असही सही न जाय!

एक जमानो हो जद लोग चीकणी रोटी जीमता पण चीकणी बात करण सूं परहेज राखता। हर भजण अर हक बोलण में विश्वास राखता। अजोगती बात करणियो कोई धंतरसिंह क्यूं नीं हुवै, उणनै ई साच कैवता नीं संकीजता। आज जद आपां हर नाजोगी बात देख’र अथवा सुण’र बेहिचक कैय देवां कै – “बल़णदे नीं आपांरो कांई लेवै या आपां क्यूं किणी सूं बिनां लाभ खरगसो बांधां।” पण उण जमानै में लोग खूटोड़ी बात रो भचाक विरोध करता। भलांई उणांनै उण बात रै विरोध सरूप कितरो ई नुकसाण उठावणो पड़तो।

ऐड़ो ई एक किस्सो है सीकर रा राजकुमार जसवंतसिंहजी अर देवराजजी चारण रो।

बात यूं है कै खाटू रा जोधा इंद्रभाणजी, पातसाह ओरंगजेब रै आदेश सूं लाडखानी माधोजी रै वीर सपूत सूरोजी नै पकड़ण आया पण जुद्ध में सूरोजी इंद्रभाणजी रै हाथां रणखेत रह्या। इंद्रभाणजी जावता उणांरा हथियार अर सवारी री घोड़ी ई ले गया। उणां घोड़ी रो नाम शेखावती राख दियो। आ बात शेखावतां रै खटकी पण ओरंगजेब रै आतंक सूं कोई शेखावत, इंद्रभाणजी रो बाल़ ई बांको नीं कर सकियो।

एक’र पातसाह ओरंगजेब अजमेर सूं दिल्ली जावतै पर्वतसर कनै डेरा किया। इण लवाजमे में सीकर राजकुमार जसवंतसिंहजी ई दूजोद सूं जाय भेला हुया। उठै इंद्रभाणजी रै डेरे में चारण देवराजजी ई साथै हा।

दिन बधियो। जाजमा जमी सरदारां रै दारू चढियो। जोग सूं नसै में मदछकिये इंद्रभाणजी आपरै चाकर नै हेलो कियो अर आदेश दियो कै – “जा ! शेखावती माथै जीण कसला ! म्हारै चढ’र फैरण री मनमें आयगी।” आ बात उठै बैठां देवराजजी सुणी। तो उणां इंद्रभाणजी नै कह्यो- “खमा! आपतो वडा सरदार हो ! इयां कांई हलकी बात करो ? ऐ तो हलकै मिनखां रा हलका बोल है-जगमें नर हल़का जिका, बोल़ै हल़का बोल। आप तो राजवी हो। नीं तो ओ घोड़ी रो नाम ओपै अर नीं आपरा ऐ बोल फबै।”
इंद्रभाण नै अवोड़ो कुण दे? पछै –

आधो नाग अभोमियो, मदवो मायादार।
परतख चलै नै पाधरा, समझावो सौ बार।।

उवै रीस में भाभड़ाभूत हुयग्या अर बोल्या – “बाजीसा! लागै बाटी खावता नै बूझ आवै! म्हारै डेरे, म्हनै ई ग्यान! मोटो घणो दल़ो! हूं खाटू रो धणी! बोलणो आपसूं सीखसूं? शेखावती नै म्हैं भुजां रै पाण खोसी है, समझ्या। जीभ वश में राखजो। पाछो ग्यान मत बगारजो। आपनै ऐड़ी अजोगती कीकर लागी?आपरै तो जैड़ा शेखा वैड़ा ई जोधा। ”

आ सुणतां ई बाजीसा नै ई रीस आयगी। उणां कह्यो – “जा रे खाटू रा धणी! चूड़लै वाल़ी नै घर घर न्यूंतो है। म्हे चारण हां। म्हांरै बैठां कोई हल़को बोलै। उणनै समझावणो म्हांरो फर्ज है-

रजब्ब तेरे बाग में, दाख तोड़ खर खाय।
हमरो कछु बिगड़ै नही, असही सही न जाय।।

ऐड़ी हल़की बात कोई शेखावत सुणै तो वैर है! जिणसूं ई बधीक हुवै।”

आ सुणतां ई इंद्रभाणजी बोल्या-
“ओ डेरो छोडो अर जठै विराजो उठै ओ फर्ज निभावजो। नीतर म्हारो हाथ उठ जावैला। शेखावतां रै जावो अर म्हारी आ जीभ बढावो तो बढा दीजो।”

आ सुणतां देवराजजी अजेज उठिया अर बोल्या – “लागै आज थनै अपसुगन हुया है। डेरो रो डोरो नीं करदूं तो म्हनै फिट कहीजै। म्हे मान अर अपमान दोनां रो करज चूकावणो म्हांरो फर्ज मानां। आजरी रात कै थारी छेहली कै म्हारी।”

आ कैय देवराजजी खाटू रै डेरे सूं निकल़’र दो-च्यार जोगतै शेखावतां रै डेरे पूगा अर बात धरामूल़ सूं बताई पण किणी कान ई ऊंचो नीं कियो।

जाणै गाडर रै माथै जूती ठैराई है। बाजीसा नै आपरा कपड़ा खावण लागा। उणांनै याद आयो कै आज जसवंतसिंहजी सीकर ई अठै है। उवै आधी रात रा उणां रै डेरे पूगा। डेरे में सल़वल़ हुई। जसवंतसिंहजी जागिया अर पूछियो- “कुण है?” आ सुणतां ई देवराजजी बोल्या-

खागां खल़ के खंडिया, गुमर रख्यो गहवंत।
कानां सुणियो कव सदा, जस थारो जसवंत।।

पिसण करै खग पाधरा, वंश विहंडण वैर।
मंडण कुल़ नर मरटधर, खटव्रन राखै खैर।।

ऐ सतोला आखर सुण जसवंतसिंहजी उठिया अर बोल्या – “पधारो ! पधारो! ! हणै आधी रात रा आय म्हनै मोटो कियो। सब बात कुशल़ है।”

आ सुणतां ई देवराजजी पूरी बात बतावतां कह्यो कै – “म्हैं सोगन लेय’र आयो हूं कै तो आज री रात इंद्रभाण अंतिम कै म्हारी। म्हैं अन्नजल़ ओ काम हुयां ई करसूं। नीतर सुबह म्हारी अरथी उठसी।”

जसवंतसिंहजी अजेज घोड़ै जीण कराई अर आपरै विश्वासी मिनखा़ं साथै इंद्रभाणजी रै डेरे जाय बोकारियो। इंद्रभाणजी ई संभिया पण जसवंतसिंहजी री तरवार री झाट झाल नीं सकिया। इंद्रभाणजी रो माथो कटियो। जसवंतसिंहजी उवा घोड़ी अर इंद्रभाणजी रा हथियार आवता आपरै डेरे ले आया। इण बात रो जद ओरंगजेब नै ठाह लागो तो जरूर जसवंतसिंहजी माथै चिड़ियो पण जद उणनै ओ ठाह लागो कै किणगत इंद्रभाण घोड़ी रो नाम शेखावती राख’र शेखावतां रो अपमान कियो अर आपरी मोत हाथां बुलाई। जणै ओरंगजेब ई कोई उजर नीं कियो। जसवंतसिंहजी उवा घोड़ी अर हथियार सूरैजी रै घरै पूगता किया। ऐड़ै नरां रै कारण कवियां लिख्यो है–

खाटी मरदां खाग सूं, रज माटी रूधिरांह।
दाटी धर दुसमण दल़ां, सेखावाटी वाह।।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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