चारणों की उत्पत्ति – ठा. कृष्ण सिंह बारहट


चारणों की उत्पत्ति के सन्दर्भ में ठा. कृष्ण सिंह बारहट ने अपने खोज ग्रन्थ “चारण कुल प्रकाश” में विस्तार से प्रामाणिक सामग्री के साथ लिखा है। उसी से उद्धृत कुछ प्रमाणों को यहाँ बताया जा रहा है। ये तथ्य हमारे प्राचीनतम ग्रंथों श्रीमद्भागवत्, वाल्मीकि-रामायण तथा महाभारत से लिए गए हैं।

चारणों की उत्पत्ति सृष्टि-श्रजन काल से है और उनकी उत्पत्ति देवताओं में हुई है, जिसका प्रमाण श्रीमद्भागवत् का दिया जाता है कि नारद मुनि को ब्रह्मा सृष्टि क्रम बताते हैं, वहां के द्वितीय-स्कंध के छटे अध्याय के बारह से तेरह तक के दो श्लोक नीचे लिखते हैं :-

अहं भवान् भवश्चैव त मुनयोऽग्रजाः।।
सुरासुरनरा नागाः खगा मृगसरीसृपाः।।१२।।
गंधर्वाप्सरसो यक्षा रक्षोभूतगणोरगाः।।
पशवः पितरः सिद्धा विद्याधरश्च चारण द्रुमाः।।१३।।
अर्थ :- हे नारद! मैं, तू, शिव, ये अग्रज-मुनि, देवता, असुर, मनुष्य, नाग, खग, मृग, सर्प।।१२।। गंधर्व, अप्सरा, यक्ष, राक्षस, भूत-गण, उरग, पशु, पितर, सिद्ध, विद्याधर, चारण, वृक्ष (ये सब हरि से हुए हैं)।।१३।।

यहां चारणों की उत्पत्ति मनुष्यों से भिन्न बताई गई, इससे इनकी उत्पत्ति देवताओं में होना सिद्ध है। देवता शब्द स्त्री-लिंग है परन्तु लोक-रूढ़ि से पुल्लिंग लिखा जाता है। फिर ब्रह्मा, नारद से कहते हैं सो इसी दूसरे-स्कंध के छठे अध्याय के इकतालीस और बयालीस, दो श्लोक नीचे लिखे जाते हैं :-

अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशा दक्षादयो ये भवदादयश्च।
स्वर्लोकपालाः खगलोकपाला नृलोकपालास्तल लोकपालाः।।४१।।
गंधर्व्वविद्याधरचारणेशा ये यक्षरक्षोरगनागनाथाः।।
ये वा ऋषीणामृषभाः पितृणां दैत्येन्द्रसिद्धेश्वरदानवेंद्राः।।४२।।
अर्थ :- स्वयं मैं (ब्रह्मा), रूद्र, विष्णु, ये दक्ष आदि प्रजापति और तू (नारद और कुमार), ऋषि, स्वर्ग के पालक, पक्षी-लोक के पालक, मनुष्य-लोक के पालक, पाताल-लोक के पालक।।४१।। गंधर्व, विद्याधर, चारण, यक्ष, रक्ष, उरग, सर्पों के पति, ऋषियों में और पितरों में श्रेष्ठ दैत्येन्द्र, दानवेन्द्र (सब) हरि से उत्पन्न हुए हैं।।४२।।

फिर, इसी दूसरे-स्कंध का दशवां अध्याय का अड़तीसवां श्लोक यह हैः-

प्रजापतीन् मनून देवानृषीन् पितृगणान् पृथक्।
सिद्धचारणगन्धर्वान् विद्याध्रासुरगुह्यकान्।।३८।।
अर्थ :- वही भगवान् प्रजापति मनु, देवता, ऋषि, पितर, सिद्ध, चारण, गंधर्व, विद्याधर, असुर, गुह्यक इनको जुदा-जुदा सृजता हुआ।।३८।।

इन प्रमाणों से ही चारणों की उत्पत्ति देवताओं में होना सिद्ध है परन्तु आगे मैत्रेय ऋषि, विदुर को सृष्टि-क्रम बताते हैं, वहां वैकारिक-सृष्टि नौ-प्रकार की कह कर, दशवीं-सृष्टि देवताओं की कहते हैं सो आठ प्रकार की है। यहां गुण-कर्म के अनुसार इन देवताओं के गण बंधे हैं सो ही क्रम श्रीधरादि टीका-कारों ने लिखा है, जिसके प्रमाण में तीसरे-स्कंध के दशवें-अध्याय के सताईस और अठाईस दो श्लोक नीचे लिखते हैं :-

देवसर्गश्चाष्टविधो विबुधाः पितरोऽसुराः।
गंधर्वाऽप्सरसः सिद्धा यक्षरक्षांसि चारणाः।।२७।।
भूतप्रेतपिशाचाश्च विद्याध्राः किन्नरादयः।।
दशैते विदुराऽख्याताः सर्गास्ते विश्वसृकृताः।।२८।।
अर्थ :- देवताओं की सृष्टि आठ प्रकार की है – १ विबुध-पितर २ असुर ३ गंधर्व और अप्सरा ४ यक्ष-राक्षस ५ भूत-प्रेत और पिशाच ६ सिद्ध-चारण, विद्याधर ७ किन्नर आदि ८ देवता मिलकर ये आठ भेद हैं, जिन सहित हे विदुर! ब्रह्मा ने दश-प्रकार की सृष्टि रची है।।२७।।

यहां हमने विस्तार-भय से ऊपर कही हुई नौ-प्रकार की सृष्टि का वर्णन छोड़ दिया है, सो जिस किसी को देखना हो, तो वे श्रीमद्भागवत् के तीसरे-स्कंध के दशवें-अध्याय को देख लेवें।

इन प्रमाणों से यह तो स्पष्ट हो गया कि चारणों की उत्पत्ति देवताओं में हुई है परन्तु पीछे से जैसा इनका आचार-व्यवहार रहा, जिसके भी प्रमाण देने आवश्यक हैं क्योंकि आचार-व्यवहार के बदलने से जाति की उत्तमता-अधमता बदल जाती है, जैसे देवताओं से और राक्षसों से विरोध होने के कारण राक्षसों की गणना अधम-पक्ष में गिनने लगे और भूत, प्रेत, पिशाचों का आचार-भ्रष्ट हो जाने के कारण इनकी गणना देवताओं में नहीं रही। इसी प्रकार, चारणों के लिए भी जानना आवश्यक है कि इनका आचार-व्यवहार कैसा रहा, सो इनके प्रमाण प्रथम, श्रीमद्भागवत् के, फिर वाल्मीकि-रामयण के और महाभारत के देकर इन ग्रन्थों के पीछे के प्रमाणों से इस विषय को वर्तमान-पर्यंत शैली-बद्ध सिद्ध करते हैं, जिनमें प्रथम श्रीमद्भागवत् के प्रमाण हैं :-

श्रीमद्भागवत् के प्रमाण

श्री कपिलदेव भगवान् माता को सांख्य-शास्त्र का उपदेश देकर तप करने गये, वहां के तीसरे-स्कंध के तेतीसवें-अध्याय के चौंतीस और पैंतीस के दो श्लोक नीचे लिखते हैंः-

सिद्धचारणगंधर्वैमुनिभिश्चाप्सरो गणैः।
स्तूयमानः समुद्रेण दत्तार्हणनिकेतनः।।३४।।
आस्ते योगं समास्थाय सांख्याचार्यैरभिष्टुतः।
त्रयाणामपि लोकानामुपशांत्यै समाहितः।।३५।।
अर्थ :- जिनकी स्तुति सिद्ध, चारण, गंधर्व, मुनि और अप्सराओं के गणों ने की है और समुद्र ने जिनको पूजन और स्थान दिया है, सांख्य के आचार्यों ने जिनकी स्तुति की है।।३४।। ऐसे कपिल मुनि, तीनों लोकों की शांति के लिए योग में स्थित होकर गंगा-सागर में बिराजे।।३५।।

स्वयंभु-मनु के उपदेश से ध्रुव ने यक्षों को मारना छोड़ा तब कुबेर, ध्रुव के समीप आये, इस प्रकरण का चौथे-स्कंध के बारहवें-अध्याय का प्रथम श्लोक नीचे लिखते हैं :-

ध्रुवं निवृत्तं प्रतिबुध्य वैशसादपेतमन्युं भगवान्धनेश्वरः।
तत्रागतश्चारणयक्षकिन्नरैः संस्तूयमानोभ्यवदत्कृतांजलिम्।।१।।
अर्थ :- यक्षों के वध से निवृत्त हुए ध्रुव को क्रोध-रहित जानकर चारण, यक्ष-किन्नर स्तुति करते हैं, वहां भगवान् कुबेर को आया जान ध्रुव ने दंडवत् की और कुबेर ने आशीर्वाद दिया।।१।।

राजा पृथु के यज्ञ में देवता आये, जिनको राजा ने हाथ जोड़ कर पूजन करके विदा किया, इस प्रकरण के चतुर्थ-स्कंध के बीसवें-अध्याय के पैंतीसवें और छत्तीसवें श्लोक नीचे लिखे जाते हैं :-

देवर्षिपितृगंधर्वसिद्धचारणपन्नगाः।
किन्नराप्सरसो मर्त्त्याः खगा भूतान्यनेकशः।।३५।।
यज्ञेश्वरधिया राज्ञा वाग्वित्तांजलिभक्तितः।
सभाजिता ययुः सर्व्वे वैकुंठानुगतास्ततः।।३६।।
अर्थ :- देवता, ऋषि, पितर, गंधर्व, सिद्ध, चारण, नाग, किन्नर, अप्सरा, मनुष्य, खग और अनेक प्राणी, यज्ञेश्वर, इनका बुद्धिमान राजा ने वाणी, चित्त और हाथ जोड़ कर भक्ति-पूर्वक पूजन किया, ऐसे ये और विष्णु के पार्षद अपने लोकों को गये।।३५-३६।।

राजा प्रियव्रत को ज्ञान देने के लिए ब्रह्मा आये, वहां का पंचम-स्कंध का प्रथम का आठवां श्लोक यह है :-

स तत्र तत्र गगनतल उडुपतिरिव विमानावलिभिरपुनथममर
परिवृढैरभिपूज्यमानः पथि वरूथशः सिद्धगंधर्वसाध्यचारण
मुनिगणैरूपगीयमानो गंधमादनद्रोणीमवभासयन्नुपससर्प।।८।।
अर्थ :- वह जहां-तहां आकाश में चन्द्रमा के समान शोभायमान विमानों में बैठे देवताओं द्वारा पूजित तथा सिद्ध, गंधर्व, साध्य, चारण, मुनि-गणों से मार्ग में पूजे गये ऐसे ब्रह्मा गंधमादन-पर्वत की गुफा को प्रकाश करते हुए आये।।८।।

खगोल के वर्णन में शुकदेव मुनि ने राजा परीक्षित को चारणों का लोक बताया है, जिसका पंचम-स्कंध के चौबीसवें अध्याय का चौथा श्लोक नीचे लिखा जाता हैः-

ततोऽधस्तात्सिद्धचारणविद्याधराणां सदनानि तावन्मात्र एव।।४।।
अर्थ :- उस (राहु-मण्डल) से नीचे, उतना (दश-हजार योजना का) ही सिद्ध, चारण, विद्याधरों का स्थान है।।४।।

दक्ष-प्रजापति के तप करते समय श्रीविष्णु भगवान् प्रकट हुए, उस वर्णन के छठे-स्कंध के चौथे-अध्याय के उनचालीस और चालीस, दो श्लोक नीचे लिखे जाते हैं :-

त्रलोक्यमोहनं रूपं विभ्रत्रिभुवनेश्वरः।
वृतो नारदनंदाद्यैः पार्षदैः सुरयूथपैः।।३९।।
स्तूयमानोनुगाययद्भिः सिद्धगंधर्वचारणैः
रूपं यन्महदाश्चर्यं विचक्ष्यागतसाध्वसः।।४०।।
अर्थ :- त्रिलोकी को मोहित करने-वाले रूप को धारण करके त्रिलोकी के ईश्वर, नारद, नंदादि पार्षदों और देवता से युक्त, लोक-पाल और सिद्ध, गंधर्व, चारणों से स्तुति किया गया, बड़ा है आश्चर्य जिसका, ऐसे रूप को देख कर उस दक्ष का भ्रम दूर हुआ।।३९-४०।।

वृत्रासुर और इन्द्र के युद्ध में वृत्रासुर का पराक्रम देख कर देवता और असुर उसकी प्रशंसा करने लगे और इन्द्र को संकट में देख कर हाहाकार करने लगे, उस प्रकरण का छठे-स्कंध के बारहवें अध्याय का पांचवां श्लोक यह है :-

वृत्रास्य कर्मातिमहाऽद्भुतं तत्सुरासुराश्चारणसिद्धसंघाः।
अपूजयंस्तत्पुरुहूतसंकटं निरीक्ष्य हाहेति विचुक्रुशुभृशम्।।५।।
वृत्रासुर के बड़े अद्भुत कर्म को देख कर देवता, असुर, चारण और सिद्धों के समूह, उसकी बड़ाई करने लगे और इंद्र का संकट देख कर हाहाकार करने लगे।।५।।

हिरण्याक्ष ने दिग्वजय किया, जिस प्रकरण का सातवें-स्कंध का चौथा अध्याय का छठा श्लोक यह है :-

सिद्धचारणविद्याध्रानृषीन्पितृपतीन्मनून्।
यक्षरक्षः पिशाचेशान् प्रेतभूतपतीनथ।।६।।
अर्थ :- सिद्ध, चारण, विद्याधर, ऋषि, पितरों के पति, मनु, यक्ष, राक्षस, पिशाच, इनके ईश्वर और प्रेत-भूतों के पतियों को जीते।।६।।

नृसिंहावतार होकर हिरण्याक्ष को मारा, तब से देवता वहां आये, इस प्रकरण के सप्तम्-स्कंध के आठवें अध्याय के अड़तीस और उनचालीसवें, दो श्लोक नीचे लिखे जाते हैं :-

मनवः प्रजानांपतयो गंधर्वाप्सरचारणाः
यक्षाः किंपुरषास्तात वैतालाः सिद्धकिन्नराः।।३८।।
ते विष्णुपार्षदाः सर्वे सुनदंकुमुदादयः।
मूर्ध्नि बद्धांजलिपुटा आसीनं तीव्रतेजसम्।
ईडिरे नरशार्दूलं नातिदूरचराः पृथक्।।३९।।
अर्थ :- मनु प्रजापति, गंधर्व, अप्सरा, चारण, यक्ष, किंपुरुष, वैताल, सिद्ध, किन्नर।।३८।। सुनंद, कुमुद, आदि विष्णु के सब पार्षद वहां आकर हाथ जोड़ कर मस्तक से नमस्कार करके समीप खड़े हो कर सिंहासन पर बैठे हुए तीव्र तेज-वाले नृसिंह की भिन्न-भिन्न स्तुति करने लगे।।३९।।

सब देवताओं ने नृसिंह की जुदी-जुदी स्तुति की, जिनमें चारणों द्वारा की हुई स्तुति का सप्तम्-स्कंध के आठवें-अध्याय का इकावनवां श्लोक यह है :-

चारणा उचुः।। हरे तवांध्रिपंकजं भवापवर्गमाश्रिताः।
यदेष साधुहृच्छयरत्वयाऽसुरः समापितः।।५१।।
अर्थ :- चारण स्तुति करते हैं कि हे हरे! संसार की निवृत्ति कराने-वाले तुम्हारे चरण-कमल, जिनके हम आश्रित हुए हैं तो साधु-पुरुषों के हृदय में भय देने-वाले आसुर का तुमने नाश किया है।।५१।।

गजेन्द्र का मोक्ष करने-वाले हरि-अवतार की कथा में चित्रकूट नामक पर्वत के वर्णन का आठवें-स्कंध के दूसरे अध्याय का पांचवां श्लोक हैः-

सिद्धचारणगंधर्वविद्याधरमहोरगैः।।
किन्नरैरप्सरोभिश्च क्रीड़द्भिर्जुष्टकंदरैः।।५।।
अर्थ :- क्रीड़ा करने-वाले सिद्ध, चारण, गंधर्व, विद्याधर, बड़े-बड़े सर्प, किन्नर, अप्सराओं द्वारा सेवन की गयी है गुफा जिसकी।।५।।

श्रीहरि ने गजेन्द्र को मोक्ष प्रदान किया, वहां के वर्णन का आठवें-स्कंध के चौथे अध्याय के दूसरे श्लोक में चारणों ने श्रीहरि की स्तुति की, सो नीचे लिखते हैं :-

नेदुर्दुंदुभयो दिव्या गंधर्वा ननृतुर्जगुः।
ऋषयश्चारणाः सिद्धास्तुष्टुवुः पुरुषोत्तमम्।।२।।
अर्थ :- देवताओं के नगारे बजे, गंधर्व नाचने और गाने लगे, ऋषि, चारण और सिद्धों ने उन पुरुषोत्तम भगवान् की स्तुति की।।२।।

समुद्र-मंथन के समय देवताओं को अमृत देने के कारण श्रीविष्णु भगवान् ने मोहिनी-रूप धारण किया। इस प्रकरण का आठवें-स्कंध के आठवें-अध्याय का उन्नीसवां श्लोक लिखा जाता हैः-

विलोकयन्ती निरवद्यमात्मनः पदंध्रुवं चाव्याभिचारिसद्रुणम्।
गंधर्वयक्षासुरसिद्धचारणत्रैविष्टपेयादिषु नान्वविन्दत।।१९।।
अर्थ :- अपने दोष-रहित, नित्य-गुण-युक्त स्थान को देख कर गंधर्व, यक्ष, सिद्ध, चारण देवता इनको प्राप्त नहीं हुए।।१९।।

मोहिनी-रूप की स्तुति में दानव कहते हैं कि सिद्ध, चारणों ने भी तुम्हारा स्पर्श नहीं किया सो मनुष्य कहां से करेंगे? इसका आठवें-स्कंध की नवमें-अध्याय का चौथा श्लोक लिखा जाता हैः-

न वयं त्वाऽमरैद्दैत्यैः सिद्धगंधर्वचारणैः
नास्पृष्टपूर्वां जानीमो लोकेशैश्चकुतो नृभिः।।४।।
देवता, दैत्य, सिद्ध, गंधर्व, चारण, इन्होने तुम्हारा पहले स्पर्श नहीं किया और लोक-पालों ने भी स्पर्श नहीं किया तो मनुष्य कहां से करेंगे, यह हम जानते हैं।।४।।

वामन भगवान् के जन्म होने पर देवता प्रसन्न होकर-स्तुति करने लगे, इस प्रकरण के अष्टम-स्कंध के अठारहवें-अध्याय के आठ से लेकर दश-पर्यंत तीन श्लोक नीचे लिखते हैं :-

प्रीताश्चाप्सरसोऽनृत्यन् गन्धर्वप्रवराजगुः।
तुष्टुवुर्मुनयो देवा मनवः पितरोऽग्नयः।।८।।
सिद्धविद्याधरगणाः सकिंपुरुषकिन्नराः।
चारणा यक्षरक्षांसि सुपर्णा भुजगोत्तमा।।९।।
गायंतोऽतिप्रशंसंतो नृत्यन्तो विबुधानुगाः।
अदित्या आश्रमपदं कुसुमैः समवाकिरन्।।१०।।
अर्थ :- प्रसन्न हो कर अप्सरा नाचने लगीं, श्रेष्ट-गंधर्व गाने लगे, मुनि स्तुति करने लगे, देवता-मुनि-पितर-अग्नि।।८।। सिद्ध, विद्याधर, किंपुरुष, किन्नर, चारण, यक्ष, राक्षस, गरूड़-सर्प।।९।। गाने लगे और अत्यन्त प्रशंसा करने लगे, देवताओं के अनुचर नाचने लगे और अदीति के आश्रम में फूल बरसाने लगे।।१०।।

राजा बलि ने वामन को तीन पैंड भूमि दी, उस समय देवताओं ने बलि पर फूल बरसाये, इस प्रकरण का आठवें-स्कंध के बीसवें-अध्याय का उन्नीसवां श्लोक लिखा जाता है :-

तदा सुरेन्द्रं दिवि देवतागणा गंधर्वविद्याधरसिद्धचारणाः
तत्कर्म सर्वेऽपि गृणन्त आर्जवं प्रसूनवर्षैर्वषुर्मुदाऽन्विताः।।१९।।
अर्थ :- उस समय स्वर्ग में देवताओं के समूह, गंधर्व, विद्याधर, सिद्ध, चारणों ने असुरों के इन्द्र एवं बलि पर फूलों की वर्षा की और सब ने बलि के कर्म की बड़ाई की और आनन्द-युक्त हुए।।१९।।

श्रीकृष्ण के जन्म-समय, सिद्ध और चारणों ने स्तुति की, सो दशम्-स्कंध का तीसरे अध्याय का छठा श्लोक लिखा जाता हैः-

जगुः किन्नरगंधर्वास्तुष्टुवुः सिद्धचारणाः
विद्याधर्यश्च ननृतुरप्सरोभिः समं तदा।।६।।
अर्थ :- किन्नर, गंधर्व गान करने लगे, सिद्ध, चारण प्रसन्न होकर स्तुति करने लगे और अप्सराओं को साथ लेकर विद्याधरों की स्त्रियाँ नृत्य करने लगीं।।६।।

यशोदा के गर्भ से उत्पन्न होने-वाली देवी ने कंस के हाथ से छूट कर कंस को मारने वाले के जन्म की सूचना दी, उस प्रकरण का दशवें-स्कंध के चौथे अध्याय का ग्यारहवां श्लोक निम्नलिखित हैः-

सिद्धचारणगंधर्वैरप्सरः किन्नरोरगै।।
उपहृतोरूबलिभिः स्तूयमानेदमब्रवीत्।।११।।
अर्थ :- सिद्ध, चारण, गंधर्व, अप्सरा, किन्नर और नागों ने बड़ी भेंटे दे कर स्तुति की, तब वही देवी, यह बोली।।११।।

श्रीकृष्ण, कालिय नाग के फणों पर नृत्य करने को खड़े हुए, तब सिद्ध, चारण आदि प्रसन्न हुए, इस प्रकरण का दशम्-स्कंध के सोलहवें-अध्याय का सताईसवां श्लोक नीचे लिखते हैं :-

तं नर्तुमुद्यत्तमवेक्ष्य तदा तदीयगंधर्व सिद्धसुरचारणदेववध्ववः।।
प्रीत्या मृदङ्गपणवानकवद्यगीतपुष्पो पहारनुतिभिः सहसोपसेदु।।२७।।
अर्थ :- श्रीकृष्णचन्द्र कालिय नाग के फणों पर नाचने को खड़े हुए, उस समय गंधर्व, सिद्ध, देवता, चारण, देवताओं की स्त्रियां सब प्रसन्न हो कर मृदंग, ढोल नगारे ले-लेकर गाने-बजाने लगीं और पुष्पों की वर्षा करके, भेंट ले कर स्तुति करती हुई शीघ्र आईं।।२७।।

गोवर्धन-पर्वत को उठाया तब देवताओं ने फूलों की वर्षा की, इस प्रकरण का दशम्-स्कंध के पचीसवें-अध्याय का इकतीसवां श्लोक निम्नलिखित हैः-

दिवि देवगणाः साध्याः सिद्धगंधर्वचारणाः।।
तुष्टुवर्मुमुचुस्तुष्टाः पुष्पवर्षाणि पार्थिव।।३१।।
अर्थ :- शुकदेवजी कहते हैं कि हे राजन परीक्षित स्वर्ग में देवताओं के गण, साध्य, सिद्ध, गन्धर्व और चारण संतुष्ट होकर फूलों की वर्षा करने लगे।।३१।।

गोवर्धन-पर्वत उठाने के बाद श्रीकृष्ण का गोविंदाभिषेक हुआ, तब स्वर्ग से इंद्रादिक देवता आये, इस प्रकरण का दशम्-स्कंध का सताईसवां अध्याय का चौबीसवां श्लोक नीचे लिखते हैं :-

तत्रागतास्तुंबरू नारदादयो गन्धर्वविद्याधरसिद्धचारणाः।।
जगुर्यशो लोकमलांपहं हरेः सुरांगनाः संननृतुर्मुदान्विताः।।२४।।
अर्थ :- उस समय आये हुए तुंबरू, नारद आदि गंधर्व, विद्याधर, सिद्ध, चारण, नाग-लोकों का पाप दूर करने-वाले श्रीकृष्ण के यश को गाने लगे और देवताओं की स्त्रियां प्रसन्न होकर नाचने लगीं।।२४।।

बाणासुर की राजधानी शोणितपुर में श्रीकृष्ण और महादेव का युद्ध हुआ, तब ब्रह्मा आदि देवता देखने आये, इस प्रकरण का दशम्-स्कंध की तिरसठवां अध्याय का नवमां श्लोक नीचे लिखा जाता हैः-

ब्रह्मादयः सुराधीशा मुनयः सिद्धचारणाः
गन्धर्वाप्सरसो यक्षा विमानैर्द्रष्टुमागमन्।।९।।
अर्थ :- देवताओं में मुख्य ब्रह्मा आदि मुनि, सिद्ध, चारण, गंधर्व, अप्सरा, यक्ष, ये सब विमानों में बैठ कर युद्ध देखने को आये।।९।।

श्रीकृष्ण, शाल्व और दन्तवक्र को मार कर पीछे द्वारिका आये, वहां के वर्णन का दशम्-स्कंध के अठत्तरवें-अध्याय का चौदहवां और पन्द्रहवां, दो श्लोक नीचे लिखते हैं :-

मुनिभिः सिद्धगन्धर्वैर्विद्याधरमहोरगैः।
अप्सरोभिः पितृगणैर्यक्षैः किन्नरचारणैः।।१४।।
उपगीयमानविजयः कुसुमैरभिवर्षितः।
वृतश्च वृष्णिप्रवरैर्विवेशालंकृतां पुरीम्।।१५।।
अर्थ :- मुनीश्वर, सिद्ध, गंधर्व, विद्याधर, बड़े सर्प, अप्सरा, पितृगण, यक्ष, किन्नर, चारण, सब ने विजय होना कह कर पुष्पों की वर्षा की, ऐसे श्रीकृष्ण, यादवों को साथ लेकर शोभायमान होते हुए द्वारिकापुरी आये।।१४-१५।।

द्वारिका में श्रीकृष्ण के समीप ब्रह्मादिक देवता आये, जिसके वर्णन के एकादश-स्कंध की छठे-अध्याय के प्रथम श्लोक से लेकर तीसरे श्लोक तक, तीन श्लोक नीचे लिखते हैं :-

अथ ब्रह्मात्मजैर्देवैः प्रजेशैरावृतोभ्यगात्।
भवश्त भूतभव्येशो ययौ भूतगणैर्वृतः।।१।।
इंद्रो मरुद्भिर्भगवानादित्या वसवोऽश्विनौ।
ऋभवोऽअङ्गिरसो रूद्रा विश्वेसाध्याश्च देवताः।।२।।
गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धचारणगुह्यकाः।
ऋषयः पितरश्चैव सविद्याधरकिन्नराः।।३।।
अर्थ :- राजा परीक्षित को शुकदेव मुनि कहते हैं कि नारद, वासुदेव को ज्ञान देने के पश्चात् द्वारिका में ब्रह्मा, सनकादिक देवता, ऋषियों से मिल कर आये और श्रेष्ठ भूतों के पति महादेव, भूत-गण सहित वापस आये।।१।। देवताओं के साथ भगवान् इन्द्र, आदित्य, वसु, अश्विनीकुमार, ऋभु, अंगिरा, एकादश रूद्र, विश्वेदेवा, साध्य।।२।। गंधर्व, अप्सरा, नाग, सिद्ध, चारण, गुह्यक, ऋषि, पितर, विद्याधर, किन्नर आये।।३।।

श्रीकृष्ण के महाप्रस्थान के समय ब्रह्मादिक देवता आये, जिसका वर्णन एकादश-स्कंध के इकतीसवें-अध्याय के एक से लेकर तीन तक के तीन श्लोक नीचे लिखे जाते हैं :-

अथ तत्रागमद्ब्रह्मा भवान्या च समं भवः।
महेन्द्रप्रमुखा देवा मुनयः सप्रेजश्वराः।।१।।
पितरः सर्वगंधर्वा विद्याधरमहोरगाः।
चारणयक्षरक्षांसि किन्नराप्सरसो द्विजाः।।२।।
द्रष्टुकामा भगवतो निर्वाणं परमोत्सुकाः।
गायन्तश्च गृणन्तश्च सौरेः कर्माणि जन्म च।।३।।
अर्थ :- शुकदेव मुनि राजा परीक्षित को कहते हैं कि दारूक के गए पीछे, वहां ब्रह्मा, पार्वती सहित शिव, इंद्रादिक देवता, सन्कादिक मुनि, मरीचि आदि प्रजापति।।१।। पितर, गंधर्व, विद्याधर, महानाग, चारण, यक्ष, राक्षस, किन्नर, अप्सरा, पक्षी।।२।। भगवान् के प्रस्थान को देखने की इच्छा से परम उत्कंठित होकर श्रीकृष्ण के जन्म-कर्म का गान करते और कहते हुए आये।।३।।

जैसे चारणों की उत्पत्ति देवताओं में हुई, वैसे ही उनका आचार-व्यवहार भी देवताओं के सदृष ही रहा जो कि श्रीमद्भागवत् के उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध है। अब आगे कुछ प्रमाण श्रीमद्वाल्मीकि रामायण के दिए जाते हैं :-

श्रीमद्वाल्मीकि रामायण के प्रमाण

श्रीरामचन्द्र महाराज का अवतार होने पर ब्रह्मा ने ऋषि, सिद्ध, चारण आदि देवताओं को आज्ञा दी कि हमारे कल्याण के हेतु विष्णु भगवान् ने राजा दशरथ के यहां अवतार लिया है इसलिए तुम सब उनकी सहायता हेतु वानर शरीर धारण करो, इसी आज्ञानुसार सब देवताओं ने अपने-अपने अंश से वानर-योनि में पुत्र उत्पन्न किए, जिसके वृत्तांत का बाल-काण्ड से सत्रहवें-सर्ग का नवमां श्लोक यह हैः-

ऋषयश्च महात्मानः सिद्धविद्याधरोरगाः।
चारणाश्च सुतान्वीरान् ससृजुर्वनचारिण।।९।।
अर्थ :- महात्मा-ऋषि, सिद्ध, विद्याधर, उरग और चारणों ने वानरों की योनि में अपने-अपने अंश से वीर-पुत्रों को पैदा किया।।९।।

जब समुद्र-मंथन करने से अमृत निकला तब दैत्यों ने उसे देवताओं से छीन लेना चाहा, तब भगवान् विष्णु ने मोहिनी-अवतार लेकर दैत्यों को पराजित कर इन्द्रादिकों को अमृत दिया, तब इन्द्र ने अपना राज्य पाकर, चारणों के साथ ऋषि-संघों का पालन किया, जिसका बाल-काण्ड के ४५वें सर्ग का ४५वां श्लोक यह हैः-

निहत्य दितिपुत्रांस्तु राज्यं प्राप्य पुरन्दरः।
शशास मुदितो लोकान् सर्षिसंघान्सचारणान्।।४५।।
अर्थ :- इन्द्र ने दैत्यों को मार कर राज्य को प्राप्त कर, ऋषि-समुदाय और चारणों सहित, लोकों का हर्ष के साथ पालन किया।।४५।।

गौतम ऋषि की स्त्री अहिल्या के साथ इन्द्र ने मुनि का वेष धारण कर व्यभिचार करना चाहा और गौतम ने आकर इन्द्र का यह दुराचार जान कर इन्द्र को अफल होने का और अहिल्या को शिला-रूप होने का शाप दिया और अपने आश्रम को छोड़, जहां पर सिद्ध, चारण रहते थे, उस हिमालय के सुन्दर शिखर पर तप किया, जिसका वर्णन बाल-काण्ड के ४५वें-सर्ग के ३३वें श्लोक में इस प्रकार हैः-

एवमुक्त्वा महातेजा गौतमो दुष्टचारिणीम्।।
इममाश्रममुत्सृज्य सिद्धचारणसेविते।।३३।।
हिमवच्छिखरे रम्ये तपस्तेपे महातपाः।।
अर्थ :- महा-तेजस्वी गौतम अपनी दुष्ट-आचरण-वाली स्त्री को शाप देकर इस आश्रम को छोड़ कर सिद्ध और चारणों से सेवित किए गए हिमालय के सुन्दर शिखर पर तप करने लगे।।३३।।

गौतम के शाप से अफल हुए इन्द्र ने अग्नि आदि देवता, सिद्ध, गन्धर्व और चारणों को अपना अपराध कह कर उनके उद्योग से सफलता प्राप्त की, जिसके वाल्मीकि-रामायण के बाल-काण्ड के ४९वें सर्ग के प्रारम्भ से चार श्लोक ये हैं :-

अफलस्तु ततः शक्रो देवान्ग्निपुरोगमान्।
अब्रवीस्तत्रनयनः सिद्धगन्धर्वचारणान्।।१।।
कुर्वता तपसो विघ्नं गौतमस्य महात्मनः।
क्रोधमुत्पाद्य हि मया सुरकार्यमिदं कृतम्।।२।।
अफलोस्मि कृतस्तेन क्रोद्धस्ता च निराकृता।
शापमोक्षेण महता तपष्चापहृतं मया।।३।।
तन्मां सुरवराः सर्वे सर्षिसंघाः सचारणाः
सुरकार्यकरं यूयं सफलं कर्तुमर्हथ।।४।।
अर्थ :- तब अफल हुआ और डरे हुए नेत्र-वाला इन्द्र, अग्नि आदि सिद्ध, गन्धर्व और चारण देवताओं से बोला।।१।। महात्मा गौतम के तप में विघ्न करने-वाले मैंने क्रोध प्रकट करके यह सुर-कार्य किया।।२।। उस महात्मा से मैं तो अफल (पुंसत्व-हीन) किया गया और क्रोद्ध करके वह (अहिल्या) छोड़ी गई, भारी शाप के देने से मैंने, उस गौतम का तप हरण किया।।३।। उस कारण से ऋषि-समुदाय सहित और चारणों सहित सब श्रेष्ठ देव, मुझ सुर-कार्य करने-वाले को आप लोग सफल करने को योग्य हैं।।४।।

रामचन्द्र ने धनुष तोड़ा, इस प्रकरण में प्राचीन कथा लिखी है कि शिव और विष्णु मे युद्ध हुआ, वहां पर विष्णु ने हुंकार-मात्रा से शिव को स्तम्भित कर दिया, तब देवता, ऋषि-संघ और चारणों ने उनको समझाया, जिसका बाल-काण्ड के ७५वें सर्ग का १७वां यह श्लोक है :-

हुंकारेण महादेवः स्तंभितोऽथ त्रिलोचनः।
देवैस्तदा समागम्य ऋषिसंघैः सचारणैः।।१७।।
अर्थ :- हुंकार से तीन-नेत्र वाले महादेव को जड़ कर दिया, उस समय ऋषि और चारण आदि परस्पर रामचन्द्र की जय की इच्छा करने लगे।

इस विषय में अरण्य-काण्ड के २३वों-सर्ग का २७वों श्लोक है :-

ऋषयो देवगंधर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः
समेत्य चोचुः सहितास्तेन्योन्यं पुण्यकर्मणः।।२७।।
अर्थ :- वह पुण्य-काम करने-वाले ऋषि, देव और गंधर्व, सिद्ध, चारणों के साथ एकत्रित होकर परस्पर कहने लगे।।२७।।

जब खर, दूषण आदि मारे गए तब रावण, मारीच नामक राक्षस के पास गया, इस विषय में मारीच के वन की शोभा का अरण्य-काण्ड के ३५वें सर्ग का १५वाँ श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

जितकामैश्च सिद्धैश्च चारणैश्चोपशोभितम्।
आजैर्वैखानसैर्माषैबालिखिल्यैर्मरीचिपैः।।१५।।
अर्थ :- जीत लिया है कामदेव को जिन्होंने, ऐसे सिद्ध और चारणों द्वारा अज अर्थात ब्रह्मा के पुत्र वैखानस जाति के, माष जाति के बालखिल्य और मरीचि ऋषियों द्वारा सुशोभित हैं।।१५।।

जब रावण सीता को हरण का लंका गया, तब सीता के त्रसित होने पर समुद्र स्तंभित हो गया और चारण तथा सिद्ध कहने लगे अब रावण की मृत्यु आ पहुंची, इस प्रकरण का अरण्य काण्ड के ५४वें सर्ग का १०वां श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

वैदेह्यां ह्रियमाणायां बभूव वरुणालयः।।
अन्तरिक्षगता वाचः सस्रजुश्चारणास्तथा।।१०।।
एतदन्तोदशग्रीव इति सिद्धास्तदाब्रुवन्।।
अर्थ :- सीता के हरे जने पर समुद्र स्तंभित हुआ, तब आकाश में सिद्ध और चारण बोले कि सीता का हरण होना ही रावण का अन्त है।

सुग्रीव ने सीता को शोधने के लिए वानरों को आज्ञा दी कि समुद्र के बीच पुष्पान्तक पर्वत है, वहाँ पर शोधन करो, इस विषय का किष्कन्धा-काण्ड के ४१वें सर्ग का २८वां श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

तमतिक्रम्य लक्ष्मीवान् समुद्रे शतयोजने।
गिरि:पुष्पितको नाम सिद्धचारणसेवित:।।२८।।
अर्थ :- पूर्वोक्त स्थल, शत-योजन समुद्र में सिद्ध और चारणों से सेवित लक्ष्मीवान पुष्पांतक पर्वत है।।२८।।

लंका-दहन के बाद हनुमान को स्वयं पश्चात्ताप हुआ कि इस अग्नि से सीता का दाह हो गया होगा तो उसके शोक से राम, लक्ष्मणादि सब नाश को प्राप्त होएंगे और उनके शोक से सुग्रीव, अंगद भी मर जायेंगे तो इस दोष का मुख्य-कर्ता मैं हुआ, सो इनसे पहले मैं आत्म-घात करलूं तो ठीक है। ऐसे पश्चात्ताप करते हुए हनुमान ने चारण-ऋषियों के मुख से सुना कि लंका का दाह हुआ परन्तु सीता का नहीं हुआ, यह हमको आश्चर्य है, इस विषय के सुन्दर-काण्ड के ५५वें सर्ग के २९वें श्लोक से नीचे लिखे जाते हैं

स तथा चिन्तयंस्तत्र देव्या धर्मपरिग्रहम्।
शुश्राव हनुमांस्तत्र चारणानां महात्मनाम्।।२९।।
अहो खलु कृतं कर्म दुर्विग्राह हनूमता।
अग्निं विसृजता तीक्ष्णं भीमं राक्षससह्मनि।।३०।।
प्रपलायितरक्ष: स्त्रीबालवृद्धसमाकुला।
जनकोलाहलाध्माता क्रन्दतीवाद्रिकन्दरैः।।३१।।
दग्धेयं नगरी लंका साट्टप्राकारतोरणा।
जानकी न च दग्धेति विस्मयोद्भुत एव न:।।३२।।
इति शुश्राव हनुमान् वाचं ताममृतोपमाम्।
बभूव चास्य मनसो हर्षस्तत्कालसम्भवः।।३३।।
स निमित्तैश्च दृष्टार्थैः कारणैश्च महागुणैः।
ऋषिवाक्यैश्च हनुमानभवत्प्रीतमानस:।।३४।।
अर्थ :- चिन्ता करते हुए उस हनुमान ने वहाँ सीता का धर्म-संरक्षण, महात्मा चारणों की वाणी से सुना।।२९।। आश्चर्य है कि राक्षसों के घर में तेज अग्नि लगाने-वाले हनुमान ने निस्सन्देह भयानक और कठिन कार्य किया।।३०।। मनुष्यों के कोलाहल शब्द से पर्वत की गुफाओं के समान शब्दित व बालक और वृद्धों से व्याकुल होती हुई भागती हैं राक्षसों की स्त्रियाँ, जिससे।।३१।। ऐसी अटारियों, कोट, दरवाजे सहित यह लंकापुरी दग्ध हुई परन्तु सीता दग्ध नहीं हुई, यह अद्भुत आश्चर्य है।।३२।। इस प्रकार चारणों की कही हुई, उस अमृत के समान वाणी को हनुमान ने सुनी और हनुमान के चित्त में तत्काल हर्ष हुआ।।३३।। देखे हुए अर्थ अर्थात् जिनके फल अनेक बार देखे गये, ऐसे शकुनों से, बड़े गुण-वाले कारणों से अर्थात् सीता के पतिव्रतादि-धर्म के कारणों से और चारण-ऋषियों के वचन से हनुमान का चित्त प्रीति-युक्त हुआ।।३४।।

फिर हनुमान लंका को उल्लंघन करके पीछे अंगदादिक वानरों के पास आया, तब उन्होंने पूछा है कि तुम किस प्रकार गये और किस प्रकार आये, तो वहाँ पर हनुमान ने सब वृत्तांत कहा, उसमें यह भी कथा कही कि मैं लंका को जला कर समुद्र के किनारे पर आया, तब मैंने सोचा कि सब लंका जली तब सीता भी जल गई तो मुझको मर जाना चाहिए, यह विचार करके मैं बैठा, तब चारणों ने कहा कि जानकी नहीं जली हैं। इस प्रकरण के सुन्दर-काण्ड के ५८वें सर्ग के १६१-१६२वें श्लोक नीचे लिखे जाते हैं :-

इति शोकसमाविष्टश्चिन्तामहमुपागत:।
ततोहं वाचमश्रौषं चारणानां शुभाक्षराम्।।१६१।।
जानकी न च दग्धेति विस्मयोदन्तभषिणाम्।।
ततो मे बुद्धिरुत्पन्ना श्रुत्वा तामद्भुतां गिरम्।।१६२।।
अर्थ :- जब मैं इस प्रकार के शोक में पड़ा और चिन्ता को प्राप्त हुआ तो आश्चर्य के वृत्तान्त कहने-वाले चारणों से ये सुन्दर वचन सुने कि सीता नहीं जलीं, फिर इस अछूत-वाणी को सुन कर मुझे बुद्धि पैदा हुई।।१६२।।

जब रामचन्द्र ने रावण को मारा, तब रावण की ज्येष्ठ-पत्नी मन्दोदरी का रुदन वर्णन किया है, वहाँ युद्ध-काण्ड के ११३वें सर्ग के ४ और ५ वाँ श्लोक नीचे लिखते हैं-

ऋषयश्च महान्तोपि गन्धर्व्वाश्च यशस्विन:।
ननु नाम ततोद्वेगाच्चारणाश्च दिशो गता:।।४।।
स त्वं मानुषमात्रेण रामेण युधि निर्जित:।
न व्यपत्रपसे राजन् किमिदं राक्षसेश्वर।।५।।
अर्थ :- बड़े-बड़े ऋषि और यश-वाले गन्धर्व और चारण, यह सब तुम से घबरा कर निस्सन्देह दिशाओं में चले गये, सो तू ऐसा पराक्रमी, हे राक्षसों के ईश्वर! केवल एक मनुष्य-मात्र द्वारा रण में जीता गया, सो यह क्या बात है कि तू लज्जित नहीं होता?।।५।।

जब रावण वरदान पाकर चन्द्रलोक को विजय करने को गया तो मार्ग में जो लोक आये हैं उनमे चारणों का भी लोक आया है, जिसके प्रमाण में उत्तर कांड के ४ और ५वे श्लोक यहाँ लिखे जाते हैं :-

अथ गत्वा तृतीयं तु वायोः पन्थानमुत्तमम्।।४।।
नित्यं यत्र स्थिताः सिद्धाश्चारणाश्च मनस्विनः।।
दशैव तु सहस्त्राणि योजनानां तथैव च।।५।।
अर्थ :- इसके आगे वायु के उत्तम तीसरे मार्ग में गया, वहां विद्वान्, सिद्ध, चारण सदैव निवास करते हैं और वह मार्ग दस हजार योजन का है।।४-५।।

सहस्रार्जुन ने रावण को हजार हाथों से पकड़ कर बाँध दिया, उस समय देवताओं ने पुष्प-वृष्टि की, जिसका उत्तर-काण्ड के ३२वें सर्ग का ६५वाँ श्लोक यह है :-

बध्यमाने दशग्रीवे सिद्धचारणदेवता :।।
साध्वीतिवादिन: पुष्पैः किरन्त्यर्ज्जुनमूर्द्धनि।।६५।।
अर्थ :- रावण के बाँधे जाने को अच्छा कहने वाले सिद्ध, चारण और देवताओं ने सहस्रार्जुन के सिर पर पुष्प-वृष्टि की।।६५।।

उक्त रीति के और भी प्रमाण वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध हैं परन्तु विस्तार भय से यहाँ थोड़े से आवश्यक प्रमाण देकर आगे महाभारत के प्रमाण भी संक्षेप में देते हैं।

श्री महाभारत के प्रमाण

राजा पाण्डु तपस्या करने को इन्द्रद्युम्न सर और हेमकूट को पार कर शत-श्रंग नामक पर्वत पर गया, वहां के वर्णन का अदि-पर्व के १२०वे अध्याय का पहला श्लोक है :-

तत्रापि तपसि श्रेष्टे वर्त्तमानः स वीर्यवान् I
सिद्धचारणसंघानां बभूव प्रियदर्शनःII१II
अर्थ :- श्रेष्ठ तपस्या में प्रवृत होता हुआ वह पराक्रमी पाण्डु राजा, सिद्ध चारण लोगों के समूह का प्रीति-पात्र हुआ।।१।।

वहाँ तपस्या करते हुए राजा पाण्डु का देहान्त हुआ, तब इन्हीं चारण-ऋषियों ने सम्मति करके पाण्डु के पाँचों ही पुत्रों को और कुन्ती को साथ लेकर हस्तिनापुर आकर द्वारपालों को कहा कि राजा को सूचना करो कि ऋषि-लोग आये हैं और उन्होंने जाकर राजा से निवेदन किया, तब द्वारपालों से यह बात सुन कर भीष्म, धृतराष्ट्र और दुर्योधनादि उनके पुत्र और सत्यवती देवी और गान्धारी आदि लेकर सब स्त्रियाँ और समस्त नगर के लोग उन ऋषियों के पास गए, वहाँ जाकर भीष्म ने राज्य और देश का वृत्तांत निवेदन किया, तब उनमें से एक वृद्धतम ऋषि ने खड़े हो कर सब ऋषियों की सम्मति से जो वृत्तांत कहा, आदि-पर्व के १२६ अध्याय के १ से लेकर ३५ तक के ये श्लोक हैं :-

।।वैशाम्पायनउवाच।।
पाण्डोरूपरमं दृष्टवा देवकल्पा महर्षय:।।

ततो मन्त्रविद: सर्वे मन्त्रयांचक्रिमिथ:।।१।।
अर्थ :- वैशम्पायन बोले, राजा पाण्डु की मृत्यु को देख कर सलाह के लिए जाने-वाले देवताओं के सदृश महर्षि लोग आपस में सलाह करने लगे।।१।।

।।तपसा उवाच।।
हित्वा राज्यं च राष्ट्रं च स महात्मा महायशा:।
अस्मिन् स्थाने सपस्तप्त्वा तापसान् शरणं गत:।।२।।
अर्थ :- तपस्वी बोले, वह बड़ा यश-धारी महात्मा अपने देश और राज्य को छोड़कर, इस स्थान में तपस्या करके तपस्वियों के शरण में गया।।२।।

स जातमात्रान् पुत्रांश्च दारांश्च भवतामिह।।
प्रदायोपनिधिं राजा पांडु: स्वर्गमितो गत:।।३।।
अर्थ :- वह पाण्डु राजा, अपने सब पुत्रों और स्त्रियों को यहाँ पर आप लोगों के भरोसे छोडकर स्वर्ग गया।।३।।

तस्येमानात्मजान्देहं भार्यां च सुमहात्मन:।
स्वराष्ट्रं गृह्य गच्छामो धर्म एष हि न: स्मृतः।।४।।
अर्थ :- उस महात्मा के अस्थि और इन पुत्र और स्त्री को लेकर स्वदेश चलें, यही हम लोगों का धर्म है।।४।।

।।वैशम्पायन उवाच।।
ते परस्परमामन्त्र्य देवकल्पा महर्षय:।
पाण्डो: पुत्रान्पुरस्कृत्य नगरं नागसाव्हयम्।।५।।
उदारमनस: सिद्धा गमने चक्रिरे मन:।
भीष्माय पांडवान्दातुं धृतराष्ट्राय चैव हि।।६।।
अर्थ :- वैशम्पायन बोले, वे देवताओं के सदृश महर्षि लोग आपस में सलाह करके पाण्डु के पुत्रों को आगे करके हस्तिनापुर को चले।।५।। उन सिद्धि को प्राप्त हुए उदार मन-वालों ने पाण्डवों को भीष्म और धृतराष्ट्र को देने के हेतु चलने का मन किया।।६।।

तस्मिन्नेव क्षणे सर्वे तानादाय प्रतस्थिरे।
पांडोर्दारांश्च पुत्रांश्च शरीरं ते च तापसा:।।७।।
अर्थ :- उसी क्षण, वे सब तपस्वी पाण्डु के पुत्रों और स्त्री और दोनो दग्ध-शरीरों की अस्थियों को लेकर चले।।७।।

सुखिनी सा पुरा भूत्वा सततं पुत्रवत्सला।
प्रपन्ना दीर्घमध्वानं संक्षिप्तं तदमन्यत।।८।।
अर्थ :- वह सदैव पुत्रों में प्रेम रखने-वाली और सुख को प्राप्त होने-वाली कुंती, सब के आगे रहकर लम्बे मार्ग में प्राप्त है, तो भी उसको छोटा मानती हुई।।८।।

सा त्वदीर्घेण कालेन संप्राप्ता कुरुजांगलम्।
वर्द्धमानपुरद्वारमाससाद यशस्विनी।।९।।
अर्थ :- वह यशस्विनी कुन्ती थोडे ही समय में कुरु-जांगल देश होती हुई मुख्य-द्वार पर पहुंची।।९।।

द्वारिणां तापसा ऊचू राजानं च प्रकाशय।
ते तु गत्वा क्षणेनैव सभायां विनिवेदिता:।।१०।।
अर्थ :- तपस्वी-लोगों ने द्वारपाल से कहा कि राजा को सूचित करो और वे सब क्षण-भर में सभा में गए।।१०।।

तं चारणसहस्राणां मुनीनामागमं तदा।
श्रुत्वा नागपुरे नृणां विस्मय: समपद्यत।।११।।
अर्थ :- उन हजारों चारण-मुनियों के आगमन को सुन कर हस्तिनापुर में मनुष्यों को आश्चर्य हुआ।।११।।

मुहुर्त्तोदित आदित्ये सर्वे बालपुरस्कृता:।
सदारास्तापसान्द्रष्टुं निर्ययु: पुरवासिन:।।१२।।
अर्थ :- दो घड़ी दिन चढ़ने पर सब पुरवासी, बालकों को आगे करके स्त्रियों सहित उन तपस्वियों को देखने के लिए निकले।।१२।।

स्त्रीसंघाः क्षत्रसंघाश्च यानसंघं समास्थिता:।
ब्राह्मणैः सह निर्जग्मुर्ब्राह्मणानां च योषित:।।१३।।
अर्थ :- स्त्रियों के समूह और क्षत्रियों के समूह, सवारियों पर चढ़े हुए तथा ब्राह्मणों के साथ ब्राह्मणों की स्त्रियाँ, ये सब चले।।१३।।

तथा विट्शूद्रसंघानां महान् व्यतिकरोऽभवत्।
न कश्चिदकरोदष्यिमिभवन् धर्मबुद्धय:।।१४।।
अर्थ :- इसी प्रकार, वैश्य और शूद्रों के समूहों की बड़ी भारी भीड़ हुई और सब धर्म-बुद्धि में हुए, किसी ने किसी से ईर्षा नहीं की।।१४।।

तथा भीष्म: शान्तनव: सोमदत्तोऽथ बाल्हिकः।
प्रज्ञाचक्षुश्च राजर्षिः क्षत्ता च विदुर: स्वयम्।।१५।।
सा च सत्यवती देवी कौशल्या च यशस्विनी।
राजदारैः परिवृता गान्धारी चापि निर्ययौ।।१६।।
अर्थ :- इसी प्रकार शान्तनु का पुत्र भीष्म, सोमदत्त, बाल्हिक और राजर्षि धृतराष्ट्र और दासी-पुत्र विदुर और वह सत्यवती देवी, यशस्विनी काशिराज की पुत्री कौशल्या, ये दोनों और राज-स्त्रियों से घिरी हुई गान्धारी भी गयीं।।१६।।

धृतराष्ट्रस्य दायादा दुर्योधनपुरोगमा:।
भूषिता भूषणैश्चित्रैः शतसंख्या विनिर्यंयुः।।१७।।
अर्थ :- दुर्योधन आदि धृतराष्ट्र के सौ पुत्र, नाना-प्रकार के भूषणों से भूषित होकर निकले।।१७।।

तान्महर्षिगणान्द्रष्ट्वा शिरोभिरभिवाद्य च।
उपोपविविशु: सर्वे कौरव्याः सपुरोहिता:।।१८।।
अर्थ :- उन महर्षि-गणों को देख कर और सिरों से नमस्कार करके पुरोहित के साथ, सब कौरव चारों ओर बैठे।।१८।।

तथैव शिरसा भूमावभिवाद्य प्रणम्य च।
उपोपविविशु: सर्वे पौरजानपदा अपि।।१९।।
अर्थ :- इसी प्रकार भूमि से सिर लगा कर अभिवादन अर्थात् अपने नामोच्चारणों के साथ नमस्कार और प्रणाम (आठों-अंगों सहित किया जावे, उसको प्रणाम कहते हैं) करके पुरवासी और देश के सब लोग भी चारों ओर बैठे।।१९।।

तमकूजमभिज्ञाय जनौघं सर्वशस्तदा।
पूजयित्वा यथान्यायं पाद्येनार्घ्येण च प्रभो।।२०।।
अर्थ :- हे महाराज! चारों ओर उस जन-समुदाय को चुपचाप जान कर यथायोग्य पाद्य और अर्ध्य से पूजन करके।।२०।।

भीष्मो राज्यं च राष्ट्रं च महर्षिभ्योंन्यवेदयत्।
तेषामर्थो वृद्धतमः प्रत्युत्थाय जटाजिनी।।
ऋषीणां मतमाज्ञाय महर्षिरिदमब्रवीत्।।२१।।
अर्थ :- भीष्म ने राज्य और देश को महर्षियों के अर्थ निवेदन किया, तदनन्तर महर्षियों में से बडी-भारी जटा-वाला एक बडा वृद्ध महर्षि खड़ा होकर ऋषियों के अभिप्राय को जानकर, यह बोला।।२१।।

य: स कौरव्यदायाद: पाण्डुर्नाम नराधिप:।
कामभोगान्परित्यज्य शतश्रृंगमितो गत:।।२२।।
अर्थ :- जो कौरवों का दाय-भागी पाण्डु नामक राजा था, वह मनोवांच्छित भोगों को छोड़कर यहाँ से शतश्रृंग नामक पर्वत पर गया था।।२२।।
ब्रह्मचर्यव्रतस्थस्य तस्य दिव्येन हेतुना।
साक्षाद्धर्मादयं पुत्रस्तत्र जातो युधिष्ठिर:।।२३।।
अर्थ :- ब्रह्मचर्य-व्रत में रहने-वाले उस पाण्डु के दिव्य हेतु अर्थात् मन्त्र द्वारा देवता आव्हान के कारण साक्षात्-धर्म से यह युधिष्ठिर पुत्र वहाँ उत्पन्न हुआ।

तथैनं बलिनां श्रेष्ठं तस्य राज्ञो महात्मन:।
मातरिश्वा ददौ पुत्रं भीमं नाम महाबलम्।।२४।।
अर्थ :- इसी तरह, उस महात्मा राजा को बलवानों में श्रेष्ठ बडे बलवान् इस भीम नामक पुत्र को मातरिश्वा (पवन) ने दिया।।२४।।

पुरुहूतादयं जज्ञे कुंत्यामेव धनंजय:।
यस्य कीर्तिर्महेश्वासान्‌ सर्वानभिविष्यति।।२५।।
अर्थ :- यह धनंजय, कुन्ती में पुरुहूत (इंद्र) से पैदा हुआ, जिस धनंजय की कीर्ति सम्पूर्ण बड़े धनुष-वाले वीरों को परास्त करेगी।।२५।।

यौ तु मादी महेष्वासावसूत पुरुषोत्तमौ।
अश्विभ्यां पुरुषव्याघ्राविमौ तावपि पश्यत।।२६।।
अर्थ :- जिन बड़े धनुष-वाले उत्तम-पुरुषों को माद्री ने जने हैं, वे दोनों ये पुरुष-व्याघ्र अर्थात् पुरुषों में सिंह के समान अश्विनीकुमारों के समान हैं, उन्हें भी देखो।।२६।।

चरता धर्मनित्येन वनवासं यशस्विना।
नष्ट: पैतामहो वंश: पांडुना पुनद्ध्रत:।।२७।।
अर्थ :- सदैव धर्म में रहने-वाले वन-वासी यशस्वी पाण्डु ने नष्ट हुए पितामह(शांतनु) के वंश का फिर से उद्धार किया।।२७।।

पुत्राणां जन्मवृद्धिं च वैदिकाध्ययनानि च।
पश्यन्तः सततं पाण्डोः परां प्रीतिमवाप्स्यथ।।२८।।
अर्थ :- पुत्रों की जन्म-वृद्धि और वेद का पढ़ना निरन्तर देखते हुए पाण्डु की परम-प्रीति को प्राप्त होएगी।।२८।।

वर्तमान: सतां वृत्ते पुत्रलाभमवाप्य च।
पितृलोकं गत: पांडुरित: सप्तदशेऽहनि।।२९।।
अर्थ :- सत्पुरुषों के आचरण में रहने-वाले पाण्डु को पुत्र-लाभ प्राप्त होकर, इस संसार से पितृ-लोक को गए सत्रह दिन हुए।।२९।।

तं चितागतमाज्ञाय वैश्वानरमुखे हुतम्।
प्रविष्टा पावकं माद्री हित्वा जीवितमात्मन:।।३०।।
अर्थ :- उस अग्नि के मुख मे हवन किए हुए पाण्डु को चिता में गया हुआ जानकर, माद्री ने अपने जीवन को छोड़कर अग्नि में प्रवेश किया।।३०।।

सा गता सह तेनैव पतिलोकमनुव्रता।
तस्यास्तस्य च यत्कार्यं क्रियतां तदनन्तरम्।।३१।।
अर्थ :- यह माद्री सती-धर्म को पालन करती हुई, उस पाण्डु के साथ ही पति-लोक को गई, उस माद्री का और उस पाण्डु का इसके आगे का, जो कार्य करना हो सो करो।।३१।।

इमे तयो: शरीरे द्वे पुत्राश्चेमे तयोर्वरा:।
क्रियाभिरनुगृह्यन्तां सहमात्रा परंतपा:।।३२।।
अर्थ :- उन दोनों के शरीर (अस्थि) और उनके पराक्रमी श्रेष्ठ पुत्र-माता के साथ हैं, उन पर उत्तर-क्रियाओं का अनुग्रह करो।।३२।।

प्रेत-कार्ये निवृत्ते तु पितृमेधं महायशा:।
लभतां सर्वधर्मज्ञ: पाण्डु: कुरुकुलोद्वह:।।३३।।
अर्थ :- प्रेत-कार्य से निवृत्त होने पर महान् यश-वाला धर्म को जानने-वाला कुरु-कुल को धारण करने-वाला, पाण्डु पितृ-यज्ञ को प्राप्त होवे।।३३।।

।।वैशम्पायन उवाच।।
एवमुक्त्वा कुरून्सर्वान्‌ कुरूणामेव पश्यताम्।
क्षणेनांतर्हिता: सर्वे तापसा गुह्यकैः सह।।३४।।
अर्थ :- वैशम्पायन बोले, इस प्रकार सब कौरवों को कह कर कौरवों के देखते ही देखते, क्षण-भर में गुह्यकों के साथ सर्व-तपस्वी अंतर्धान हो गये।।३४।।

गन्धर्वनगराकारं तथैवांतर्हितं पुनः।
ऋषिसिद्धगणं दृष्टवा विस्मयं ते परं ययुः।।३५।।
अर्थ :- फिर, वैसे ही गन्धर्व-नगर के सदृश अर्न्तधान हुए ऋषि और सिद्धों के समुदाय को देख कर, वे कौरव बड़े आश्चर्य को प्राप्त हुए।।३५।।

जब द्रोपदी का स्वयंवर रचा गया, तब कई राजा और कई देवता इकट्ठे हुए, उस समय देवर्षि, चारण इत्यादि भी इकट्ठे हुए थे, इस विषय का आदि पर्व के १५७वे अध्याय के ७वे अंक का श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

दैत्याः सुपर्णाष्व महोरगाश्च देवर्षयो गुह्यक चारणाश्च I
विश्वावसुर्नारदपर्वतौ च गन्धर्वमुख्याः सहसाप्सरोभिःII७II
अर्थ :- दैत्य, गरुड़, बड़े नाग, देवर्षि, गुह्यक, चारण, विश्वावसु, नारद मुनि, पर्वत मुनि और गन्धर्व, मुख्य अप्सराओं के साथ अकस्मात् प्रकट हुए II७II

राजा युधिष्ठिर ने सूर्य की स्तुति की, उस प्रकरण का वन पर्व के ३ अध्याय का ४०व श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

तव दिव्यं रथं यांतमनुयान्ति वरार्थिनःI
सिद्धचारणगन्धर्वा यक्षगुह्यकपन्नगाःII४०II
अर्थ :- है सूर्य, तुम्हारे चलते हुए दिव्य रथ के पीछे वरदान की इच्छा से सिद्ध, चारण, गन्धर्व, यक्ष, गुह्य्यक और सर्प चलते हैंII४०II

युधिष्ठिर की आज्ञा से अर्जुन, महादेव और इन्द्र को देखने के लिए उत्तर दिशा में हिमालय के शिखर की ओर गया, वहाँ पर मार्ग में एक वन आया, जो अनेक मृग, पुष्प, फल से युक्त और सिद्ध व चारणों से सेवित था, इस विषय के वन-पर्व के ३५वें अध्याय के १२वें श्लोक से नीचे लिखे जाते हैं :-

युधिष्ठिरनियोगात्स जगामामितविक्रमः।
शक्रं सुरेश्वरं द्रष्टुं देवदेवं च शंकरम्।।१२।।
दिव्यं तद्धनुरादाय खङ्गं च कनकत्सरुम्।
महाबलो महाबाहुरर्जुन: कार्यसिद्धये।।१३।।
दिशं ह्युदीचीं कौरव्यो हिमवच्छिखरं प्रति।
ऐंद्रिः स्थिरमना राजन् सर्वलोकमहारथः।।१४।।
त्वरया परया युक्तस्तपसे धृतनिश्चयः।
वन कंटकितं घोरमेक एवान्वपद्यत।।१५।।
नानापुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषे वितम्।
नानामृगगणाकीर्णं सिद्धचारणसेवितन्।।१६।।
हे राजन्! युधिष्ठिर की आज्ञा से वह दृढ़ चित्त-वाला, सम्पूर्ण लोक में एक महारथी इन्द्र का बेटा महा-पराक्रमी, महाबाहु, बड़ा बलवान अर्जुन, कार्य-सिद्धि के लिए उत्तम धनुष और सोने की मूठ की तलवार लेकर उत्तर दिशा की ओर हिमालय पर्वत की चोटी की तरफ देवताओं के अधिपति इंद्र और देवों के देव महादेव के दर्शन के हेतु गया।।१२।।१३।।१४।। तप के लिए निश्चय कर अकेला ही बड़ी शीघ्रता के साथ भयानक कँटीले वन में प्रविष्ट हुआ।।१५।। वह वन भांति-भांति के फल और पुष्पों से युक्त अनेक पक्षियों से शोभित, अनेक मृग-समुदाय से भरा हुआ और सिद्ध, चारणों से सेवित है।।१६।।

अर्जुन, इन्द्र की पुरी में पहुँचा तो, जो पुरी सुन्दर, सिद्ध, चारणों से सेवित है और सर्व-ऋतु के वृक्ष, पुष्प आदि से सुशोभित है उसको देखा, इसके प्रमाण में वन-पर्व के ४३वें अध्याय के आदि का श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

ददर्श स पुरीं रम्यां सिद्धचारणसेवितां।
सर्वर्तुकुसुमै: पुण्यै: पादपैरूपशोभिताम्।।१।।
अर्थ :- उस अर्जुन ने सुन्दर, सिद्ध, चारणों से सेवा की हुई और सर्व-ऋतु के पुष्पों-वाले पवित्र वृक्षों से शोभित अमरावती पुरी को देखा।।१।।

उर्वशी ने अर्जुन से कहा कि हे पार्थ! इंद्र की सभा में इतने देवता उपस्थित थे, उस समय तूने मेरी ओर अनिमेष होकर देखा था, उस प्रकरण के वन-पर्व के ४६वें अध्याय से २४वां और २५वां दो श्लोक नीचे लिखते हैं :-

रुद्राणां चैव सान्निध्यमादित्यानां च सर्वश:।
समागमेऽश्विनोश्चैव वसूनां च नरोत्तम।।२४।।
अर्थ :- हे मनुष्यों में उत्तम! रुद्रों के समीप और सब आदित्यों, अश्विनीकुमारों और वसु-देवताओं के मेल में।।२४।।

महर्षीणां च संघेषु राजर्षिप्रवरेषु च।
सिद्धचारण वक्षेषु महोरगगणेषु च।।२५।।
अर्थ :- महर्षियों के समूहों में तथा श्रेष्ठ राजर्षियों में और सिद्ध, चारण, यक्ष व बड़े उरग-समुदायों में तुमने मेरे सामने देखा है।।२५।।

जब इन्द्र के अर्द्ध-आसन पर अर्जुन को बैठा देख कर लोमश को अचरज हुआ, तब इन्द्र ने कहा कि यह मनुष्य नहीं, परन्तु मेरा पुत्र और नर-नारायण का अवतार है, जिसका निवास उस बद्रिकाश्रम में है कि जहाँ से सिद्ध, चारणों से सेवा की हुई गंगा निकलती है, इस विषय के वन-पर्व के ४७वें अध्याय के १०वें श्लोक से लेकर १३वें तक नीचे लिखते हैं :-

ताविमावनुजानीहि ऋषीके शधनंजयौ।
विख्यातौ त्रिषु लोकेषु नरनारायणवृषी।।१०।।
कार्यार्थमवतीणौ तौ पृथ्वी पुण्यप्रतिश्रयाम्।
यन्न शक्यं सुरैर्द्रष्टुमृषिभिर्वा महात्मभिः।।११।।
तदाश्रमपदं पुण्यं बदरी नाम विश्रुतम्।
स निवासोभवद्विप्र विष्णोर्जिष्णोस्तथैवच।।१२।।
यतः प्रवतृते गंगा सिद्धचारणसेविता।।१३।।
अर्थ :- तीनों लोकों में प्रसिद्ध, जो नर-नारायण हैं, उन्हें हृषीकेश (कृष्ण) और धनंजय (अर्जुन) जानो।।१०।। कार्य के लिए वे दोनों पुण्य, पवित्र पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं, जो आश्रम महात्मा, ऋषि और देवताओं के देखने को अशक्य हैं।।११।। वह पुण्य-स्वरूप बद्रिकाश्रम नाम से प्रसिद्ध है, वह आश्रम विष्णु का, वैसे ही अर्जुन का निवास-स्थान हुआ और जिस आश्रम से सिद्ध, चारणों से सेवन की हुई गंगा निकलती है।।१३।।

अगस्त्य-ऋषि ने राजा युधिष्ठिर के आगे कुरुक्षेत्र की और सरस्वती की प्रशंसा की है, उस प्रकरण का वन-पर्व के ८३वें अध्याय का पाँचवां श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

तत्र मासं वसेद्धीरः सरस्वत्यां युधिष्ठिर।
यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः।।५।।
अर्थ :- हे युधिष्ठिर! उस कुरुक्षेत्र में सरस्वती नदी के किनारे एक मास तक धीरज-वाला मनुष्य बसे, जहाँ पर ब्रह्मा आदि देवता, ऋषि और सिद्ध-चारण हैं।।५।।

धौम्य ऋषि ने युधिष्ठिर को तीर्थों का माहात्म्य कहा है, वहाँ वन-पर्व के ८१वें अध्याय के २ से लेकर ४ तक के श्लोक नीचे लिखते हैं :-

प्रियंग्वाम्रवर्णोपेता वानीरफलमालिनी।
प्रत्यक्स्रोता नदी पुण्या नर्मदा तत्र भारत।।२।।
अर्थ :- हे भरतवंशी राजन्! वहाँ पर प्रियंगु और आमों के वनों से युक्त, वानीर वृक्षों के फलों की माला-वाली और पश्चिम दिशा में बहने-वाली पवित्र नर्मदा नदी है।।२।।

त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च।
सरिद्वनानि शैलेन्द्रा देवाश्च सपितामहा :।।३।।
अर्थ :- जो त्रैलोक्य में तीर्थ हैं वा पुण्य-स्थान नदी, वन, पर्वत और ब्रह्मादिक देवता हैं।।३।।

नर्मदायां कुरुश्रेष्ठ सह सिद्धर्षिचारणैः
स्नातुमायान्ति पुण्यौधैः सदा वारिषु भारत।।४।।
अर्थ :- कौरवों में उत्तम राजन् हे भारत! वे सब सिद्ध, ऋषि, चारणों के पवित्र-समूहों के साथ सदैव नर्मदा में स्नान करने को आते हैं।।४।।

युधिष्ठिर ने तीर्थाटन करते हुए बद्रिकाश्रम के मार्ग से कुबेर के भवन को देखने की इच्छा की, तब आकाश-वाणी से कहा गया कि इस मार्ग से नहीं जा सकेगा। पीछा, उसी स्थान में जाकर, वृषपर्वा के आश्रम में जायेगा तो वहाँ से कुबेर का भवन दिखेगा। इस विषय के वन-पर्व के १५६वें अध्याय के १३वें श्लोकसे १६ तक नीचे लिखे जाते हैं :-

।।वैशंपायन उवाच।।
एवं ब्रुवति राजेन्द्र वागुवाचाशरीरिणी।
न शक्यो दुर्गमो गन्तुमितो वैश्रवणाश्रमात्।।१३।।
अनेनैव पथा राजन् प्रतिगच्छ यथागतम्।
नरनारायणस्थानं बदरीत्यभिविश्रुतम्।।१४।।
तस्माद्यास्यसि कौन्तेय सिद्ध-चारण सेवितम्।
बहुपुष्पफलं रम्यमाश्रमं वृषपर्वण:।।१५।।
अतिक्रम्य च तं पार्थ त्वार्ष्टिषैणाश्रमे वसे:।
ततो द्रक्ष्यसि कौन्तेय निवेशं धनदस्य च।।१६।।
अर्थ :- वैशम्पायन बोले, इस प्रकार राजा युधिष्ठिर के बोलने पर बिना शरीर-वाली (आकाश-वाणी) हुई कि यह कठिन मार्ग जाने के योग्य नहीं, इस कारण जिस मार्ग से आया, उसी मार्ग से हे राजन्! कुबेर के आश्रम से पीछा बद्रिकाश्रम के नाम से प्रसिद्ध, जो नर-नारायण का स्थान है वहाँ जा।।१५।। हे कुंतीपुत्र! वहाँ बहुत हैं पुष्प और फल, जिसमें ऐसा प्रसिद्ध चारणों से सेवित मनोहर, जो वृषपर्वा का आश्रम है, वहाँ जायेगा।।१५।। हे पृथा के पुत्र! उसके आगे चल कर आर्ष्टिषेण के आश्रम में निवास करेगा, तब हे कुंती-पुत्र! कुबेर के स्थान को देखेगा।।१६।।

राजा ययाति के स्वर्ग से भ्रष्ट होने से अप्रसन्न होकर उसके दोहित्रों ने पुत्र-कार्य करके पीछा उसको स्वर्ग पहुंचाया और वहाँ पर देवता, ऋषि तथा चारणों ने उत्तम-अर्घ्य से अर्चन किया, इस विषय के उद्योग-पर्व के १२३वें अध्याय के आदि से ५ श्लोक नीचे लिखे जाते हैं :-

।।नारद उवाच।।
सद्भिरारोपितः स्वर्गं पार्थिवैर्भूरिदक्षिणैः।
अभ्यनुज्ञाय दौहित्रान्ययातिर्द्दिवनास्थितः।।१।।
अभिवृष्टश्च वार्षेण नाना पुष्पसुगंधिना।
परिष्वक्तश्च पुण्येन वायुना पुण्यगंधिना।।२।।
अचलं स्थानमासाद्य दौहित्रफलनिर्जितम्।
कर्मभिः स्वैरूपचितो जज्वाल परया श्रिया।।३।।
उपगीतोपनृत्तश्च गन्धर्वाप्सरस्रां गणैः।
प्रीत्या प्रतिगृहीतश्च स्वर्गे दुन्दुभिनिस्वनैः।।४।।
अभिष्टुतश्च विविधैर्देवराजर्षिचारणैः
अर्चितश्चोत्तमार्ध्येण दैवतैरभिनन्दितः।।५।।
अर्थ :- नारद बोले, बहुत दक्षिणा देने-वाले उन श्रेष्ट-राजाओं से स्वर्गारोहण करने-वाला वह ययाति राजा, दौहित्रों की अनुमति से स्वर्ग में स्थित हुआ।।१।। अनेक सुगन्धित पुष्पों की वर्षा से आच्छादित और सुन्दर सुगन्धि-वाले पवित्र वायु से सेवित।।२।। वह राजा ययाति, दोहित्रों के पुण्य-फल से जीते गये अचल स्वर्ग-स्थान को प्राप्त होकर अपने कर्मों से बढ़ता हुआ पूर्ण शोभा से शोभित हुआ।।३।। गन्धर्व व अप्सरा-गण के नाच-गाने से प्रसन्न, नगारों के शब्दों के साथ प्रीति से ग्रहण किया गया।।४।। अनेक देव, राजर्षि, चारणों से स्तुति किया गया और उत्तम-अर्घ्य से पूजित होकर देवताओं के समुदाय के साथ आनन्दित हुआ।।५।।

श्रीकृष्ण ने दोनों ओर की सेना और अर्जुन को युद्ध करने को तैयार हुआ देख कर अर्जुन को कहा कि हे अर्जुन! तू देवी की स्तुति कर, वह तुम्हें विजय दिलायेगी। तब अर्जुन ने स्तुति की, वहाँ भीष्म-पर्व २३वें अध्याय का १६वाँ श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

तुष्टि: पुष्टिर्धृतिर्दीप्तिश्चन्द्रादित्यविवर्धिनी।
भूतिर्भूतिमतां संख्ये वीक्ष्यसे सिद्धचारणैः।।१६।।
अर्थ :- हे देवी! तू तुष्टि, पुष्टि, धृति, दीप्ति, चन्द्र और आदित्य की वृद्धि करने-वाली और ऐश्वर्य-वालों का ऐश्वर्य, ऐसी संग्राम में सिद्ध और चारणों से देखी जाती हो।।१६।।

संजय ने राजा धृतराष्ट्र से कहा कि कृष्ण का उपदेश सुनने के पश्चात् अर्जुन को धनुष-बाण धारण किया हुआ देख कर महारथियों ने महा-नाद किया, वहाँ देवतादि देखने को आये, वह भीष्म-पर्व के ४३वें अध्याय का ९वें श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

तथा देवा: सगन्धर्वा: पितरश्चं जनाधिप।
सिद्धचारणसंघाश्च समीयुस्तद्दिदृक्षया।।९।।
अर्थ :- हे राजन्! उसी प्रकार गन्धर्व सहित देवता, पितर, सिद्ध और चारणों के समूह, उसे देखने की इच्छा से आये।।९।।

जब भीष्म और अर्जुन का परस्पर युद्ध प्रारम्भ हुआ और उन दोनों के शस्त्र-अस्त्र का बल देख कर देव, गन्धर्व, महर्षि व चारण लोग परस्पर कहने लगे कि अर्जुन से भीष्म और भीष्म से अर्जुन की पराजय होवे, ऐसा नहीं दिखता। यह युद्ध बड़ा अद्भुत है, इत्यादि विषय के भीष्म-पर्व के ५२वें अध्याय के ६३वें श्लोक से नीचे लिखे जाते हैं

प्रकाशौ च पुनस्तूर्णं बभूवतुरुभो रणो।
तत्र देवा: सगन्धर्वाश्चारणाश्चर्षिभिः सह।।६३।।
अन्योन्यं प्रत्यभाषन्त तयोर्दृष्ट्वा पराक्रमम्।
न शक्यौ युधि संरब्धौ जेतुमेतौ कथंचन।।६४।।
सदेवांसुरगन्धर्वैर्लोकैरपि महारथौ।
आश्चर्यभूतं लोकेषु युद्धमेतन्महाद्भुतम्।।६५।।
नैतादृशानि युद्धानि भविष्यन्ति कथंचन।
न हि शक्यो रणे जेतुं भीष्म: पार्थेन धीमता।।६६।।
सधनु: सरथ: साऽश्वः प्रवपन्सायकान् रणे।
तथैव पांडवं युद्धे देवैरपि दुरासदम्।।६७।।
न विजेतुं रणे भीष्म उत्सहंत धनुर्धरम्।
आलोकादपि युद्धं हि सममेतद्भविष्यति।।६६।।
अर्थ :- और फिर वे दोनों संग्राम में शीघ्र प्रकाश हुए, वहाँ गन्धर्वों के साथ देवता और ऋषियों के साथ चारण।।६३।। उन दोनों के पराक्रम को देखकर आपस में कहने लगे कि ये दोनों महारथी संग्राम में किसी प्रकार देव, असुर और गन्धर्वों के साथ तीनों लोकों से भी जीते नहीं जा सकते, तीनों लोकों में बड़ा अछूत आश्चर्य करने-वाला यह युद्ध है।।६४-६५।। ऐसे युद्ध किसी प्रकार नहीं होंगे, भीष्म को बुद्धिमान् अर्जुन, संग्राम में जीतने में समर्थ नहीं है।।६६।। वैसे ही धनुष के साथ, रथ के साथ और घोड़ों के साथ, भीष्म भी संग्राम में बाणों को लाकर धनुष-धारण करने-वाले, रण में देवताओं से भी नहीं जीते जाने-वाले अर्जुन को संग्राम में जीतने का उत्साह नहीं करें, यह युद्ध देखने में भी बराबर ही होगा।।६८।।

भीष्म को शर-शय्या के ऊपर स्थित हुआ देखकर ऋषि और चारण लोगों ने जो कुछ कहा, उस प्रकरण के भीष्म-पर्व के १२०वें अध्याय के १४वें श्लोक से नीचे लीखे जाते हैं :-

अयं पितरमाज्ञाय कामार्तं शांन्तनुं पुरा।
ऊर्धरेतसमात्मानं चकार पुरुषर्षभ:।।१४।।
इति स्म शरतल्पस्थं भरतानां महत्तमम्।
ऋषयस्त्भ्यभाषन्त सहिता: सिद्धचारणैः।।१५।।
हते शान्तनवे भीष्मे भरतानां पितामहे।
न किञ्चित् प्रत्यपद्यन्त पुत्रास्तव हि मारिष।।१६।।
विष्ण्णवदनाश्चासन्हतश्रीकाश्च भारत।
अतिष्ठन्ब्रीडिताश्चैव हिया युक्ता ह्यधोमुख:।।१७।।
पाण्डवाश्च जयं लब्ध्या संग्रामशिरसि स्थिता:।
सर्वे दध्मुर्महाशंखान्हेमजालपरिष्कृतान्।।१८।।
अर्थ :- पुरुषों में उत्तम, पहले उस भीष्म ने अपने पिता शान्तनु को कामार्त्त जान कर अपने तईं ब्रह्मचर्य धारण करने-वाला कर लिया।।१४।। शर-शय्या पर सोते हुए भरत-वंश में बहुत बड़े ऐसे भीष्म को ऋषि-लोक, सिद्ध और चारणों के साथ इस रीति से कहने लगे।।१५।। हे मारिष शान्तनु-पुत्र! भरत-वंशियों के पितामह भीष्म के मरने पर तुम्हारे पुत्रों को कुछ नहीं सूझा।।१७।। और रण के बीच स्थित सब पाण्डवों ने जय पाकर, सोने से मढ़े हुए बड़े-शंख बजाये।।१८।।

जब युयुधान और द्रोण का परस्पर युद्ध हुआ, तब विमानों में बैठ कर देवता, सिद्ध, चारण और विद्याधर आदि दोनों वीरों की ओर से तीरों का जाना-आना देख कर विस्मय हुआ, इस विषय के द्रोण-पर्व के ९८वें अध्याय के ३३वें, ३४वें श्लोक नीचे लिखे जाते हैं :-

तद्युद्धं युयुधानस्य द्रोणस्य च महात्मन:।
विमानाग्रगता देवा ब्रह्मसोमपुरोगमाः।।३३।।
सिद्धचारणसंघाश्च विद्याधरमहोरगाः।
गतप्रत्यागताक्षेपैश्चित्रैरस्त्रविघातिभिः।।३४।।
विविधैर्विस्मयं जग्मुस्तयोः पुरुषसिंहयोः।
अर्थ :- महात्मा द्रोण और युयुधान के उस युद्ध को विमानों में बैठे हुए ब्रह्मा और चन्द्र आदि को लेकर देवता, सिद्ध, चारणों के समुदाय और विद्याधर और महोरग, ये सब देख कर, उन दोनों पुरुष-सिंहों के चित्र-विचित्र अस्त्रों का विनाश करने-वाले नाना-प्रकार के जाने-आने और फेंकने से आश्चर्य को प्राप्त हुए।।३४।।

युयुधान की शीघ्रता की द्रोणाचार्य प्रशंसा करने लगे और देवता, गन्धर्व आदि द्रोण और युयुधान, दोनों के शीघ्रता के प्रभाव को नहीं जान सके और सिद्ध, चारणों ने जाना, इस विषय के द्रोण-पर्व के ९८वें अध्याय के ४३वें श्लोक से नीचे लिखे जाते हैं :-

लाघवं वासवस्येव संप्रेक्ष्य द्विजसत्तम:।
तत: अस्त्रविदां श्रेठस्तथादेवा: सवासवा:।।४३।।
न तामालक्षयामासुर्लघुतां शीघ्रचारिणः
देवाश्च युयुधानस्य गन्धर्वाश्च विशांपते।।४४।।
सिद्धचारण संघाश्च विदुर्द्रोणस्य कर्म तत्।
अर्थ :- हे राजन्! अस्त्र-वेत्ताओं में श्रेष्ठ द्विजों में उत्तम द्रोणाचार्य, युयुधान की इंद्र की-सी लघुता को देख कर प्रसन्न हुआ, वैसे ही इन्द्र सहित देवता और शीघ्र चलने-वाले देवता और गन्धर्व, उस लघुता की नहीं देख सके परन्तु द्रोण के उस काम को सिद्ध और चारणों के समुदाय ने जाना।।४३।।४४।।

द्रोणाचार्य और धृष्टकेतु का युद्ध बड़ा भयानक, देखने के लायक और सिद्ध, चारण सभी को, विस्मयाद्‌भुत दिखने-वाला हुआ, इस विषय का द्रोण-पर्व के १०७वें अध्याय का १३वें श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

तद्युद्धमासीत्तुमुल प्रेक्षणीयं विशांपते।
सिद्धचारणसंघानां विस्मयाद्भुतदर्शनम्।।१३।।
अर्थ :- हे राजन्! देखने लायक बड़ा भारी युद्ध, सिद्ध और चारणों के समुदाय को अद्भुत आश्चर्य दिखाने-वाला हुआ।।१३।।

जयद्रथ के मारने में द्रोणाचार्य ने जो व्यूह रचा, उसकी प्रशंसा देवता और चारणों द्वारा की गयी और उसका वृत्तांत संजय ने धृतराष्ट्र के आगे कहा, जिसका द्रोण-पर्व के १२४वें अध्याय का १० अंग का श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

तत्र देवासत्वभाषन्त चारणाश्च समागता:।
एतदन्ताः समूहा वै भविष्यन्ति महीतले।।१०।।
अर्थ :- उस युद्ध में आये हुए देवता और चारणों ने कहा कि भूतल में अन्त का व्यूह यही होगा अर्थात् ऐसी व्यूह-रचना फिर कभी नहीं होगी।।१०।।

कर्ण और भीमसेन का युद्ध हुआ, इस विषय का द्रोण-पर्व के १३७वें अध्याय का १४वें श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

दृष्ट्वा तु भीमसेनस्य विक्रमं युधि भारत।
अभ्यनन्दंस्त्वदीयाश्च संप्रहृष्टाश्च चारणा:।।१४।।
अर्थ :- हे राजन्! युद्ध में भीमसेन के पराक्रम को देख कर, तुम्हारे पक्ष-वाले प्रशंसा करने लगे और चारण प्रसन्न हुए।।१४।।

भूरिश्रवा का हाथ अर्जुन द्वारा काटा गया था, तब वह युद्ध छोड़ बैठा परन्तु सात्यिकी ने उसका मस्तक खड़ग से काट डाला, उस कर्म से सेना के लोग सन्तुष्ट नहीं हुए। सिद्ध, चारण और मनुष्य, भूरिश्रवा को मरा देख कर उसके पराक्रम की प्रशंसा करने लगे। इस विषय के द्रोण-पर्व के १४३वें अध्याय के ५४वें श्लोक से नीचे लिखे जाते हैं :-

प्रायोपविष्टाय रणे पार्थेन च्छिन्नबाहवे।
सात्यकि: कौरवेयाय खङ्गेनापहरच्छिर:।।५४।।
नाभ्यनंदंत सैन्यानि सात्यकिं तेन कर्मणा।
अर्जुननेन हतं पूर्वं यज्जघान कुरूद्वहम्।।५५।।
सहस्राक्षसमं चैव सिद्धाचारणमानवा:।
भूरिश्रवसमालोक्य युद्धप्रायगतं हतम्।।५६।।
अपूजयंत तं देवा विस्मितास्तेथ कर्मभिः।।५७।।
अर्थ :- अर्जुन द्वारा कटा है हाथ जिसका, ऐसे संग्राम में अनशन-व्रत को धारण किए हुए भूरिश्रवा का सिर सात्यकि ने तलवार से काट डाला।।५४।। इस काम से सेना के लोगों ने सात्यकि की प्रशंसा नहीं की क्योंकि उसने पहले अर्जुन से घायल हुए भूरिश्रवा को मारा।।५५।। युद्ध से निवृत्त हुए, इन्द्र के समान भूरिश्रवा को सिद्ध, चारण और मनुष्य, युद्ध में मरा हुआ देख कर।।५६।। वे देवता, इस भूरिश्रवा के काम से आश्चर्य-चकित होकर उसकी प्रशंसा करने लगे।।५७।।

अश्वत्थामा के साथ अर्जुन का युद्ध हुआ तो सहस्र महा-रथियों के बराबर अकेले अर्जुन ने काम किया, जिससे सिद्ध, देवर्षि व चारण प्रसन्न हुए, देव-दुन्दुभि बजी और पुष्प-वृष्टि हुई, इस प्रकरण के कर्ण-पर्व के १६वें अध्याय के १६वें श्लोक से नीचे लिखे जाते हैं :-

विस्मापयन्प्रेक्षणीयं द्विषतां भयवर्द्धनं।
महारथसहस्रस्य सप्तं कर्माकरोज्जयः।।१६।।
सिद्धदेवर्षिसंघाश्च चारणाश्चापि तुष्टुवुः।
देवदुन्दुभ्यो नेदु: पुष्पवर्षाणि चापतन्।।१७।।
अर्थ :- आश्चर्य कराते हुए अर्जुन ने शत्रुओं को भय बढ़ाने-वाला देखने योग्य, हजार महारथियों के बराबर काम किया।।१६।।जिससे सिद्ध, देव, ऋषियों के समुदाय और चारण प्रसन्न हुए और देव-दुंदुभि बजी और पुष्पों की वर्षा हुई।।१७।।

अकेले कर्ण ने सब पाण्डवी-सेना को शरों से हटा दी, इस प्रकार की शीघ्रता से देवता, सिद्ध व चारण प्रसन्न हुए और धृतराष्ट्र के पुत्रों के साथ कर्ण की प्रशंसा की, इस प्रकरण के कर्ण-पर्व के ७८वें अध्याय के ३१वें एवं ३२वें श्लोक नीचे लिखे जाते हैं :-

पांडवेयान्महाराज शरैर्वारित्वान् रणे।
तत्र भारत कर्णस्य लाघवेन महात्मनः।।३१।।
तुतुषुर्देवताः सर्वे सिद्धाश्च सह चारणैः
अपूजयन्महेष्वासा धार्तराष्ट्र नरोत्तमम्।।३२।।
अर्थ :- हे महाराज! संग्राम में पाण्डवों का बाणों से वरण किया, वहाँ हे भारत! महात्मा भरत-वंशी कर्ण की लाघवता से।।३१।। सब देवता और चारणों सहित सिद्ध, प्रसन्न हुए और बड़े धनुष-वाले धृतराष्ट्र के पुत्रों ने पुरुषों में उत्तम कर्ण की पूजा की।।३२।।

कर्ण और अर्जुन में परस्पर युद्ध प्रारम्भ होने के समय कितने ही लोग कर्ण की जय और कितने ही लोग अर्जुन का जय चाहने लगे, उनमें से मुनि, सिद्ध व चारण आदि अर्जुन के पक्ष में हुए, जिसके प्रमाण में कर्ण-पर्व के ८७वें अध्याय के इकतालीस से ३ श्लोक नीचे लिखे जाते हैं :-

मुनयश्चारणाः सिद्धा वैनतेय वयांसि च।
रत्नानि निधयः सर्वे वेदाश्चाख्यानपंचमाः।।४१।।
सोपवेदोपनिषदः सरहस्याः ससंग्रहाः।।
वासुकिश्चित्रसेनश्च तक्षको मणिकस्तथा।।४२।।
सर्पाश्चैव तथा सर्वे काद्रवेयाश्च सान्वयाः।
विषवन्तो महाराज नागाश्चार्जुनतोऽभवन्।।४३।।
अर्थ :- मुनि, चारण, सिद्ध, गरुड़-पक्षी, रत्न, निधि और इतिहास के साथ सब वेद, रहस्य, संग्रह और उपवेदों सहित उपनिषद्, वासुकि, चित्रसेन, तक्षक, मणिक, सर्प और सब सर्प-वंश सहित काद्रवेय और हे महाराज! विष-वाले नाग, ये सब अर्जुन के पक्ष में रहे।।४३।।

जब कर्ण और अर्जुन दोनों, सारथि, वाहन, आयुध, पराक्रम इत्यादि में बराबर होकर संग्राम में लड़ने गए, तब उन महारथियों को देख कर सिद्ध और चारण-समुदाय को विस्मय हुआ। इस विषय के कर्ण-पर्व के ८७वें-अध्याय के २७ और २८वें श्लोक नीचे लिखे जाते हैं :-

उभौ श्वेतहयौ राजन् रथप्रवरवाहनौ।
सारथिप्रवरौ चैव तयोरास्तां महारणे।।२७।।
ततो दृष्ट्वा महाराज राजमानौ महारथौ।
सिद्धचारणसंघानां विस्मयः समुपद्यत।।२८।।
अर्थ :- है राजन्! उस महा-रण में उन दोनों के श्वेत घोड़ों-वाले और अच्छे वाहन-वाले रथों में अच्छे चलाने-वाले दो श्रेष्ठ सारथी हैं।।२७।।हे महाराज! तदनन्तर शोभायमान उन दोनों महारथियों को देख कर सिद्ध, चारणों के समुदाय को आश्चर्य हुआ।।२८।।

कर्ण और अर्जुन के युद्ध से अचरज में आकर इन्द्र ने ब्रह्मा से पूछा कि इन दोनों में किसकी विजय होगी, तब ब्रह्मा और शिव ने अर्जुन की विजय होना निश्चय करके कृष्ण और अर्जुन की स्तुति की, इस प्रकरण का कर्ण-पर्व के ८७वें-अध्याय का ८० के अंक का श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

नैतयोस्तु समः कश्चिद्दिवि वा मानुषेषु वा।
अनुगम्यास्रयो लोकाः सह देवर्षिचारणैः।।८०।।
अर्थ :- इन नर-नारायण रूप अर्जुन और कृष्ण के बराबर स्वर्ग में अथवा मर्त्य-लोक में कोई नहीं है और देवर्षि और चारण-लोगों के साथ तीनों-लोक इनकी सेवा करने के योग्य हैं।।८०।।

राजा शल्य ने युद्ध करते समय कहा कि अब हमारा पराक्रम पाण्डव और सिद्ध, चारण देखो, उस जगह का शल्य-पर्व के सातवें-अध्याय का १७वाँ श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

लाघवं चास्ववीर्यं च भुजयोश्च बलं युधि।
अद्य पश्यन्तु मे पार्था: सिद्धाश्च सहचारणैः।।१७।।
अर्थ :- आज युद्ध में मेरे हाथों की फुर्ती और बल तथा अस्त्र-विद्या के पराक्रम को पृथा के पुत्र पाण्डव और चारणों के साथ सिद्ध-लोग देखो।।१७।।

इंद्र ने अम्बा से शिव का स्वरूप पूछा, वहाँ अम्बा ने ऋषि, गन्धर्व और चारणों के रूप-धारी शिव का वर्णन किया, जहाँ का अनुशासनिक-पर्व के १४वें अध्याय का १५०वाँ श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

ऋषिगन्धर्वरूपश्च सिद्धचारणरूपधृक्।
भस्मपांडुरगात्रश्च चन्द्रार्धकृतभूषण:।।१५०।।
अर्थ :- ऋषि और गन्धर्व तथा सिद्ध और चारण का रूप धारण करने-वाले भस्म से श्वेत शरीर-वाले और अर्द्ध-चन्द्रमा को धारण करने-वाले शिव हैं।।१५०।।

अष्टावक्र ने रुद्र-स्थान का मार्ग वदान्य से पूछा, जिसके उत्तर में वदान्य ने मार्ग बताया, वहाँ अनुशासनिक पर्व के १९वें अध्याय का १६वाँ श्लोक नीचे लिखा जाता है-

धनदं समतिक्रम्यं हिमवन्तं च पर्वतम्।
रुद्रस्यायतनं दृष्ट्वा सिद्धचारणसेवितम्।।१६।।
अर्थ :- कुबेर को और हिमालय पर्वत को भी लाँघ कर सिद्ध, चारण लोगों से सेवित रुद्र के स्थान को देख सकेगा।।१६।।

गजेन्द्र-मोक्ष में जहाँ परमेश्वर की स्तुति की है, वहाँ का एक श्लोक नीचे लिखा जाता है :-

गुह्याय वेदनिलयाय महोदराय,
सिंहाय दैत्यनिधनाय चतुर्भुजाय।
ब्रह्मेन्द्ररुद्रमुनिचारणसंस्तुताय,
देवोत्तमाय विरजाय नमोऽच्युताय।।६८।।
अर्थ :- जो जानने में नहीं आता, वेद ही है घर जिसका, बड़ा पेट-वाला, सिंह स्वरूप-वाला, दैत्यों का नाश करने-वाला, चार हाथ-वाला ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, मुनि और चारणों से स्तुति किया गया, ऐसा देवों में उत्तम रजो-गुण रहित जो अच्युत विष्णु है, उसको नमस्कार करता हूँ।।६८।।

उक्त प्रमाणों से यह बात स्पष्ट रीति से सिद्ध हो चुकी है कि चारणों की जाति, सृष्टि की उत्पत्ति समय से है और उनका आचार-व्यवहार देवताओं के सदृश अत्युत्तम और शुद्ध रहा है और उनकी उत्पत्ति भी देवताओं में है और इनका निवास-स्थान स्वर्ग है, सो उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध हो चुका है। इस कारण अब हमको इस विषय में आगे लिखने की आवश्यकता नहीं रही परन्तु शास्त्रों से अपरिचित बहुधा मनुष्यों को इस बात का संदेह होगा कि चारणों का निवास-स्थान स्वर्ग था तो फिर भूमि पर कैसे आये? इस संदेह की निवृत्ति के लिए थोड़ा-सा वृत्तान्त प्रमाणों सहित और युक्ति-सिद्ध नीचे लिखते हैं कि जिससे अ-पठित-लोगों की आशंका भली-भांति मिट जायेगी। वह, यह है कि पुराणों के मतानुसार देवताओं का निवास-स्थान (स्वर्ग), भूमि से ऊपर आकाश में है तो वहाँ से भूमि पर आना-जाना उन्हीं पुराणों से सिद्ध है, यदि इसके प्रमाण दिए जावें तो सैकड़ों नहीं किन्तु हजारों विद्यमान हैं, वे तन्दुल-कण-न्याय के अनुसार जान लेने चाहिए कि राजा ययाति, मान्धाता, मुचकंद, दशरथ, अर्जुन आदि इसी मनुष्य शरीर से स्वर्ग में गए और आये हैं और इसी प्रकार देवताओं का स्वर्ग से पृथ्वी पर आना-जाना सिद्ध है, वहाँ चारणों के आने-जाने में क्यों संदेह हो सकता है और जो अनेक शास्त्रों के और आधुनिक विद्वानों के मतानुसार हिमालय पर्वत के समीपस्थ, मध्य-प्रदेश तिब्बत को स्वर्ग माना जाए तो हमारे मत से भी यह प्रामाणिक और युक्ति-सिद्ध है क्योंकि भारद्वाज ने भृगु से पूछा कि स्वर्ग कहाँ पर है, जिसके जानने की मैं इच्छा करता हूँ। इस प्रकरण का महाभारत के शांति-पर्व के मोक्ष-धर्म-पर्व का १९२वें अध्याय का सातवाँ श्लोक नीचे लिखते हैं :-

।।भारद्वाज उवाच।।
अस्माल्लोकात्परो लोकः श्रूयते नोपलभ्यते।
तमहं ज्ञातुमिच्छामि तद्भवान्वत्कुर्महति।।७।।
अर्थ :- भारद्वाज बोले कि इस लोक से आगे पर-लोक सुना जाता है परन्तु देखा नहीं जाता, उस पर-लोक का वृत्तान्त मैं आपसे जानना चाहता हूँ क्योंकि आप कहने के योग्य हो।।७।।

इसके उत्तर में भृगु ने उत्तर दिया, वह इसी शांति-पर्व के मोक्षधर्म-पर्व के १९२वें-अध्याय का आठवाँ श्लोक नीचे लिखते हैं :-

।।भृगुवाच।।
उत्तरे हिमवत्पार्श्वे पुण्ये सर्वगुणान्विते।
पुण्य: क्षेम्यश्च काम्यश्च स परोलोक उच्यते।।८।।
अर्थ :- उत्तर दिशा में हिमालय की पवित्र सब गुणों-वाली भूमि के समीप, अति पवित्र, विघ्नों से रहित जो सुन्दर लोक है, वही पर-लोक कहलाता है।।८।।

इस संसार की प्रथम-उत्पत्ति और खगोल आदि की रचना तिब्बत में ही हुई थी, जिसके प्रमाण में उदयपुर के यंत्रालय में छपे हुए “शब्दार्थ चिन्तामणि-कोश” के तृतीय-भाग के तीन सौ एक पृष्ठ का एक श्लोक नीचे लिखते हैं :-

अत्रेव हि स्थितो ब्रह्मा प्राङ्नक्षत्रं ससर्ज ह।
तत: प्राग्ज्योतिषाख्येयं पुरी शक्रपुरीसमा।।
अर्थ :- प्राग्ज्योतिष नामक नगर के नाम की व्युत्पत्ति के सम्बंध में कहते हैं कि यहाँ पर स्थित होकर ब्रह्मा ने प्रथम नक्षत्र बनाये, इस कारण इसका नाम प्राग्ज्योतिष हुआ, सो इंद्र की पुरी अमरावती के समान है।।

यह प्राग्ज्योतिष नगर भी तिब्बत के समीप ही है, जिससे भी संसार की प्रथम रचना तिब्बत में ही होना पाया जाता है, इसके उपरांत तिब्बत का नाम भी त्रिविष्टप’ (स्वर्ग) है। सो भी तिब्बत के स्वर्ग होने का पूरा प्रमाण है। इसके उपरांत ज्योतिष के सर्व-मान्य ग्रन्थ “सिद्धान्त-शिरोमणि” के “गोलाध्याय” के “भुवन-कोश” का दो श्लोक नीचे लिखा जाता है, जो स्वर्ग का इसी पृथ्वी पर होने का पुष्ट प्रमाण है :-

भूमेः पिण्डं शशाङ्कज्ञज्लकविरविकुजेज्यार्किनक्षत्रकक्षा।
वृत्तैर्वृत्तो वृत: सन्मृदनिल सलिलव्योमतेजोमयोयम्।।१।।
नान्याधार: स्वशक्त्यैव वियति नियतं तिष्ठतीहास्य पृष्टे।
निष्ठं विश्वं च शश्वत्सदनुजमनुजादित्यदैत्यं समन्तात्।।२।।
अर्थ :- यह भूमि का पिण्ड मिट्टी, पवन, जल, आकाश और तेज-मय है और चन्द्रमा, बुध, शुक्र, सूर्य, मंगल, वृहस्पति और शनि, इन नक्षत्रों से कक्षा-वृत्त अर्थात् अपनी-अपनी मर्यादा की गोलाई से घिरा हुआ है और गोल है। इसके कोई आधार नहीं है, अपनी ही शक्ति से आकाश में ठहरा हुआ है और इसकी पीठ पर सदैव से दनुज (कश्यप से दनु नामक स्त्री से उत्पन्न अर्थात् राक्षस), मनुष्य, अदिति के पुत्र (देवता) दिति के पुत्रों (दैत्यों) सहित सब चारों ओर रहते हैं, अर्थात् निश्चय ही स्थित हैं।

इस प्रमाण से भी स्वर्गादि इसी पृथ्वी पर हैं, इत्यादि प्रमाणों से और अनेक युक्तियों से देवता आदि सभी संसार की उत्पत्ति, तिब्बत में हुई। इस तिब्बत से हिमालय के ऊर्ध्व-भाग को, ऊर्ध्व-लोक और नीचे के भाग को मर्त्य-लोक कहते थे, उस आदि-समय में कोई वर्ण-भेद नहीं था किन्तु एक तो आर्य (देवता) और दूसरे अनार्य दस्यु (लुटेरे), ये दो ही भेद हुए, जिसके प्रमाण में ऋग्वेद का मंत्र लिखते हैं :-

विजानीहर्यान्ये च दस्यवो बर्हिष्मते रन्धया शासदब्रतान्।
शाकीभव यजमानस्य चोदिता विश्वेताते सेधमादेषु चाकन्।।८।।
अर्थ :- हे मनुष्य! तू (बर्हिष्मते) उत्तम-सुखादि गुणों के उत्पन्न करने-वाले व्यवहार की सिद्धि के लिए (आर्यान्) सर्वोपकारक धार्मिक विद्वान् मनुष्यों को (विजानीहि) जान और (ये) जो (दस्यवः) पर-पीड़ा करने-वाले अधर्मी दुष्ट मनुष्य हैं, उनको जान कर (बर्हिष्मते) धर्म की सिद्धि के अर्थ (रंधय) मार, और उन (अब्रतान्) सत्य भाषणादि धर्म-रहित मनुष्यों को (शामत्) शिक्षा करते हुए (यजमानस्य) यज्ञ के कर्ता का (चोदिता) प्रेरणा-कर्ता और (शाकी) उत्तम शक्ति-युक्त सामर्थ्य को (भव) सिद्ध कर, जिससे (ते) तेरे उपदेश वा संग से (सेधमादेषु) सुखों के साथ वर्तमान स्थानों में (ता) उन (विश्व) सब कर्मों को सिद्ध करने की ही मैं (चाकन्) इच्छा करता हूँ।।८।।

इस वेद के प्रमाण से सिद्ध है कि उस समय आर्य और अनार्य (दस्यु), इसके अतिरिक्त कोई जाति-भेद नहीं था। इन आर्यों (देवताओं) में आठ भेद हुए, जो भागवत् के प्रमाण से ऊपर दिखा आये हैं, जिनमें फिर अपने-अपने कर्मों के अनुसार अनेक नाम विख्यात हो गए, जैसे साध्य-देव, विश्व-देव, विश्वावसु, मरुद्रण, सोमपा, अग्नीघ्राद्य, विद्याधर, सिद्ध, चारण, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, किंपुरुष, तुम्बरु, आदित्य, ऋभु, गुह्यक, पितर आदि। इनमें विस्तार-भय से अन्य के नामों की व्युत्पत्ति छोड़ कर चारणों के नाम की व्युपत्ति करते हैं कि देवताओं की कीर्ति प्रचार करने से “चारयन्ति कीर्ति मिति चारणा:”। इस व्युत्पत्ति से इनका नाम चारण प्रसिद्ध हुआ और “देवानां स्तुति-पाठका:”, यह कार्य इन्होंने अंगीकार किया। इसके पीछे जब मनुष्यों में वर्ण-व्यवस्था हुई तब “ब्रह्मजानातीति ब्राह्मण” इस व्युत्पत्ति से वेद जानने-वालों का नाम ब्राह्मण और “क्षत्रात् त्रायते इति क्षत्रियः” इस व्युत्पत्ति से रक्षा करने-वालों का नाम क्षत्रिय और ‘विश प्रवेशने’ इस धातु से व्यापार में प्रवेश करने-वालों का नाम वैश्य और इन तीनों वर्णों की सेवा करने-वालों का नाम शूद्र हुआ परन्तु वर्ण-व्यवस्था होने से पहिले जिन देवताओं की उत्पत्ति हुई, वे अब तक उन्हीं नामों से प्रसिद्ध हैं।

यहाँ कोई यह प्रश्न करे कि “ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः” इत्यादि प्रमाणों से वर्ण-व्यवस्था सृष्टि के आदि से ही सिद्ध है, तो इसका उत्तर यह है कि यह परमेश्वर के विराट-स्वरूप का रूपकालंकार में वर्णन है। जैसे ‘सहस्रशीर्षापुरुषः’ इत्यादि है। परन्तु वर्ण-व्यवस्था तो पीछे ही हुई है, जिसके अनेक प्रमाण भी हैं सो यहाँ विस्तार-भय से नहीं लिख सकते। यह कोई बुरा मानने की बात नहीं है क्योंकि सृष्टि-सर्जन काल से पीछे वर्ण-व्यवस्था होने से ब्राह्मण, क्षत्रियों की उत्तमता में कोई बाधा नहीं आ सकती क्योंकि ज्यों-ज्यों कार्य होता जाता है, त्यों-त्यों ज्ञान बढ़ता जाता है, इससे प्रथम की अपेक्षा पिछला कार्य उत्तम होता है, जैसे प्रथम नौ-प्रकार की सृष्टि ब्रह्मा ने बनायी, जिनमें उत्तरोत्तर उत्तम है और सबसे पीछे देवताओं की सृष्टि रची है। विस्तार-भय से अब इस प्रकरण को आगे न बढ़ा कर अपना असली प्रयोजन लिखते हैं कि उक्त प्रकार से स्वर्ग में आदि की उत्पत्ति हो कर सृष्टि-क्रम के अनुसार वह सृष्टि इतनी बढ़ी कि स्वर्ग में उसका निर्वाह और समाव होना कठिन हुआ, तब आर्य और अनार्यों में घोर “देवासुर-संग्राम” हुआ, जिस विघ्न की शांति के हेतु और अपनी उन्नति करने के लिए आर्यों ने अपने उद्योग और परिश्रम से निर्जन और शून्य-प्रदेश, इस “आर्यावर्त” को ढूंढ कर अपना निवास-स्थान बनाया। इसी कारण, उक्त आर्यों के नाम पर इस देश का नाम “आर्यावर्त” प्रसिद्ध हुआ और क्षत्रियों ने अपने बाहु-बल से इस “आर्यावर्त” में बड़े-बड़े राज्य स्थापित किए, उन क्षत्रियों ने स्वर्ग में चारणों को अमूल्य वस्तु समझ कर अपनी उन्नति और कीर्ति के लिए उनको स्वर्ग से भूमि पर लाकर अपने उपदेशक बना कर कीर्ति का प्रचार किया, चारणों ने भी जैसे स्वर्ग में देवताओं की कीर्ति करते थे, वैसे ही यहाँ क्षत्रियों की कीर्ति करना अंगीकार करके अपने नाम को सार्थक ही रखा और कई बार क्षत्रियों को समयानुसार सदुपदेश दे-देकर उन्नति के शिखर पर चढ़ा कर और चारणों का निवास हुए पीछे भी स्वर्ग और भूमि पर आर्य और अनार्यों में अनेक बार घोर-संग्राम हुए, जिनमें भूमि-वालों ने स्वर्ग-वालों की और स्वर्ग-वालों ने भूमि-वालों की परस्पर अनेक बार रक्षा की, जिनमें चारण, क्षत्रियों के साथी बने रहे और स्वर्ग और भूमि पर जाते-आते रहे, सो उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध है।

इस प्रकार, चारण और क्षत्रियों में दृढ़ सम्बंध होने के कारण उक्त दोनों जातियों में परस्पर प्रीति बढ़ती गई, यहाँ तक कि राजा लोग चारणों से न्याय और राजनैतिक, सम्पूर्ण-कार्यों में सहायता लेने लगे और अपने आपत्ति-काल में अपने स्त्री-पुत्रादि को चारणों के घरों में शरण रख कर, आप उस आपत्ति में निकलने के कार्यों में स्वतंत्र होकर उद्योग करने लगे। उन राजाओं की स्त्रियों और पुत्रादिकों को चारण भी अपनी माता और पुत्रों के समान, निर्भय रख कर, उस आपत्ति से निकाल कर अमोघ सुख पहुँचाते, जिसके अनेक प्रकरण प्राचीन आर्ष-ग्रन्थों में और आधुनिक इतिहासों में विद्यमान हैं, जैसे राजा पाण्डु अपनी मृत्यु के समय अपनी स्त्री कुंती और अपने पुत्र, युधिष्ठिरादिकों को चारणों के अधीन रख कर गया और चारणों ने उनको पूर्ण-प्रतिष्ठा-युक्त अपने पास रख कर हस्तिनापुर पहुँचाया, जिसमें महाभारत का प्रमाण ऊपर आ चुका है और आधुनिक इतिहास में मारवाड़ के राजा राव चूँडा और उसकी माता माँगलियाँणी को काळाऊ ग्राम के आल्हा चारण ने अपनी शरण में रख कर शत्रुओं से बचाया और फिर चूँडा को मारवाड़ के राज्य पर पहुँचाया, इत्यादि अनेक उदाहरण विद्यमान हैं।

अब, यहाँ पर कोई यह कुतर्क करे कि उपरोक्त प्रमाणों-वाले चारण ओर थे और ये चारण ओर हैं, तो इसके उत्तर में हम लिखते हैं कि उनकी यह कुतर्क, असत्य और बिना आधार की है क्योंकि सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर द्वापर के अंत तक के शृंखला-बद्ध प्रमाण इन चारणों के स्वर्ग और भूमि पर रहने के लिख आये हैं, जिनमें सत्-युग से लेकर त्रेता और द्वापर तक इन तीनों युगों के चारणों की देवताओं में उत्पत्ति और देवताओं के सदृश ही इनके आचार-व्यवहारों के श्रेणी-बद्ध प्रमाण लिखे गये है, जिनमें अन्य जाति का संदेह हो ही नहीं सकता।

आगे केवल कलि-युग के प्रमाण दे कर वर्तमान समय-पर्यंत इस प्रकरण को शैली-बद्ध दिखाया जाता है कि जिससे स्पष्ट सिद्ध हो जायेगा कि उपरोक्त प्रमाणों-वाले चारण और ये चारण एक ही हैं, भिन्न नहीं। इस कलि-युग के प्रमाण बहुधा पुराणों, काव्यों और नाटक आदि ग्रंथों में भरे हुए हैं, सो सब प्रमाण लिखने से तो यह लेख बहुत बढ़ता है, इस विस्तार-भय से सब प्रमाणों को छोड़ कर थोड़े-से प्रमाण यहाँ लिख देते हैं, जिनसे उक्त लेख शृंखला-बद्ध समझ लिया जा सकता है।

इस बात को वर्तमान समय के सभी विद्वान् मानते हैं कि इस समय के सभी काव्य, नाटक आदि ग्रंथ राजा विक्रमादित्य पँवार से लेकर राजा भोज पँवार के समय में बने हैं, इस कारण इन ग्रंथों में जो वर्णन है वह उसी समय के बर्ताव का है। यदि उन विद्वानों ने महाभारतादि ग्रंथों से प्राचीन कथा लेकर ग्रंथ बनाये हैं तो भी अंत में उस वर्तमान समय की छाया अवश्य आई है और कितना ही वर्णन तो उसी समय का है।

श्रीहर्ष-चारित्र के तृतीय उच्छ्वास में श्रीकंठ-देश के स्थंडीश्वर नगर के वर्णन में लिखा है

महोत्सवसमाज इति चारणैः, वसुधारेति च विप्रैरगृह्यत।।
अर्थ :- वह नगर-महोत्सव समाज की-सी भांति चारणों से और धन-धारा की भांति ब्राह्मणों से ग्रहण किया गया।

“प्रसन्नराघव” नाटक में सीता के स्वयंबर के वर्णन में राजाओं की पहिचान के अर्थ नूपुरक पूछता है और मंजीरक उत्तर देता है, वहाँ यह श्लोक है :-

मञ्जीरकः सएषनिजयश:
परिमलप्रमोदितचारणचञ्चरीकचयकोला
हलमुखरितदिक्चक्रवालक्ष्मापालकुंतलालंकारो मल्लिकापीडो नाम।
अर्थ :- मंजीरक कहता है कि जिसको तू पूछता है, यह अपने यश-रूप सुगंधि से आनन्दित चारण-जन रूपी भ्रमरों के समूह के कोलाहल से शब्दायमान किया है दिशाओं का मंडल जिसने, ऐसा राजाओं का मुकुट, कुंतल-देश का भूषण मल्लिकापीड नामक है।

यद्यपि यह वर्णन प्राचीन है तथापि चारणों की जाति का कुछ भी भेद होता तो ग्रंथ-कर्ता अवश्य लिखता कि उस समय के चारण अन्य थे। इसी प्रकार के अनेक प्रमाण पिछले ग्रंथों में हैं, जिनसे इस चारण-जाति का शृंखला-बद्ध वृत्तांत राजा भोज के समय तक जान लेना चाहिए। अब भोज के समय से आगे का प्रमाण देखना हो तो मेवाड़ के महा-प्रतापी महाराणा कुम्भा, जो विक्रमी संवत् १४९० में चित्तौड़ की गद्दी पर बैठे थे, उन्होंने अपने पण्डितों से संस्कृत में “एकलिङ्ग-माहात्म्य” नामक ग्रंथ बनवा कर “वायुपुराणान्तर्गत” किया है, जिसके लिए यह भी प्रसिद्ध है कि महाराणा ने स्वयं बनाया था सो ऐसा हुआ हो तो कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि उक्त महाराणा संस्कृत के बड़े विद्वान् थे, जिनके बनाये हुए संस्कृत में संगीत आदि के ग्रंथ विद्यमान हैं। उस “एकलिङ्ग-माहात्म्य” में भी उपरोक्त क्रमानुसार चारणों का वर्णन बड़ी प्रतिष्ठा के साथ लिखा हुआ है, जिससे सिद्ध है कि सृष्टि-सर्जन काल से लेकर महाराणा कुम्भा-पर्यन्त के संस्कृत ग्रंथों में चारणों का वर्णन श्रेणी-बद्ध लिखा हुआ है, जिससे यह संदेह हो ही नहीं सकता कि सत्-युग के चारण और थे और ये और हैं।

इन प्रमाणों के अतिरिक्त कलि-युग के आदि से लेकर वर्तमान समय पर्यन्त अनेक दान, सन्मानों से विभूषित होने के श्रंखला-बद्ध चारणों के नाम, पते सहित वर्णन महाकवि सूर्यमल्ल मीसण विरचित ग्रंथ “वंश-भास्कर” में विद्यमान हैं, जिससे भली-भांति सिद्ध है कि जिस चारण जाति के प्रमाण आर्ष-ग्रंथों से लेकर ऊपर दिए गए हैं, वही जाति वर्तमान समय में भी अपने पूर्वजों के आदर के साथ विद्यमान है।

चारण जाति में विद्या का प्रचार आदि से ही चला आया है, जिनके बनाये हुए लोकोपकारी अनेक ग्रंथ थे परन्तु भारतवर्ष में वेद-मत का ह्रास होकर बौद्ध-मत का प्रचार हुआ, तब बौद्धों ने वे ग्रंथ नष्ट कर दिए, तत्‌पश्चात् क्षत्रियों के परस्पर के द्वेष और विजाति-वाले विदेशियों के आक्रमणों से क्षत्रियों के अनेक राज्य नष्ट हो गए। उस आपत्ति-काल में क्षत्रियों के सहचारी रहने के कारण, चारणों से अपनी पूर्व-विद्या का फिर से उद्धार नहीं हो सका परन्तु क्षत्रियों के आपत्ति-काल में साथ रहने के कारण चारणों पर क्षत्रियों के विश्वास और स्नेह में अधिकता ही हुई और चारणों ने क्षत्रियों के अनेक उपकार और अमुल्य सेवायें कीं, जिनके सविस्तार-उदाहरण देखने की इच्छा हो तो राजपूताना के प्रत्येक राज्य के भिन्न-भिन्न इतिहासों में देखें। वे प्रमाण यहाँ पर विस्तार-भय से संक्षेप में दिए गये हैं।

पूर्व-काल में चारण सदैव स्वतन्त्र और स्वेच्छाचारी रहे थे परन्तु गुजरात देश के स्वामी अनहिलपुर-पट्टन के राजा, सिद्धराज जयसिंह देव सोलंकी ने महावदान्य नामक चारण को आनर्त (काठियावाड़) देश का राज्य दान किया, तभी से चारणों की स्थिति काठियावाड़ देश में हुई परन्तु जब वह राज्य चारणों के हाथ से जाता रहा, तब चारणों के दो दल हो गए, जिनमें एक दल प्रजा-रूप होकर वहीं पर रहे सो कच्छ देश के नाम से “काछेला” प्रसिद्ध हुए और दूसरे दल के मारवाड़ में चले-आने के कारण मरु-देश के नाम से “मारू” चारण कहलाने लगे। चारणों में कोई तो पूर्वजों (बड़ों) के नाम से, कोई ग्राम के नाम से और कोई प्रसिद्ध कार्य करने आदि कारणों से भिन्न-भिन्न १२० शाखायें प्रसिद्ध हुईं, इन शाखाओं की कई प्रति-शाखा होकर १५४ शाखायें हो गई थीं। [ इन शाखाओं का वर्णन जानने के लिए यहाँ क्लिक करें ]

चारणों के समान क्षत्रियों में भी प्रथम कोई जाति-भेद नहीं था परन्तु उपरोक्त कारणों से क्षत्रियों में भिन्न-भिन्न ३६ वंश होकर अब उनके अनेक भेद हो गए हैं और ब्राह्मण तथा वैश्यों की जातियों में भी उक्त कारणों से अनेक भेद हो गए सो विद्यमान हैं। इसी प्रकार, चारणों के भेद भी जानने चाहिए। इन चारणों ने उपरोक्त प्रमाणों के अनुसार अपने पूर्वजों की रीति बनाये रख कर अपना आचार-व्यवहार क्षत्रियों के समान बनाये रखा सो वर्तमान समय-पर्यन्त उसी अनुसार चला आया है और क्षत्रियों को उपदेश करके क्षत्रियों की उन्नति करने का कार्य पूर्व-काल के समान करते रहे अर्थात् क्षत्रियों के अधम-कार्य करने पर अपनी निन्दा-सूचक कविता करके मान-हानि करना, और उत्तम कार्य करने पर उत्साह-वर्द्धिनी-स्तुति के साथ प्रशंसा-सूचक कविता कर के उत्साह बढ़ाने का कार्य करना, जिससे क्षत्रियों ने अति उन्नति की, जिनके हजारों प्रमाण देश-भाषा की कविताओं में भी विद्यमान हैं। मीसण सूर्यमल्ल ने ग्रंथ “वंश-भास्कर” में भी उक्त शैली के अनुसार अधम-क्षत्रियों की निन्दा और उत्तम क्षत्रियों की प्रशंसा करके उत्तम उपदेश में वृद्धि ही की है, जिससे आधुनिक क्षत्रिय लोग भी उत्तम शिक्षा ग्रहण करके अपनी जाति की पूर्व-वत् उन्नति कर सकते हैं। इसी उत्तम शैली के कारण प्राचीन राजा-महाराजाओं ने चारणों को अनेकानेक आदर-सम्मान दिए, जिनके अनेक उदाहरण ग्रंथ “वंश-भास्कर” में विद्यमान हैं।

~~ठाकुर कृष्णसिंह बारहट
सन्दर्भ: चारण-कुल-प्रकाश (संपादक: राजलक्ष्मी देवी “साधना”)

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