चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – ९४ | पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल (द्वितीय उत्थान)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ – आलोचना खण्ड : पद्य साहित्य(निन्दात्मक)

नन्दलाल ने मेवाड़ के महाराणा अरिसिंह (द्वितीय) के विरोधी कृत्रिम राणा रत्नसिंह के विषय में सामन्तों को चेतावनी देते हुए लिखा है-

जण (रो) जनम जको कुण जाणे, दाई कसी जणाय दियो।
सतवादियां सा पुरसां सूराँ, कठेई फतूरां राज कियो।।
कूड़ा तोत थि(या) गढ़ कोटे, भाजगिया खळ सकल भणे।
माठी वात पंथ मत लागो, ताय छळ जागो नमख तणे।।

जीवा की दृष्टि में बून्दी के रावराजा अजीतसिंह ने मेवाड़ के महाराणा अरिसिंह (तृतीय) को छलघात से मारकर कोई बहादुरी का काम नहीं किया (१७७२ ई.)। यदि वह खड्ग उठाकर ललकारता तो संसार के लोग निःसन्देह उसे वीर कहते। निम्न गीत में कवि ने रावराजा के कपट की कठोर शब्दों में निन्दा की है-

भुजां धारियो न षाग तैं बाकारियो न बाघ भूरो,
करग्गां प्रहारियो दगा सूं आणे कूंत।
अेकाअेक लाषां बातां हारियो धरम्म अजा,
हींदूनाथ मारियो विसासघात हूंत।
रूकां धाय जातो तोने इळारा बदंता राव,
दीठ आय जातो जे नगारो चाड देत।
तठै भेद लड़स्सी दगा रो पाय जातो तो, तो,
षाय जातो अड़स्सी जगारो घोड़ै षेत।।

बनाजी का निन्दात्मक काव्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है। निम्न गीत में मरहठों के आक्रमण के समय चांदावती एवं उसकी दासी का वार्तालाप कायर पति से सम्बंधित है। रायजादी युद्ध से भाग आने वाले पति के लिए भोजन की तैयारियां करती है जिसे देखकर दासी को आश्चर्य होता है। अभी भोजन आधा ही पका था कि कायर पति शीघ्र भागकर आ गया-

चांदावत कहै है चाढो चखा, दौड़ो बेगज दासी।
बाजत गोळा दिवणी बिढ़िया, आज तो रावळ आसी।।
जोड़ै कर बडारण जंपै, मुळक’र बोली मोसो।
रण मै कहो कंथ आवण रो, भोळां किसो भरोसो।।
बसी अनै षाटू नह बिढ़ियो, भिन्न-भिन्न जाणूं भेदां।
भारथ नाह सदा ही भाजै, उचरै बयण उमेदाँ।।
कांसो करो सितावी कामण, भामण पंथ दिस भाळो।
पाती पाग पमंग दै पैलां, आसी कंथ उपाळो।।
भरता तणी परखकर भोजन, रायजादी रंधवायो।
इसड़ी करी उतावळ इन्दै, अधसीजै ही आयो।।

एक दूसरे गीत में बनाजी ने सास-बहू के संवाद की आयोजना कर मीठी चुटकी लेते हुए कायर की धज्जियां उड़ाई है-

सकती बहू कहै सुणौ सासूजी, अतरा कांई उदासी।
मो कंथ तणो भरोसो मौनें, वै कुसळां घर आसी।।
अड़तां लार भागतां आगै, बातां घणी बणासी।
बागां षाग नणद रा वीरा, आगै भागर आसी।।
ससतर स्याम दे आया सारा, कपड़ा बीच खुसाया।
ऐ तो बात करै छी आगै, अतैं उघाड़ा आया।।
महिना नौ राख्यो उर मांही, आगम बातां आची।
कहती जिसो तिहारो कंथो, सांची ए बहू सांची।।

३. वीरकाव्य:- युद्धों के बढ़ते रहने से वीरकाव्य भी बढ़ता गया। इस काल में आकर तो वह उन्नत अवस्था पर पहुँच गया। प्रबन्धकाव्य के अन्तर्गत मारकाट का विस्तृत वर्णन है किन्तु स्फुट रचनाओं में योद्धा के किसी विशेष कौशल के ही दर्शन होते हैं। जग्गा, वीरभांण, कानों, पहाड़खां एवं करणीदान कविया का काव्य प्रबंध की कोटि में आता है। इन कवियों ने युद्ध को कसौटी मानकर अपने चरित्रनायकों का चित्रण किया है। वीर-रस को सफल एवं सबल अभिव्यक्ति प्रदान करने में इन कवियों का प्रशंसनीय हाथ रहा है।

शास्त्रीय दृष्टि से जग्गा कृत ‘वचनिका राठौड़ रतनसिंहजी री महेसदासोतरी’ में महाकाव्य के सदृश तारतम्यता है किन्तु नायक के जीवन से सम्बद्ध एक ही घटना का वर्णन होने से इसे एक चरित्र-प्रधान वर्णनात्मक खण्ड-काव्य ही माना जायगा। इस में बादशाह शाहजहां की ओर से महाराजा जसवंतसिंह (जोधपुर) की अध्यक्षता में शाहजहां के औरंगजेब एवं मुराद नामक विद्रोही राजकुमारों के विरुद्ध उज्जैन के युद्ध का वर्णन है। इस युद्ध में जसवंतसिंह के अवकाश ग्रहण करने पर रतलाम-नरेश रतनसिंह नेतृत्व करते हैं। कवि ने युद्ध का फड़कता हुआ वर्णन किया है। जसवंतसिंह एवं औरंगजेब की यह भिडंत दृष्टव्य है-

खुन्दालिम करि खोध बसुधा ऊपरि वाजिआ।
लागि गड़ा सिर लोटिआ जाणि कबूतर जोध।।
पड़े लड़े अणपार अड़े धड़े सान्हे अणी।
कमंधे कावलिये कियौ आहिव घोर अधार।।
झोक अणी खग झाट सिर उर माथै सूरमा।
वहती की दळ वाहतां बैकुण्ठवाळी वाट।।
नरवर सूर निगेम भारथ मधि रीती भरी।
आवै जावै अपछरा जगि अरहट घड़ि जेम।।
औरंग जसौ अगाहि जूटा सूरिज राहु ज्यूं।
ग्रहण अन्धारौ गैग्रहण मेछ किऔ रिण माहि।।

~~क्रमशः


नोट: पूर्व में प्रेषित कड़ियों को पढने के लिए निम्न अनुक्रमणिका में सम्बंधित विषय के शीर्षक पर क्लिक कीजिये। जो कड़ियाँ प्रेषित हो चुकी हैं उन्ही के लिंक एक्टिव रहेंगे।

अनुक्रमणिका

पहला अध्याय – विषय प्रवेश

दूसरा अध्याय – चारण साहित्य की पृष्ठभूमि (सन ६५०-११५० ई.)

तीसरा अध्याय – प्राचीन काल (सन ११५०-१५०० ई.)

चौथा अध्याय – मध्यकाल, प्रथम उत्थान (१५००- १६५० ई.)

पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल, द्वितीय उत्थान (सन १६५०-१८०० ई.)

३. वीर काव्य. . . . क्रमशः

6 comments

  • Shambhusingh chahdot Barahath

    जय माता जी की बहुत बढ़िया जानकारी दी है होकम।

  • Balwant Deval

    जिज्ञासु जी की मेहनत को कोटि कोटि वंदन।
    इस पुस्तक को अगर हम खरीदना चाहे तो कंहा ओर कैसे सम्पर्क करना होगा।
    कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

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  • Mahendra singh

    साधुवाद

  • पुष्पेंद्र जुगतावत

    यह ग्रन्थ अत्यधिक श्रमसाधना का परिणाम है। इसका सुलभ होना स्वागत योग्य है।

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