वाह तरव्वर वाह

लालच ना जस लैण रो, चित न बडाई चाह। आये नै दे आसरो, वाह तरव्वर वाह।।1 गहडंबर फाबै गजब, रल़ियाणो मझ राह।। पथिक रुकै परगल़, छिंयां, वाह तरव्वर वाह।।2 विहँग सीस वींटा करै, उर ना भरणो आह। दंडै नीं राखै दया, वाह तरव्वर वाह।।3 फूल तोड़ फल़ तोड़णा, पुनि सथ तोड़ पनाह। उण पँछिया नै प्रीत दे, वाह तरव्वर वाह।।4 ताड़्यां नह तूं रूसणो, दिल नह निकल़ै दाह। झांफ सटै फल़ झाड़ दे, वाह तरव्वर वाह।।5 थल़ थोथै में आंधियां, उडती रेत अथाह। उण वेल़ा इक आसरो, वाह तरव्वर वाह।।6 तपै जोर बल़ तावड़ो, पशुवां नहीं पनाह। छाजै सिर छायां […]

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किरसाण बाईसी – जीवतड़ो जूझार

।।दूहा।।
तंब-वरण तप तावड़ै, किरसै री कृशकाय।
करण कमाई नेक कर्म, वर मैंणत वरदाय।।1

तन नह धारै ताप नै, हिरदै मनै न हार।
कहजो हिक किरसाण नै, सुज भारत सिंणगार।।2

गात उगाड़ै गाढ धर, फेर उगाड़ी फींच।
खोबै मोती खेत में, सधर पसीनो सींच।।3

कै ज सिरै किरतार है, कै ज सिरै किरसाण।
हर गल्ल बाकी कूड़ है, कह निसंक कवियाण।।4[…]

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चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – ५४ | चौथा अध्याय – मध्यकाल (प्रथम उत्थान)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ – आलोचना खण्ड: वीर काव्य

मालदेव की वाहिनी के प्रयाण करने पर आकाश और पृथ्वी का रंग पलट गया –

है खूरख ऊपडे, चड़े अंबर रज डंबर।
झर झंगर तर विमर, हुवै पैमाल गिरोवर।।

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જેણે રામને ઋણી રાખ્યાં – દુલા ભાયા કાગ

જગતમાં એક જ જન્મ્યો રે જેણે રામને ઋણી રાખ્યાં
રામને ચોપડે થાપણ કેરા ભંડાર ભરીને રાખ્યાં
ન કરી કદીએ ઉઘરાણી તેમ સામા ચોપડા ન રાખ્યાં
જગતમાં એક જ જન્મ્યો રે જેણે રામને ઋણી રાખ્યાં
માગણા કેરા વેણ હરખથી કોઈને મોઢે ન ભાખ્યાં
રામકૃપાના સુખ સંસારી સ્વાદભર્યાં નવ ચાખ્યાં[…]

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માવલ સાબાણી અને આઇ રવેચીનો કુંભ (मावल साबाणी अने आई रवेची नो कुंभ)

કેરાકોટની રાજમહેલની અટારીયે આથમતાં સુર્યની ચર્ચા જોતી ચારણ આઇ જશી, રાણી સોનલ અને તેની દાસી ડાઈ એ ત્રણેય બેઠી હતી. એ દરમ્યાન સુર્યના કિરણમાંથી એક ફુલ મેડીની અટારીમાં પડયું. ફુલની સુવાસ ચોતરફ મધમધ ઊઠી. આઇ જેસી રાણી સોનલ અને દાસી ડાઈએ ક્રમશઃ ફુલ સુંઘે છે. ફુલની સુગંધ અલૌકિક ત્રણેય સખીઓ એ ફુલ સુંધી ઘોડારમાં નાંખે છે ત્યાં ઘોડારમાં નેત્રમ નામની ધોડી આ ફુલ સુંધે છે. આ ફુલમાં એવી દૈવીશક્તિ હતી કે જે સુંઘે તેને ઓધાન રહે. આથી ત્રણેય સખી અને ઘોડીને ઓધાન રહે છે. નવમે મહિને સોનલરાણીને પુત્ર લાખાનો જન્મ, ચારણઆઇ જેસીને પુત્ર માવલસીનો જન્મ, ડાઈબેનડીને કમલ દિકરીનો જન્મ અને ઘોડીને માણેરા વછેરાનો જન્મ થાય છે.આ ધટનાની ક્વિદંતી લોકોમાં ખુબજ પ્રચલીત છે.[…]

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गीत मथाणियाराय रो

पहर एक प्रभात रा, अमर रुकूँली आंण।
प्रण पूरै प्रमेश्वरी, मरूधर नगर मथांण।।

।।गीत।।
अमर दूदहर आवियो तेड़वा ईसरी,
मया कर जोध पर आज माता।
सार कर रिड़ै-तण काज गढ सारजै,
निजर भर इमी री पाल़ा नाता।।1[…]

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ऊंठ रो गीत (प्रहास साणोर)

।।गीत – प्रहास साणोर।।
अगै करहलां जोड रा वरी धिन कीरती,
तीखली तोड रा ढांण ताता।
हेरिया नहीं धर दूसरी होड रा,
महि मन पूरणा कोड माता।।1[…]

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शरणागत पंखी रै सारू मरणिया !!

महात्मा ईसरदासजी आपरी काल़जयी कृति ‘हाला-झाला रा कुंडलिया’ में लिखै कै “सिंह रा केश, नाग री मणि, वीरां रो शरणाई, सतवंती रा थण अर कृपण रो धन फखत उणां रै मरियां ईज दूजां रै हाथां पड़ै, जीवतां नीं। जे ऐ जीवता है ! अर कोई इणां री इण चीजा़ं रै हाथ घालै, तो घालणिये नै मरणो ईज पड़ै। उणां आ बात किणी अटकल़ पींजू डोढसौ री गत नीं लिखी बल्कि कानां सुणी अर आंख्यां देखी रै मेल़ सूं मांडी-

केहर केस भमंग मण, शरणाई सूहड़ांह।
सती पयोहर कृपण धन, पड़सी हाथ मूवांह।।[…]

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कूड़ लारै, धूड़!!

जोधपुर रै थल़वट इलाकै रो जुढियो गांम आपरी साहित्यिक अर सांस्कृतिक विरासत रै पाण चावो रह्यो है। इणी जुढिये में सोनथल़ी (एक धोरै रो नाम) माथै थल़वट री आराध्या देवी सैणीजी रो मढ(मंदिर) है–

धिन-धिन रै धोराह, वेदासधू विराजिया।
सकवी रह सोराह, सरण तिहारी सैणला।।

सैणीजी रै कारण ई रियासत काल़ में जुढियो प्रसिद्ध अर गजबंध गांम मानीजतो-

प्रथम शेरगढ परगनै, गजबंध जुढियो गांम।[…]

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कविता करणी ई व्है तो करजो !!

कविता करणी व्है
तो करजो!
धूवादी उरड़ती
काल़ोड़ी कांठल़ में
भूरड़ै भुरजां में
नागण सी
वल़ाका खावती
काल़ रो माथो किचरण
अंतस में उमंग
पल़कती बीजल़ री।[…]
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