मीठी मसकरी

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एक म्हाराज हा। बाणियां री बस्ती में रैवता। बाणियां माथै लछमी री कृपा ही सो म्हाराज रै ई किणी बात रो तोटो नीं हो। चोखी रसोई लावै अर मौज मनावै। इयां करतां-करतां म्हाराज री जीभ चटोकड़ी हुयगी सो जितरै उणरै मनमाफक भोजन नीं आवतो तो उणांरो जीव तिरपत नीं हुवतो।

एक’र किणी सेठां रा माजी चालता रह्या। सेठां चोखल़ो निंवतियो।[…]

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कविराज दयालदास संढायच

….दयालदासजी का स्थान राजस्थान के उन्नीसवीं शताब्दी के लेखकों में आदरणीय व अग्रगण्य है। गद्य के गजरे में बीकानेर के यशस्वी इतिहास को गूंथकर जो सुवास भरी वो आज भी महकती हुई तरोताजा है। नामचीन ख्यातकार, गजब के गीतकार, विश्वसनीय सलाहकार व प्रखर प्रतिभा के धनी दयालदासजी बीकानेर रियासत के देदीप्यमान नक्षत्र थे। जिन्होंने अपनी, प्रभा का प्रकाश चतुर्दिक फैलाया। ऋषि ऋण परिशोध की भावना से शोध के क्षेत्र में अभिरूचि रखने वालों को ऐसे मनीषी के साहित्यिक व ऐतिहासिक रचनाओं के शोध हेतु अग्रसर होना चाहिए ताकि इनकी लुप्त प्राय रचनाएं प्रकाश में आ सकें।[…]

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संवेदनाओं के पर्याय महाकवि पृथ्वीराज राठौड़

आज राजस्थान और राजस्थानी जिन महान साहित्यकारों पर गौरव और गर्व करती है उनमें से अग्रपंक्ति का एक नाम हैं पृथ्वीराजजी राठौड़

बीकानेर की साहित्यिक और सांस्कृतिक धरोहर के धोरी और धुरी थे पृथ्वीराजजी राठौड़। इसलिए तो महाकवि उदयराजजी उज्ज्वल लिखतें हैं-

नारायण नै नित्त, वाल्ही पीथल री धरा।
सुरसत लिछमी सत्थ, ऐथ सदा वासो उदय।।[…]

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चारण भगत कवियां रै चरणां में

चारण भगत कवियां रै चरणां में सादर-

।।दूहा।।
चारण वरण चकार में, कवि सको इकबीस।
महियल़ सिरहर ऊ मनूं, ज्यां जपियो जगदीश।।1
रातदिवस ज्यां रेरियो, नांम नरायण नेक।
तरिया खुद कुल़ तारियो, इणमें मीन न मेख।।2
तांमझांम सह त्यागिया, इल़ कज किया अमांम।
भोम सिरोमण वरण भल, निरणो ई वां नांम।।3
जप मुख ज्यां जगदीश नै, किया सकल़ सिघ कांम।
गुणी करै उठ गीधियो, परभातै परणांम।।4
भगत सिरोमण भोम इण, तजिया जाल़ तमांम।।
गुणी मनै सच गीधिया, रीझवियो श्रीरांम।।5[…]

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मा देवनगा

।।छंद – गयामालती।।
मही मेदपाटं विदग मंडण,
धर पसूंदं तूं धणी।
तप त्याग दिनकर ध्यान तारां,
जपै माल़ा जोगणी।
वन बाहर विचरण बाघ वाटां,
गुढै नदियां गाजणी।
अई देवनगा नमो आढी, भगतजन दुख भंजणी।।1[…]

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तरस मिटाणी तीज

भलो थल़ी में भादवो, रमूं सहेली रीझ।
हड़हड़ती हँसती हरस, तरस मिटाणी तीज।।

हरदिस में हरयाल़ियां, भोम गई सह भीज।
भल तूं लायो भादवा, तरस मिटाणी तीज।।

भैंसड़ियां सुरभ्यां भली, पसमां घिरी पतीज।
मह थल़ बैवै मछरती, तकड़ी भादव तीज।।[…]

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सबसूं है मोहन सिरमोड़ !

गीत – वेलियो
मोहन बल़ तणी बात आ महियल़,
लखियो नकूं कोई लवलेश।
डिगतो बह्यो डांग कल़ डोकर,
अधपतियां करियो आदेश।।1

बीजो बुद्ध अवतरियो बसुधा,
अहिंसा तणो उपासक आप।
गुणधर पांण विनाशक गोरां,
पराधीनता काटण पाप।।2[…]

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रैणायर दुरगो रतन!

सामधरम रो सेहरो, मातभोम रो मांण।
आसै रै घर ऊगियो, भलहल़ दुरगो भांण।।1

आभ मरूधर आस घर, ऊगो अरक उजास।
जस किरणां फैली जगत, दाटक दुरगादास।।2

नर-समंद मुरधर नमो, इल़ पर बात अतोल।
रैणायर दुरगो रतन, आसै घरै अमोल।।3

चनण तर दुरगो चवां, सुज धर पसर सुवास।
निमल़ कियो घर नींब रो, सूरै सालावास।।4[…]

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कलंक री धारा ३७०

पेख न्यारो परधान, निपट झंडो पण न्यारो। सुज न्यारो सँविधान, धाप न्यारो सब ढारो। आतँक च्यारां ओर, डंक देश नै देणा। पड़िया छाती पूर, पग पग ऊपरै पैणा। पनंगां दूध पाता रह्या, की दुरगत कसमीर री। लोभ रै ललक लिखदी जिकां, तवारीख तकदीर री।। कुटल़ां इण कसमीर, धूरतां जोड़ी धारा। इल़ सूं सारी अलग, हेर कीधो हतियारां। छती शांती छीन, पोखिया ऊ उतपाती। घातियां घोपीयो छुरो मिल़ हिंद री छाती। करता रैया रिल़मिल़ कुबद्ध, परवा नह की पीर री। वरसां न वरस बुरिगारियां, की दुरगत कसमीर री।। कासप रो कसमीर, उवै घर अरक उजासै। केसर री क्यारियां, बठै वनराय विकासै। […]

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सुरराज आरजी सुणै साहिब!

।।छंद-गयामालती।।
काढियो मुरधर काल़ कूटै,
एक थारी आस में।
इण झांख साम्हीं आंख काढी,
बात रै विसवास में।
ओ बीतियो ऊनाल़ इणविध,
छांट हेकन छेकड़ी।
सुरपाल़ अरजी सुणै साहिब,
पूर गरजी आ पड़ी।।1[…]

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