डूंगरां ऊपरै छांह डाकी

कविवर नाथूसिंहजी महियारिया सही ई लिख्यो है कै भगती अर वीरता वंशानुगत नीं हुय’र फखत करै जिणरी हुवै-

जो करसी जिणरी हुसी, आसी बिन नूंतीह।
आ नह किणरै बापरी, भगती रजपूतीह।।

क्यूंकै फखत शस्त्र धारण सूं सूर अर गैणो पैरण सूं कोई हूर नीं हुवै-

भेख लियां सूं भगत नीं, होय न गैणै हूर।
पोथी सूं पंडित नहीं, नहीं शस्त्र सूं सूर।।

इणी कारण तो कवि किसनाजी छींपा कह्यो है कै जुद्ध री वेल़ा फखत विरल़ा शस्त्र उठावै-

हाटां में हथियार, सिकलीगर राखै सदा।
भारथ पड़़ियां भार, कोयक बांधै किसनिया।।

अर उण कोयक में किणीपण जात रो मिनख हुय सकै। राजस्थान में ऐड़ा ज्ञात, अल्पज्ञात अर अज्ञात घणा ई वीर हुया जिणां आपरी वीरता बताय’र आपरै कुल़नै सुजस अर स्वामी नै अंजस दिरायो।

ऐड़ो ई अल्पज्ञात एक वीर बिसाऊ में हुयो। जिणरो नाम हो दीपो (दीपाराम)नाई। उण दिनां बिसाऊ धणी ठाकुर श्यामसिंह सूरजमलोत हा। बिसाऊ जयपुर राज रो मोटो ठिकाणो हो। उण दिनां जयपुर माथै महाराजा प्रतापसिंह रो राज। जयपुर महाराजा बड़गाव रा किसनसिंह माथै किणी बात सारू रूठग्या। ‘राजा जोगी अगन जल़, ज्यांरी उलटी रीत’ री बात चितार’र किसनसिंह डरग्या अर अठीनै -उठीनै सुरक्षित ठिकाणो जोवण सारू फिरिया, पण किणी शरण नीं दी सेवट वै बिसाऊ आया। बिसाऊ ठाकुर निशंक शरण दी-

केहर केस भमंग मण, सरणाई सूहड़ांह।
सती पयोहर क्रपण धन, पड़सी हाथ मूवांह।।

जद जयपुर धणी नै ठाह लागो कै जयपुर रै गुन्हैगार नै बिसाऊ शरण दी है तो वै झाल़बंबाल़ हुयग्या अर श्यामसिंह नै कैवायो कै – “अजेज किसनसिंह नै उठै सूं काढदे नीतर बिसाऊ री ठौड़ मूल़ा री बुवाई करा दूंला।”

श्यामसिंह ऐड़ी बात री गिनर नीं करी अर शरणाई नै निशंक रैवण रो कैवतां कह्यो कै -“बिसाऊ रो कोट अडिग है, जितै थे ई अडग रैवो।”

श्यामसिंह री द्रढता सूं रीसाय जयपुर दरबार बिसाऊ माथै आपरी सेना मेलदी। जयपुर सेना रै आवण अर मोठां भेल़ा घुण पसीजण री सोच’र किसनसिंह, श्यामसिंह नै कह्यो कै – “म्हैं अठै सूं जावूं परो क्यूं फालतू में बिसाऊ रो हाण करावो।”

आ सुण’र श्यामसिंह कह्यो – “आ कीकर हुय सकै ? थे एक राजपूत री शरण में हो। राजपूत री आदत में है कै- ‘घर स्वारथ हो कै कुस्वार्थ हो, कर बात पछै छिटकावणो नीं।’ सो म्हांरो माथो साबत, जितै थे अभय। बिसाऊ ऐड़ी सेना अर ऐड़ै नुकसाण सूं नीं डरै।”

श्यामसिंह सेना रो मुकाबलो कियो। जयपुरियां रा पग काचा पड़िया। आ सुण’र जयपुर महाराजा आपरै भरिये दरबार में पूछियो कै- “कोई अठै ऐड़ो सेनानायक है? जिको बिसाऊ नै सर करै?”

आ सुण’र दूजो कोई नीं उठियो जणै कप्तान नौसरअली उठियो अर कह्यो कै- “हूं बिसाऊ नै पाधरी कर दूंला।”

नौसरअली सेना ले बिसाऊ माथै आयो। गढ घेर लियो गयो। ठाकुर मोरचो लेवण री त्यारी में लागा।

उण समय एक दीपो(दीपाराम) नाई जिको ढाल-तरवार बांधियोड़ो अर जुद्ध सारू खमखमियोड़ो बर्तन मांजै हो। उणनै इण हाल में बर्तण मांजतै नै देख’र किणी मोसो दियो कै- “दीपला तणियोड़ो तो इयां बैठो है जाणै ई नौसरअली रो माथो तूं ई बाढ’र ठाकुरां रै हाजर करसी।”

आ सुणतां ई दीपो बर्तन उठै ई छोड’र भचाक दैणी उठियो अर उण आदमी रै देखतां-देखतां गढ री भींत कूद सीधो उठै पूगो जठै नौसरअली मोरचो लैवण री त्यारी में ऊभो हो। दीपै जावतै ई नौसरअली माथै वार कियो पण नौसरअली वार टाल़ लियो। दो-च्यार दोनां कानी वार हुया जितै बल़शाली नौसरअली छंल़-छंद सूं दीपै नै गफी घाल पकड़ लियो। अठीनै ठाह लागो कै दीपो नाई इणगत भींत कूदग्यो जणै बिसाऊ रा सरदार ई मैदान में आयग्या। अठीनै दीपो अर नौसरअली दोनूं लथोबत्थ। एक दूजै नै मात दैवण में लागोड़ा। इतरै मोबतसिंह मोकावत आय नौसरअली माथै तरवार बाही वो दीपै नै छोड नाठण री सोची पण दीपै कस’र पकड़ लियो, छोडियो नीं। जणै उण दीपै नै वारां रै आडो दे दियो जिणसूं मोबतसिंह नै तरवार बिचै रोकणी पड़ी। उणां दो-च्यार वार इणगत किया पण नौसरअली ओ डाव रम बोकरियो। सेवट दीपै कह्यो – “ठाकुरां आपांनै बिसाऊ रो नाक राखणो है अर हूं नौसरअली नै मारण आयो। सो ईरो मरण म्हारै नाम मांडजो। थे ईरै भेल़ो म्हनै ई बाढ दिरावो। रति मत शंकीजो। वीर जुद्ध में मरता रैया है।” मोबतसिंह तरवार बाही जिको दोनूं बिचै सूं कटिया। बिसाऊ री जीत हुई पण दरबार घणा रीसाया तो मांयां रा मांयां डरिया ई खरी। सेवट दूणी रावजी शंभुसिंह आद बिचै पड़िया अर राजीपो कराणो तेवड़ियो।

रावजी बिसाऊ आया अर राजीपै री शर्तां तय करतां कह्यो कै- “बिसाऊ गढ नै एकै कानी सूं पटकायो जावै। गढ खाली कर दियो जावै। गढ में जयपुर दरबार री दुहाई फैरदी जावै अर जयपुर रै नुकसाण री भरपाई करी जावै।”

आ सुणतां ई श्यामसिंह री मूंछां रो मरट तणियो अर आंख्यां रो रंग ई बदल़ग्यो। उणां कह्यो कै – “गढ नै नुकसाण मतल़ब म्हारो मरण। दरबार री दुहाई मतल़ब म्हे बापड़ा! म्हैं मर सकूं पण इणगत नस पाधरी नीं कर सकूं। थे ऐ शर्तां उठै मनाइज्यो जठै बूकियां में गाढ नीं हुवै। हां जयपुर धणी म्हांरो धणी। उणां रो जुद्ध खर्चो भर सकूं बाकी चाखो तो चांदी अर रगड़ो तो गोडा है।”

रावजी सेवट खर्चो लेवण सूं राजी हुयग्या अर दरबार नै ई मना लिया।

किणी कवि श्यामसिंह री इण अडरता नै बखाणतां लिख्यो है-

रीत रजवाट अवनाड़ कायब रत्ता,
कूरमां थाट नायब कजाकी।
तूं करै बांहबल़ आज सूरज-तणा,
डूंगरां ऊपरै छांह डाकी।।

श्यामसिंह री वीरता, धीरता अर उदारता विषयक घणा दूहा चावा है। एक थोड़ीक बांनगी–

धन बिसाऊ धन झुंझुणू, धन-धन स्याम नरेश।
सेखाटी को सेहरो, मालम च्यारां देस।।

स्यामा सूरजमाल रा, सेखा-धरा सपूत।
सांखूं नै सीधी करी, काढ्यो भोमो भूत।।

स्यामा सूरजमाल रा, सेखा-धरा सपूत।
पूगाया अजमेर में, तुरकां रा ताबूत।।

रूक रगत कुरल़ा करै, काटै अंग तमाम।
भाज्यां नै छोडै नहीं, सूरजमल को स्याम।।

बसै बिसाऊ चौगणी, फौज न आवै फेर।
बादस्यावां मालम पड़ी, स्याम तणी समसेर।।

आज नीं तो श्यामसिंह बिसाऊ है अर नीं दीपो नाई पण इण दोनां री वीरता जनकंठां में आज ई जीवित है।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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