भगतमाल़ – छंद त्रिभंगी – ब्रह्मदास जी बीठू माड़वा

।।दूहौ।।
वंदण श्री गुरुदेव कूं, जिण काटे जंजाल़।
मुझ्झ सुणाया मेर कर, गुण थारा गोपाल़।।१
संतां सायक तूं सदा, दुसटां खायक देव।
केसव तौ वरणन करूं, भल गुरु दीनौ भेव।।२
ठग धोमर भोल़ा ठगै, दग दग्गै देवीस।
ले कंकण जाल़ण लगे, अर उठ भग्गै ईस।।३

।।छंद – त्रिभंगी।।
ईसर उठ भग्गा, धोमर अग्गा, बेवै नग्गा, लग बग्गा।
हुय नार सुहग्गा, मिल़ियौ मग्गा, दाणव पग्गा, रच दग्गा।
ललचायौ ठग्गा, नाचण लग्गा, सीस करग्गा, विणसंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।१

हिरणाकस खहड़ै, पुत्र न पहड़ै, सो पर उरड़ै, खग सुरड़ै।
खंभा जब बड़ड़ै, सुररथ खड़ड़ै, अंबर दड़़ड़ै, धर धड़ड़ै।
गज रिफ़ हुय गड़ड़ै, आयौ अड़ड़ै, दांणव झड़ड़ै, नख दंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।२

निबाह लगाया, झल़ निकल़ाया, धोम सवाया, धड़ड़ाया।
सिरियादे धाया, करौ सहाया, मिनड़ी जाया, मंझ आया।
ठंढा जद थाया, कुंभ उठाया, खसता पाया खेलंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।३

अंबरीस सुध्यायौ, तुझ अपणायौ, भजन सवायौ, मन भायौ।
दुरवासा आयौ, आय डरायौ, चकर चलायौ, बिचल़ायौ।
तभुवन भटकायौ, कहर तपायौ, नृपत छुड़ायौ, नासंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।४

दुरजोधन ठग्गूं, कीधौ दग्गूं, पांड़व पग्गूं, निपड़ग्गूं।
लाखाग्रह लग्गूं, जाल़ां जग्गूं, धोम अथग्गूं, धगधग्गू।
काढै करमग्गू, साहि करग्गूं, साचे सग्गूं, सामंतूं।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।५

अंबर माथारे, लैण उतारे, कुरपत प्यारे ललकारै।
पंडव ग्या हारे, नार पुकारे, आव हमारे, आधारे।
तब चीर वधारे, सब हितिया रे, थवै नियारै थररंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।६

दूते कंठझेल़ू, थयौ दुहेल़ू, अज्जामेल़ू, अंतवेल़ू।
करते पुत्र हेलू, नाम कहेलू, सब कमठेलू, छूटेलू।
गासी उयबेल़ू, भाज गहेलू, तेरे सहेलू, उणतंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।७

जोरावर मीरूं, जड़ै जंजीरूं, नांख कबीरूं, बिच नीरूं।
तिर आयौ तीरूं, गज हमगीरूं, चवै सरीरूं, कर चीरूं।
वभकार गहीरूं, आयौ भीरूं, होय कंठीरूं, हड़ड़तूं।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।८

सैभर मतमंदे, उसर बसंदे, दोस करंदे, ना डर दे।
गुरु दादू बंदे, तिस पुर हंदे, छोड़ गयंदे, छकियंदे।
काल़ै पग बंदे, रहे तकंदे, मुगलां हंदे, मुरझंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।९

घट घट मग हेरे, नामां घेरे, कथा उचेरे दुज केरे।
छीपे निज छेरे, प्रेम चखेरे, आँसू झेरे, उण बेरे।
तब देवल फेरे, ये गुण तेरे, पंडत घेरे पुछियंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।१०

मीरां गुण गाये, लाज गमाये, बिसै न भाये, बिसराये।
महपत कोपाये, जहर मंगाये, प्यालो लाये, भर पाये।
उण इमरत थाये, सुख उपजाये, आंच न आये, उदरंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।११

कौरव कर चाल़ां, रच रोसाल़ां, भीठ वड़ाल़ां, भोपाल़ां।
रिल़िया रिणताल़ां, कट किरमालां, सीस भुजाल़ां, सुंडाल़ां।
चालै लतखाल़ां, तेण बिचाल़ां, पंखणियाल़ां, पोखंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।१२

पड़ियौ फंद आये, जल़ गज पाये, गरकज थाये, गल़़ल़ाये।
कस सूंड रहाये, ररौ कहाये, ढील न लाये, चढ धाये।
परहर पँखराये, चकर चलाये, लियो छुड़ाये, लीजंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।१३

वीटे मिरघाणूं, अति विघनाणूं, वल़तूं टाणूं बीहाणूं।
सिमरै तिह टाणूं, भील डसाणूं, स्थान हटाणूं, छुट बाणूं।
झल़ फंद जल़ाणूं, जल़ वरसाणूं, चहु तरफाणूं, निहचंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।१४

दसकंधर भ्राता बुध के दाता, वचन विधाता कै वाता।
सो नाह सुहाता, परजल़ गाता, उरल़ै लाता, मुरझाता।
त्यां रहण न पाता, सरणै जातां, दी लंक दाता, देखंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।१५

धू ध्यान धरंदे, पच वरसंदे, छोड़ चलंदे, राजंदे।
तब नृपत सुनंदे, चर पटयंदे, सिर पदवंदे, नारंदे।
बन जाय बसंदे, आसन संदे, रूप रसंदे, राम रतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।१६

चंपै सींचाणूं, मग असमांणूं, पुल़त न जाणूं, पंखाणूं।
तल़ खेंचै बाणूं, दुसटी पांणूं, रटै नराणूं, रखिमाणूं।
अहि व्याध डसाणूं, चूकै बाणूं, बध सींचाणूं, बल़संतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।१७

चंदर व्यभिचारी, ऐल्या नारी, खल़ता जारी, पत खारी।
रिस साप सहारी, अधगत धारी, वरस हजारी, सिल भारी।
मग जात खरारी, दया विचारी, पद रज डारी, उधरंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।१८
सय घन बरसारे, मुसल़धारे, तबै पुकारे, नर नारे।
परबत जब प्यारे, कर पर धारे, नीर उतारे, चहुवारे।
सुरपत ग्यौ हारे, गरब ज गारे, बिरज उगारे, बरसंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।१९

धिन धिन जिन दरिया, जग अवतरिया, जस विसतरिया, अघ हरिया।
मुल्लां बरबरिया, धेखज करिया, क्यूं ध्रम फिरिया, परहरिया।
अल्ला उचरिया, बांण अंतरिया, साचौ दरिया, निज संतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।२०

हूं केतो गासी, आवै हांसी, सेस फणासी, थक जासी।
जुय जुय जुग जासी, हुवोज गासी, तुरत विणासी, तौ पासी।
अब आगे ध्यासी, तिण कज आसी, ढील न लासी, धावंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।२१

।।कल़स रो कवित्त/छप्पय।।
है मुख जेण हजार, जास दुगणी मुख जीहा।
जीह जीह जस जाप, इधक इधक नित ईहा।
अखंड धार इकसार, सुतौ रणकार सुहायौ।
तुझ गुणों किरतार, पार किणही नी पायौ।
अनुसार कछु बुध आपणी, ब्रह्मदास कहिया बरण।
अरदास तास मानों इती, सुख निवास राखौ सरण।।१

~~ब्रह्मदास जी बीठू माड़वा

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