अंबा स्तवन

।।दोहा।।
दुर्गा दुर्गतिनाशिनी, वासिनी गिरि कैलास।
मंदहासि मृदुभाषिणी, मां काटो यमपाश।।१
जगत-वत्सला जोगणी, जयतु जयतु जगदंब।
करुणेशि! करुणाकरा, हे जननी-हेरंब।।२
चंडी! दंडी-दैत्य-दल, परम प्रचंडी मात।
झंडी फरकै देवल़े, जोत अखंडीथात।।३
उमा! रक्तवसना! शिवा!, भवा! प्रिया-ईशान।
अनपुरणा, अनदायिनी, सकल-सुमंगल-खान।।४
वंदे! विन्ध्यनिवासिनी, खड़गपाणि! खल-खंड।
सिद्धिदात्रि शंकरप्रिया, परमा! तेज-प्रचंड।।५

।।छंद त्रिभंगी।।
अयि! उमा अपरणा, हर मन हरणा, वेद सु बरणा, सुर सरणा।
उर आनंद भरणा, करुणा करणा, नेह निझरणा, बहु वरणा।
वपु गौर सुवरणा, पाप प्रजरणा, सौख्य सुभरणा, सुख स्तंभा।।
भज मन भुजलंबा! कृपा कदंबा! जय जगदंबा! श्री अंबा!
जय जय जगजननी जगदंबा!!१

वरदायक वाणी, पुस्तक पाणी, कवि कल्याणी, ब्रह्माणी।
उर भाव उपाणी, लय यति लाणी, राग रिझाणी, प्रति-प्राणी।
देवी स्वर दानी, वीण बजाणी, ओ अज-राणी, वरदंबा!
भज मन भुजलंबा!, कृपा कदंबा!, जय जगदंबा!श्री अंबा!
जय जय जगजननी जगदंबा!!२

मुरली मुरचंगम, चितहर चंगम, झांझ मृदंगम, धींगड ध्रम।
सब नव लख संगम, रमत सुरंगम, द्रां द्रां द्रम् द्रम्, तिरकिट तम्।
देखत सब दंगम, द्रश्य विहंगम्, सुरमुनि संगम, रति रंभा।
भज मन भुजलंबा!, कृपा कदंबा, जय जगदंबा, श्री अंबा।
जय जय जगजननी जगदंबा।।३

महिखासुर मुंडा, बहु बरिबंडा, महि पर मंडा, पाखंडा।
दाणव दुरदंडा, देवी दंडा, खल बल खंडा, बरु चंडा।
निरभय नवखंडा, रख ब्रहमंडा, महि चामुंडा, पालंबा।
भज मन भुजलंबा, कृपा कदंबा, जय जगदंबा, श्री अंबा।
जय जय जगजननी, जगदंबा!।।४

वसू व्योम विशाला़, जोगण ज्वाला़, कर करवाला़, वपु बाला़।
मोती मणि-माल़ा, माणक लाला रम्य प्रवाला़, बिच डाला।
पुनि चंद्र कपाला, वर-गिरि बाला, सुतन-सुंडाल़ा, हेरंबा।।५
भज मन भुज लंबा, कृपा कदंबा, जय जगदंबा, श्री अंबा।
जय जय जगजननी जगदंबा।।५

दुं दुर्गतिनासी, व्योम विलासी, मां मृदुहासी, शुभ-भासी।
काटत जम फांसी, अनड़ अवासी, सिधि रिधि दासी, सुख रासी।
तन तेज प्रकासी, अरक उजासी, तूं खल त्रासी, जल़ल़ंबा।
भज मन भुजलंबा, कृपा कदंबा, जय जगदंबा, श्री अंबा।।६

कलि कल्मष गंजनि, भव भय भंजनि, नमो निरंजनि, शंकरनी,
मुनि मानस रंजनि, रव शिवरंजनी, भव भय भंजनी, श्रुति बरनी।
खल दुस्ट निकंदनि, सुख उर स्पंदनि, गिरिवर नंदनि, अवलंबा।
भज मन भुजलंबा, कृपा कदंबा, जय जगदंबा, श्री अंबा।
जय जय जगजननी, जगदंबा।।७

विधु वदन अघोरी-संकर, गौरी! आप चकोरी, मन भोरी।
मति चंचल मोरी, दाखूं डोरी, है हथ थोंरी, मां मोरी!
गिरिराज किशोरी, विनय सुनोरी, करत करोरी, नृपतंबा।
भज मन भुजलंबा, कृपा कदंबा, जय जगदंबा, श्री अंबा।
जय जय जगजननी जगदंबा।।८

।।कलश छप्पय।।
उमा अपरणा अंब, बीसहथ काल़ी वाणी!
भयहारी भुजलंब, कमल़-कर! खड़ग कृपाणी!
तूं तरुणी त्रिपुरारि, जयतु जय जृंभिणि जोगण।
सुर-मुनि-किन्नर सेव्य, अंब उर धर मत औगण।
है करी वंदना कोड़ कर, अरज इती छै अंबिका।
शिशु “नरपत” नें राखो शरण, ज्वाला! दुरगा! चंडिका।।

।।दोहा।।
कमला, वाणी, कालिका, भवा उमा भुजलंब।
तवन त्रिभंगी त्रृठजो, जगजननी जगदंब।।१
ऐं ह्री क्लीं मंत्रात्मिका, सती! शिवा! सुख-स्तंभ।
जग में म्हारै जोगणी, आप एक अवलंब।।२

~~©नरपत वैतालिक

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