चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – ४७ | चौथा अध्याय – मध्यकाल (प्रथम उत्थान)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ – आलोचना खण्ड: पद्य साहित्य

(ख) आलोचना खण्ड: पद्य साहित्य

१. प्रशंसात्मक काव्य: इस युग का प्रशंसात्मक काव्य दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम, जिसमें आश्रयदाता की वीरता, दानशीलता, कृतज्ञता, तेजस्विता एवं कला-प्रियता का प्रकाशन किया गया है और द्वितीय, जिसे किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए लिखा गया है। प्रथम प्रकार के कवियों ने संसार में जितने भी विरुद हैं, उनसे अपने चरितनायकों को अलंकृत करने का प्रयत्न किया है। यहां जीवन के उत्तम गुण एकत्रित हो गये हैं। कहीं-कहीं तो ये गुण ऐसे घुल-मिल गये हैं कि जिन्हें पृथक नहीं किया जा सकता। इन कवियों में अत्युक्ति भी दृष्टिगत होती है, किन्तु वह निर्मूल एवं निराधार न होकर न्यूनाधिक वास्तविकता लिए हुए है। द्वितीय प्रकार के कवियों ने काव्य को साधन बनाकर अपने मनोवांछित फल को प्राप्त करने की अभिलाषा व्यक्त की है और उसमें इन्हे सफलता भी मिली है। इसे हम तात्कालिक कविता कह सकते हैं।

चारण सदैव से ही वीरता का गायक रहा है। अपने नायक में अदम्य साहस देखकर उसका अंग-प्रत्यंग फूला नहीं समाता। एक इसी गुण का पक्ष लेकर वह अनेक ग्राम एवं गढ़पतियों का यशोगान करना अपने जोवन का ध्येय बना लेता है। जिन राजाओं को नहीं देखता उनका भी सुयश गाता है और जिनसे कभी कुछ भी नहीं पाता उनका भी काव्य बनाता है। ऐसा करते समय उसकी दृष्टि वीरता पर बराबर बनी रहती है। कहना न होगा कि यह उदार व्यापक-दृष्टि सबके लिए समान रूप से अनुकरणीय है। अक्खा, इसरदास, दुरसा, पीथा, सूरायची, रंगरेला, शंकर, भल्ला, गोविन्द, बिहारीदास, नरबद, माला सांदू प्रभृति कवियों में यही भावना पाई जाती है। रायसिंह (बीकानेर) की वीरता से प्रभावित होकर अक्खा ने लिखा है-

धणी एक नव सहस एक दसां सहसां घणी, थिर विहुं सुजस संसार थियौ।
सींध जगमाल नूं मेल क्यूं संचरै, जगौ किम सींघ नूं मेल जियौ।।
षरा सिरदार भुज भार आयो षरौ विसे वे बैन ही वैग षांगौ।
पूठ रायसिंह री गांगौ परै, सगह जगमाल री पूठ सांगौ।।
काज पतसाह कुळ लाज भारथ करण, थोभिया देवडां मांड थांणौ।
रांड नू मेल किम नीसरे र व रिण, राव नूं मेल किम जापै राणौ।।
काज सुरतांण सुरतांण सूं जुध करै, पाड़ भड़ अपड़ रणषेत पड़ियां।
बड़ा सिरदारा दळ वेर वारगना, चंद उत ऊद उत सुरंग चडिया।।

ईसरदास का नायक राठौड़ रघुनाथसिंह मेड़तिया भी ऐसा ही है-

वडा खेळा विचे अभिनमो वीर गुर, ऊजळा सावळां चोट उथाल।
सांकड़े घातियां दोयण सांमल सुतण, खत्री गुर खेले अखेलां ख्याल।।
दोयणियाल डाण घड़ डोहिया, असपत केव तें किया अण भंग।
पतसाहां तणा ख्याल बांदा पलब, जिप उभो रुघो कमध रण जंग।।

दुरसा ने राणा प्रताप की विरुदावली गाई है किन्तु नये रंग-ढंग से, परम्परानुसार नहीं। अब तक के प्रशस्ति काव्य में यह एक अभिनव आयोजन है। इसमें जहां अतीत का स्वर है वहाँ समाज में नवचेतना उत्पन्न करने की क्षमता भी। वह प्रताप के प्रण, पराक्रम एवं पुरुषार्थ पर मुग्ध है। घोर अन्धकार से परिपूर्ण अकबर के शासन में सब राजा ऊंघने लग गये किन्तु जगत का दाता प्रताप पहरे पर जगता रहा–

अकबर घोर अंधार, ऊंघाणा हींदू अवर।
जागै जगदातार, पोहरै राण प्रतापसी।।

इसी प्रकार सुरताण की प्रशंसा में-

सवर महाभड़ मेरवड़, तो ऊभा वरियाम।
सीरोही सुरतांण सूं, कुण चाहै संग्राम।।

आगरा के शाही दरबार में मदमस्त हाथी को कटार से मारने वाले वीर युवराज राठौड़ रतनसिंह (जोधा) की यह प्रशंसा दुरसा की उदार व्यापक दृष्टि सूचित करती है–

हूकळ पोळि उरड़ियो हाथी, निछटी भीड़ि निराळी।
रतन पहाड़ तणे सिर रोपी, धूहड़िया धाराळी।।
पाचूं सह बहंता पोखे, सांई दरगाह सोधे।
सिधुर तणो भृसुंडे सुजड़ी, जड़ी अभनमे जोधे।।
देस महेस अंजसिया दोन्यौ, रोद खत्री ध्रम रीधो।
बोहिज गयंद वखाणे आंणे, डांणे लागे दीधो।।

पीथा का कथन है कि कुम्भा की कला को धारण करने वाला प्रताप अपने कुल की रीति को रख कर ‘हिंदूपति’ एवं ‘यवनों का रिपु’ कहलाता है अत: राणा तो अकबर के हृदय में निवास करता है और दूसरे राजा उसके पैरों मे पड़े रहते हैं-

षटकै षत्रवेध सदा षेहड़तो, दिनप्रत दाषंतो षत्रदाव।
अकबर साह तणौं ऊदावत, राण हिये चरणां अन राव।।
नह पलटे षरड़कै अहोनिस, धड़ दुरवेस घड़ै घण घाव।
सांगा हरो तणे आलमसह, पांतर दै महपत अन पाव।।
धर बाहरू प्रताप षड़गधर, सुज वीसरै न पाषर सेर।
अकबर उर में साल अहाड़ो, ओयणे सेवग भूप अनेर।।
राव हींदवो तणो रोदां रिप, राणो आपाणी कुळ रीत।
पड़िया रहै अवर नृप पावां, चढियो कुंभ कळोधर चीत।।

~~क्रमशः


नोट: पूर्व में प्रेषित कड़ियों को पढने के लिए निम्न अनुक्रमणिका में सम्बंधित विषय के शीर्षक पर क्लिक कीजिये। जो कड़ियाँ प्रेषित हो चुकी हैं उन्ही के लिंक एक्टिव रहेंगे।

अनुक्रमणिका

पहला अध्याय – विषय प्रवेश

दूसरा अध्याय – चारण साहित्य की पृष्ठभूमि (सन ६५०-११५० ई.)

तीसरा अध्याय – प्राचीन काल (सन ११५०-१५०० ई.)

चौथा अध्याय – मध्यकाल, प्रथम उत्थान (१५००- १६५० ई.)

पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल, द्वितीय उत्थान (सन १६५०-१८०० ई.)

7 comments

  • गणपत सिंह

    38 नंबर पर शक्ति दान जी की गोत्र छाबड़ा नहीं छाछडा(चांचडा) हे हुकुम दुरुस्त करावे

  • Balwant Deval

    जिज्ञासु जी की मेहनत को कोटि कोटि वंदन।
    इस पुस्तक को अगर हम खरीदना चाहे तो कंहा ओर कैसे सम्पर्क करना होगा।
    कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

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  • Mahendra singh

    साधुवाद

  • पुष्पेंद्र जुगतावत

    यह ग्रन्थ अत्यधिक श्रमसाधना का परिणाम है। इसका सुलभ होना स्वागत योग्य है।

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