महात्मा ईसरदासजी री महिमा रा सोरठा – शुभकरण जी देवऴ (कूंपड़ास)

सिध्द संत महात्मा ईसरदासजी री महिमा में शुभकरण जी देवऴ कूंपड़ास रचित सुंन्दर सोरठा। देवऴ साहब ने महात्मा श्री रा जीवन रौ सगऴो सार मात्र नो सोरठां में ही समाहित कर दियो है, कवि री मेधा प्रज्ञा ने धन्य है। आखरी सोरठे में आपरी औऴखाण में महात्मा माधव दास जी दधवाड़िया रो उल्लेख कर काव्य री कमनीयता ने द्विगुणित कर दी है।

महात्मा ईसरदासजी व माधवदासजी को शत शत नमन और शुभजी देवल को सादर प्रणाम।

मालाणी धर मांयने, भल सांसण भाद्रेस।
जिथ सूरै घर जनमियो, (उण) ईसर ने आदेस।।

ज्वाला गिरी जोगी जबर, गिर हिम निज तन गाऴ।
सुत जनम्यौ सूरा घरै, भगतां रो भूपाऴ।।

कज हरि तो हरिरस कथ्यौ, देवी कज देवियाण।
सुंण कुंडऴियां संचरै, सूरापण सुभियांण।।

मिस निंदा अस्तुति मुणी, वऴ कथ गुण वैराट।
ईसर इण विध अलखरा, ठाह्या भगती ठाट।।

कांबऴ हिक हिज कारणै, पड़्यां प्रेम रे पास।
सांगौ सुदतारां सिरै, दाख्यौ ईसर दास।।

परण्यां पहलां परहर्या, सरवैया रा सास।
जम सूं तद रण जीतियो, दाटक ईसर दास।।

वित्त हीणां रो वाहरू, इधकौ पूरण आस।
उभै वार अंगेजियौ, बंदी गृह तण बास।।

श्रेय प्रेय बिंहूं साधिया, पाया क्रोड़ पसाव।
भल मुगती पद भेंटियौ, भगती पथ रै भाव।।

हूँ पोतौ माधव हरौ, अरजी आखूँ ऐह।
“आपै” सद् बुध “ईसरा”, (म्हारौ)जनम सफल कर जेह।।

आज संयोगवश जूनी जागां राखियोड़ी पोथियां रा पानड़िया फिरोऴतां ए सोनल आखरां मांडियोड़ा सोरठा निंगैह आया तो आपरी निजरां पहुंचाय नेहचौ आवियो।।

~~राजेन्द्रसिंह कविया (संतोषपुरा – सीकर)

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