ऐहड़ै नरां पर बल़िहारी

मुख नह फूटी मूंछ, दंत दूध रा देखो।
सीस झड़ूलो सजै, पदां झांझरिया पेखो।
वय खेलण री बेख, वीर धारी तन वरदी।
सधर खड़ो तण सीम, सदर उसण नै सरदी।
वतन री लाज वरियो मरण, धरण रखी धर धीरता।
ऐहड़ै नरां पर आज दिन, (आ)बल़िहारी खुद वीरता।।

क्रीड़ा रो नह कोड, भल़ै रंग राग न भावै।
तंतू ममता त्याग, सिंधू झट राग सुणावै।
बाल़ापण गुण विसर, त्याग फिर भोजन तातो।
सीमा ऊपर सूर, मुदै बहियो मन मातो।
रमण री उमर रण सेज पर, अंतस तजी अधीरता।
ऐहड़ै नरां पर आजदिन, (आ)बल़िहारी खुद वीरता।।

हाऊ रो नह हेर, सूर नै टुकियक संको।
भूत पिसाचां भूल, वाह रहियो बल़ बंको।
मातभोम रिण मांन, कोम नै देवण कीरत।
नर रह सदा निसंक, बदन उफणी नित वीरत।
जिण धरा ऊपनो जोरवर, सूंप्यो गात गहीरता।
ऐहड़ै नरां पर आजदिन, आ)बल़िहारी खुद वीरता।।

जीयो जितै जरूर, तिरंगो रखियो तांणै।
जीव बसा जिण मांय, उरां नित गौरव आंणै।
वरी वीरगत वीर, जगत जांणी आ जाहर।
ओढ तिरंगो अडर, नाज घर पूगो नाहर।
जयकार गूंजियो गगन जद, गौरव साथ गंभीरता।
ऐहड़ै नरां पर आजदिन, आ)बल़िहारी खुद वीरता।।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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