गीत बलूजी चांपावत रो

।।दोहा।।
अडर बल्लै अवनाड़ उण, दल़िया दोयण दाव।
चावी की चांपै चवां, हर दिस हरसोल़ाव।।

वा वा रै बल्लियाह, गाढधारी गोपाल़ रा।
घेटां ज्यूं घल्लियाह, अरियण आगे आपरै।।

शाहजहां संकोह, मुगल मनां जद मानियो।
दाटक रण डंकोह, घुरियो.बल्लड गोपाल़ रै।।

।।गीत – प्रहास साणोर।।
अयो अमर रो उगाहण वैर धुब आग रै
जाग रै क्रोध उर पाल जायो।
भुजां रै भरोसो, नको बल़ भागरै,
आगरै नाग रै रूप आयो।।1

बलड़ सूं कंपिया पिसणदल़ बीहता,
जंपिया खुणां में खान जेता।
चरण जा साह रा उबारण चंपिया,
दिगर जो हरावल़ डकर देता।।2

साह पण ध्राह कर खुदोखुद संकियो,
नाह मुगलाण रो हुवो नाकै।
वाह रै वाह धिन पाल रा वीरवर,
हाहकर आगरै मची हाकै।।3

हेवरां हणाटा किले पर होइया,
पल़चरां गणाटा जेथ पेखो।
साह घर सांप्रत पेखिया सणाटा,
असमरां तणाटा तूझ एको।।4

देह पण अमर री समर में उठाड़ी,
अमर कथ रखेवा कमर आणी।
गुमर तैं राखियो गजन रै घरां रो,
जगत धमगजर री खबर जाणी।।5

अहीछत्त-पति री कीरती उबारी,
हती दल़ -जमन जोधार हाथै।
जगपति जोवता रह्या वै जमनतट,
सती वा पति रै गई साथै।।6

निडरपण दियो ज्यूं वचन निरवाहियो,
आगरै सचनपण अरक ऊगो।
कचनपण नको तूं लाहियो कमधवड,
पाणबल अमर सथ सरग पूगो।।7

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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