महाकवि हिंगलाज दान कविया

HinglajdanKaviyaहिंगलाज दान कविया सेवापुरा के रामप्रताप जी कविया के दो पुत्रो में ज्येष्ठ थे। उनका जन्म माघ शुक्ला १३ शनिवार सम्वत १९२४ को सेवापुरा में हुआ था। तब उनके दादा नाहर जी कविया विद्यमान थे और उन्ही से इन्होने अपनी आरंभिक शिक्षा पाई। जब वे साढ़े तीन वर्ष के थे तो पिता बारहठ रामप्रताप कविया ने उन्हें बांडी नदी के बहते हुए जल में खड़ा करके जिव्हा पर सरस्वती मन्त्र लिख दिया था। बांडी सेवापुरा के पास हो कर ही बहती है और इस में बरसात में ही पानी आता है। बहता पानी निर्मल गंगा की तरह ही पावन माना जाता है। बांडी नदी के प्रवाह के प्रति भावना व आस्था के साथ पिता ने जो मन्त्र दिया, उसने अपना चमत्कारिक प्रभाव दिखाया। पांच वर्ष की अल्पायु में ही हिंगलाज दान की कवित्व-शक्ति प्रस्फुटित हो गयी और अपनी विलक्षण स्मरण शक्ति तथा वंशानुगत संस्कारों के फलस्वरूप वे डिंगल के सर्वश्रेष्ठ महाकवि के रूप में प्रतिष्ठित और मान्य हुए। डिंगल व पिंगल के विद्वान होने के साथ ये संस्कृत के भी उदभट पंडित थे। उन्हें अमरकोष पुरा कंठस्थ था।

स्मरण शक्ति तो ऐसी थी कि दोहा सोरठा जैसे छन्द एक बार सुन लेने पर ही याद हो जाते थे। छप्पय, कवित्त और सवैये जैसे छंद भी दो बार सुन लेने के बाद वे अक्षरशः सुना देते थे। डिंगल का बड़े से बड़ा व कठिन से कठिन छंद तीन बार सुन लेने पर उन्हें याद हो जाता था। किसी गीत को लय के साथ पांच बार सुना देने पर उसे वे विपरीत क्रम में दोहरा देते थे। हिंगलाज दान जी बड़ी गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे, कभी कोई शेखी नही बघारते थे किन्तु एक प्रसंग में उन्होंने कह ही दिया कि उन्हें पूरा अमरकोष कंठस्थ है। कवि-शब्दकोश ‘मानमंजरी’ के चार सो दोहे भी उन्हें कंठस्थ ही नही थे बल्कि वे प्रत्येक शब्द का यथोचित उपयोग भी जानते थे।

राजस्थान पत्रिका के वयोवृद्ध स्तंभकार राजेंद्र परिक जी (नगर परिक्रमा इनका स्तम्भ था) ने एक अनुभव लिखा है, उन्ही की भाषा में –
कोई चोपन वर्ष (यह लेख शायद १५ – २० वर्ष पुराना है)पुराणी बात होगी, सोलह वर्ष का मै दीपावली की धोक देने के लिए जयपुर के साहित्य मनीषी पुरोहित हरिनारायण शर्मा बी.ए. विद्याभूषण के पास गया था। मै जब पहुंचा तो एक नाटे कद के वयोवृद्ध सज्जन, जिनकी पगड़ी और अंगरखे का लिबास उनको पुराणपंथी जता रहा था, पुरोहित जी से विदा लेकर वहां से जा रहे थे और पुरोहित जी, जो उन सज्जन से कद में लगभग डेढ़ नही तो सवाये अवश्य थे, अपनी झुकी कमर के साथ उठ खड़े हुए थे और बड़े आत्मीय भाव से उनके साथ द्वार तक जाकर उन्हें विदा कर रहे थे। जब वे चले गये और पुरोहित जी अपने स्थान पर लोट आये तो मेरी और देख कर पूछने लगे “भाया थे आने जाणो छो ज्यो अबार अबार गया छे ?” मैंने गर्दन हिलाकर ना में जवाब दिया, पुरोहित जी ने दूसरा प्रश्न किया “थे मैथलीशरण गुप्त ने जाणो छो ?” मैंने हाँ में उत्तर दिया तो पुरोहित जी ने कहा “ये जो गया वै मैथलीशरण गुप्त सूं इक्कीस छे, उन्नीस कोनै। बहुत बड़ा कवी छे ये हिंगलाज दान जी कविया”

१९४५ ई. में हरिनारायण जी पुरोहित का निधन हुआ तो उन का श्रधांजलि अंक पारिक जी ने निकाला व हिंगलाज दान जी को अपने परम मित्र के लिए काव्यांजलि लिख कर भेजने का निवेदन किया। उन्होंने जो मरसिया लिख भेजा वो इस प्रकार है :

इग्यारस सुकल मंगसर वाली, दो हजार पर संवत दुवो।
इण दिन नाम सुमरि नारायण, हरिनारायण सांत हुवो।।
परम प्रवीण पिरोंथा भूषण, विधा भूषण वृद्ध वयो।
भगवत भगत उर्जागर भारथ, गुणसागर सुरलोक गयो।।
करि मृत लोक जोखा कान्थडियो, घट छट कायो तीकण घडी।
पुहप झड़ी लागी सुरपुर में, पुर जयपुर में कसर पड़ी।।
भायां ज्यूँ मिलतो बडभागी, घरी आयां करि कोड घनै।
मिलसी हमें सुपने रै मांही, तनय मना पारिक तणे।।
हाय पिरोथ, अदरसण ऊगो, हाथां पाय सपरसण हार।
जुनू मित्र सुरगपुर जातां, सूनो सो लागे संसार।।

मरसिया क्या है, कवि ने अपने प्रिय मित्र के विछोह पर अपना हृदय ही उड़ेल कर रख दिया है। भायां ज्यूँ मिलतो बड भागी, घरि आयां करि कोड घणो और जूनो मित्र सुरगपुर जातां, सुनो सो लगे संसार, मार्मिक शोकोद्गार हैं। ‘पहुप झड़ी लागी सुरपुर में, पुर जयपुर में कसर पडी’ ने रिक्तता का आभास करा दिया।

इन की रचनाओं में ‘मेहाई महिमा’, ‘मृगया-मृगेंद्र’, ‘आखेट अपजस’, ‘दुर्गा बहतरी’ व फुटकर गीत व कवित्त जिन में कुछ प्रकाशित व अप्रकाशित है।

मृगया-मृगेंद्र कथा यूँ चलती है – शंकर के शाप से मृत्यु लोक में उत्पन्न मृगराज ने विन्ध्याचल की पर्वत श्रेणी में बड़ा आतंक मचाया और पहाड़ी मार्गो को अवरुद्ध कर दिया। हाडोती के हाडो में कोई ऐसा नही था जो उसका वध करने का साहस दिखाता। वह अपनी सिहनी के साथ घूमता घामता मारवाड़ के कुचामन के पहाड़ की और आ निकला और वहां एक कन्दरा में रहने लगा। तब कुचामन के ठाकुर केशरी सिंह थे व उनका कुंवर शेर सिंह बड़ा पराक्रमी वीर था। यहाँ कवि ने कुचामन नगर का सोंदर्य, वहां के निवासियों और हाथी घोड़ों-ऊँटो आदि का बड़ा सजीव वर्णन किया है। कुंवर शेर सिंह को जब इस सिंह के आने की खबर मिली तो उन्होंने इसके शिकार की तैयारी की। वन में जाकर उन्होंने सिंह को हकाला (चुनोती दी)। सिंह निकलकर आया और शेर सिंह ने उसे अपनी तलवार से ही धराशायी कर दिया।

आखेट का वर्णन बड़ा ही रोचक व सजीव है। भाषा पर हिंगलाज दान जी का पूर्ण अधिकार था। कुंवर शेर सिंह व उनका शिकारी दल जब निकट आ जाता है तो ‘गजां गाह्णी नाह सूतो जगायो’, सिंहनी अपने सोते हुये नाथ को जगाती है –

सती रा पती ऊठ रै काय सोवे, जमी रा धणी ताहरी राह जोवे !
बजे सिंधु वो राग फोजां बकारै, थई थाटरां पेर चोफेर थारे !!
दलां भंजणा, ऊठ जोधा दकालै, घणा रोस हूँ मो सरां हाथ घालै !
अडिबा खड़े दूर हूँ सूर आया, जुड़ेबा कीसुं जेज लंकाल जाया !!
हे सती के पति ! हे मृगराज नीद से उठो सो क्यों रहे हो। ये देखो इस जमीन के धणी, जमीन के मालिक तुम्हारी राह देख रहे हैं। सिंन्धू राग बज रहा है, फोज युद्ध घोष कर रही है। सेना ने तुम्हे चोतरफ़ से घेर लिया है। हे दल भन्जन ! उठो ये योद्धा तुमे ललकार रहे है। बड़े क्रोधित हो ये हमारे सिरों पर हाथ ड़ाल रहे है। ये सूर सिंह अड़ कर खड़ा है। हे योद्धा इन से भीड़ में देर कैसी।

बरूंथा गजां गंजणी एम बोली, खुजाते भुजा डाकि ये आँख खोली !
द्रगां देख सुंडाल झंडा दकुला, प्रलय काळ रूपी हुवो झाल पूलां !
करे पूंछ आछोट गुंजार किधि, बाड़ेबा अड़े आभ हूँ झंप लिधि !
सिंहनी से यह सब सुन कर सिंह कुपित होता है, भुजा को खुजाते हुए सिंह ने आँख खोली। गुस्से में भरकर पूंछ को सीधी कर गर्जना की और जैसे आसमन में अडना है वैसे छलांग लगा दी।

फिर सिंह को देख कर शेर सिंह अपनी तलवार लेकर उस पर झपटे, शेर से शेर भिड गया। इस द्वंद का रोमांचक दृश्य है –

लखे सेर नू सेर केवाण लीनी, भुंवारां भिड़ी मोसरां रोस भीनी !
कह्यो साथ नु लोह छुटो न कीजे, लडाई उभै सेर की देख लीजै !!

सिंह के शिकार के बाद सिंहनी का भी शिकार किया गया। कवि की कल्पना देखते ही बनती है। –

सती सिंघणी पोढ़ीयो पेट स्वामी, बणी संग सहगामिणी अंग बामी !
सताबी तजे मद्र रा छुद्र सैला, गया दम्पति अद्र कैलास गेलाँ !!

इस प्रकार मृत्यु लोक में अपना शापित जीवन समाप्त कर सिंह दम्पति पुन: कैलास पर चले गये।


Reference: उपरोक्त सामग्री श्रीमान मदन सिंह जी शेखावत “झाझड” के ब्लॉग से ली गयी है| ओरिजिनल ब्लॉग पढने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें|


महाकवि हिंगलाज दान जी कविया द्वारा रचित चिरजा / छंद श्री सुरेन्द्र सिंह जी रतनू के स्वर में:
श्री करणी जय जयति सकत्ती
स्तुति जगदम्बा की - नमामि मात इंदिरा
महाकवि हिंगलाजदान जी कविया द्वारा लिखी अथवा उनसे सम्बंधित रचनाओं व संस्मरणों के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं| पढने के लिए नीचे शीर्षक पर क्लिक करें|

“देहावसान कविया हिंगऴाजदानजी का”

हिंगऴाजदानजी को माँ भगवती श्रीकरणीजी व इंन्द्रबाईसा का बड़ा इष्ट था। वे अपने जीवन में देशनोक व श्रीमढ खुड़द कई बार दर्शनार्थ जाते रहते थे तथा सुदुर बलुचिस्थान में माताजी श्री हिंगऴाज की तीर्थयात्रा भी करली थी। ई.सन 1948 में अपने देहावसान से कुछ माह पूर्व भी वे देशनोक गए थे तथा इस यात्रा में उन्है परम संतोष व सुखानुभूति हुई थी। भगवती ने उनको दर्शन देकर कृतार्थ कर दिया था। उनकी अंतिम यात्रा में श्वेत काबी का दर्शन माँसा श्रीकरनीजी की मूर्ति के पास में हुए थे तब उन्होने इस यात्रा को सफल माना था।

इस यात्रा के कुछ समय पश्चात उनहोनें श्रीमढ खुड़द धाम के दर्शन का विचार करके वहां पहुंच गए तथा बड़े भावावेश के साथ वंहां दर्शन आरती जोत आदि देखने के पश्चात वहीं पर भगवती इन्द्रबाईसा के दर्शन किए व उनसे आज्ञा चाही तथा बाहर की प्रधान प्रौऴ मे बैठ कर वहीं पर वैशाख कृष्णा नवमीं संवत 2005 में 81 वर्ष की परिपक्व आयु में डिंगऴ साहित के इस महारथी ने अपने शरीर रूपी रथ को छोङ दिया और प्राण विसर्जन कर दिया। उनके जैसे शुध्दात्मा आस्थावान साधक के लिए इस प्रकार की उच्च कोटि की मृत्यु-वरण से अधिक उपयुक्त स्थान और समय क्या होता!

उनका जीवन धन्य हो गया उनकी कीर्ति अमर हो गई। उन्होनें अपने जीवनमें सदैव अन्याय का प्रतिकार किया निर्बलों की मदद को हमेशा ही तत्पर रहे जीवन भर मुकदमें लडे और वह भी गरीबों के हक में। अन्यायी को उसके सन्मुख ही प्रताड़ित करने में कभी भी कौताही नहीं की। तत्कालीन समय के राजन्यवर्ग में उनका बङा सम्मान था। सही मायने में उनका जीवन सफल जीवन था। चारण समाज के लिए विपुल साहित सृजन कर छोड़ दिया जो आज धरोहर के रूप में विद्यमान है।

उनके देहावसानपर उनही के अनुज मुरारीदान जी के पुत्र पाबूदानजी का कहा मरसिया!!

!!कवित्त!!
अस्त भयो चारण सजातिय को अर्कहाहा,
सुकवि समाज के हिये में शोक भरगो!
सूख गयो साहित्यिक सुन्दर समुद्र सही,
विद्या छंद मन्दभाग अक्खर उघरगो!
दोहजार पांच के बैसाख बदी नौमी को,
मंजु काव्य-पुंज पै विधाता कोप करगो!
डिंगऴ व पिंगऴ प्रवीन कवि हिंगऴाज,
आज सुरराज गेह देखो डोकरो डिगरगो!!!!

~~राजेंन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर
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पिछली शदी के उत्तरार्द्ध व इस शदी के पूर्वार्द्ध के शिखर कवि श्रद्धेय हिंगलाज दानजी कविया सेवापुरा को मेरा सादर नमन !!

!!कवित्त!!
कविया हिंगलाज !सदी को शिखर पुरुष,
कवि सिरताज जाको सेवापुरा धाम है !!
उक्ति अनुपम वहा !जुक्ति को बखानू कहा,
शब्द को घड़ैया अहो दुनि सरनाम है !!
सुरवाणी मरूवाणी उर्दू पिंगल में पटू,
ग्रंथन को गूढ कोश सुनी बात आम है !!
अलू को वंशज अंशज कवि सागर को,
गुन आगर को कवि गीध का प्रणाम है !!

~~गिरधरदान रतनू दासौङी (बीकानेर)

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