इण घर आई रीत!!

रजवट रै रुखाल़ै गोपाल़दासजी चांपावत रै वंशजां रो ठिकाणो हरसोल़ाव। इण ठिकाणै में महावीर बलूजी री वंश परंपरा। इण परंपरा नै पाल़णिया कई आंकधारी अर अखाड़ाजीत नर रत्न हुया, जिणां आपरै पुरखां री कीरत आपरी वीरत रै पाण कदीमी कायम राखी।

इणी ठिकाणै रै छुट भाइयां में महाराजा मानस़िहजी री बखत करणसिंहजी चांपावत(सालावास) आपरी आदू रीत अर तरवार सूं प्रीत पाल़णिया राजपूत हुया। जद महाराजा भीमसिंहजी अर मानसिंहजी रै बिचाल़ै साकदड़ा नामक स्थान माथै लड़ाई हुई, उणमें करणसिंहजी, मानसिंहजी रै कानी सूं लड़तां थकां आपरो सामधरम अर वीरता बताई। जद भीमसिंहजी रै सुरगवास पछै मानसिंहजी जोधपुर री गादी विराजिया उण बखत मारवाड़ रै केई ठाकुरां भीमसिंहजी रै बणावटी बेटे धोंकल़सिंह रो कूड़ो नाटक रचियो। इण ठाकुरां रा मुख्या सवाईसिंहजी पोकरण हा। महाराजा नै लोगां भिड़ाया कै सवाईसिंह जी रै प्रभाव सूं करणसिंहजी ओ जाल़ गूंथण में भेल़ा है। कैताणो है कै राजा कानां रा काचा हुवै-

राजा जोगी अगन जल़, आंरी उलटी रीत।
डरता रैज्यो फरस रा, (ऐ)थोड़ी पाल़ै प्रीत।।

इण बात सूं खीझ’र मानसिंहजी सालावास जब्त करली अर करणसिंहजी नै आपरी हवेली में नजरबंद कर दिया।

एक दिन करणसिंहजी आपरी हवेली री छात माथै किन्नी उडावै हा उण बखत जोग सूं मानसिंहजी री सवारी कन्नै कर निकल़ रैयी ही। दरबार री नजर किन्नी उडावतां करणसिंहजी माथै पड़ी तो उण करणसिंहजी नै सुणाय’र एक दूहो कह्यो-

पिंड री गी प्रतीत, गाढ जमी दोनूं गया।
चांपा हमे नचीत, किनक उडावो करणसी!!
अर्थात हे करणसिंह! थैं थारो विस्वास, गाढ अर जमी सगल़ा गमा दिया, ऐड़ै में हमे थारै कनै नेठाव सूं पतंग उडावण रै टाल़ कीं दूजो काम नीं बचियो है!

आ बात करणसिंहजी रै काल़जै खुबगी पण धणी रो धणी कुण? जोग सूं उणांरी हवेली भदोरा रा सांदू गिरवर दानजी मिलण आयग्या। करणसिंहजी, उणां नै दरबार वाल़ी बात बताई अर निवेदन कियो कै “बाजीसा रजपूती करण लायक कोई मारग बतावो? इणगत तो म्है को मरियै में न को जीवतै मे!”

गिरवरदानजी कह्यो कै “अबकै कदै जोग बणै तो म्है एक दूहो लिखर दूं जिको सुणा दिया”-

पिंड री हुती प्रतीत, (पा.पिंडां होती प्रीत)
साकदड़ै देखी सही।
इण घर आई रीत,
दुरगो ई सफरा दागियो।।
अर्थात म्हारो विस्वास अर समर्पण आप आपरी नजरां सूं साकदड़ै में देख्यो हो अर पतियायो ई हो! पण आपरै घर री तो रीत ई सामधरमी नै दंड देवण री है। इणी कारण तो दुर्गादास रो दाग मारवाड़ में नीं हुयर सफरा रै किनारै हुयो हो!!

जोग सूं पांचै-दसै मानसिंहजी भल़ै उठीकर निकल़िया अर कह्यो-

…..कनक उडावो करणसी।

करणसिंहजी अजेज ऊंची आवाज में दूहो पढियो-

…. दुरगो ई सफरा दागियो।

बात चालै कै दूहै रो ओ असर हुयो कै दूजै ई दिन सालावास बहाल हुयग्यो।

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

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