चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – १८ | दूसरा अध्याय – चारण साहित्य की पृष्ठभूमि
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| प्रसंग – ऊजली – जेठवा

प्रतीक्षा करने की भी सीमा होती है। प्रिय के न आने की सम्भावना से ऊजली का हृदय भर आया। वह अपने कृष्ण-मिलन की मधुर आशा में घर से निकल ही पड़ी। स्थान की दूरी का क्या भय? मार्ग में बरसने वाले अंगार श्रंगार बन गये, दुर्गम घाटी सोहाग-शैय्या का रूप ले बैठी। राजभवन में उप-स्थित होकर जैसे ही उसने जेठ रूपी सघन छांह देखी वैसे ही उसका श्रांत-क्लांत मन सरसित हो उठा-

तावड़ तड़तड़तांह, थळ साम्है चढ़तां थकां।
लाधो लड़थड़तांह, जाडी छाया जेठवो।।

जब मेह का पाषाण-हृदय किसी प्रकार से तरल-स्निग्ध नहीं हुआ तब ऊजली उपालंभ देने के अतिरिक्त और कर ही क्या सकती थी?–

पाबासर पैसेह, हंसां भेळा ना हुवो।
बुगळां संग बैसेह, जूण गमाई जेठवा।।

विपदा अकेली नहीं आती, वह शत-शत पीड़ाओं को साथ लेकर आती है। मेह से चोट खाकर ऊजली वियोग की उस कठोर चट्टान पर जा गिरी, जहां उसे उठाने वाला कोई न मिला। दुर्भाग्य से वृद्ध अमरा भी उसे अकेली छोड़ कर चल बसा। जीवन का रहा-सहा सहारा भी छूट गया। अब उसे पूर्ण वियोग-दशा ने आ घेरा। यह दृश्य कितना मर्मान्तक, हृदय-विदारक एवं अनुभूतिमय हैं? काव्य के रूप में प्रस्फुटित होकर इसमें एक विशेष सौन्दर्य आ गया है। जैसे-जैसे ऊजली की दृष्टि अपने प्रियतम की खोज में दूर-दूर तक जाती है, वैसे-वैसे नये-नये उपमान आप ही आप खड़े होते जाते है। वर्णन-प्रणाली अत्यंत सरल, सुबोध एवं स्वाभाविक है। काव्य के आभूषण स्वत: ऊजली के चरणों में आ लिपटते हैं। बन में विचरण करने वाली स्वच्छन्द हिरणों की टोली को रमते हुए देख कर रमणी का हृदय भर आया। वह विलाप करती हुई कहती है-

टोळी सूं टळियांह, हिरणां मन माठा हुवै।
बालम बीछड़ियांह, जीवै किण विध जेठवा।।

ऊजली के हृदय को रह-रह कर यह बात कुरेदती रहती है कि मेह ने उसकी पीड़ा का अनुभव नहीं किया। यदि किया होता तो वह तीर चला कर उसे आहत न करता-

परदेशी नी पीड, जेठी राण! जाणी नहि।
ताणी ने मार्यां तीर, भाथे भरी ने भाणना।।

अवश्य ही वह अफीम की तरह कुछ कडुवे वचन कह आई है अन्यथा ज्वर में जैसे रोगी अन्न का त्याग कर देता है, वैसे मेह उसे न ठुकराता-

तावमां माणस जेम, आघां ठेले अन्न ने।
मेने लागी ऐम, अफीण रोखी उजळी।।

ऊजली को वियोग का वज्रपात सहना ही पड़ा। वह अपने शरीर के क्षण-क्षण क्षीण होने की तुलना रेतीली नदी की वेरी (रेत खोद कर बनाई हुई जल-कुंडी) से करती है। वेरी का जल जैसे शनैः-शनैः कम होता जाता है वैसे ही उसका हृदय-सरोवर सूखता जा रहा है। इसका कोई उपचार नहीं, अत: वह जीवित रहे भी तो कैसे?–

हियोज डुल डुल जाय वेकर री वेरी ज्यों।
कारी न लागै कांय, जीवूं किण विध जेठवा।।

ऊजली प्रेम के पासे को ‘अंगूठे री आड़’ कहती है। इसके लगने से रात भर जक (चैन) नहीं पड़ती-

अंगूठे री आळ, लोभी लगवाड़ै गयो।
सूनी सारी रात, जक न पड़ी रै जेठवा।।

जिस जाति के कड़े नियम दो सरल युवकों को गले नहीं लगने देते, उस समाज में भला ऐसे प्रेम की प्रतिक्रिया क्यों नहीं होती? विशेषत: राजपूत और चारण जाति में ऊजली बहुत दिनों तक वाद-विवाद का विषय अवश्य रही होगी। कठोर हृदय वाला मेह तो महलों में जाकर बैठ गया, किन्तु ऊजली अपने भरे हुए यौवन को लेकर किसके पास जाय? सारे संसार में यह बात फैल चुकी है कि ऊजली जोगण हो गई है–

जोबन पूरै जोर, मांणीगर मिळियौ नहीं।
सारे जग में सोर, (हूं) जोगण होगी जेठवा।।

अत: ऊजली की दीन वाणी अपने स्वामी को आत्म-समर्पण करती हुई कहती है कि जब उसके बिना एक घड़ी भी व्यतीत नहीं हो सकती तब शेष जीवन कैसे कटेगा? उस बिलखती हुई अबला को जोगण बनाने वाला जेठवा नही तो और कौन है?–

तो बिन घड़ी न जाय, जमवारो किम जावसी।
मो बिलखतड़ी नार, जोगण करगो जेठवा।।

समय के साथ ऊजली प्रेमाग्नि में तप कर स्वर्ण की भांति उज्ज्वल होती गई। एक बार पति मान लेने पर वह तो मेह के साथ जन्म-जन्मान्तर के लिए बंध चुकी थी। समय का कोई क्षण, वायु का कोई झोंका उसे पृथक नहीं कर सकता था। यह कैसी विडम्बना है कि मेह को अपनी जीवनदायिनी का कोई ध्यान नहीं। यदि ऊजली के स्थान पर लंदन की सड़कों पर फिरने वाली कोई पाश्चात्य रमणी होती तो प्रतिशोध की ज्वाला से धधक उठती, न्यायालय की शरण लेकर मेह से किनारा करती अथवा कम से कम अपने भावी जीवन का कोई नया उपक्रम बनाती। भारतीय नायिकाओं के भाग्य में तिल-तिल जलने के अतिरिक्त और लिखा ही क्या है? वे अश्रु-जल से अपने प्रेम-पौधे को सींचती आई हैं। उनका सारा ध्यान केवल एक स्वामी की ओर ही केन्द्रित हो जाता है। स्वभावत: ऊजली के हृदय में भी मेह की ही चिन्ता है, मन उसी के ध्यान में मग्न है, अन्तःकरण उसी के लिए लालायित है, चित्त उसी की चाह में बेचैन है, सारे रोम-रोम में वही समाया हुआ है, सम्पूर्ण जीवन उसी का पक्षपाती है। लाख छटपटाने पर भी ऊजली का मन किसी अन्य व्यक्ति की ओर नहीं आकर्षित हो सकता। उसे तो जेठवा के अभाव में सारा संसार ही सूना दिखाई देता है–

आवै और अनेक, जाँ पर मन जावै नहीं।
दीसै तो बिन देख, जागा सुनी जेठवा।।

ऊजली के स्वर में चातक के सदृश प्रेम की अनन्यता है। जिस प्रकार चातक स्वाति नक्षत्र के जल को छोड़ कर अन्य किसी जल का सेवन नहीं करता उसी प्रकार ऊजली मेह के अतिरिक्त किसी अन्य के प्रेम को स्वीकार नहीं करती-

बापैयो बीजे, पालर वण पीवे नहीं।
समदर भरियो छेः, (तोय) जल नो बोटे जेठवा।।

सच है पाबासर (मानसरोवर) के शीतल जल से जिसने अपनी प्यास बुझाई हो, वह छोटे-छोटे नाडकिये (पोखर) के पास कैसे जा सकती है हैं—

जळ पीधो जाड़ेह, पाबासर रे पावटे।
नैनकिये नाड़ेह, जीव न ढूके जेठवा।।

ऊजली पुकार-पुकार कर कहती है कि मेह ने उसके हृदय-कपाट में ऐसा दृढ़ ताला लगा दिया है जो उसके आने पर ही खुल सकता है अन्यथा जुड़ा ही रहेगा-

ताळा सजड़ जड़ेह, कूंची ले कानै थयो।
आयां ही उघड़ेह, (नहिं) जड़िया रहसी जेठवा।।

ऊजली चकवा एवं सारस की अभिन्न जोड़ी देख कर सोचती है काश मेरी भी ऐसी होती-

जोड़ी जग में दोय, चकवे नै सारस तणी।
तीजी मिळी न कोय, जो जो हारी जेठवा।।

प्रेम के एकांत मंदिर में अर्चन-पूजन करने वाली यह तपस्विनी बाला न तो अपने देवता का रहस्य ही जान पाई, न उसके दर्शन ही हो सके, उसका सारा जीवन सूने मन्दिर में सेवा करते करते बीत गया-.

दरसण हुआ न देव, भेष विहूणा भटकिया।
सूनो मंदिर सेव, जनम गमायो जेठवा।।

~~क्रमशः


नोट: पूर्व में प्रेषित कड़ियों को पढने के लिए निम्न अनुक्रमणिका में सम्बंधित विषय के शीर्षक पर क्लिक कीजिये। जो कड़ियाँ प्रेषित हो चुकी हैं उन्ही के लिंक एक्टिव रहेंगे।

अनुक्रमणिका

पहला अध्याय – विषय प्रवेश

दूसरा अध्याय – चारण साहित्य की पृष्ठभूमि (सन ६५०-११५० ई.)

तीसरा अध्याय – प्राचीन काल (सन ११५०-१५०० ई.)

चौथा अध्याय – मध्य काल, प्रथम उत्थान (१५००- १६५० ई.)

पांचवाँ अध्याय – मध्य काल, द्वितीय उत्थान (सन १६५०-१८०० ई.)

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