श्री दुर्गा-बहत्तरी – महाकवि हिंगऴाजदान कविया

आद्याशक्ति माँ हिंगुऴाज पौराणिक देवी है तथा प्राचीन पुराणों मे इसका वर्णन आता है व तंन्त्रचूड़ामणि, वृहन्नीलतंन्त्र, शिवचरित्र आदि मे भी इसका वर्णन है। इस आदिकालीन तीर्थ के अब पाकिस्तान में चले जाने पर व आव्रजन व वीजा आदि नियमों की जटिल प्रक्रिया के चलते भारतीय नागरिकों के जाने का संयोग कम ही सजता है। आदरणीय हिंगऴाजदान जी कविया ने अपनी उम्र के 36वें साल अर्थात विक्रमी संवत 1960 या ई. सन 1902 के लगभग इस महत्ती तीर्थ-स्थान की यात्रा की थी। उस समय में यात्रा पैदल अथवा ऊंट पर बैठ कर की जाती थी। हिंगलाजदान ने दुर्गाबहत्तरी काव्य मे इसका वर्णन किया है जो कि बड़ा रोचक व सरस है।

।।दुर्गा-बहत्तरी।।
।।छन्द भुजंगप्रयात।।
मनंछा परब्रह्म हिंगोऴ माता।
समैं सात पौरां रमै दीप साता।
जंबू दीप में जाम एको जिकांरो।
दिशा पच्छमी दूर प्रासाद द्वारो।।1।।

जिको धोकबा काज जावै जमातां।
अपा पाप थावै बजै सिध्द आतां।
करामात री बात साखात कैई।
सता मातरी चन्द्र कूपादि सैई।।2।।

नग्री सोनमेनी पछै गांम नांही।
महा कासटा घोर ऊजाड़ मांही।
प्रपा कूप नैड़ो न बैड़ो प्रयाणों।
जलाल्या तणों फेटबो थेट जाणों।।3।।

बहै जातरी रातरी दीह बारा।
धकै चाढबो मागरो खाग धारा।
उदै-अद्रजो बारमों भाण ऊगै।
पबै-अस्त सो पूगियां नीठ पूगै।।4।।

तठै आगवो खाग हूं छाग तोड़ै।
चंडी काऴिका मातरै श्रोण चोड़ै।
लगावै सबै शेष बिन्दी ललाटां।
करै फेर विश्राम पाखै कपाटां।।5।।

उठै झाड़ कण्डीर पाहाड़ ऐंडा।
बणैं मंथरां हालणों पंथ बैडा।
खऴक्कै सदा नीझरां नीर खोऴां।
छलै कुण्ड अल्लील सल्लील छोऴां।।6।।

कई जातरा तत्र पत्राऴ कूंजै।
गहक्कै सिवा साद सादूऴ गूंजै।
जिकां दाकले जातरी पोढ जावै।
गुसांई रहै जागता राग गावै।।7।।

बड़ै प्रातरी मात मंजीर बागै।
जरां गात जम्भात जम्मात जागै।
सुणीजै अलंकार झंकार श्रूतां।
हुवै नींद बिक्षेप ताकीद हूंतां।।8।।

बिजै मातरी जातरी लोक बोलै।
खमाबैण ऊचारता नैंण खोलै।
पुगावै गुफा-गर्भ पाखै पुजारा।
दुजन्मा जमातां हुवै जेण द्वारा।।9।।

नवो जन्म ले कुण्ड कण्डीर न्हावै।
महा शुध्द ह्वै मुध्द मानूं नमावै।
लखै शूऴ सिन्दूर रो झोक लेतो।
श्रज्यो मात श्रीहाथ त्रीनोक सेतो।।10।।

धनोधन्य सो लोक जो नोक धोकै।
बऴै गौर हूं और बातां बिलोकै।
रच्या राम रा दोय चित्राम रूड़ा।
चखां-सर्व ऐको बियो सर्व-चूड़ा।।11।।

गदा ले खड़ो लांगड़ो अग्र गामी।
भऴे मात हिंगोऴ हिंगोऴ भामी।
मुणीं मैं जिका आदि अन्नादि माई।
अवत्तार ले माँमड़ा धाम आई।।12।।

थिरा आवड़ा नाम विख्यात थायो।
छिपा-शत्रु सो तेमड़ै छत्र छायो।
सको सोखियो हाकड़ो नाम सिंधू।
बहंतो थको रोकियो लोक-बन्धू।।13।।

चक्री-पीवणों पाय भाई बचायो।
क्षुधाऴी हणे हेक हेरंब खायो।
चढीज्यो धकै तेमड़ो शुक्र चेलो।
भुजां झोक कीधो पित्रांलोक भेऴो।।14।।

लंबी कोसकैई गुफा खोस लीधी।
करै पोस पासांण निद्रोष कीधी।
जठै आवड़ा मांमड़ाई पुजावै।
आई धोकबा लोक अन्नेक आवै।।15।।

रच्यो फेर प्रासाद बाहादरा रो।
धनो भाग भू भाग भाटी धरा रो।
हुवो ना इसो थांन ना आन हूंणों।
दिपै इन्दरां मन्दिरां हूंत दूंणों।।16।।

ढकी नींव काकोदरां लोक ढूकै।
फतै चिन्ह आकास लागो फरूकै।
मिणैं मेहरो-माग पाताऴ मानूं।
सको देहरो सेहरो रत्न-सानूं।।17।।

थिरू मूरती सूर नै नूर थाई।
तिका स्वप्न रै मांहि पिण्डा बताई।
सिरोरूह कोसेय काऴा सरीखा।
तियो आंक भू बांकड़ा नेत तीखा।।18।।

झगैं भाऴ सिन्दूर ज्यों ज्वाल झाऴा।
मुद्राऴी गऴै हिंडुऴै मुण्ड माऴा।
भुजां भांमणां कंकणां सज्ज कीधां।
लसै सूऴ डैरू खडग खप्र लीधां।।19।।

छऊं भैंन छोटी दहूं ओड़ छाजै।
बिचै पाट-राजीव माजी बिराजै।
खड़ो लांगड़ो बीर वीराधि खेतू।
करै रागड़ां छागड़ां राह केतू।।20।।

खऴां धूकऴां आदरै बीर खेऴा।
मिऴै भादरै जोगण्यां जुत्थ मेऴा।
भरै पत्र भैंसां अजां रत्र भोगै।
अछक्कां छकां छाक दारू अरोगै।।21।।

हुवै धत्त लोहित्त मैमत्त हाला।
नसारा किसा पार सूंऴां निवाला।
मधु मास आसोज में रास मंडै।
तिहूं लोकरी डोकरी तेथि तंडै।।22।।

रजा ब्रह्मरी रूप अन्नैक रम्मैं।
घणां बाजणां घूघरा घम्म घम्मै।
घटा भद्द ज्यों नद्द आंनद्द घोरै।
धुबैताऴ कंसाऴ सांगीत धोरै।।23।।

तणैं तार सैतार बीणांदि तंत्री।
बणै बीस बत्तीस भैरूं बजंत्री।
डफां मादऴां नाद डेरूं डमंकै।
धरा ब्योम पाताऴ धूजै धमंकै।।24।।

धनो धन्य मा आवड़ा धाड़धाड़ा।
अखीजै किसी जीह थारा अखाड़ा।
सदा तूं रमै रास नौ कोड़ साथै।
महामोड़ तूं कोड़ तेतीस माथै।।25।।

जिका आवड़ा देस जेसांण जिल्लै।
करन्नी तिका द्रंग देसांण किल्लै।
मयन्दी बणै कान्ह रै थाप मारी।
तरी साह तोफांन रै मांह तारी।।26।।

बिलूंब्यो निधी नीर श्री हाथ बांमै।
पुरी में सको सीर हन्नोज पांमै।
सजा हूं छुड़ायो आई राव सेखो।
लाई पुत्र पित्रेस रो लोप लेखो।।27।।

चवत्थू तणो तूटियो ऊंट चीन्हों।
करै काठ रो पाव ऊपाव कीन्हो।
दिपि कूप रै ऊप रै रूप दम्भी।
थये टूकड़ा जावती लाव थम्भी।।28।।

महाराज नूं राज रीझै समाप्यो।
थिरू राज रो राज देसांण थाप्यो।
जठै झाड़ियां खंड श्रीखंड जैड़ी।
नगां पुंजरी मंजरी रूप नैड़ी।।29।।

हिंदूवाण रो घ्रांण देसांण हूगो।
वणांरो अलंकार प्राकार ऊगो।
बुरज्जां चहूं जाण लोकेश बाका।
पृथी आभ रो बीच भांगै पताका।।30।।

पड़ै दीठ आसेर ज्यों मेर पब्बै।
दुती देखियां सुर्ग रो दुर्ग दब्बै।
सिला रा किला द्वार चित्रांम सोहै।
बिभूसा अलोकीक लोकां बिमोहै।।31।।

कपाटां तणी गाढता बज्र कीसी।
बणी भालि ज्यों जज्र बाकै बत्तीसी।
कसै ब्याल हूं नींव पाताल कांनै।
महा उच्चता भाखरां तुच्छ मांनै।।32।।

तिसोता जिसो नीर गम्भीर टांको।
बिलूमैं बिचै जाऴ भुजाऴ बांको।
जिका कोट नूं देवता हाथ जोड़ै।
चहूं कूंट रै बीच बैकूंट चोड़ै।।33।।

छबीलो घणो खास-आवास छाजै।
लखै घाट स्वाराट रो पाट लाजै।
निराऴो फबै फूटरौ झूंठ नांही।
मनों मेर रो कूट बैकूंट मांही।।34।।

लखीजै असी भांति आकास लागो।
भवांनी खड़ा पांण लीधां त्रभागो।
हमेशां रहै शत्रु रो सीस हाथै।
मुखै रत्र रो तासऴो छत्र माथै।।35।।

दिपै आवड़ा आद प्रासाद दूजा।
पुजारा करै नित्य नैमित्य पूजा।
चवै चंडिका चंडिका दीप चासै।
पिसै ठीक बाल्हीक श्रीखंड पासै।।36।।

सिरी गंग रो नीर संन्नान सारू।
दसत्तूर सिंदूर कप्पूर दारू।
हुवै होम आसावरी धूप हूं मैं।
घणां सांघणां दीप सांमीप घूमैं।।37।।

फऴां गंज फूऴां दऴां पुंज फाबै।
तयारी रहै सासता दास ताबै।
दहूं हाथ जोड़्यां पढै छंद दोहा।
बढै मैंमदादीक सोरंभ बोहा।।38।।

श्रलोकां धुणी पाठ दुर्गा सुणावै।
गुणी माढ रै राग सौभाग गावै।
बंबी बीण सैतार सैनाय बाजै।
त्रमाऴां घुरै मेघ माऴा तराजै।।39।।

जुड़ै आय सव्वासण्या रायजादी।
दरस्सैं कई सेवकां माय दादी।
हमल्लै धनो ऊन्दरी सेन हंदै।
मनों मैथली बन्दरी सेन बंन्दै।।40।।

हुवै चम्मरां झाटका जोति हूबै।
सदा ऊतरै आरती सांझ सूबै।
तके भादवी माह ऊपान्त तित्थी।
पड़ै मायरै पाय पृत्थी प पृत्थी।।41।।

पुनै चैत आसोज रा स्वैत पाखां।
लुऴै मात नूं जातरी लोक लाखां।
बदीजै किसूं कीरती हेक बाकै।
थऴी री दुती दाखतो शेष थाकै।।42।।

प्रवाड़ा किसूं हेक जीहां पुणीजै।
कंरां जोड़ियां कोड़ि आदेश कीजै।
धजाऴी हमै फेर ओतार धारियो।
बड़ो काम श्रीजोगमाया बिचारियो।।43।।

अभै-दान जैसांण बीकांण अप्पै।
तिका आज जोधांण रै राज तप्पै।
आई आवड़ा नाम विख्यात येऴा।
बजै इन्द्रबाई जिका ऐण बेऴा।।44।।

नमो देश मारूधरा कोट नोवाँ।
नमो द्रंग गेढा कलां खुर्द दोवां।
प्रणम्मो समो च्यार छै नो पहोमी।
नमो मास आसाढरी शुक्ल नोमी।।45।।

नमो शुक्र संध्या घणो श्रैष्ठ सम्मो।
नखित्रां तणो पातिसा स्वाति नम्मो।
महालक्ष्मी मात धापां नमामी।
नमो मात रो तात सामुद्र नामी।।46।।

बऴे तंनमो तंनमो इन्द्रबाई।
तुही सुन्य रै माँहि चैतन्य ताई।
महमाय तूहि तुहि जोग माया।
प्रकत्ती सकत्ती तुहि नाम पाया।।47।।

तुही रोम मैं तोम ब्रैमंड राखै।
नवै खंड तूहि घड़ै भांगि नाखै।
रमी तू रहै ब्रह्म रै रोम रोमै।
तरां बिंब छाया रहै ब्रह्म तोमै।।48।।

प्रथमा तुही पब्बई शैल-पुत्ती।
दुरग्गा तुही ब्रह्मचारण्य दुत्ती।
त्रतीया तुही चन्द्र घंटा तवीजै।
चतुर्थी तुही कूसमांडा चवीजै।।49।।

मुणीजै तुही पंचमी स्कंधमाता।
खटी मात कात्यायणी तू विख्याता।
रचै सातमो रूप तू काऴरात्री।
दिगी गौरी तू निध्यमी सिध्दि दात्री।।50।।

धुरां तू सुराराय नो नाम धेई।
कहीजै पुनै रावऴा रूप केई।
तुही भीलणी भेष शंभू भुऴावै।
रजो मूरती लेख तूही रूऴावै।।51।।

हरीबच्छश्रीलच्छ तू बीस हत्थी।
तुही पन्नगाधीस रै शीश पृत्थी।
तुही पच्छ तारच्छ में शीघ्रताई।
रती मूरती में तुही सुन्दराई।।52।।

तुही भेष में सूर में नूर भासै।
तुही मेह कादम्बणी चत्रमासै।
दिपै तू घटा में छटा द्योतद्वारा।
धपै तू जटा में तटा गंग-धारा।।53।।

छती तू सती भूपती दच्छछोणी।
गती मत्त मातंग तूं हंस गोणी।
तुही चन्द्रमा तुंड चामुंड चंडी।
अपर्णा अजा ईश्वरी तूं अखंडी।।54।।

बिजै तू श्रजै आहवां बाह बीसां।
सजै तू हियै हार झूझार सीसां।
तुही हाथलै शूऴ शादूऴ हक्कै।
त्रणां मात्र तू शुक्र रा छात्र तक्कै।।55।।

महैरामणो शुंभ निशुंम मार्या।
बऴी चंड मुंडादि तू ही बिदार्या।
दिती-पुत्र तू मारियो बाजद्रोही।
ललक्कारि डक्कारियो बीज-लोही।।56।।

तुही अज्जया अभ्भया अब्बिऴंबा।
तुही अज्जरा अम्मरा अख्खिऴंबा।
तुही साकणी डाकणी बाकसाऴी।
तुही भूचरी खेचरी भद्र काऴी।।57।।

तुही जंत्रणी मंत्रणी अन्न जामा।
तुही धंत्रणी तंत्रणी बुध्दि धामा।
तुही गिव्वरां बिव्वरां बीज गाजै।
तुही रावऴां देवऴां मध्य राजै।।58।।

तुही काऴिका ज्वाऴिका बज्र काया।
तुही मंगऴा तोतऴा जोग माया।
तुही पिंगऴा डिंगऴा पद्य गद्या।
तुही बैदिका लौकिका छंद विद्या।।59।।

तुही भारती भाखणी सर्व भाषा।
तुही सर्व दातार मंदार साखा।
हमाऊ परां तोकरां छांह हेको।
न को पार ओतार थारा अनेको।।60।।

तुही सारदा नारदा कासमेरी।
तुही काऴिका भास मद्रास केरी।
कृपाऴी तुही किल्लकत्तै किल्लकै।
जिलै उत्तरा खंड तू ज्वाऴ जक्कै।।61।।

कुमंख्या तुही कांमरू देश कांनी।
भऴै तत्थ तू मत्थ-हीणा भवानी।
दिसा प्राचि आवाचि तुही उदीची।
तुही मात हिंगोऴ राजै प्रतीची।।62।।

तुही सिंध आसापुरा रूप तापै।
तुही अंबिका मात ऐबात आपै।
तुही अर्बुदा अद्र आबू अग्राजै।
तुही बैचरा संभरा मात बाजै।।63।।

सिला रूप आमैर तूही सकत्ती।
तुही जीण जम्बाय जोतां जकत्ती।
तुही जोति ज्वाऴा मुखी जोबणैरी।
बसै तू दिली जोगणी बेख बैरी।।64।।

तुही कामही नाम देबी कहांणी।
महमांय दूगाय तूही मृडाणी।
तुही चांण चांमड चाऴकनैची।
तुही राज राजेश्वरी डूंगरैची।।65।।

बजै माल्हणां मात तूही बिराई।
बऴू तू पृथीराज रै राजबाई।
पुनः माय गीगाय तूही पुणीजै।
भुजाऴी तुही नागणैची भणीजै।।66।।

सिंघाऴी तुही सीमिका होल सैंणी।
बद्राऴी तूही गूंगिका नागबैणी।
खगाऴी तुही बिव्वड़ा चख्खड़ाई।
मुद्राऴी तूही आवड़ा मामड़ाई।।67।।

धजाऴी तुही कर्नला धाबऴांणी।
बडाऴी तनै च्यार बेदां बखाणी।
किसो ओड़ नो कोड़ तूही कहाई।
बिजाई उमा आज तू इन्द्र बाई।।68।।

थई जै इसा रूप अन्नेक थारा।
सको सारदा कै सकै नांहि सारा।
जपूं जीह सोभाग मोभाग जागो।
लुऴै आय श्रीमाय रै पाय लागो।।69।।

अबै बीनती हेक “हिंगोऴ” वाऴी।
जिका ध्यान दै कांन कीजै धजाऴी।
लहैरी महैराण भूपाऴ लच्छो।
अखो दूसरो रीझ खीजाऴ अच्छो।।70।।

कल्पब्रच्छ म्हाराज रा सेवकां को।
बण्यों राखिजै बूडसू भूप बांको।
बऴे हूं लुऴे रावऴा पाव बंदूं।
अड़ी नाव ऊबारबा आव ईंन्दू।।71।।

लंकाऴै चडै चाऴ जंघाऴ लेलै।
हली राजड़ा ज्यों पृथीराज हेलै।
हरी पोकरी रै हुवो जेम ह्वीजै।
कवी पातरी मात ऊबेल कीजै।।72।।

इति श्री दुर्गा-बहत्तरी संम्पूर्णम् भवेतः

टंकण – राजेन्द्रसिंह कविया (संतोषपुरा सीकर)

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