गुरु वंदना – देवी दान देथा (बाबिया कच्छ)

।।गुरु वंदना।।
मुद मंगल गुरु मूर्ति को, धरहु ध्यान उर माय।
यातें क्लेस अशेष सद, बिन प्रयास मिट जाय।।१
तीन लोक के मांहि ना, श्रीगुरु सम दातार।
मौज मुक्ति दे शिष्य कूं, शीघ्र करहि भव पार।।२
गुरु पद परम पराग जो, सिर पर धरहि सु राग।
दुरित मिटै बहु जनम के, प्रगटे पूरण भाग।।३
गुरु परब्रह्म स्वरूप है, गुरु है सुख के धाम।
ऐसे दिन दयाल मम, श्री गुरु इश्वर राम।।४

।।छंद त्रिभंगी।।
श्री सदगुरु देवा, अलख अभेवा, रहित अवेवा, अधिकारी।
गावत श्रुति संता, अमल अनंता, सबगुनवंता, दुखहारी।
तजि के अभिमाना, धरही ध्याना, कोउ सयाना, रतिधारी।
जय इश्वर रामं, ब्रह्म विरामं, अति अभिरामं, सुखकारी।।१

जीवन कुं तारन, बंधन हारन, द्वंद निवारन, मन जानी।
धारी नर रूपं, अती अनूपं, श्रेष्ठ स्वरूपं वरमानी।
मुक्ति के दाता, भव भय त्राता, निज पद राता, जिय जानी।
जय इश्वर रामं, ब्रह्म विरामं, अति अभिरामं, निरमानी।।२

महि मांहि हमेशं, रहि अकलेशं, शुभ उपदेशं, बहु करही।
सरनं जो आवै, वर फल पावै, शोक न आवै, भ्रम हरही।
अपनी मृदु बानी, परम प्रमानी, निगम समानी, उच्चरही।
जय इश्वर रामं, ब्रह्म विरामं, अति अभिरामं, विस्तरही।।३

सुभ गुन के सागर, ग्यान उजागर, अनुभव आगर, उर जामी।
संसृति कुं टारे, ताप निवारे, सब अघ जारे, जन स्वामी।
अविधा के नासक, परम उपासक, बोध प्रकाशक, गुन ग्रामी।
जय इश्वर रामं, ब्रह्म विरामं, अति अभिरामं, निहकामी।।४

गुरु परम कृपाला, शंशय टाल़ा, करै निहाला ततकाला।
जोरि जुग पानं, जायो दानं, तव पद ध्यानं, सुख आला।
मेटहु मम कामं, गुरु सुख धामं, कह वली रामं, तव बाला।
करुना के सिंधु, दीनन बंधू, तव पद वंदू धर भाला।।५

।।छप्पय।।
कच्छ देस के मांय, जन्म जिन धारन कीन्हौ।
मौ सम अधम अनंत, जंतु कूं अभय सु दीन्हौ।
भव जलधि के बीच, बोध.की नाव फैलावै।
बैठे ता में आय, ताहि कूं पार लगावै।
अस कृपा करन भव भय हरन, श्रीगुरु इश्वररामजी।
तव ध्यान सदा वली उर बसे, एहि विनय अभिरामजी।।१

उर धर पर उपकार, पार भव तें बहु कीन्है।
त्रिविध ताप संताप, काटि चरनन में लीन्है।
कर आतम उपदेस, द्वैष क्लैशादिक हारै।
कलिमल दल खल प्रबल, कुटिल पल बिच निवारै।
जग खेद सकल भ्रम भेद जिन, मेटै दैसिक म्हेर कर।
तिहि विमल जुगल पद कमल सद, वंदू जुगल कर जोड़ कर।।२

सहज समाधि बीच, लीन भइ जाकि वृत्ति।
मेट्यौ द्वैत प्रपंच, रंच या को न प्रवृत्ति।।
उर शीतल सम द्रष्टि, सृष्टि सब ब्रह्म ही देखे।
राव रंक द्विज श्वपच, भाव.दूजा नहि पेखे।।
जन.कोउ करै पूजा पुनि, कठिन बचन बहु भाखही।
नहि उपजै ताको तोष पुनि, रोष न मन बिच राखही।।३

।।दोहा।।
शुभगुन सदन कृपायतन, सदगुरु सब सुखराश।
अभय दान मोहि दीजिए, जानि आपनो दास।।१
महा ललित गुरु चरन रज, मल मंजन मन हारि।
भंजन भव रंजन सुजन, अंजन सब अघहारि।।२
श्री गुरु की महिमा अमित, शेष लहै ना पार।
सो कैसे मैं कहि सकों, अति मतिमंद गँवार।।३
ता तें मन वच काय कर, करहु सदा प्रणाम।
धरहु ध्यान दिन रैन तव, श्री गुरु इश्वर राम।।४
निज शरणागत जानि जन, मेटहु विषम अध्यास।
जीव चराचर सरब में, पेखों तुम्हरौ वास।।५
वली राम पर अब कृपा, कीजै गरिब नवाज।
मेटहु विषम भवांबुधि, देहु ग्यान को साज।६
आन उपाधि छोड़ि के, चित तें तजि अहमेव।
तुम्हरौ जस समरौ सदा, जय जय जय गुरुदेव।।७
हरि गुरु अरु संत में, नहि अंतर लवलेश।
द्वैत द्रष्टि तातें तजी, वंदहु ताहि हमेश।।८
विविध रीत कवि जनन की, तो किन मोहि संभाल।
छंद वर्ण के दोष कूं, क्षमहुँ गुरू दयाल।९
वेद विषय निधि शशी संवत, श्रावन मास मोझार।
गुरु स्तुति कीनी सरन गुरू, सुद अष्टमी भृगुवार।।

~~देवी दान देथा (बाबिया कच्छ)

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