दिवला! इसड़ो करे उजास

दिवला! इसड़ो करे उजास
जिणमें सकल निरासा जळ कर,
उबरै बधै ऊजळी आस।

मन रो मैल कळुष मिट ज्यावै,
वध-वध दृढै विमळ विश्वास ।
झूठ कपट पाखंड जळै सब,
पाप खोट नहं आवै पास।।

थारो प्रण साहस थिरचकपण,
परहित जळ जग देण प्रकास।
महज ऐह गुण भर मिनखां में,
अदद इती तो सूं अरदास।।

जग ओ ठकुर-सुहाती जाणै,
दिन दिन बणै तमस रो दास।
मांटी! मरते इण मिनखापै,
चड़वड़ जीवट-बाती चास।।

अळगां हूंत डरै अरड़ावै,
तमस-तमस कह भोगै त्रास।
समझ सकै खुद री सबळाई,
जिगरां नरां जगाय जिहास।।

अणगिण रूप धर्या अँधियारै,
नित-नित नाना ठौड़ निवास।
अप्पो दीप भवः हर इंसाँ,
निरलज तम रो करबा नास।।

दिवला! इसड़ो करे उजास….

~~डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

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