जलंधरनाथ सुजस

।।दूहा।।
किणियागिर री किंदरां, वसै जऴंधर वास।
प्रतख जोगी पूरणो, आप जनां री आस।।1

दाऴद दासां दाटणो, उरड़ आपणो आथ।
जोगी रहै जाऴोर में, नमो जऴंधरनाथ।।2

जाहर जूनी जाऴियां, थाहर सिंघां थाट।
जिथियै नाथ जऴंधरी, हर हर खोली हाट।।3

सैखाऴै रू सोनगिर, जप-तप नगर जोधांण।
तापस रातै गिरँद त़ू, इथियै रहै अमांण।।4

रातै गिर सिर राजणो, रटणो हर हर हेर।
वाहर जाहर बाऴकां, दुरस करै नीं देर।।5

भीम दलो रु कान भण, सबऴो लाऴस साच।
ज्यां सिर नाथ जऴंधरी, आय दिया निज आच।।6

अपणाया निज आप कर, सेवग किया सनाथ।
वसुधा तिण दिन बाजियो, नमो चारणानाथ।।7

।।छंद – रूपमुकंद।।
बजियो धर चारणनाथ बडाऴिय,
रंग सदामत रीझ रखी।
सबऴै दलसाह रु भीमड़(भीमड़ै) सांप्रत,
आपरि कीरत कांन अखी।
तद तोड़िय दाऴद तूठ तिणां पर,
बात इऴा पर आज बहै।
जय नाथ जऴंधर जोगिय जाहर, राज रातैगिर थांन रहै।।
जिय राज रातै गिर वास रहै।।1

भल अंग भभूत सुसोभित भारण,
धारण ध्यांन धणी धजरो।
श्रवणां बिच कुंडऴ वेस सिंदूरिय,
आच कमंडऴ है अजरो।
जग कारण जोग जगावत जांणिय,
सांमियमोड़ समाज सहै।
जय नाथ जऴंधर जोगिय जाहर, राज रातैगिर थांन रहै।।2

अवधूत अलेखत नांमत आगऴ,
पांमत क्रांमत नाय पुणां।
गुरु गोरखनाथ गहीर गुणाढय,
सांझ मछंदर संग सुणां।
रमता कई सिद्ध धुणी तप रावऴ,
ग्यांन मुनेसर आय गहै।
जय नाथ जऴंधर जोगिय जाहर, राज रातैगिर थांन रहै।।3

समरत्थ सिधेसर आप तणी सत,
चाव उछाव चलै चरचा।
रँक राव किया अपिया द्रब राजस,
पेख सुभाव दिया परचा।
मरुदेश तप्यो हद मांन महीपत,
पाव तिहाऴिय ओट पहै।
जय नाथ जऴंधर जोगिय जाहर, राज रातैगिर थांन रहै।।4

वर आसण धार विछाय बघंबर,
ओढण अंबर गात अहो।
धुन धार जटेसर जापण धारण,
कारण जारण ताप कहो।
सज संतन काज सताब सुधारण,
थाट अपारण आप थहै।
जय नाथ जऴंधर जोगिय जाहर, राज रातै गिर थांन रहै।।5

किणियागिर पाट जहांन कहै इम,
राजत आंण अमांण रमै।
तन ताप जमात सनाथ तपेसर
जाण जाऴां बिच जोर जमै।
थऴवाट सेखाऴय गोगरु थांनग,
मंझ मरूधर देश महै।
जय नाथ जऴंधर जोगिय जाहर, राज रातै गिर थांन रहै।।6

मुख नूर निरम्मऴ तेज महीयऴ,
देह कड़क्कड़ ऐह दिपै।
विरदाऴ निजां जन बुद्ध वरीसण,
कांम मनोरथ कष्ट कपै।
उपजै उकती उर म़ांय अमांमिय,
जांमिय तूझ रि जाप जहै।
जय नाथ जऴंधर जोगिय जाहर, राज रातैगिर थांन रहै।।7

वरणूं वनवासिय हेक विसासिय,
आसिय पूरण तूं अमणी।
सुणजै सुखरासिय साद सँनासिय,
तीख प्रकासिय आप तणी।
हिव ‘गीध’ उपासिय तो हिवऴासिय,
दीह उजासिय सांम दहै।
जय नाथ जऴंधर जोगिय जाहर, राज रातैगिर थांन रहै।।8

।।छप्पय।।
जयो जऴंधरनाथ, वाह जोगी विरदाऴा।
जिण जपियो मन जाप, वण्यो हमगीर वडाऴा
जूनी जाऴां जोर, तवां जाऴोर तिहाऴी
वडी कंदरां वास, इऴा जसवास उजाऴी।
सेखाऴै थऴी मँदर सिरै, रातै गिरँदां रीझियै।
कवियाण ‘गीध’ कीरत कथै, दाता आणद दीजियै।।

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

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