चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – १८ | दूसरा अध्याय – चारण साहित्य की पृष्ठभूमि
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| प्रसंग – ऊजली – जेठवा

प्रतीक्षा करने की भी सीमा होती है। प्रिय के न आने की सम्भावना से ऊजली का हृदय भर आया। वह अपने कृष्ण-मिलन की मधुर आशा में घर से निकल ही पड़ी। स्थान की दूरी का क्या भय? मार्ग में बरसने वाले अंगार श्रंगार बन गये, दुर्गम घाटी सोहाग-शैय्या का रूप ले बैठी। राजभवन में उप-स्थित होकर जैसे ही उसने जेठ रूपी सघन छांह देखी वैसे ही उसका श्रांत-क्लांत मन सरसित हो उठा-[…]

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सींथल़-सुजस इकतीसी

।।दूहा।।
सुकवी संतां सूरमां, साहूकार सुथान।
सांसण सींथळ है सिरै, थळ धर राजस्थान।।1

वंश वडो धर वीठवां, गोहड़ भो गुणियाण।
जिण घर धरमो जलमियो, महि धिन खाटण माण।।2

धरमै रो बधियो धरम, भोम पसरियो भाग।
जांगल़पत गोपाल़ जो, उठनै करतो आघ।।3

धरमावत मेहे धरा, कीरत ली कवराव।
सांगट देव हमीर सा, आसै जिसा सुजाव।।4[…]

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सूरां मरण तणो की सोच?

राजस्थान नै रणबंकां रो देश कैवै तो इणमें कोई इचरज जैड़ी बात नीं है। अठै एक सूं बध’र एक सूरमा हुया जिणां आपरी आण बाण रै सारू मरण तेवड़ियो पण तणियोड़ी मूंछ नीची नीं हुवण दी। वै जाणता कै एक दिन तो इण धरती सूं जावणो ई है तो पछै लारै सुजस ई राख’र जावां कुजस क्यूं?

ओ ई कारण हो कै अठै नरां धरम, धरती अर स्त्री रै माण सारू आपरी देह कुरबान करती बखत मन चल़-विचल़ नीं करता बल्कि गुमेज रो विषय मानता-

ध्रम जातां धर पल़टतां, त्रिया पड़ंतां ताव।
तीन दिहाड़ा मरण रा, कहा रंक कहा राव।।[…]

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श्री आवड़ आराधना – कवि चाळकदान जी रतनू मोड़ी

।।छंद – हरिगीत।।
अंजुलिय इक्कर नलगि नख्खर सिन्धु हक्कर सोखिये।
तेमड़े तिहि कर दनू दह कर महिष भक्कर मोखिये।
मद रूपमत्ती सिंह सझत्ती वज्रहत्थी बदावड़ा।
जय मातु जगत्ती बीसहत्थी, आद सगती आवड़ा।
जिय आद रूपा आवड़ा।।१।।[…]

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ऊभा सूर सीमाड़ै आडा

।।गीत – जांगड़ो।।
ऊभा सूर सीमाड़ै आडा,
भाल़ हिंद री भोमी।
निरभै सूता देश निवासी,
कीरत लाटै कोमी।।१

सहणा कष्ट इष्ट सूं सबल़ा,
भाल़ रणांगण भाई।
ताणै राखै आभ तिरंगो,
करणा फिकर न काई।।२[…]

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शंकर स्मृति शतक – कवि अजयदान लखदान जी रोहडिया मलावा

लीम्बडी में राजपूत समाज द्वारा लीम्बड़ी कविराज शंकर दान जी जेठी भाई देथा की प्रतिमा का अनावरण दि. ११-मार्च-२०१९ को हुआ। कविराज शंकरदान जी से स्व. अजयदान लखदान जी रोहडिया मलावा बीस वर्ष की आयु में एक बार मिले थे और उस एक ही मुलाकात में इतने अभिभूत हुए कि जब कविराज शंकरदान जी जेठी भाई देथा लीम्बड़ी का देहावसान हुआ तब उन्होंने उनकी स्मृति में पूरा “शंकर स्मृति शतक” रच डाला। जो बाद में “शंकर स्मृति काव्य ” और “सुकाव्य संजीवनी” मैं शंकर दान जी देथा के सुपुत्र हरिदान जी देथा नें संपादित काव्य में समाहित किया।[…]

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देशभक्ति

कांईआप बता सको ?
कै
देशभक्ति रो दीप
किण विचारधारा रै वायरै सूं प्रजल़ै
अर
अरूड़ चानणो देवै?
अर
किण विचारधारा रै वायरै रै
दोटां सूं बुझै परो।
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अभिनंदन के अभिनंदन में–

तर चंदन है धर वीर सबै,
मंडिय गल्ल कीरत छंदन में।
द्विजराम प्रताप शिवा घट में,
भुज राम बसै हर नंदन में।
निखरै भड़ आफत कंचन ज्यूं,
उचरै कवि वीरत वंदन में।
छवि भारत की लखि पाक लही,
इक शेर इयै अभिनंदन में।।[…]

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