चारणों के गाँव – नोख / बासणी (कवियान)

नोख (कवियान) चारणो की जागीरो में से एक ऐसी जागीर है जो एक बहुत बड़े राजपूती सँघर्ष के फलस्वरुप अस्तित्व मे आयी। नोख एक राजपूत और एक चारण कवि की घनिष्ठ मित्रता का परिणाम है।

आज राजस्थान राज्य के पाली जिले मे राजपूतों की उदावत खाँप का प्रभुत्व है। ये महान वीर यशस्वी राव उदाजी के वँशज है। राव उदाजी जोधपुर के सँस्थापक महावीर जोधाजी के पौत्र थे।

राव उदाजी और खेतसी जी कविया की बहुत अच्छी मित्रता थी, ये मित्रता चँदरवरदाई और सम्राट पृथ्वीराज चौहान की तरह थी। राव उदाजी और खेतसीजी दोनो उस वक्त जवान थे। वे हर वक्त शिकार, गोठ और भ्रमण आदी मेँ व्यस्त रहते थे। एक बार राव उदाजी अपनी मौसी से मिलने के लिये जैतारण पधारे। साथ मेँ खेतसी जी भी थे। जैतारण मेँ उस वक्त राजपूतो की सिँदल खाँप का राज था। राव उदाजी की मौसी जैतारण के शासक को ब्याह रखी थी। राव उदाजी के पास लगभग 20-25 सवार साथ थे। जब राव उदाजी ने जैतारण पहुँच कर अपनी मौसी का चरण स्पर्श किया तो मौसी ने नजदीकी गाँव “लौटोती” आशीर्वादपूर्वक हाथखर्ची मेँ दिया।

राव उदाजी लोटौती पधारे और वहीं पर अपना खेमा लगाया। लोटौती के नजदीक में निम्बोल नामक गाँव था। निम्बोल में रिद्धरावल जी नामक बहुत ही सिद्ध सँत का आश्रम था। राव उदाजी भी आश्रम मेँ पधारे और रिद्धरावल जी महाराज के दर्शन किये। रिद्धरावल जी महाराज के ज्ञान से प्रभावित होकर राव उदाजी ने उनको अपना गुरु मान लिया।

एक दिन अचानक रिद्धरावल जी महाराज ने राव उदाजी से कहा “हे उदा ये आने वाला समय तेरा है, सिँदल राजपूतो का पतन तो निश्चित है इसलिये बेहतर होगा कि तू जैतारण के शासक तुम्हारे मौसाजी राव सिँदल को मार कर जैतारण पर राठौड़ो का राज्य स्थापित कर।”

राव उदा जी पहले तो अपने मौसा पर हमला करने में हिचकिचाये परन्तु गुरु के बहुत समझाने के बाद वे जैतारण हथियाने की बात मान गये। अब राव उदाजी, खेतसी जी कविया और उनके सभी 20-25 साथी उचित मौके का इन्तजार करने लगे। और वह मौका आ भी गया जैतारण के किसी कँवर की शादी के अवसर के रुप मेँ। राव उदाजी ने कहा कि बारात के प्रस्थान के पश्चात जैतारण के गढ मे बहुत कम सिँदल राजपूत बचेँगे और हम आसानी से कब्जा कर लेँगे क्युँकि सारे लोग तो बारात मेँ चले जायेंगे।

बारात के प्रस्थान का दिन भी आ गया। राव उदाजी को खबर थी कि बारात सुबह प्रस्थान करेगी और वे दोपहर में हमला करेँगे। लेकिन विधि को कुछ ओर ही मँजूर था। किसी कारणवश बारात प्रस्थान मेँ उस दिन देर हो गयी और सारे सिँदल राजपूत गढ मेँ ही मौजूद थे और राव उदाजी ने खेतसी जी कविया के साथ मिल कर जैतारण पर धावा करने के लिए युद्ध की तुरही बजवा दी और जैतारण गढ़ के सामने आ गए। उस समय 250 से 300 की सँख्या मेँ सिँदल राजपूत जैतारण गढ़ में मौजूद थेँ। जब राव उदाजी, खेतसी जी “कविया” और उनके दो दर्जन साथियों ने जैतारण गढ के किलेदार का सर काटा तो उसकी चीख पुकार सुनकर गढ के अन्दर मौजूद सभी सिँदल राजपूत सावधान हो गये और भवानी का जयकारा लगाने लगे। उन 250-300 के जयकारो को सुनकर राव उदाजी को लगा कि अब हम सबकी मौत निश्चित है। राव उदा जी ने अपने इष्ट मित्र खेतसी जी को गले लगा कर कहा कि “है मित्र! मुझे आपकी वीरता और पहलवानी शरीर पर कोई सँदेह नहीं है परन्तु आप चारण हो और पूजनीय व अवध्य हो, आप को यहा से घोड़े पर सवार होकर बिराई कवियान या जौधपुर चले जाना चाहिये ताकि आपके प्राण बच सके।”

यह बात सुनकर कविराज खेतसी जी गदगद हो गये और भावुक होकर जवाब दिया…

उदो-खेते खेते-उदो, ना चारण ना राव।
कवित-रण रण कवित, उगे आथमे चाव।।
अर्थात मैं चारण कवि होने से पहले आपका मित्र हुँ, आप एक राजपूत योद्धा से पहले मेरे बचपन के दोस्त हैं। आपने  कविता पाठ मेँ मेरा बहुत साथ दिया आज मेँ रण मेँ आपका साथ दूंगा। यही मेरा निश्चय है।

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कलम-दुधारी वैरी-रगत दवात, लिखु जय कवित जैतारण धरा।
खेतसी जी कविया ने राव उदा से कहा कि “आज तो मेरी दुधारी तलवार ही मेरी कलम लग रही है, उन सिँदल राजपूतो का रक्त स्याही प्रतीत होती है मेँ आज दुधारी तलवार तथा वैरीयो के रक्त से जैतारण की धरा पर राठौड़ो की विजय गाथा लिखुँगा।”

यह बात कहने के बाद उन मतवाले वीरोँ ने जैतारण के गढ मेँ घुस कर सिँदल राजपूतों को मारना शुरु किया। राव उदाजी अपनी ढाल की मार से वहा के सिँदल योद्धाऔ की भीड़ को चीरते हुए अपने मौसाजी की तरफ बढने लगे। तभी खेतसी जी कविया सिँदल राजपूतों की पँक्ति को यमलोक पहुँचाते हुए किले की दीवार पर चढे और सिँदल राजपूतों का झण्डा उतार कर माँ करणी प्रतीक चील के निशान वाला राठौड़ी झण्डा जैतारण गढ पर बुलँद किया। यह बात देख कर सारे के सारे सिँदल राजपूतों ने खेतसी जी कविया को घेर लिया। खेतसी जी कविया इसी मौके की तलाश मेँ थे। अब वो राजकवि अकेला सौ योद्धाओ से जूझने लगा और लड़ते-लड़ते गढ से बाहर आ गया व जैतारण के किले से दक्षिण की ओर बढने लगा। जब वह वीर किले से आधे से ज्यादा सिँदल योद्धाओ को बाहर ले आया और लड़ते लड़ते दक्षिण की तरफ चला गया तो राव उदाजी के लिए उनके मौसाजी तक पहुँचने का रास्ता साफ हो गया।

इस प्रकार किले के अन्दर मौजूद राव उदाजी ने अपने मौसा को मार कर वहाँ के राजसी पाट पर कब्जा कर लिया। बाहर कविया खेतसी जी ने अपने से लड़ रहे काफी यौद्धाओ को यमलोक पहुँचा दिया था। तभी एक सिँदल राजपूत वीर की तलवार चमकी और कविया खेतसी जी के धड़ से उनके सर को अलग कर दिया। और बचे हुए सिँदल राजपूत निश्चिंत हो गये कि अब तो ये बला टली। लेकिन वहाँ पर सिँदल राजपूतो का पासा उल्टा पड़ता नजर आ रहा था। वह चारण वीर खेतसी कविया बिना सर के भी तलवार चला रहा था। और इतिहास गवाह है की उस कवि ने बिना सर के पीछे बचे हुए सिँदल राजपूतो का सँहार किया और वह धड़ आखिर मेँ थक गया और जैतारण के गढ के दक्षिण मेँ आकर गिरा। वहा पर आज झुझँडा गाँव बसा हुआ है। वहीं पर उन खेतसी जी का चबुतरा भी है जिनको बावरी-मेघवाल समाज के लोग झूँझार जी बावजी के रुप मेँ पूजते है।

खेतसी जी कविया की शहादत के समय उनके पुत्र निमा उर्फ निम्बसि जी बहुत छोटे थे। जब वो बड़े होकर जवान हुए तो अपनी वीराँगना माँ की आज्ञा लेकर जैतारण आए लेकिन तब तक राव उदाजी का देहाँत हो चुका था तथा जैतारण पर राव उदाजी के पुत्र खीँवकरणसि का राज्य था। ये वही खीँवकरण जी थे जो जैता व कूँपा के साथ गिरी-सुमेल के युद्ध में शहीद हुए थे। जब खीँवकरण जी को मालूम हुआ कि मेरे पिता राव उदाजी के परम मित्र कवि खेतसी का पुत्र निम्बसी आया है तो खीँवकरण जी खुद सामेळा करने आये और निम्बसी को अपने ह्रदय से लगाया। साथ ही निम्बसी कविया को दो गाँव ग्यासणी (नोख) व बासनी (कवियान) देकर सम्मानित किया।

महान वीर कवि खेतसी जी के बलिदान और माँ करणी की असीम कृपा से आज वही गाँव ग्यासणी (नोख) फलफूल रहा है।
आज इस गाँव मेँ खेतसियोत कविया है। खेतसियोत का मतलब खेतसि के पुत्रो से है। आईए हम उस चारण वीर की शहादत को याद करते हुए खेतसी कविया को नमन करते है।

जय माँ करणी . . . . . .
~~विकास सिँह कविया (खेतसियोत/खेतावत)

संवत पन्दरा पूर में, एक नवे कम नीव। (1589 सं )
खींयो उदावत खांप रो, दत गैहवासणी दीव। (1)
खेतो निम्बो नर खरो, गेहो गर वो खास।
रिदै अजो किलीयाण रो, वैणी माधोदास। (2)
जस दलजी छतरेस रो, आई धनो कल्याण।
नगर नोख कविया नरों, जग ऊंकारो जाण। (3)
~~औकार सिह कविया नोख

One comment

  • Ravisingh Mahendrasingh Kaviya

    Pleasure to know this amazing story, Proud to be a part of the legacy. Thank you Unkarji Kakosa & Vikas for their contribution for this page.

    Amazing story, hope we will remember where we come from…..

    Jay Maa Karni

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