पद्मश्री भक्त कवि दुला भाया काग

दुला भाया काग (२५ नवम्बर १९०२ – २ फ़रवरी १९७७) प्रसिद्ध कवि, समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका जन्म सौराष्ट्र-गुजरात के महुवा के निकटवर्ती गाँव मजदार में हुआ था जो अब कागधाम के नाम से जाना जाता है। दुला भाया काग ने केवल पांचवी कक्षा तक पढाई करी तत्पश्चात पशुपालन में अपने परिवार का हाथ बंटाने में लग गए। उन्होंने स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी हिस्सा लिया। उन्होंने अपनी जमीन विनोबा भावे के भूदान आन्दोलन में दान दे दी। उनके द्वारा रचित “कागवाणी” 9 खंडो में प्रकाशित वृहत ग्रन्थ है जिसमे भक्ति गीत, रामायण तथा महाभारत के वृत्तांत और गांधीजी के दर्शन व भूदान आन्दोलन पर आधारित गीत संकलित हैं। उनकी रचनाओं का विषय अधिकतर भक्ति एवं परमार्थ होता था। उन्होंने गांधीजी तथा विनोबा भावे पर मर्सिये भी लिखे हैं। उन्हें वर्ष १९६२ में भारत सरकार ने साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मनित किया। हालाँकि उनकी अपनी शिक्षा केवल पांचवी कक्षा तक हुई परन्तु उनकी लिखी रचनाये प्राथमिक से लेकर स्नातकोत्तर कक्षाओं तक पढाई जाती है। 25 नवम्बर 2004 को उनकी 102वीं जयंती पर भारतीय डाक तार विभाग ने उनकी स्मृति में 5 रुपये का टिकट जारी कर उन्हें सम्मानित किया। 22 फरवरी 1977 को उनका स्वर्गवास हुआ। प्रति वर्ष इस दिन उनके नाम से कागधाम में पांच पुरस्कार पूज्य मोरारी बापू द्वारा दिए जाते हैं।


कांकरी
(झूलणा छंद)
कुळ रावण तणो नाश किधा पछी
ऐक दी रामने वहेम आव्यो
मुज तणा नामथी पथर तरता थया
आ बधो ढोंग कोणे चलाव्यो ?
ऐ ज विचारमां आप उभा थया
कोईने नव पछी साथ लाव्या
सवॅथी छुपता छुपता रामजी
ऐकला उदधिने तिर आव्या…
चतुर हनुमानजी बधुंय समजी गया
चालीया श्री रधुनाथ पे’ले
रामनो दास ऐ वेरी ना वतनमां
रामने ऐकला केम मेले ?
तीर सागर तणे विर उभा रह्या
कोकथी जाणीये होय डरता
हाथमां कांकरी ऐक लीधी पछी
चहु दिशे रामजी नजर करता…

चोरना जेम हनुमान संताईने
वृक्षनी धटाथी निरखे छे
चितमां कपिने खूब विस्मय थयुं
आ रधुनाथजी शुं करे छे ?
फेंकता कांकरी तुतॅ तळीये गई
तसगरे जाणीये होय लुंट्या
राम पोता थकी खूब भोंठा पड्या
शरमना शेरडा मुख छूट्या…

चरणमां जई कपि हाथ जोडी कहे
नाथजी ! आ मती केम आवी ?
हाथ जेनो गह्यो तेहने फेंकतां
आपना बिरदनी शरम ना’वी ?
तारनारा बनी निरमां धकेलो
माफ करजो करी भूल भारे
तमे तरछोडशो तेहने नाथजी !
पछी त्रीलोकमां कोण तारे ?…
– दुला भाया काग



गिरधर दान रतनू “दासोड़ी” द्वारा गुजराती अर डिंगल़ रा महामनीषी विद्वान अर ऋषि तुल्य पूज्य दूलाभाया काग नै सादर
कवियण वंदन काग
दूहा
सरस भाव भगती सहित, राम मिलण री राग।
गुणी मुलक गुजरात में, करी भली तैं काग।।१
छंद छटा बिखरी छिती, इल़ा करै सह आघ।
आखर साकर सारखा, करिया घर -घर काग।।२
मरू गूजर सह एक मन, भाल़ सरावै भाग।
जाती गौरव जनमियो, कीरत खाटण काग।।३
गूजर मरूधर में गिणो, पात वरण री पाघ।
ऊंची धिन राखी ईंमट, कवियण साचै काग।।४
सगती भगती एक सम, संस्कृति अनुराग।
सत वकता सींची सुरां, कवियण नामी काग।।५
वाणी आ राची विमल़, थहै न किण सूं थाग।
चित्त चारणाचार मे, कवि नित राख्यो काग।।६
नीति नग जड़िया निपट, मही दियण सत माग।
आखर कहग्यो ऊजल़ा, कवियण वंदन काग।।७
दिशाबोध सबनै दियो, जियो जात हित जाग।
रसा काम अम्मर रियो, कवियण वंदन काग।।८
साच वचन तन सादगी, आखर कहण अथाग।
गुणी !करै तो गीधियो, कवियण वंदन काग।।९



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