गये बिसारी गिरधारी – त्रिभंगी छंद – स्व. देवीदान देथा (बाबीया कच्छ)

।।दोहा।।
उद्धव आए एक दिन, मथुरा से ब्रज माय।
कुशल पत्रिका श्याम की, सब को बाँच सुनाय।।१
प्रीतम की पाती लखी, दिल में भइ अति दीन।
कहत त्रिभंगी छंद कर, ब्रज की बाल प्रबीन।।२

।।छंद त्रिभंगी।।
ब्रज की सब बाला, रूप रसाला, बहुत बिहाला, बिन बाला,
जागी तन ज्वाला, बिपत बिसाला, दिन दयाला, नंद लाला।
आए नहि आला, कृष्ण कृपाला, बंसीवाला, बनवारी।
कान्हड़ सुखकारी, मित्र मुरारी, गये बिसारी, गिरधारी।।१

आए अकरूरं, ग्यान गरूरं, निरमल नूरं, तन सूरं।
प्रेमी जन पूरं, निपट निठूरं।बात मधूरं, कर बूरं।
मोहन सुख मूरं, हरी हजूरं, ले गये दूरं, बलकारी।
कान्हड़ सुखकारी, मित्र मुरारी, गये बिसारी, गिरधारी।।२

लायक नंदलालं, गोप गवालं, करी बिहालं, किरपालं।
गये कान छुगालं, मथुरा मालं, साल दुसालं, सजहालं।
मुकता मणि मालं, हेम हमालं, राज रसालं, कर भारी।
कान्हड़ सुखकारी, मित्र मुरारी, गये बिसारी, गिरधारी।।३

रंजन मन रासं, ब्रज के बासं, सकल हुलासं, तज तासं।
कीनी कुबजासं, प्रीत प्रकासं, नविन विलासं, मन भासं।
प्रीतम ना पासं, अंग उदासं, आवन आसं उरधारी।
कान्हड़ सुखकारी, मित्र मुरारी, गये बिसारी, गिरधारी।।४

बंसी की बानी, श्रवन सुहानी, मंगल दानी, मन जानी।
गाजत गहरानी, सुनत सयानी, भान भुलानी, भय भानी।
लोपी कुल कानी, मेरम मानी, अब पस्तानी, कर यारी।
कान्हड़ सुखकारी, मित्र मुरारी, गये बिसारी, गिरधारी।।५

साजत सिणगारं, कैक प्रकारं, कुबजा नारं, कर प्यारं।
झांझर झनकारं, हिय बिच हारं, काजल सारं, द्रग कारं।
सुमनम ले सारं, सेज सुधारं, करत विहारं, तन कारी।
कान्हड़ सुखकारी, मित्र मुरारी, गये बिसारी, गिरधारी।।६

गोपी गोवासी, रसिक रमासी, मन अकुलासी, मुरझासी।
ओधव कब आसी, ब्रज के बासी, स्याम विलासी, सुख रासी।
प्रीतम की प्यासी, अती उदासी, प्रेम प्रकासी, बिन प्यारी।
कान्हड़ सुखकारी, मित्र मुरारी, गये बिसारी, गिरधारी।।७

करुना निधि कानं, सुह्रद सुजानं जीवन प्रानौ, तजि मानं।
दीजै दिल जानं, दरसन दानं, प्रीत पुरानं, पहिचानं,
जोरी जुग पानं, “देवी दानं”बोलत बानं, ब्रिज नारी।
कान्हड़ सुखकारी, मित्र मुरारी, गये बिसारी, गिरधारी।।८

।।छप्पय।।
गिरधारी गोपाल, लाल सबही गुन लायक।
कैसे भये कठोर, दीन जन के दुख दायक।
हमको तजी बिहाल, कीन्ह कुबजा को प्यारी।
उनको भै आधीन, नाथ की है गति न्यारी।
कान्हड़ कृपाल मंगल करन, करुना हम पर कीजिए।
निज दास जान ब्रज नारी को, “देवा” दरसन दीजिए।
~~स्व. देवीदान देथा (बाबीया कच्छ)

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