जद छूटै जालोर!

दूहा लोहा सरिस दुहुं, वडौ भेद इक एह।
दूहो वेधै चित्त नै, लोहा भेदे देह।।

यानी दोहा अर लोहा री मार एक सरीखी। एक चित्त नै वेधै तो दूजो देह नै। पण लोह तो हरएक रै घाव कर सकै पण दूहो फखत समझै उणनै ईज सालै। इतिहास में ऐड़ा अनेकूं दाखला मिलै कै दूहे इतिहास बदल़ दियो। लोगां री दिनचर्या बदल़दी।

जद ई तो आईदानजी कविया लिखै-

बानी के असर ही ते शुद्ध होत वीर जात,
बानी के असर नर कायर व्है गारती।

यानी कायर नै वीर अर वीर नै सधीर ओ दूहो ई बणावै। इण पेटे यूं तो घणा दाखला चावा है पण ऐड़ो ई एक दाखलो महाराजा मानसिंहजी जोधपुर सूं संबंधित सर्वविदित है।

उणां सूं संबंधित एक दूहो घणो चावो है…जद छूटै जालोर!

ओ दूहो घणै लोगां रै दांई म्हैं ई महाराजा मानसिंहजी रचित ई मानतो पण धीरै-धीरै ज्यूं-ज्यूं समझ बधी अर समझ रै साथै संपर्क बधिया त्यूं-त्यूं केई बातां नवी मालूम हुई। उणां मांय सूं एक बात आ ई भेल़ी है कै ओ दूहो मानसिंहजी रचित नीं हुय’र साहिबोजी(साहिबदानजी) सुरताणिया रो है।

साहिबोजी री पढण री बाण अर उक्ति चातुर्य माथै सटीक टिप्पणी करतां भक्तकवि ओपाजी आढा लिख्यो कै –
“हे साहिबा! थारो गलवो तो ऐड़ो मीठो है कै एक’र सुणियां पछै तो उणरै आगै चीणी ई फीकी लागै–

वड कव थारी बांण, सांभल़िये सुरताणिया।
ज्यां लागै घण जाण, साकर मोल़ी साहिबा।।

आपां महाराजा मानसिंहजी रो संवेदनावां सूं परिपूर्ण ओ गीत घणो सुणां-

ठौड़ ठौड़ त्रंबक ठहठहिया,
भड़ थहिया पग रोप भव।
वाल्ही लाज तजै के वहिया,
सतरै जद रहिया सकवं।।

ऐ साच री आरसी बतावता आखर महाराजा मानसिंहजी उण बखत कह्या जद वै घोर विपत्त में हा। मानसिंहजी लिख्यो कै जद च्यारां कानी जुद्ध रा नगारा घुरिया, तोफां रा हबीड़ बाजिया तो केई सिरदार वाल्ही लाज नै त्याग बांठां पग दिया पण उण विपत्त री घड़ी में म्हारो साथ फखत सतरै चारणां नीं छोडियो।

महाराजा मानसिंहजी लिखै-

आभड़ियो आरंभ, धमगजर कल़ै धरा रो।
वल़ च्यारूं हकबकी, कल़ह माचियो करारो।
परतीतां पाल़टै, धरै केता घण धाई।
घूमर अरियां घरै, जोधपुर बंटै बधाई।
आसरो जल़ंधरनाथ इक, भुजां भरोसै भूप रै।
उण बार हाजर रह्या उठै, ऐ गढवी गढ ऊपरै।।

सुध जुगतो वणसूर, पीथलो हरियंद सांदू।
बारठ भैरूंदान, दान ऊमो वड नांदू।
ईंदो कुशल़ो मेघ, मयारामो रतनू रंग।
एक पनो आसियो, नवल लाल़स कवियो नग।
गाडण भोप खिड़िया उभै, केहर साहब कारणां।
जोधाण किलै पायो सुजस, चौड़ै एतै चारणां।।

नवकोटी मारवाड़ रै धणी ऐ आखर उण चारण कवेसरां रै सम्मान में कह्या थका है जिकै जालोर रै घेरे में मानसिंहजी रै साथै फखत उणांरी गुणग्राहकता अर मिनखपणै रै कारण रह्या।

क्यूंकै उण दिनां मानसिंहजी कनै खुद री आजीविका चलावण रा ई पुख्ता साधन नीं हा। पछै दातारगी री बात ई सोचणी थोड़ी अटपटी लागै। पण मानसिंहजी रो मन मोटो अर सनातनी संबंधां रा साकार रूप हा सो केई कवेसर इणां रै गुढै रैवता।

जद जोधपुर रा राजा अर मानसिंहजी रा काकाई भाई भीमसिंहजी जालोर नै च्यारां कानी सूं घेरा दियो। ऐड़ै में थित रो काम चलावणो घणो अबखो हुयग्यो। उण बखत कोटड़ा रा वणसूर तेजोजी रा सपूत जुगतीदानजी आपरै मोभी जैतजी री बहू रो गैणो ले जाय मानसिंहजी नै दे दियो। इतै सूं ई काम नीं चाल्यो, जणै उणां आपरै छोटै बेटे भैरजी नै भाडखा महंतजी रै अडाणै राख बदल़ै में जिकी रकम मिली वा ई मानसिंहजी नै सूंप दीनी। उण बखत जैसल़मेर महारावल़ गजसिंहजी ई सिरुवा रा रतनू मयारामजी साथै स्वर्णमुद्रावां मेली ही।

आ बात साव साफ है कै भीमसिंहजी क्रूर शासक हा। उणांमें दया-हया कीं नीं ही। उणां आपरै काका शेरसिंह, फतेहसिंह आद नै कुटल़ता सूं मरा दिया हा अर काकै जालमसिंह रो पख लेवण सारू मानसिंहजी माथै ई कुठागरी राखता। वै कैता कै –
“ओ काल़ियो(मानसिंहजी कृष्ण रंग के थे) बचग्यो। इणनै ई मारणो है।”

पण मारणहार सूं बचावणहार मोटो हुवै। यानी जठै च्यारभुजा री कलम चलै उठै दो भुजावां कांई करै?-

दाटण सगती नह दूजा,
च्यारभुजा री कलम चली।

इणी क्रूरता रै पाण ई भीमसिंहजी आपरै सेनानायक अखेराज सिंघवी नै जालोर माथै मेलियो। इण सेनानायक जालोर में इतरी तडी मचाई कै प्रजा घणीकरीक डरती दुर्ग में बड़गी।

मानसिंहजी ई नितरी राड़ सूं आंती आयग्या सो उवां जाल़ोर छोडण रो मन बणा लियो अर आपरै साथ नै भेल़ो कर’र आपरी मंशा बताई। घणकराक सरदार त्यार हुयग्या अर गढ खाली करण री त्यारी करण लागा। उण बखत उठै ई साहिबोजी सुरताणिया जिकै जनम सूं प्रज्ञाचक्षु हा, एकांत में माल़ा फेरे हा। साहिबोजी नै जाय किणी बतायो कै मानसिंहजी गढ खाली करण री तेवड़ली। उण बखत उवै माल़ा एकै पाखती राख’र उठिया अर मानसिंहजी कनै आय एक दूहो कह्यो कै –

आभ फटै धर ऊलटै, कटै बखतरां कोर। 
तूटै सिर धड़ तड़फड़ै, जद छूटै जालोर।।

यानी जालोर इयां पाधरियां में कीकर छूटै ? जालोर तो जद छूटसी तद आभो फाट जासी, धरती भी उलट जासी यानी कोई प्राकृतिक विपदा आ पड़ेली या पछै जुद्ध मंडैलो अर आपांरा माथा अरियां री तरवारां सूं कट आगा पड़ैला अर मुंडविहीन धड़ां पड़ी तड़फड़ैला उण बखत जालोर आपै ई छूट जावैला!! पछै जालोर छोडण री इतरी कांई खतावल़ है। ?”

दूहै रा आखर सुणतां ई मानसिंहजी रो डगमगतो आत्मविश्वास इयां वापरग्यो जाणै बुझतै दीये में किणी घी घातियो हुवै। इयां आ बात ई चावी है कै मानसिंहजी जालोर घेरे में आं साहिबोजी सूं ई डिंगल़ रो अभ्यास कियो हो।

मानसिंहजी उणी बखत भीमसिंहजी नै ओ दूहो लिख मेलियो।

भीमसिंहजी ई लारो नीं छोडियो उणां लगोलग जालोर रो घेरो राखियो अर आपरै सेनानायक इंदराज सिंघवी नै मेलियो। सेना घणो बिगाड़ कियो। मानसिंहजी दिलगीर हुयग्या अर एक’र पाछो जालोर छोडण रो मानस बणा लियो। पण उण बखत ई केसरोजी खिड़िया कह्यो कै – “हुकम म्हनै चाल़राय रो सुपनै में संदेश मिलियो है कै आप इणी साठ रै साल दीपावल़ी रै दिन जोधपुर पावोला। आप नै जालोर छोडण री सोचणी ई नीं चाहीजै।”

उल्लेखजोग है कै केसरोजी अर उणां रा स्वगोती भाई साहिबोजी खिड़िया ई उण सतरै कवेसरां में भेल़ा हा जिकै मानसिंहजी रै दुख-दरद रा साझीदार हा। केसरोजी माथै मानसिंहजी रा दादा अर जोधपुर रा धणी विजयसिंहजी री घणी मेहरबानी ही। उणां रो एक गीत विजयसिंहजी री वीरता विषयक घणो चावो है–

चमू मेल़ गज चढै विजसाह ढुल़तै चमर,
तेगधर जोधहर जबर तालै।
त्रंबाटां गजर दे फजर मौसर तरै,
हलकधर असुर धर अंबर हालै।।

जद केसरोजी मानसिंहजी नै गीत सुणावतां कह्यो कै–

घणा कहै लोक जाल़ोर गढ घेरसी,
धीर रो नितो नित बखत धासी।
नखत पत बांकड़ो अठा रो नरेसर,
अड़ीखंभ जोधपुर तखत आसी।।

चीत री फल़ावट चाल़राया चवै,
गीत री फल़ावट कवी गावै।
‘केसरो’ मान महाराज रै करां सूं,
पात गज गांम रो कुरब पावै।।

इण सतोलै आखरां माथै मानसिंहजी नै धीजो आयो अर उणां इंदराज सिंघवी नै वि.सं.1860 सावण सुद 7 रै दिन कैवायो कै –
“म्हांनै दीयाल़ी तांई अठै रैवण दिया जावै पछै गढ खाली कर दियो जासी।”

जोग ऐड़ो बणियो कै गीत री भविष्यवाणी मुजब भीमसिंहजी रोगग्रस्त हुय’र सुरगवासी बणिया अर मानसिंहजी जोधपुर री गादी बैठा।

गादी बैठतां ई उणां आपरी अबखी रै भीरू लगटगै सगल़ै लोगां री पूगती मदत कर’र आपरी संवेदना री ओल़खाण दी।
थोड़ै दिनां पछै ई जोग ऐड़ो बणियो कै पोकरण ठाकुर सवाईसिंहजी जयपुर महाराजा री मदत ले जोधपुर किलो घेर लियो। साहिबोजी रा संबंध सवाईसिंहजी सूं मधुर हा सो उवै उणां रै खेमे में गया परा। आ बात जद दरबार नै मालूम हुई तो उवै घणा बेराजी हुया।

उण लड़ाई में पोकरण ठाकुरां री पार नीं पड़ी। जद साहिबोजी आऊवा ठाकुर बखतावरसिंहजी कनै गया अर आपरो अपराध क्षमा करावण में मदत मांगी। ठाकुर मदत करी पण दरबार रै साम्हीं साहिबोजी नै लेय’र कीं हलकी बात कैयदी जिणसूं साहिबोजी अणूता रीसायग्या। उठै एक पल ई नीं ठंभिया अर ईडर नरेश गंभीरसिंह जी कनै गया परा।

मानसिंहजी आं री प्रज्ञा, प्रखरता अर साच कैवण री बाण सूं घणा प्रभावित हा सो ईडर संदेशो कराय’र पाछा बुला लिया।
महाराजा, सवाईसिंहजी रै रचिये तोतक सूं घणा अरूठ हा सो पठाण मीरखान री मदत लेय सवाईसिंहजी नै मरा दिया। आ बात जद साहिबोजी नै ठाह लागी तो उवै घणा दिलगीर हुया अर महाराजा रै रचिये जाल़ माथै अणेसो ई आयो। उण बखत किणी कवि कह्यो-

मींयै दीनी मीरखां, कमधां बीच कुराण।
रह्या भरोसै रांम रै, (नीतर)पड़ती खबर पठाण।।

पण साहिबोजी तो बिनां हाण-लाभ री चिंता कियां भरिये दरबार में एक सपाखरो गीत सुणायो। जिणमें खरै अर खारै आखरां में दरबार नै ओल़भो हो तो उणां रै ई इण आखरां री परिपुष्टि ही कै ‘सत्य वक्ता रू वचनसिद्ध।’

गीत रो एक-एक आखर कवि रै उकल़तै अंतस अर साच कैवण री आखड़ी रो प्रमाण है। 6 दूहालै रै उण उटीपै गीत रो एक अंश दाखलै सरूप–

लेखियो न सामध्रमो दगा सूं चलायो लोह,
उसरे ही रेखियो न चौड़ै दगां आन।
सवाई रो हत मारो खांवदे खीचियां साटै,
प्रथी सारी पेखियो ज तंबू रो प्रमान।।

ओ गीत सुण महाराजा फरमायो कै-
“आगै सूं अठै नीं देखणा चावूं।”

कवि उण बखत दरबार छोड पाछा ईडर गया परा।

गंभीरसिंहजी रै माथै साहिबोजी 300सौ कवत्त बणाया पण महाराजा कवि रै व्यक्तित्व मुजब कीं खास तूठा नीं। आ बात कवि नै अखरगी अर उणां महाराजा नै कह्यो कै –
“आप नीं तूठा ओ आपरो दोष नीं है, ओ म्हारै नसीब रो दोष है-

दिल धरियो विसवास, करी सेवा त्रण वरसां।
पारस नै परहरै, अवर पाखाण न परसां।
माल़ी घड़ा अपार, सदा सींचै जिम जाणै।
रुत आयां फल़ होय, सुण्या अगलै ऊखाणै।
ज्यूं जाण करी सेवा अठै, मम ऊणत अजहुं न मरी।
तुम दोष नहीं अणदेस-तण, निसचै बात नसीब री।।

साहिबोजी आपरी बखत रा नामी कवि अर साचड़िया मिनख हा।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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