चारण साहित्य का इतिहास – पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल (द्वितीय उत्थान)

(ख) आलोचना खण्ड : पद्य साहित्य

१. प्रशंसात्मक काव्य:- चारण कवियों की प्रशंसा पद्धति प्राय: समान है। अत: विगत काल के सदृश इस काल में भी राजा-महाराजाओं एवं जागीरदारों की वीरता, दानशीलता, धर्म-वीरता, प्रभुता, तेजस्विता, कृतज्ञता एवं राग-रंग का ही वर्णन अधिक मिलता है। यह काव्य राजवंशों से सम्बद्ध एक विशेष पद्धति का द्योतक है। कतिपय कवि ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने साधु-महात्माओं का यशोगान किया है। इन समस्त कवियों ने फुटकर कवितायें लिखी है।

क्षत्रिय नरेशों की वीरता चारण कवियों की प्रशंसा का अनिवार्य गुण है। इस दृष्टि से पता, गिरधर, सुजाणसिंह, बखता, भीकमचंद, श्री एवं श्रीमती करणीदान कविया, नंदलाल, रामदान प्रभृति कवि उल्लेखनीय हैं। बड़ी सादड़ी (मेवाड़) के झाला चंद्रसेण की वीरता का वर्णन अनेक कवियों ने किया है। पता भी उनमें से एक है-

अईची भैभीत चंद्रसेण राणा अकल। आज संसार सहि क्रीत आखै।
अमर जै सींघ बैल मेळ औरंग अगे। राज पाखै न को धरा राखै।।
सोढ़ रा प्रवाड़ा भाग तो सारखा। पहलका अहलका प्रिथी पुणिया।
राण रै साह रै धकै थिर राखतै। बड़ा धर वाहरू विरद वणिया।।

गिरधर के इस गीत में राणा प्रताप के अनुज शक्तिसिंह की वीरता व्यंजित हुई है-

ऊदल राणै एक दिन, सभ पूछियौ स कोइ।
अणी सिरै कर आहणै, हूंसारै हूं सोइ।
मैंगळ-मैंगल सारिषौ, सीह सारिषौ सीह।
सगतौ उदियासिंघ तण, अंगपित जिसौ अबीह।
चख रत्तै मुख रत्तडी, वैस जिहिं कुळवग्ग।
सगतै जमदड्‌ढां सिरै, आफाळियो करग्ग।
कियौ हुकुम न कांणिकी, ए वट एह अवट्ट।
ऊदळ राण कमखियौ, पह दी सीख प्रगट्ट।
पिता हुकुम लिखियौ परम, अंग अहंकार अथाह।
सगतौ उदियासिंघ तण, सुबसीयौ पतसाह।

सुजाणसिंह ने महाराजा बिशनसिंह (जयपुर) की वीरता के विषय में कहा है-

जोडै राज पाट ओछायत, हर जोडै की भोम हदां।
राज जोड़ जोड़ता खेत, सेखां राजां जोड सदा।।
दळ बळ मींडि-मींडि प्राकृत नद, खाग मींडतां त्याग खरो।
मान हरा ची मींडि महाबळ, हरि कीधो तिरलोक हरो।।

वीरवर दुर्गादास (मारवाड़) का पौत्र राठौड़ अभयकरण अचूक वार करने के कारण बखता के धन्यवाद का पात्र है-

दुरग सुत वाह दोय राह दाखे दुझल, रचे गजगाह इक मत इरादा।
जोध मिल सामठा करत चैहरा जिके, जिकेइज करै तारीफ जादा।।

महाराजा बहादुरसिंह ( किशनगढ़) ने मरहठों के अभियानों से राज्य की रक्षा की थी। इस उपलक्ष में भीखमचंद का कथन है-

सुतन राजान बाहादर अभंग सूर गुर, वीर छक चाळ अंग छक वराथी।
विहद कीधी फते जोध रिण बांकड़ां, सांकड़ा बखत मे होय साथी।
यळा सिर प्रवाड़ा कीध ते एहड़ा, केहड़ा कहू ब्रद अछट कांटे।
वीरवर कमंध काळी तणा वेहड़ा, बंधव तो जेहड़ां भीड़ बांटे।।

करणीदान कविया ने एक बार उदयपुर के दरबार में विवाहोत्सव पर जब सब राज्यों के कवि एकत्र हुए थे तब महाराणा उदयपुर की प्रशंसा में यह दोहा कहा था–

डोलै नह दी डीकरी, नवरोजे निरमांण।
हुआ न कोई होवसी, सीसोदिया समान।।

कहते हैं, यह दोहा सुनकर महाराजा अभयसिंह (जोधपुर) मुग्ध हो गए और उन्होंने महाराणा से अपने राज्य के लिए कवि की मांग की। अभयसिंह के लिए कवि की उक्ति है-

तुम कदली के पात हो, हम इमली के पान।
तुम हम किसी बराबरी, कह कवि करणीदान।।

इसी प्रकार कविया प्रतापसिंह राठौड़ ( खेरवा) एवं राठौड़ अमरसिंह (निमाज) पर मुग्ध हैं क्योंकि वे वीर हैं। प्रताप की प्रशंसा में कवि कहता है-

नयण रंग जोस छिवि गयण पोरस निडर, वयण रंग रोस समहर विरोधा।
दूसरा रयण भुजदंड थारा दुगम, जई ओधस गयण राव जोधा।।
तूज जिम पता सिणगार कुळ सोहो तणा, असुर खग वोहो तणा जीत आवे।
भुजां छक छोह तणा वधारा जिके भड़, पोहो तणा वधारा भलां पावे।।

कवि ने अमरसिंह के शौर्य-पराक्रम की प्रशंसा शाही उमरावों के मुंह से कराकर अनूठापन ला दिया है-

यसही ने खवांनी तणे मुंह ऊपरां, दायिणै दसत रा तमाचा दीध।
साह आगळ कहे ऊबरां साहरां कमंध री हकीकत जाहरां कीध।।
इता कर खूंन दरगाह बिच आवियो राह दहुंवे सिरे नाम रहियो।
कुसळ सुत वाह वे-वाह हीमत करां, किलम पात वाह वे-वाह कहियो।।

~~क्रमशः


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