भद्रकालिका नाराचवृत्त स्तवनम्

bhadrakali

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🍀नाराच वृत्तम्🍀
🌴संस्कृत🌴
शवारूढे स्मशानवासिनी शिवे, दयानिधे।
अघोरघोर गर्जनी, रता मदे दिगंबरी।
विशाल-व्याल केशिनी, प्रपूजिता मुनिश्वरम्।
महाकपालि! मुण्डमालि! भद्रकालिकां भजे।।१

निरावलंबलंबिनी, करालकष्टनष्टनी।
मंदांधमूढदैत्यदुष्टदर्पभंजनी भवा।
मनोविकारदाहिवह्निरूप ज्वालमालिके।
महाकपालि! मुण्डमालि! भद्रकालिकां भजे।।२

रणे वने जले स्थले गढे पुरे च पर्वते।
क्षणे क्षणे पलेलवे अपत्य रक्ष अंबिके।
सदामनोनुकूलभक्त मात! भैरवी सुखे।
महाकपालि! मुण्डमालि! भद्रकालिकां भजे।।३

डमालिनी, कपालिनी, त्रिलोचनी, कृषोदरी।
करालद्रंष्ट्र-अट्टहासिनी, महाभयंकरी।
तमोमयीत्रिलोकमोहिनी च सांभवी तपे!
महाकपालि! मुण्डमालि! भद्रकालिकां भजे!।४

शवा! शिवा! भवा! उमा! प्रियापिनाकपाणिकं।
जगाश्रया! जया! वरा! परा! बला! कृपालिनी।
डमं डमं ध्वनि डमाल ताल नृत्य सा रते।
महाकपालि! मुण्डमालि! भद्रकालिकां भजे।।५

नमामि सर्वमंत्रमूल तंत्ररूप त्र्यंबके।
चलाचला सुयंत्ररूपिणीच वाणीवैखरीम्।
अषाढ-श्याम-मेघ-देह! सिद्धिमोक्षकामदे!
महाकपालि! मुण्डमालि! भद्रकालिकां भजे।।६

करं नरं कटिं सुमेखला करालधारिणीम्।
स्वभक्तरक्षिणी तथासमस्तशत्रुनाशिनी।
प्रचंडचंडभीषणंरणेरता! भयावहा!
महाकपालि! मुण्डमालि! भद्रकालिकां भजे।।७

त्वदीय पादयुगम्कं रतं सदा अहर्निशम।
अहं विहीनग्यान दीनअंब बालकं तवं।
कृषाग्रबुद्धि देहि नेहवारिधिं “नृपत” कविम्।
महाकपालि! मुण्डमालि! भद्रकालिकां भजे।।८

~~©वैतालिक

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