीं मेहाजी मांगलिया का जीवन परिचय बातों, ख्यातों व लोक काव्य में कम ही प्राप्त होता है, परंतु डिंगल काव्य में जरूर मिलता है लेकिन वो भी प्रचुर मात्रा में नहीं। यही कारण है कि इस जननायक के विषय में जितना भी लिखा गया उसमें इनसे संबंधित जानकारी नहीं देकर मेहराज सांखला से संबंधित जानकारी दी जाती रही है। मेहाजी मांगलिया पर लिखने वाले तमाम लेखकों ने कमोबेश आम पाठक के मन मे यह भ्रामक धारण सुदृढ़ करने का काम किया कि मेहराज सांखला ही मेहा मांगलिया के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं। मेहाजी मांगलिया अपने समय के उदार क्षत्रिय, वीर पुरुष, और प्रणवीर थे। राजस्थान के महान पांच जननायकों अथवा ‘पंच पीरों’ की अग्र पंक्ति के लोकमान्य नायकों में शुमार हैं, ऐसे में आम पाठक को इनकी सही और प्रामाणिक जानकारी होनी ही चाहिए, इसी बात को दृष्टिगत रखते हुए इनकी जानकारी देना समीचीन रहेगा।[…]

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भद्रकालिका नाराचवृत्त स्तवनम्

शवारूढे स्मशानवासिनी शिवे, दयानिधे।
अघोरघोर गर्जनी, रता मदे दिगंबरी।
विशाल-व्याल केशिनी, प्रपूजिता मुनिश्वरम्।
महाकपालि! मुण्डमालि! भद्रकालिकां भजे।।१

निरावलंबलंबिनी, करालकष्टनष्टनी।
मंदांधमूढदैत्यदुष्टदर्पभंजनी भवा।
मनोविकारदाहिवह्निरूप ज्वालमालिके।
महाकपालि! मुण्डमालि! भद्रकालिकां भजे।।२

रणे वने जले स्थले गढे पुरे च पर्वते।
क्षणे क्षणे पलेलवे अपत्य रक्ष अंबिके।
सदामनोनुकूलभक्त मात! भैरवी सुखे।
महाकपालि! मुण्डमालि! भद्रकालिकां भजे।।३[…]

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हुकम!ओ ई चंदू रो भतीजो है!!

कोई पण जिण रेत में रमै अर जिण कुए सूं काढ पाणी पिवै उणरो असर कदै ई जावै नीं। इणगत रा पुराणा दाखला आपांरी मौखिक बातां अर ख्यातां में पढण अर सुणण नै मिल़ै। ऐड़ी ई एक रेत अर पाणी रै असर री मौखिक कहाणी सुणणनै मिल़ै जिकी आप तक पूगती कर रैयो हूं। ठिरड़ै (पोकरण) रो गाम माड़वो आपरी वीरत अर कीरत रै पाण चारण समाज में ई नीं अपितु दूजै समाजां में चावो रैयो है। इणी धरा माथै हिंगल़ाज सरूपा देवल रो जनम होयो तो देवल सरूपा चंदू माऊ जनमी, जिणरै कोप सूं पोकरण ठाकुर सालमसिंह मरियो-

जमर चंदू थूं जल़ी, तैंसूं कूण त्रिसींग।
पोढी हंदो पाटवी, सोख्यो सालमसींग।
चंदूबाई परचो चावो रे, आयल म्हारै हेलै आव।।
~~जगमालजी मोतीसर

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नदी रुपाळी नखराळी – कवि दादूदान प्रतापदान मीसण

।।छंद – त्रिभंगी।।
डुंगर सूं दडती, घाट उतरती, पडती पडती, आखडती।
आवै उछळती, जरा नि डरती, हरती फिरती, मद झरती।
किलकारां करती, डगलां भरती, जाय गरजती जोराळी।
हिरण हलकाळी, जोबन वाळी, नदी, रुपाळी, नखराळी।।1।।

आंकडियां वाळी, वेल घटाळी, वेलडियाळी, वृखवाळी।
अवळां आंटाळी, जांमी झाळी, भेखडियाळी, भे वाळी।
तिणने दे ताळी, जातां भाळी, लाखणियाळी लटकाळी।
हिरण हलकाळी, जोबन वाळी, नदी, रुपाळी, नखराळी।।2।।[…]

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