सूरजदेव स्तुति

।।छंद – मुकंदडंबरी।।
परभात री जोत दिपै परभाकर,
नित्य नवीन करै किरणां।
उतसाह उमंग सुचंग भरै उर,
तारण नाथ सदा तरुणा।
जगचक्ख अहो जगनायक जोगिय,
काज धरा करणो करुणा।
सुण गीध सलाम सदामद सूरज,
नाम ललाम रटो निरणा।।1[…]

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अपभ्रंश साहित्य में वीररस रा व्हाला दाखला

आचार्य हेमचंद्र आपरी व्याकरण पोथी में अपभ्रंश रा मोकळा दूहा दाखलै सरूप दिया है। आं दूहाँ में वीर रस रा व्हाला दाखला पाठक नै बरबस बाँधण री खिमता राखै।आँ दूहाँ रो सबसूं उटीपो पख है -पत्नियां रो गरब। आपरै पतियां रै वीरत री कीरत रा कसीदा काढ़ती अै सहज गरबीली वीरबानियां दर्पभरी इसी-इसी उकतियां री जुगत जचावै कै पाठक अेक-अेक उकत पर पोमीजण लागै। ओ इसो निकेवळो काव्य है, जिणमें मुरदां में नया प्राण फूंकण री खिमता है।

आप-आपरै वीर जोधार पतियां री बधतायां गिणावती वीरबानियां में सूं अेक बोलै-“हे सखी! म्हारो सायबो इण भांत रो सूरमो है कै जद बो आपरै दळ नैं टूटतो अर बैरी-दळ नैं आगै बढतो देखै तो चौगणै उछाह रै साथै उणरी तलवार तण उठै अर निरासा रै अंधकार नैं चीरती ससीरेख दाईं पिसणां रा प्राण हर हरख मनावै-
भग्गिउ देक्खिवि निअअ वलु, वलु पसरिअउ परस्सु।
उम्मिल्लइ ससिरेह जिंव, करि करवालु पियस्सु।।[…]

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स्वामी कृष्णानन्द सरस्वती

वह महामानव थे। उदार थे, व्यवहारिक थे, यंत्र-तंत्र-मंत्र में विश्वास नहीं था उनका। मानव सेवा उनका कर्म था। उसी सेवा के आसपास सभी मसलों का वह हल देखते, खोजते समेटते थे। वह सहज थे, सरल थे, सादा जीवन जीते थे। पहनते बेशक वह गेरूआ वस्त्र थे लेकिन घुर, कट्टर साधुओं-स्वामियों-संतों जैसी भावभंगिमाओं से अछूते थे। गतिशील विचार थे, रचनात्मक सोच थे, विचारशील थे, वर्तमान स्थितियों-परिस्थितियों से परिचित थे, उपदेश से परहेज करते थे। गहन अध्ययन था। केवल धार्मिक, आध्यात्मिक ग्रंथों का ही नहीं क्लासिक ग्रंथों से भी भलीभांति परिचित थे। उनके गहन और व्यापक व्यक्तित्व को जानने-समझने-परखने के लिए पारखी नजरों की जरूरत हुआ करती थी। आशीर्वाद तो सभी को देते थे जो उनसे मुलाकात करने आता था लेकिन दिल की बातें उसी से किया करते थे जो उनकी पारखी नजरों पर खरा उतरते थे। जी हां, मैं जिक्र कर रहा हूं अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संत स्वामी कृष्णानंद सरस्वती का।[…]

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अपभ्रंश साहित्य रो सिणगार वर्णन

सिणगार तो हर भाषा रै लिखारां रो प्रिय विषै रैयो है। अपभ्रंश साहित्य रा थोड़ाक सिणगार रस प्रधान दूहा आप विद्वानां रै सामी प्रस्तुत है। अपभ्रंश भाषा में मोकळा पण्डित कवि होया है पण जिण दूहां री चरचा आगै होवणी है, वै इण भांत रै पंडितां रा लिखेड़ा नीं लागै। हां हो सकै कै आं दूहां रा लिखारा पारंगत पंडित हा पण दूहां रै सिरजण रै समै वै पंडिताई सूं ब्होत ऊपर उठेड़ा हा। सहज भाव ब्होत कठोर साधना सूं मिलै। कीं दाखलां सूं बात स्पष्ट होवैला।

अेक विरह-व्याकुळ प्रिया कैवै कै “जियां-कियां ई जे मैं म्हारै प्रिय नैं पा लेवती तो अेक इसो खेल रचती, जिसो आज लग नीं रचिजियो। प्राणपीव रै रूं-रूं में इयां रम जावती जियां माटी रै नयै सिकोरै में पाणी पैठ जावै अर उणरै अंग-प्रत्यांग नैं भीनो कर जावै“-
जइ केबइं पावीस पिउ, अकिआ कुड्डु करीसु।
पाणिउ नवइ सरावि जिबं, सब्बंगे पइसीसु।।[…]

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बोधिसत्व री मैत्रीभावना

।।बोधिसत्व री मैत्रीभावना।।

भूखा खाली पेट पकड़ियां,
है सोवण हित मजबूर जका।
तिस मरता पाणी बिन रोवैै,
तड़पैै है बिना कसूर जका।

धीरज छूटण सूं पैली ही,
कछु हाय! इसी जे बण पावै।
प्यासोड़ा ठंडो जळ पीवै,
भूखोड़ा भोजन पा जावै।[…]

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नज़्म – नजर नें छू लिया जिस दम

नजर नें छू लिया जिस दम तो मेरे दिल ने ये सोचा,
यहाँ पर हर किसी का चाँद सा चेहरा नहीं होता।
मगर फिर भी मुझे वो चाँद का ही अक्स लगता है,
नहीं तो इस कदर मह दीद को ठहरा नहीं होता।१

जेहन में जिक्र आता है जब उस रूखसार का मुझको,
तो दिल मेरा पुकारे है वो गहरी झील सा होगा,
पतंगा बन मेरा मन जलने को बेताब सा होगा,
और वह भी इश्क में मेरे जला कंदील सा होगा।।२[…]

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हमारे अग्रज – भंवरदान रत्नू ‘मधुकर’ (खेड़ी)

जिन चारण साहित्यकारों ने व्यापक फलक पर काम किया लेकिन अपरिहार्य कारणों से उनकी पहचान सर्वत्र नहीं बन पाई।कारण कोई भी रहा हों लेकिन यह सत्य तथ्य है कि इन मनीषियों के काम की कूंत साहित्यिक जगत के समक्ष नहीं के बराबर आई है। ऐसे ही काम में अग्रणी और नाम में विश्वास नहीं रखने वालें एक मनीषी हैं, भंवरदान रत्नू ‘मधुकर’

‘मधुकर’ एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने मौलिक लिखने के साथ अपने पूर्ववर्ती विद्वानों द्वारा प्रणीत काव्य जो आजकी पीढ़ी के लिए सुलभ तो हैं लेकिन अध्ययनाभाव के कारण उनके लिए सुगम नहीं, को बौधगम्य बनाने हेतु स्तुत्य कार्य किया है।

इनके कार्य की तरफ इंगित करूं उससे पहले इनकी साहित्यिक विरासत की तरफ थोड़ा ध्यानाकर्षण करना समीचीन रहेगा।[…]

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गुण-गर्जन

गरजा बादल गगन में,
घटा बनी घनघोर।
उमड़-घुमड़ कर छा गए,
अम्बुद चारों ओर।

सुन कर गर्जन समुद्र को,
आया क्रोध अपार।
मूढ़ मेघ किस मोद में,
गर्जन करत गंवार।।

मेरे जल से तन बना,
अन्य नहीं गुण एक।
मो ऊपर गर्जन करत,
लाज न आवत नेक।।[…]

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हालाँ झालाँ रा कुँडळिया – ईसरदास जी बारहट

“हालाँ झालाँ रा कुँडळिया” ईसरदास जी की सर्वोकृष्ट कृति है। यह डिंगल भाषा के सर्वश्रेष्ट ग्रंथों में से है। इसकी रचना के सम्बन्ध में निन्नलिखित किंवदंती प्रसिद्ध है।
एक बार हलवद नरेश झाला रायसिंह ध्रोळ राज्य के ठाकुर हाला जसाजी से मिलने के लिए ध्रोळ गये। ये उनके भानजे होते थे। एक दिन दोनों बैठकर चौपड़ खेलने लगे। इतने में कहीं से नगाड़े की आवाज इनके कानों में पड़ी। सुनकर असाजी क्रोध से झल्ला उठे और बोले – “यह ऐसा कौन जोरावर है जो मेरे गांव की सोमा में नगाड़ा बजा रहा है” फौरन नौकर को भेजकर पता लगवाया गया।[…]

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