बैशक दीजो बोट – कवि मोहनसिंह रतनू

दिल मे चिंता दैश री,मन मे हिंद मठोठ।
भारत री सोचे भली, बीण ने दीजो बोट।।

कुटलाई जी मे करे,खल जिण रे दिल खोट।
मोहन कहे दीजो मति,बां मिनखां ने बोट।।

काला कपटी कूडछा,ठाला अनपढ ठोठ।
घर भरवाला क्रत घणी, दैणो कदैन बोट।।

बुध हीणा गत बायरा, पाप उठावै पोट।
विस कटुता री विस तरै, भूल न दीणां बोट।।

दशा बिगाडै दैश री, कर हिंसा विस्फोट।
मोहन कहे दीजो मति, बा मिनखा ने बोट।।

करडाई अडचन करे,सागै रखणो सोट।
निरभय,निडर,निसंक व्हे, बैशक दीजो बोट।।

पांच बरस बीत्यो पछै, आवै परब अबोट।
चित उजवल नह चूकणो, बैशक दैणां बोट।।

इण अवसर दारु अमल, हिलणो नी धर होठ।
जगां जगां नी जीमणो, दैख चीकणां रोट।।

प्रात काल न्हायां पछै, हरि सुमरण कर होठ।
दैणो बटन दबाय कर, बैश कीमती बोट।।

अतंस तणी अवाज सुण, सुध हृदय मन मोट।
बिध बिध सोच विचार कर, अवस दैवणो बोट।।

सर्व धरम,सद भावना, सब जन लेय परोट।
हिल मिल चालै हेत सू,बां ने दीजो बोट।।

~~मोहनसिंह रतनू, सेवा निवृत्त आर पी एस

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