ठिरड़ै रा ठाट

।। ई काणिये मारिया पा?।।

शेर नै ई सवाशेर‘ अर ‘बाबै के ई बाबो‘ जैड़ा कैतांणा बणिया है तो कीं न कीं कारण रह्यो है। तो आ ई साची है कै सौ दिन चोर रा अर एक दिन घणी रो हुवै। इयां तो आ ई साची है कै खावैलो जिणरो खेतियो ईज खावैलो ! अर खेतिया रा खावैला उणरो खो जावैलो पण जिकै खो जावण सूं नीं डरै वै ईज खेतिये रा खावण री हूंस राखै।

ऐड़ो ई एक शेखावाटी में भलो मिनख बसै। घर रै नीं बाड़ अर नीं झूंपड़ै रै किंवाड़ पण आंटीली मूंछां अर डील रो डकरेल। बातां रा लठीड़ काढै तो कमाई रै नाम माथै उण कनै रामो ई राम हरे, पण एक ठाकरां सूं बेलीपा। उणरै एक बाई। बाई परणावण सावै हुई जणै जोड़ायत कह्यो कै – “भलै मिनखां छोरी नै पराए घरै मेलणी है कीं तो करो ! घरां जैड़ो घर है अर थे जोगता मिनख ! इयां बातां सूं कियां पार पड़सी?”[…]

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विजयी एवं पराजयी मानसिकता

युवाओं के हृदय सम्राट एवं भारतीय मनीषा के महनीय आचार्य स्वामी विवेकानन्द के साहित्य का अध्ययन करने पर सार रूप में यह समझ आया कि व्यक्ति की हार एवं जीत में उसकी मानसिकता का अहम योगदान रहता है। कबीर ने भी ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत‘ कह कर इस तथ्य को पूर्व में ही स्वीकृति दी है। स्वामीजी के अनुसार मानव समाज में दो तरह की मानसिकताएं सदैव साथ-साथ काम करती है। एक ही काम, एक ही व्यक्ति एवं एक ही विषय पर हमारी अलग-अलग राय के पीछे ये मानसिकताएं ही काम करती है। ये हैं – 1. विजयी मानसिकता एवं 2. पराजयी मानसिकता। इसे हम सकारात्मक एवं नकारात्मक भी कह सकते हैं तो आशावादी एवं निराशावादी मानसिकता भी कह सकते हैं।[…]

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अभिराम छबि घनश्याम की

।।कवित्त।।

मोरपंखवारा सिर, मुकुट सु धारा न्यारा,
नंद का कुमारा ब्रज, गोप का दुलारा है।
कारा कारा देह, मन मोहता हमारा गिध,
गनिका उबारा अजामिल जिन तारा है।
वेद श्रुति सारा “नेति नेति” जे पुकारा, जसु-
मति जीव-प्यारा मैने, उर बिच धारा है।
आँखिन की कारा बिच घोर हा अँधारा, सखि !
कृष्ण दीप बारा, तातें फैला उजियारा है।।१[…]

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हूं कांई? होको तो खुद डोकरो खांचै!

मेवाड़ धरा रा राणा जितरा सूरमापणै में अजरेल उतरा ई उदारता में टणकेल। महाराणा प्रताप जिता वीरता रा पूजारी,उतरा ई कविता रा पारखी। आजादी री अलख रै उण आगीवाण महासूरमै माथै समकालीन मोकल़ै कवियां काव्य रचियो।

एक दिन राणा रो दरबार लागोड़ो हो। कूंट-कूंट रा कवेसर आप आपरी गिरा गरिमा री ओल़खाण दे रह्या हा। उणी बखत कानैजी सांदू ई आपरो एक गीत पढियो। गीत सुण’र महाराणा घणा राजी हुया अर इणांनै गोढवाड़ रो गांम मिरगेसर इनायत कियो-

गोढाण धरा वाल्ही गढे,
आछा अरहर गांम अत।
परताप राण तांबा-पतर,
दियो मिरगेसर गांम दत।।[…]

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आंधै विश्वास तणो अंधियारो!

।।गीत जांगड़ो।।

आंधै विश्वास तणो अंधियारो,
भोम पसरियो भाई।
पज कुड़कै में लिखिया पढिया,
गैलां शान गमाई।।1

फरहर धजा बांध फगडाल़ा,
थांन पोल में ठावै।
बण भोपा खेल़ा पण बणनै,
विटल़ा देव बोलावै।।2[…]

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अरे भइया ! आ तो गधा गाल़णी धरती है!

एकर एक थल़ी रो बासण घड़णियो कुंभार आपरै गधे माथै ढांचो मेलियो अर उणमें पारी, चाडा, तामणिया, कुल़डकी, चुकली, भुड़की आद घाल’र पोकरण कानी निकल़ियो।

पोकरण पूगो पण उण सोचियो कै गांमड़ां में मजूरी ठीक हुसी सो उवो पोकरण सूं दिखणादी-आथूणी कूंट में निकल़ियो।
थोड़ोक आगै निकल़ियो तो उणनै सुणिज्यो कै लारै सूं कोई मिनख हेलो कर रह्यो है। उवो हेलो सुण’र ठंभियो। हेलो करणियो मिनख नैड़ो आयो अर खराय’र साम्हैं जोवतै पूछियो-
“कयो(कौन) है रे!”

कुंभार कह्यो – “बा ! हूं तो थल़ी कानलो फलाणो कुंभार हूं।”[…]

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कहां वे लोग, कहां वे बातें ?

।।16।।
हिम्मत और भ्रातृत्व!

राजस्थानी में एक कहावत है कि ‘नर नानाणै अर धी दादाणै।’ वास्तव में हम प्राचीन काल से लेकर अद्यावधि तक ऐसे लोगों पर दृष्टिपात करें तो यह कहावत सत्य प्रतीत होती है। हमारे गांव में मुरल़जी अगरजी के हुए थे। उनका ससुराल सींथल पीथों के बास में सत्तीदानजी के घर था। विदित रहे कि सत्तीदानजी आदि पांच भाई थे और पांडव कहलाते थे। सत्तीदानजी शक्तिशाली पुरूष थे जिनके अनेक किस्से प्रसिद्ध हैं। इन्हीं सत्तीदानजी की पुत्री मोहनबाई हमारे गांव के मुरल़जी(मुरलीदानजी) को ब्याही थी।[…]

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