चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – ८० | पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल (द्वितीय उत्थान)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ – जीवनी खंड:करणीदान कविया

करणीदान की जीवन-धारा राजस्थान के अनेक राज्यों में कलकल निनाद करती हुई उत्तरोत्तर गतिशील होती रहती है। जहाँ-जहाँ उसका संचरण हुआ, वहां-वहां यश के कुल और उपहार के मोती मिलते गये। आमेर (जयपुर) में आकर इन्होंने संस्कृत, प्राकृत, डिंगल-पिंगल आदि भाषाओं का अध्ययन किया (१७०० ई. के आसपास) । यहां के शांत वातावरण ने इन्हें छंद, ज्योतिष, संगीत, वेदान्त एवं योग सीखने के लिए प्रेरित किया और थोड़े समय में ही इन्होंने साहित्य तथा इतिहास का ज्ञान भी प्राप्त कर लिया। इनके सदृश बहुज्ञता कम कवियों में देखने को मिलती है। इसी समय के आसपास इन्होंने स्फुट रचना आरम्भ कर दी। कहते हैं, जब ये आमेर से शाहपुरा आये तब राज्य-सीमा पर एक किसान से पूछा-क्या यह शाहपुरा के उम्मेदसिंह की सरहद है? इस पर किसान बिगड़कर बोला-क्या मरना चाहते हो? ऐसे ही दरबार के सामने बोलो तो मैं अपनी समस्त चल-अचल सम्पत्ति तुम्हारे नाम कर दूं। उम्मेदसिंह के शासन में ‘तुम’ (रैकारा) से बोलने वाला मार दिया जाता था। होड़ करते-करते दोनों उम्मेदसिंह के दरबार में गये तब करणीदान ने रैकारे सहित पाँच दोहे कहे जिन्हें सुनकर शाहपुरा-नरेश अत्यन्त प्रसन्न हुए, गले मिले, लाखपसाव से अलंकृत कर सेवाना एवं सरदारपुरा नामक गांवों से पुरस्कृत किया। किसान ठगा सा देखता ही रह गया। उसने अपनी कविता सुनाते हुए कहा-आपने क्या अपनी प्रतिज्ञा मेरा सर्वस्व हरण करने के लिए ही की थी। यह सुन कर इन्होंने उसकी पत्नी को अपनी धर्मबहिन बना कर धैर्य प्रदान किया। उम्मेदसिंह इनकी प्रतिभा पर मुग्ध थे। एक बार राज्य-गद्दी पर बैठते समय घोड़ा-सिरोपाव मिलने पर कवि ने उसे गीत लिखकर लौटा दिया। इस पर इन्हें हाथी-सिरोपाव ही नहीं अन्य पुरस्कार भी मिले। सन्देह नहीं कि शाहपुरा में कवि का यथेष्ट मान-सम्मान हुआ। कालान्तर में जब उम्मेदसिंह मरहठों से उज्जैन (क्षिप्रा) के युद्ध में मेवाड़ी सेना का नेतृत्व करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए तब कवि ने गीत की सृष्टि कर श्रद्धांजलि अर्पित की।

करणीदान शाहपुरा से डूंगरपुर नरेश रावल शिवसिंह के यहां आ गये, जहां इनकी कीर्ति-कौमुदी का अभूतपूर्व विकास हुआ। शिवसिंह ने इनकी काव्य-रचना पर मोहित होकर लाखपसाव दिया। यहां इनका सम्पर्क मेवाड़ के राजघराने से हुआ। तत्कालीन गतिविधियों से प्रकट है कि उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) एवं जगतसिंह की इन पर पूर्ण कृपा थी। उन्होंने इनका मान-सम्मान भी खूब किया और ये भी काफी समय तक वहां रहे। यह देखकर डॅा मेनारिया ने इन्हें सूलवाड़ा का निवासी बताया है, जो अशुद्ध है। सम्भव है, यह गाँव इन्हें पुरस्कार में मिला हो! कहते हैं, एक बार ये महाराणा संग्रामसिंह के पास पांच गीत बनाकर लै गये जिन्हें सुनकर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए और कहने लगे कि तुम्हारा काव्य अमूल्य है, उसका मूल्य कोई क्या देगा? यह कहकर महाराणा ने करोड़पसाव अथवा उन गीतों को धूप देने का प्रस्ताव रखा किन्तु इन्होंने अपने काव्य को धूपित कराना ही उत्तम समझा। इसके पश्चात् तो ये अपने काव्य के द्वारा एक ऐसे धूपदान बन गये कि जिसकी सुगन्ध से चारण एवं क्षत्रिय धर्म उजागर होने लगा। शनैः-शनै: इनकी धवल कीर्ति राजस्थान के कोने-कोने में पहुँचने लगी। तत्कालीन विलासिता इन्हें पथ-भ्रष्ट नहीं कर पाई तथा राजकीय प्रलोभन इन्हें अपने वश में नहीं कर सके। यह लक्ष्य करने की बात है कि इन्होंने आवश्यकतानुसार विभिन्न राज्यों की आंतरिक समस्याओं को सुलझाने में भी अपनी सेवायें अर्पित की। करणीदान चारण जाति के सच्चे प्रतीक थे।

करणीदान महाराजा अभयसिंह (१६२४-१७४८ ई.) कें अनुग्रह पर जोधपुर आ गये, जहां इनके जीवन का अधिकांश समय राज्य-सेवा में व्यतीत हुआ। उल्लेखनीय है कि यहां रहकर इन्होंने अपनी काव्य-प्रतिभा, राजनीतिज्ञता एवं शूरवीरता का अपूर्व परिचय दिया जिससे सरस्वती एवं लक्ष्मी की कृपा के साथ शक्ति का भी इन पर वरदहस्त बना रहा। करणीदान कलम के तेज, जबान के खरे एवं तलवार के धनी थे। एक चारण कवि का सामन्त होना तथा अपने स्वामी के साथ युद्धभूमि में पहुँचना उसके कुल-गौरव का परिचायक है। राजस्थान के चारण कवियों ने विपत्ति की काली घटाओं को विदीर्ण करने में अपने धणियों का जो साथ दिया है, वह मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करने योग्य है। इस दृष्टि से इनका जीवन-वृत्त चारण जाति के लिए एक आदर्श है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि सम्राट् मुहम्मदशाह के विरुद्ध गुजरात के सूबेदार सरबुलंदखां ने विद्रोह किया था (१७३० ई.) और महाराजा अभयसिंह उसका दमन करने के लिए भेजे गये थे। उस समय ये भी उनके साथ थे। दोनों ओर की सेनाओं के बीच अहमदाबाद में संग्राम हआ। सरबूलंदखां के किले से बाहर न आने पर इन्होंने एक ऐसी विरुदावली सुनाई कि वह बाहर निकल पड़ा और अन्त में हार स्वीकार कर भाग गया। कहना अनावश्यक न होगा, इन्होंने अपने अद्‌भुत शौर्य-पराक्रम से विपक्षियों को मार भगाने में सहायता की जिससे स्वामी का कार्य सरल हो गया और सर्वत्र उनकी जय-जयकार होने लगी। यदि सच पूछा जाय तो इस युद्ध के फड़कते हुए वर्णन सुनकर ही अभयसिंह ने सोल्लास कवि को गले लगाया, कविराजा का उपटंक दिया, लाखपसाव एवं आलावास गांव से पुरस्कृत किया।

करणीदान की स्वामी-भक्ति के विषय में कहा जाता है कि एक बार बखतसिंह ने नागोर में अपने ज्येष्ठ भ्राता अभयसिंह जी को प्रीतिभोज पर आमंत्रित किया किन्तु अभयसिंह जी को भय था कि बखतसिंह कहीं पिता के समान उनकी भी हत्या कर गद्दी न हथिया ले। एतदर्थ पोकरण ठाकुर एवं करणीदान को सुरक्षा का भार सौंपा गया। जब शराब के नशे में चूर महाराजा पलंग पर पड़े थे तब ये दोनों उनका पहरा देते रहे। बखतसिंह कोई न कोई बहाना बनाकर आता रहता किन्तु इन्होंने उसकी कोई दाल न गलने दी। हठात् जब प्रातःकाल होने को आया तब इन्होंने अपने स्वामी के पैर का अंगूठा दबाते हुए कहा-बखतसिंह नंगी तलवार लेकर खड़ा है। इनकी सतर्कता के कारण बखतसिंह को निराश होकर लौट जाना पड़ा। इससे बखतसिंह इनके शत्रु बन गये। इतना ही नहीं, महाराजा रामसिंह के शासन-काल में भी यह भक्ति ज्यों की त्यों बनी रही। जब बखतसिंह ने जोधपुर पर आक्रमण किया तब ये जगन्नाथ पुरोहित के साथ ग्वालियर जाकर मल्हार राव को सेना भेजने के लिए राजी किया। दुर्भाग्य से रामसिंह परास्त हुए। जब बखतसिंह गद्दी पर बैठे तब करणीदान का मन खट्टा पड़ गया। बखतसिंह ने भी आलावास (पाली) जब्त कर बदला लिया। इस पर इन्होंने विरक्त होकर एकान्तवास की ठानी। जब किशनगढ़-नरेश बहादुरसिंह को इसका पता चला तब उन्होंने इन्हें ऐसा करने से रोकते हुए कहा-आप राठौड़ों के कविराज हैं। हम भी उनके भाई हैं अत: आप मेरे यहां रहिये। कविराजा उनके आग्रह पर किशनगढ़ रुक गये। बहादुरसिंह ने इन्हें अनेक गांव देने चाहे किन्तु अपनी बड़ी-पत्नी के कहने पर इन्होंने केवल एक छोटा-सा गांव केवाणिया ग्रहण किया।

~~क्रमशः


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अनुक्रमणिका

पहला अध्याय – विषय प्रवेश

दूसरा अध्याय – चारण साहित्य की पृष्ठभूमि (सन ६५०-११५० ई.)

तीसरा अध्याय – प्राचीन काल (सन ११५०-१५०० ई.)

चौथा अध्याय – मध्यकाल, प्रथम उत्थान (१५००- १६५० ई.)

पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल, द्वितीय उत्थान (सन १६५०-१८०० ई.)

(क) जीवनी-खण्ड. . . . क्रमशः

5 comments

  • Balwant Deval

    जिज्ञासु जी की मेहनत को कोटि कोटि वंदन।
    इस पुस्तक को अगर हम खरीदना चाहे तो कंहा ओर कैसे सम्पर्क करना होगा।
    कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

    • राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर में मिल सकती है हुकम। उनका नंबर है 9414100334

  • Mahendra singh

    साधुवाद

  • पुष्पेंद्र जुगतावत

    यह ग्रन्थ अत्यधिक श्रमसाधना का परिणाम है। इसका सुलभ होना स्वागत योग्य है।

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