गैली दादी!

आथूणै राजस्थान री धरा वास्तव में सिद्धां, सूरां, सतियां, जतियां री धरा है। बांठै-बांठै कन्नै लोक-निर्मित उण महामनां री कीरत रा कमठाण, इण बात री साख भरै कै-

कीरत महल अमर कमठाणा।

लोकहितार्थ जीवण जीवणियां अर अरपण करणियां रो जस सदैव जनकंठां में ई गूंजतो सुणीजै, क्यूंकै लोक कदै ई गुणचोर नीं हुवै अर साथै ई लोक जात रो पूजक नीं, बल्कि गुणां ग्राहक हुवै-

गुण नै झुरूं गंवार, जात न झींकूं जेठवा।

गुणपूजा ई राजस्थानी संस्कृति रो मूल़ाधार है। जद ई तो इण पावन भोम रा मूल़ वासी महाकवि हमीरजी रतनू आपरै एक गीत में लिखै कै देवां, दातारां, जूझारां अर सिद्धां रै साथै ई साधक ई प्रणम्य है क्यूंकै सिद्ध नै साधक ई पूजावै–

देवां दातारां जूझारां सारां चारां वेदां अवतारां दसां,
धरां हरां ग्यारां रवि बारां चारां धांम।
सतियां जतियां रूपां सूरां पूरां रिखेसरां,
पीरां पैगंबरां सिद्धां साधकां प्रणांम।।

सत-पत रै पथ रा पथिकां री आ राजस्थान री आथूणी धरा सत अर पत रै मुचतै झूंपड़ै री थूणी रै रूप में जाणीजै। जद-कद ई सत री पत जावण लागी जद-जद अठै रै मानखै आपरी जथा शक्ति उणनै राखण रा जतन किया। इण पेटे भलांई इणांनै आपरा प्राण अरपण करणा पड़िया पण मोको आयां पाछा नीं सरकिया।

इण पेटे समझणै अर दानै नर-नाहरां री तो बातां आपां मोकल़ी सुणी पण गैलै कै गैली री बातां कम ई सुणी। जिणां इण पेटे समझणां सूं बधीक काम कर’र इण दूहै नै सार्थकता दी कै-

नर सैणां सूं व्है नहीं, निपट अनोखा नाम।
दैणा मरणा मारणा, कालां हंदा काम।।

ऐड़ो ई एक किस्सो बीकानेर री धरा में आए गांम ‘किनियां री बसती’ री धियारी अर ‘रावणेरी’ री बहुआरी ‘गैली दादी‘ रो।

‘गैली दादी’ री बात करूं उणसूं पैला थोड़ीक बात ‘किनियां री बसती’ री करणी समीचीन रैसी।

चारणां में किनिया शाखा आपरै मूल़ पुरूष किनिया लारै ईज चाली। ज्यूं रतनू लाल़स, सांदू, वीठू आदि-आदि चाली। गुजरात रै काठियावाड़ इलाकै सूं किनियाजी रो वंशज ‘भीमड़’ जिकै किशोरसिंहजी वार्हस्पत्य रै मुजब हलवद रै पाखती आए गांम खोड़ रा वासी हा। उवै पैला माढ अर पछै जांगल़ू-धरा रा धणी रायसी कनै आयग्या।

भीमड़ घोड़ां रा वौपारी हा, जिकै काठियावाड़ी घोड़ा इण इलाकै में लाय’र शासकां नै जरूरत मुजब देता। काठियावाड़ री बधताई बतावतां किणी लोककवि लिख्यो है–

भुजनगरै घोड़ा भला, हलवद वौरां हट्ट।
नग कठियांणी नीपजै, अइयो धर सोरट्ठ।।

रायसी रै पछै उणां रा सपूत उदारमना खींवसी बैठा। उणां वीठूजी रोहड़िया नै दो करोड़ पसाव अर बारह गांमां री जागीर दी, जठै उणां आपरै नाम सूं बीठनोक बसायो। इणी बारह गांमां में ई एक गांम हो रावणेरी(राणेरी)।

इणी खीवसी सांखला, भीमड़जी किनिया नै ई एक गांम दियो जठै उणां आपरो रैवास कियो अर उवा जागा ई ‘किनियां री बसती’ रै रूप में जाणीजी।

इणी ‘किनियां री बसती’ सूं भगवती करनजी रा पिता मेहाजी दूसलोत मांगल़ियावटी रा धणी मेहाजी मांगल़िया कन्नै गया परा। मेहोजी तो आपरी धरम-बैन किणी गूजरी री गायां री रक्षार्थ भाटियां सूं हुयै जुद्ध में जूझर वीरगति पाई अर राजस्थान रै पांच प्रसिद्ध लोकदेवतावां मांय सूं एक रै रूप में चावा हुया-

पाबू हरबू रामदे, मांगल़िया मेहा।
पांचूं पीर पधारजो, सिद्ध गोगा जेहा।।

किंवदंती रै मुजब मेहाजी मांगल़िया रै भतीज वैरसी मेहाजी किनिया नै ‘सुवाप’ गांम इनायत कियो–

तेरेसै पिचियासिये, मांगल़िये मा-बाप।
वांकै आंकै वैरसी, समप्यो गांम सुवाप।।

‘किनियां री बसती’ में भीमड़जी री वंश परंपरा में आगै जाय’र कलजी (कल्याणजी) किनिया हुया। इणी कलजी री बेटी हा ‘गैली दादी’। ‘गैली दादी’ रो मूल़ नाम कांई हो? आज किणी नै ई ठाह नीं है पण जिण इलाकै में इणांरो थान है, उण इलाकै में लोग किणी समझणी दादी नै तिल मात्र ई नीं जाणै पण परहितार्थ प्राण त्यागण वाल़ी इण मनस्विनी नै अवस जाणै।

‘गैली दादी’ रो ब्याव ‘रावणेरी’ रै बीठुवां में हुयो। पति रो कांई नाम हो ? ओ तो ठाह नीं पण आ बात जरूर चालै कै शादी रै थोड़ाक दिनां पछै ई उणा रै धणी रो सुरगवास हुयग्यो हो।

जैड़ो कै नाम सूं ठाह लागै कै वै आंगै रा भोल़ा भंडारी हा। ऐड़ै में सासरै में उणांरो कोई घणो आदर नीं रह्यो। इण सारू वै आपरै पीहर रै पाखती आए गांम ‘कुंभाणा’ में रैवण लागा। अठै ऐ किणी माथै भार नीं बणिया। स्वालंबी स्वभाव रै पाण वै गांम रा बाछड़ा चरा’यर आपरी आजीविका चलावता। कितीक नाडी अर कितोक आगोर। मुठ्ठीक कावड़ नै कितोक धान चाहीजै?

उठै रा ठाकुर कुंभसी कुंडल़िया घणो ई कैता कै- “बाई तूं रोटी रावल़ै जीमिया कर।”

पण वै गिनर नीं करता क्यूंकै- ‘मुझे है काम ईश्वर से, जगत रूठे तो रूठण दे।’

कुंभसी कुंडल़िया, महेवा रा शासक मल्लिनाथजी रै पोतै अर पोकरण रै धणी हम्मीर री वंश परंपरा में हा। मल्लिनाथजी री संतति साचाणी धरतीपुत्र हा। उणां री ओल़खाण आपरै बाप-दादां लारै नीं बल्कि खुदी री खाटी धरती लारै हुई- ‘धरती म्हांरी, म्हे धणी, ढाहण नेजां ढल्ल।’ यथा महेचा, पोकरणा, खावड़िया, बाड़मेरा, कोटड़िया, कुंडल़िया, जसोला आदि-आदि। कुंभसी रा वडेरा पोकरण सूं कुंडल़ आयग्या। जिणसूं उवै कुंडल़िया कहीजण लागा। कुंडल़िया कुंभसी, कुंडल़ सूं बीकानेर आयग्या। जठै इणांनै तत्कालीन बीकानेर राजाजी जागीर दी अर इणां आपरै नाम सूं ‘कुंभाणा’ बसायो।

उण दिनां आथूण सूं मुसलमान लुटेरां रा घणा दल़ आया करता। ऐड़ो ई एक दल़ इण इलाकै में लूटपाट करतो आयो अर ‘टोकला’ गांम नै लूट’र कुंभसी कुंडल़िया नै समाचार करायो कै- “लूटीजण सूं बचणो है तो म्हांनै सवारै दिन बंधियां सूं पैला मिनख दीठ एक सोने री मो’र दे दी जावै। म्हे आगै बुवा जावांला। नीतर ओ ई कंवाड़ो अर ओ ई डांडो है।”

भलांई कुंभसी राजपूत हा पण लूटेरां री अनीति अर उदंडता नै जाणै हा, तो आ ई जाणै हा कै बल़ बिनां बुद्ध बापड़ी हुवै। वै दोघड़चिंता में पड़ग्या।

अठीनै गैलीदादी जोग सूं उण दिन बाछड़िया चरावता रावणेरी री कांकड़ तक बुवा ग्या। उठै उणां देखियो कै भर चौमासै में ई खेत खायोड़ा दीसै। उणां सोचियो कै बीठुवां रा किरसा इतरा कांई निपौचा है जिको आपरा खेत ई नीं रुखाल़ै। खूटोड़ा कठै ई रा। इतरै उणांनै रावणेरी रा दो च्यार आपरा किरसा दीखिया। उणां बालोज में ओल़भो देतां कह्यो- “रे गैलां थांरा धणी तो खूटल है ईज, थे ई कामचोर लागो। भर चौमासै में लहरावती फसल़ां इयां सूनी छोडोला ! जणै घरै कांई ले जासो अर कांई धणियां नै देसो?”

आ सुण’र किणी किरसै कह्यो- “दादी धणी तो थां जैड़ा है! लोग समझणां रा खेत खड़ा देवै, पछै कालां रा खेत कुण छोडै? ‘साहजी रा सवा नवा, दुख भाड़ेत्यां दीठा।’ म्हे तो इयां ई रोवां म्हांरै बाप नै, पग तोड़ावां अर खेत में ऊभी फसल ठाकुर रा घोड़ा चरै।”

आ सुणतां ई डोकरी नै रीस आई अर पूछियो- “ऐड़ो किसो ठाकर है जिको चारणां रा खेत चरावै?”

जणै किरसां कह्यो- “दूजो कुण ? थांरो ईज कुंभो कुंडल़ियो।”

आ सुणतां ई डोकरी बाछड़िया उठै ई छोड’र कुंभाणा पूगा। उवै कुंभसी नै कीं कैता उणसूं पैला उणां देखियो कै कुंभसी रो मूंढो चिंता में पैला ईज काल़ोकुट पडियोड़ो हो। ठाकुर नै सोच अर गताघम में पड़ियो देख उणां पूछियो कै- “कुंभा ! चारणां रा खेत चुंथाय’र मूंढो लटकावण रा ढफल मत कर। तूं भलांई मूंढो लटका पण हूं जमर रो तेवड़’र आई हूं।”

आ सुण’र कुंभसी भल़ै घणो डरियो अर डरतै ई कह्यो- “अरे बाई! खेतां में तो घोड़िया बड़ग्या हुसी पण तैं सुणी नीं कै कालै टोकलो लूंटीजग्यो अर आज आपांरी बारी है।”

“आपांरी बारी! मतलब वै खूटल अठीनै आसी? तो घोड़ां साम्हा खड़। चारणां री सलवार पूल़छ खड़ाय मतवाल़ा तो घणा ई किया है। इयां मूंढो पीलरो मत कर।”

डोकरी कह्यो जणै कुंभसी पाछो कह्यो- “गैलसफी लांठापी सूं गरीबी ठीक है।”

“जा रे! डर सूं शस्त्र नांखदे, जिकै किसा रजपूत? पण म्हनै वचन दे। आततायां नै पाछा लोवड़याल़ घेरसी। अठै कोई लूटेरा नीं आवै।”

गैली दादी कह्यो तो कुंभसी कह्यो- “वचन।”

गैली दादी कह्यो- “वचन दिया जणै म्हारी रथी चिणाय जमर रै अगन प्रजाल़। म्हे ओ शरीर हमै लाखै ई नीं राखूं।”

आ सुण’र कुंभसी कह्यो कै- “आ कांई कैवो? चारण री बेटी म्हारै कन्या जैड़ी। इण पाप सूं म्हारी सात पीढी नीं उबरै। हूं कोढियो होय मर नीं जाऊं? भलांई हूं वचनहीण बाजतो पण ओ अकरम म्हारै सूं नीं हुवै।”

आ सुणतां ई डोकरी कह्यो- “कुंभा पाप में तूं चारणां रा खेत चूंथ पड़ियो रो। म्हे जमर करण रो द्रढ निसचै कियो। ध्रुव ढिगै तो म्हारो निर्णय डिगै। जे तूं अगन देय’र म्हारो जमारो सुधारतो तो म्हारै कोप सूं बचतो पण तूं वचनहीण हुयो सो सुण जिण घोड़ां सूं तैं खेत खड़ाया उणांरै आज सूं खुर रो खुरड़को थारै घर सूं तो ग्यो अर आगै हल़ रो घुरड़को ई रैसी। कुंडल़िया आज पछै इण इलाकै में कोई दूजी जागीर नीं पासी फखत किरसा ई रैसी। आ ई नीं हूं तो ई सूरज री साख में जमर बैठूं पण तनै आज सूं सातमें दिन काणो काल़ीदर खासी। ऐ म्हारा वचन है।”

इणरै साथै ई किणी अदीठ शक्ति रै तेज सूं रथी में झाल़ उपड़ी अर गैली दादी उण झाल़ रै भेल़ी झाल़ हुयगी।

कुंभसी खानदानी राजपूत हो, जाणतो कै जमर चढी चारणी रा वचन लाखै ई झूठ नीं पड़ै। सो उवो उणी घड़ी घोड़ै चढियो अर तय कियो कै सात दिन पमंग री पीठ ई वासो करसूं। किंवदंती है कै सातमें दिन कुजोग ऐड़ो बणियो कै थाकोड़ै कुंभसी कुंभाणै री जीयोल़ाई तल़ाई में घोड़ो पायो अर थाकोड़ै थोड़ो सुसतावण सारू पाल़ रै पाखती ऊभै पींपल़ री डाल़ झाली। डाल़ झालतां ई आंगल़ी रै बटीड़ उपड़ियो।

कुंभसी कह्यो- “ले भाई गैली पूगी परी।”

उणां जी पतियावण सारू उठै उभै आपरै हाजरिये नै कह्यो- “जोवो कांई हो? पींपल़ चढ’र इण नाग नै मार’र नीचो नाखो। देखां काणो है कै नीं?”

नाग मार’र जोयो तो उवो साचाणी काणो हो।

कुंभाणो उजड़ियो। उठै रा कुंडल़िया आज ई “भाणा रो गांम” में बसै।

जिण जागा “गैली दादी जमर कियो। उठै आज ई उणां रो थान साखीधर है अर आखती-पाखती रा लोग थान रै प्रति घणी श्रद्धा राखै।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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