गीत – प्रिथीराज राठौड़ रो – लक्खा बारठ रो कहियो

मध्यकाल की डिंगल काव्यधारा के श्रेष्ठ कवि लक्खाजी बारठ पर अद्यावधि कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ है। आपका जन्म गांव नानणयाई के बारठ नानणजी के घर हुआ था। साधारण परिवार के लक्खाजी ने अपनी कर्मठता, प्रज्ञा व प्रतिभा के बूते उस समय असाधारण सफलता अर्जित की थी।

वे मुगल बादशाह अकबर के प्रीतिपात्र रहे। अकबर ने इन्हें अंतरवेद(मथुरा) का परगना इनायत किया व मथुरा में रहने हेतु हवेली बनाकर दी थी। इस संबंध में कुछ किंवदतियां भी प्रसिद्ध है।

अकबर के दरबार में लक्खाजी की उच्च हैसियत का अनुमान हम उनके समकालीन कवि दुरसाजी आढा के इस एक दोहे से लगा सकते हैं–

दिल्ली दरगह अंब फल, ऊंचा घणा अपार।
चारण लक्खो चारणां, डाल़ नमावणहार।।

इस दोहे के प्रत्युत्तर में जो लक्खाजी ने कहा था उससे हमे विदित होता है कि इनमें विनम्रता कूट कूटकर भरी हुई थी-

दुरसा डूंगरड़ैह, कुण काला छायां करै।
आढा आपांणैह, महर करीजै मेहवत।।

इनका एक गीत बहुत प्रसिद्ध है, लेकिन अभी तक मुझ अकिंचन के पढ़ने में नहीं आया है। जो उन्होंने प्रसिद्ध वीर व दानवीर सक्तावत गोकलदास भाणोत पर कहा था-

सकतावत सरग सिधातां,
गीत हुवा रद गोकल़दास।।

लक्खाजी के ही वंशज व राजस्थानी साहित्य की मूल भावनाओं से गहरे तक जुड़ाव रखने वाले ओंकारसिंहजी लखावत इन पर इन दिनों एक पुस्तक की तैयारी में संलग्न है। अतः रामसेतु के समय गिलहरी ने जो प्रभु राम की सहायता की थी, उसी भावों के वशीभूत मैं लक्खाजी का एक गीत लखावत साहब को प्रेषित कर रहा हूं।

गीत नायक पृथ्वीराजजी राठौड़ है। जो वीर प्रकृति व प्रभु भक्ति में समरूप अनुरक्ति रखते थे।

इन्होंने अकबर के कहने पर ‘वेली किसन रुकमणी री’ की ब्रजभाषा में टीका भी की थी। उस टीका की भाषा का उदाहरण रावतजी सारस्वत ने अपने विनिबंध ‘पृथ्वीराज राठौड़’ में उद्धृत किया है।

लक्खाजी को थोड़ा पढ़ने पर मेरे अंतस में जची है कि छोटा ही सही इन पर एक लेख किसी पत्रिका हेतु लिखूं। बहरहाल लखावत साहब के आदेशों की पालनार्थ-

।।गीत – प्रिथीराज राठौड़ रो- लक्खा बारठ रो कहियो।।

वपि वाधै नितूं विराजै अविरच,
भले बिहुं विध उर नवली भांत।
प्रभु सूं जेतो हेत प्रिथीमल,
पैररसौ ऐतो पुरसात।।

राजै राव राठौड़ प्रथीराज,
रूड़ै अगि रूड़ि वै रीत।
प्रीत जिसो सारिस जगदपति,
पैसो तिसो खत्रीपण प्रीत।।

अधिको नित कलियांण अंगोभव,
उभै विध अधिकार अछेह।
हुवै जिम तूझ सनेह सरस हर,
सुसतिय तो सारिस सनेह।।

विध विड अधिको जैत वंशोधर,
धारण हेकण व्रवण दान।
मनि तूं उवरै सुरै न मानै,
मछर न उवरै नरै मान।।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़़ी”

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