गीत सींथऴनाथ गोरैजी रो

।।दूहा।।
गोरा आखर गोरला, अप साकर उनमान।
जस ठा-कर तोरो जपूं, मामा अरजी मान।।

तूं काऴा छीलै तपै, अरी उथाऴा ओज।
भड़ गुरजाऴा भैरवा, मतवाऴा दे मौज।।

।।गीत – प्रहास साणोर।।
पेख पड़ी आ गरज उण सनातन पुरातन,
सुणै झट अरज चढ आव सामा।
नेहधर फरज नैं तावऴो निभावण,
मिहारी दरज कर बात मामा।।1

रेणवां धरा रा पोरायत राजवै,
साजवै मदत नित राख सोरा।
अभै रह हमेसा आपरै आजवै,
गाजवै सींथऴ धर तुंही गोरा।।2

सिमरियो नारायण सदा सुखरासरै,
हियै धर आसरै अडग हेती।
खमा बण बऴधियो जूपियो खासरै,
खरै मन दासरै करी खेती।।3

लहर कर डहर में धान वो लगायो,
जोरकर अघायो खेत जूतो।
भैरवा महर कर दऴद तैं भगायो,
संत रो जगायो भाग सूतो।।4

इष्टधर आज लग नरै री ऐऴरा,
भरै री काज सिग पैंड भाऴो।
धरै री मनां नित अडग धणियाप वा,
पह धव करै री साय पाऴो।।5

डींगऴां गीत पर डणक डमकारतो,
निजर निज धारतो पाऴ नाता।
सारतो सांकड़ा काज सब सेवगां,
भलां भलकारतो मात-भ्राता।।6

गणण कर गूघरा पगां घमघमै छै,
रमै छै मात रै थांन रीझ्यो।
डंमर कर डंमरू करां डमडम छै,
खऴां दऴ दमै छै खाग खीझ्यो।।7

जटा में सुगंधी तेल झर झरै छै,
करै छै रऴी मन पूर कामा।
भलोड़ो श्वान हद डांण मग भरै छै,
मीट तुझ डरै छै दूठ मामा।।8

लांगड़ा गुरजधर निजर जो लाडरी,
छतो आ चाडरी वेऴ छेको।
जटाधर बताजै ख्यात वा जाडरी,
अहर निस गाढरी आस एको।।9

छत्रधर नमो नित नाथ छीलाण रा,
काण रा रुखाऴा सुणै काऴा।
जाण रा जूनोड़ी जाग जटियाऴ अब,
पाणधर त्रिशूऴां बहै पाऴा10

जीयावत गीधियो जपै जस जोर रो,
और रो नहीं विसवास आवै।
बहती दोर रो बणै झट वाहरू,
गोर रो इणी कज गीत गावै।।11

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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