जनकवि उमरदान जी लाळस – जीवन परिचय

जनकवि ऊमरदानजी लाळस का नाम राजस्थानी साहित्याकाश में एक ज्योतिर्मय नक्षत्र की भांति देदीप्यमान है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की पृथक पहचान है। पाखण्ड-खंडन, नशा निवारण, राष्ट्र-गौरव एवं जन-जागरण का उद्घोष ही इस कवि का प्रमुख लक्ष्य था। इनकी रचनाओं में सामाजिक व्यंग की प्रधानता के साथ ही साहित्यिकता, ऐतिहासिकता एवं आध्यात्मिकता की त्रिवेणी सामान रूप से प्रवाहमान है। मरू-प्रदेश की प्राकृतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक छवियों के चित्रांकन में यहाँ के लोक-जीवन की आत्मा की अनुगूंज सुनाई देती है। डिंगल एवं पिंगल के विविध छंदों की अलंकृत छटा, चित्रात्मक शैली और नूतन भावाभिव्यंजना सहज ही पाठक का मन मोह लेती है। डिंगल साहित्य के विद्वान डा.शक्तिदान कविया द्वारा संपादित पुस्तक “ऊमरदान-ग्रंथावली” से जनकवि का जीवन परिचय यहाँ प्रस्तुत है:-

राजस्थान के लोकप्रिय कविवर ऊमरदानजी का जन्म वि.स. 1908, वैशाख शुक्ल 2, शनिवार के दिन जोधपुर जिले की फलौदी तहसील के गाँव ढाढरवाळा में हुआ था। ये लाळस शाखा के चारण थे। इनके पिता का नाम बख्शीराम और पितामह का नाम मेघराज था। ऊमरदान के बड़े भाई का नाम नवलदान था और दो छोटे भाई थे – शोभादान और आईदान। इस समय तीन भाइयों के वंशज विद्यमान हैं, किन्तु ऊमरदानजी का वंश विनष्ट हो चुका है।

बाल्यकाल एवं शिक्षा-दीक्षा
ऊमरदान के बचपन में ही उनके माता-पिता का स्वर्गवास हो गया था और बड़े भाई का स्नेह भी उन्हें नहीं मिला। उन्होंने स्वयं एक कवित्त में इस तथ्य को स्वीकार किया है, कि-

बाल वय में ही पितु मात परलोक बसे,
भ्राता नवलेस भये हुवो खेल हासी को।

गाँव में जमीन-जायदाद के झगड़ों से खिन्न होकर उन्होंने समीपवर्ती गाँव भेळू में रामस्नेही संत जीयारामजी की “झूंपड़ी” में रहना आरम्भ कर दिया था। वहाँ से रामस्नेही संतों के कंठीबंध शिष्य होकर जोधपुर आ गये और मोतीचौक स्थित रामद्वारा (खेड़ापा की शाखा) में रहने लगे। उन्होंने जोधपुर स्थित दरबार स्कूल में चौथी कक्षा तक ही शिक्षा प्राप्त की थी। इसके पश्चात् उन्होंने चारण-कुलोत्पन्न मनीषी कवि स्वामी गणेशपुरीजी (वि.सं. 1883 से 1966) के पास डिंगल और पिंगल की काव्य-शिक्षा ग्रहण की। तत्कालीन ‘दरबार स्कूल’ के शिक्षक पं. नर्बदाप्रसाद भार्गव (रेवाड़ी निवासी) से उन्होंने तरुण अवस्था में साधारण अंग्रेजी सीखी थी। जोधपुर के प. देवराजजी के पिताश्री से उन्होंने ज्योतिष और संस्कृत का सामान्य ज्ञान प्राप्त किया था। तरुणाई की अवस्था में उन्होंने एक ओर स्वामी दयानन्द सरस्वती के आर्यसमाज के वैदिक सिद्धान्तों के साथ पाखण्ड-खंडन के अकाट्‌य तर्क सुने, तो दूसरी ओर अनिच्छापूर्वक साधु बने कई लोगों को निकट से देखने का अवसर मिला, जो चादर की ओट के आदर पाने के साथ ही व्यभिचार-रत थे। ऊमरदानजी की प्रतिभा, कवित्व-शक्ति और वाक्पटुता से प्रभावित होकर कई लोगों ने उन्हें सामाजिक जीवन के साथ जुड़ने का आग्रह किया और वे स्वयं भी अंतर्द्वन्द्व की स्थिति से मुक्त होना चाहते थे; अत: उन्होंने 28 वर्ष की युवावस्था में साधुवेश को तिलांजलि दे दी। यह घटना वि.सं.1936, फाल्गुन मास की है। इसके बाद वे गृहस्थ बन गये और जोधपुर राज्य के घोड़ों के रसाले में नौकर हो गये थे।

यहाँ पर यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि जोधपुर के इतिहासकार श्री जगदीशसिंह गहलोत ने सन् 1930 (वि.सं. 1987) में ‘ऊमरकाव्य’ की तृतीय आवृत्ति की भूमिका (पृ. 20) में यह स्पष्ट लिखा है कि ”संवत् 1936 में कुछ ज्ञान हुआ, तब वे साधुओं का संग छोड्‌कर गृहस्थी बने और उनके गुण-अवगुण भी जनता को बताने लगे।”

श्री सीतारामजी लालस द्वारा सम्पादित ‘राजस्थानी सबद कोस’ की भूमिका में इस तथ्य को भ्रामक रूप में उल्लिखित किया गया है, जो सम्भवत: कोश-कार्यालय के वेतनभोगी कर्मचारियों की जानी-अनजानी भूल से हुआ होगा। उसमें लिखा है-

”संवत् 1936 में जोधपुर में मोतीचौक रामद्वारा के साधु के शिष्य हो गये।
इस सम्बन्ध में निम्नलिखित दोहा प्रसिद्ध है-

ऊमर सत उगणीस में, बरस छतीसै बीच।
फागण अथवा फरवरी, निरख्या सतगुरु नीच।।

इस दोहे में सतगुरु के साथ नीच शब्द का प्रयोग महत्वपूर्ण है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह दोहा ऊमरदानजी द्वारा बाद में लिखा गया होगा। ‘ऊमरकाव्य’ में भी यह दोहा ‘संत असंत सार’ के साथ ही लिखा हुआ है। संवत् 1940 में जब ऋषि दयानन्द मारवाड़ में आये तब उनसे प्रभावित होकर श्री ऊमरदान ने साधु सम्प्रदाय छोड़ दिया और गार्हस्थ्य जीवन प्रारम्भ कर दिया।” (राजस्थानी सबद कोस : प्रथम खण्ड : भूमिका : पृ. 181)

उपर्युक्त मत प्रामाणिक नहीं है, क्योंकि संवत् 1939 में तो ऊमरदानजी के प्रथम पुत्र अग्रदान का जन्म हो चुका था, जो 18 वर्ष की आयु में संवत् 1957 में चल बसा था। वास्तव में ऋषि दयानन्द सरस्वती के सम्पर्क में आने से चार वर्ष पूर्व ही संवत् 1936 में साधुवेश त्याग कर ऊमरदानजी गृहस्थ बन गये थे। जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंहजी (द्वितीय) ने संवत् 1940 में दयानन्द सरस्वती को उदयपुर से जोधपुर लाने के लिए निमन्त्रण-पत्र सहित ऊमरदानजी को ही भेजा था।

कविवर ऊमरदानजी प्रभावशाली व्यक्तित्व और कारयित्री प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने गृहस्थ बनते ही विवाह कर लिया और सामाजिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे। ऊमरदानजी का प्रथम विवाह गाँव दासौड़ी (जिला बीकानेर) में अमरावतों के धड़े में रतनू शाखा के चारणों के वहाँ हुआ था। उनकी पत्नी का नाम हीराकँवर था। हीराकँवर के पेट से एक बच्ची का जन्म हुआ, जिसका नाम राजू था और वह बचपन में ही पक्षाघात (पोलियो) से पीड़ित होकर चल बसी थी। प्रथम पत्नी का असामयिक निधन होने पर ऊमरदानजी ने दूसरा विवाह गाँव चाळकना (जिला बाड़मेर) में सूरजमल देथा की पुत्री देवलबाई के साथ किया। इनके दो पुत्र हुए थे – अग्रदान और मीठालाल। प्रथम पुत्र अग्रदान तो ऊमरदानजी की मृत्यु से तीन वर्ष पूर्व ही 18 वर्ष की आयु में चल बसा था और दूसरे पुत्र मीठालालजी थे, जो पहले पुलिस में सिपाही रहे और बुढ़ापे में गृहस्थी के अभाव एवं आर्थिक तंगी में मजबूर होकर जोधपुर के मंडोर रोड स्थित हनुमान मन्दिर में चौकीदारी करते हुए सन् 1967 के आसपास चल बसे थे। सन् 1956 से 1962 तक विद्यार्थी-जीवन में मैंने अनेक बार मीठालालजी से मिलकर उनके पिताश्री ऊमरदानजी के विषय में जानकारी प्राप्त की थी। मीठालालजी की आकृति भी उनके पिता की तरह ही थी, अर्थात् गौर वर्ण, उन्नत ललाट, गोल चेहरा और लम्बा कद। वे गोल साफा बाँधते थे और बाड़मेर क्षेत्र के निवासियों की तरह त्रेवटा (धोती) पहनते थे। अब केवल ऊमरदानजी का नाम अमर है, उनके परिवार में से कोई भी शेष नहीं है।

ऊमरदानजी नेक, निर्भीक, साहसी, समाज सुधारक और सदाबहार व्यक्ति थे, परन्तु जीवन के संध्या-काल में उन्हें बहुत कष्ट उठाने पड़े। मैंने ऊमरदानजी के हाथ के लिखे कुछ पत्र ‘कैर सतसई’ के रचनाकार डिंगल कवि स्वर्गीय बदरीदानजी कविया, एडवोकेट के पास (रायपुर की हवेली जोधपुर में) देखे और पढे थे, जो कविराजा मुरारीदानजी और इतिहासकार मुंशी देवीप्रसादजी (जोधपुर) के नाम हिंदी और राजस्थानी में लिखे गये थे। उन पत्रों में ऊमरदानजी ने लिखा था कि उनके पाँव में नाहरू (बाला) की असह्य पीड़ा है और वे कंठरोग से भी पीड़ित हैं। बड़े दुःख का विषय है कि महाकवि ऊमरदानजी के हाथ से लिखे वे पत्र जो संवत् 2022 में मैंने पढ़े थे, प्रतिलिपि नहीं कर पाया और अब अप्राप्य एव विनष्ट हो चुके हैं।

ऊमरदानजी को जिन लोगों ने निकट से देखा था, उनमें डिंगल के कवि उदयराजजी उज्वल भी एक थे। ऊमरदानजी की मृत्यु के समय उदयराजजी उज्वल की आयु 18 वर्ष की थी। उन्हीं के मुख से मैने सुना था कि ऊमरदानजी गोल साफा बाँधते थे, ऊँची धोती पहनते और हाथ में एक मोटा-सा डंडा रखते थे। ऊमरदानजी अपनी फक्कड़ाना मस्ती को प्राय: इन शब्दों में व्यक्त करते थे-

वसू न बुद्धि वेतरी, न कौडी पास है जमां।
घुमाय लट्ठ अट्ठ जांम, हां फिरां घमांघमां।।

उदयराजजी उज्वल के कथनानुसार ऊमरदानजी बहुत बढ़िया बातपोश थे। वे विनोदी स्वभाव के होने के साथ ही सत्य और न्याय का पक्ष लेने में किसी से डरते नहीं थे। ऊमरदानजी का गौर वर्ण था, ललाट बड़ा था, कद लम्बा और छरहरा था। हँसमुख और सुन्दर व्यक्तित्व के धनी थे। बात करते समय समाँ बाँध देते थे और पात्र के अनुरूप भाषा बोलकर वर्णन को चित्रात्मक बना देते थे।

ऊमरदानजी सच्चे अर्थों में जनकवि थे। उन्होंने देशवासियों की दुर्व्यसन-ग्रस्त दुर्दशा देखी और विदेशी सत्ता की कूटनीति भी देखी थी। इसलिए जनता को जागृत करने का भरपूर प्रयास किया और आर्यावर्त्त के विगत गौरव की स्मृति कराते हुए तत्कालीन सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति पर तीक्ष्ण कटाक्ष किये थे। निठल्ले एवं निष्क्रिय अफीमचियों पर मार्मिक व्यंग्य करते हुए कवि ने ठीक ही कहा था-

नाग रा झाग पीवै निलज, झांक आग चख में झड़ै।
अंगरेज मुलक दाबण अड़े, ऎ जूंवां सूं आथड़ै।।

उन दिनों साधु-वेश में अनेक पाखंडी लोग भोली जनता की खरी कमाई खा रहे थे। कनफटे, खाखी, जटाधारी, जोगी आदि ढोंगी साधुओं का भंडाफोड़ करते हुए ऊमरदानजी ने मरुधरा के किसानों को ही एकमात्र कमाऊ पूत कहा है। कवि के ये शब्द कितने सार्थक हैं:–

जटा कनफटा जोगटा, खाखी परधन खावणा।
मुरधर में कोड़ा मिनख, करसा एक कमावणा।।

तत्कालीन राज्य-कर्मचारियों की रिश्वतखोरी और अन्याय का चित्रण करते हुए उन मुंशी लोगों की करतूतों का सटीक वर्णन कवि ऊमर की कलम से अंकित हुआ है। जहाँ राजा लोग अंग्रेजी रहन-सहन में अपनी मर्यादा भूलने लग जाएँ, वहाँ लाल-फीताशाही की मनमानी और बेईमानी पर कौन अंकुश लगाए? ऊमर कवि के सोरठों में ऐसा ही चित्रण हुआ है:-

बोली रा बाड़ाह, रीत बिगाड़ा राज रा।
धौळै दिन धाड़ाह, मुंसी पाड़ै मुरधरा।।1।।
सेजां धण सूतैह, ऊभा मूतै अधपती।
हूंतै अणहूंतैह, मुंसी चूंथै मुरधरा।।2।।

ऊमरदानजी की राष्ट्रीय भावना और तदनुकूल प्रयासों को दृष्टिगत रखते हुए उनके समकालीन कवि जुगतीदानजी देथा (बोरूंदा) ने विदेशियों की चतुराई विषयक एक छप्पय कवित्त में ठीक ही कहा था:-

बाप बिगाड़ै विश्व, डीकरौ जगत डबोवै।
दोनूं मिळिया दुष्ट, हांण एकण री होवै।।
एक हिंदवां अधिक, एक नैड़ौ नहिं आयौ।
अंगरेजां मिळ उभय, जगत नै लाभ जणायौ।
भल संग नहीं संग है भलौ, धरा देन धन धांन रौ।
नर चतुर होय जांणै निपट, आसय ऊमरदांन रौ।।

राजस्थान में कविवर ऊमरदानजी का नाम पढे-अपड़े लोगों में, नगरीय-ग्रामीण क्षेत्रों में तथा पुरातन-अधुनातन विचारधारा के साहित्यकारों में समान रूप से लोकप्रिय है। यह कवि अपने ढंग का एक ही व्यक्ति था, जिसके व्यक्तित्व और कृतित्व में वैविध्य एवं वैशिष्ट्य का विलक्षण समन्वय लक्षित होता है। इस महान् कवि को वि.सं.1960 में दिवंगत हुए अभी 103 वर्ष ही हुए हैं, किन्तु उनके पीछे न तो घर रहा, न घर वाले। ऐसी स्थिति में उनकी कीर्त्ति-कौमुदी के अतिरिक्त जीवन-सम्बन्धी घटनाएँ जानने वाले लोग न तो ढाढरवाळा में हैं, जहाँ उनका जन्म हुआ था और न ही जोधपुर में, जहाँ उनका निधन हुआ था। मेरे हृदय में इस कवि के लिए बचपन से ही विशेष श्रद्धा रही। अत: अनेक स्थानों पर वयोवृद्ध लोगों से जो कुछ सुनने को मिला, उसी के आधार पर ऊमरदानजी के जीवन के कुछ प्रेरक प्रसंग यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जिनमें उनकी विनोदप्रियता, साहसिकता, प्रतिभा और प्रज्ञा का परिचय मिलता है।

जीवन के प्रमुख प्रसंग
1. ऊमरदानजी जब जीवन के पच्चीस वसन्त पार कर चुके और साहित्य एवं संगीत में उनकी प्रतिभा उजागर होने लगी, तो उनके कई मित्रों ने साधु-वेश को तिलांजलि देकर गृहस्थ बनने का आग्रह किया। कहते हैं कि एक प्रभावशाली व्यक्ति ने गोष्ठी में कहा कि यदि ऊमरदानजी ‘भेख’ उतार दें, तो दो सौ रुपये रोकड़ भेंट कर दूँ। वैसे भी अधिकांश भेखधारी ‘घरनि मुंई घर संपति नासी। मुंड मुंडाय भये सन्यासी’ उक्ति को चरितार्थ करने वाले ही थे, अत: 28 वर्ष की आयु में उस दिन के बाद ऊमर कवि ने ‘भेख’ उतार कर गृहस्थी के वस्त्र धारण कर लिये। इस घटना की खबर सुनकर कुछ लोगों ने कवि से प्रश्न किया कि केवल दो सौ रुपयों की होड़ पर ही आपने ‘भेख’ उतार दिया। इस पर ऊमरदानजी ने राजस्थानी में जवाब दिया-“इण फीटियै भेख रा दोयसौ ई म्हैं घड़िया है।” लोग उनकी हाजिरजवाबी और कलियुगी साधुओं की विलासिता के संकेत पर खिलखिला कर हँस पड़े।

2. साधु-संप्रदाय छोड़कर ऊमरदानजी जोधपुर राज्य के घोड़ों के रसाले में नौकर हो गये थे। उस समय वे 28 वर्ष के जवान थे तथा उनका शरीर हष्ट-पुष्ट एवं स्फूर्तिवान था। एक दिन काव्यप्रेमी महाराजा जसवंतसिंहजी (द्वितीय) शेर की शिकार के लिए जंगल में गये, जहाँ ऊमरदानजी भी उनके साथ थे। बंदूक की गोली से घायल हुआ शेर महाराजा जसवंतसिंहजी पर टूट पड़ा। उस समय अन्य लोग तो घबरा गये, परन्तु ऊमरदानजी ने बाहुओं में शेर को भींच कर महाराजा की प्राण रक्षा की थी। ऊमरदानजी के मरसिये में भी शेर से बाहु-युद्ध करने का उल्लेख मिलता है; यथा:-

बाहु युद्ध सिंहन ते जूटो केक बेर धीर,
नेक कंठ पीर हू तें भूमि शीश गिरगो।

अर्थात् जो व्यक्ति (ऊमरदान) कई बार सिंहों से बाहु-युद्ध में जुट गया था, वही जरा-सी कंठ-पीड़ा (कंठबेल) से ही धराशायी हो गया। ऐसा भी कहा जाता है कि माँद में सोये हुए शेर को एक बार ऊमरदानजी कान पकड़ कर महाराजा के सामने ले आये थे। वे इस लोक-मान्यता को प्रमाणित करना चाहते थे कि यदि कोई मनुष्य शेर की आँखों में आँखें डाल कर नेत्र झपकाये बिना उसका कान पकड़ ले, तो शेर आक्रामक रुख नहीं अपनाता। निश्चय ही, ऊमरदानजी ने शेर के साथ संघर्ष कर अपने अतुल साहस का परिचय दिया था। तभी तो उक्त मरसिया कवित्त में इसका उल्लेख हुआ है, जो कवि के अन्त्येष्टि-संस्कार के पश्चात् तत्कालीन कवि गोरखदानजी कविया (गाँव खैण निवासी) ने शोकसभा में सुनाया था।

3. स्वामी दयानंद सरस्वती के प्रभाव में आने के पश्चात् ऊमरदानजी कट्टर आर्यसमाजी बन गये थे। वे मूर्त्तिपूजा के विरोधी थे। एक बार वे अपने ससुराल (गाँव चाळकना) गये, तो वहाँ उनके ससुर सूरजमल देथा के घर में चारणी महाशक्ति आवड़ देवी की मूर्ति स्थापित देखी। उन्होंने उसे सामान्य पत्थर-तुल्य बताकर तोड़ डाला और घर से बाहर फेंक आये। उसी रात्रि में उनके ससुर के घर में आग लग जाने से झोंपड़े जल गये, जिसे ऊमरदानजी ने तो संयोग कहा और उनके ससुराल वालों ने देवी का प्रकोप माना था।

4. जोधपुर के कविराजा मुरारिदानजी ने अलंकारों का महान् ग्रन्थ ‘जसवंत जसो भूषण’ की रचना संवत् 1950 में पूरी की, जिस पर उन्हें महामहोपाध्याय की उपाधि मिली थी। उस ग्रंथ के उपलक्ष्य में जोधपुर राज-दरबार में एक उत्सव मनाया गया, जिसमें विशिष्ट व्यक्तियों और प्रमुख विद्वानों को निमन्त्रण भेजे गये थे। ऊमरदानजी को निमन्त्रण शायद इसी भय से नहीं भेजा गया कि वे उस ग्रंथ में कोई काव्य-दोष न बता दें। ऊमरदानजी कटु सत्य कहने में हिचकिचाते नहीं थे। ज्यों ही उन्हें उस आयोजन का पता चला, वे शेर की तरह वहाँ जा पहुँचे और एक कवित्त में फटकार सुनाई, जिसकी अंतिम पंक्ति इस प्रकार थी-

जस जसवंतभूषण को दूषण दिखाऊँ मैं।

कविराजा मुरारिदानजी ने उन्हें आमंत्रित न किये जाने की भूल के लिए क्षमा याचना की और उचित आदर-सत्कार कर मामला शान्त किया।

5. जोधपुर महाराजा जसवंतसिंहजी के छोटे भाई और राज्य के मुसाहिब आला सर प्रताप ने एक बार ऊमरदानजी को बाजार से कुछ अंग्रेजी दवाइयाँ लाने के लिए भेजा, तो वे बिना नाम लिखे ही उन औषधियों को खरीद लाये। इस पर सर प्रताप ने पूछा, ”थूं अंग्रेजी पढियौ?” उत्तर मिला, ”नहीं सा”। इस पर उनकी विलक्षण स्मरण-शक्ति से प्रभावित होकर सर प्रताप ने नर्बदाप्रसादजी भार्गव के पास अंग्रेजी सीखने के लिए भेजना शुरू किया था। उन दिनों वे सर प्रताप के मरजी के महकमे घोड़ों के रसाले में नौकर थे। एक दिन अध्यापक से ऊमरदान की पढ़ाई की प्रगति के बारे में सर प्रताप ने पूछा तो उन्हें बताया गया कि वह गणित में कमजोर है। सर प्रताप द्वारा कारण पूछने पर ऊमरदानजी बोले कि मास्टर साहब तो हिसाब पूछते हैं लाखों और करोड़ों का, जिसका न तो मेरे जीवन में काम पड़ा है और न पड़ेगा। आप जो खर्चा मुझे देते हैं, उसका हिसाब पूछें, तो मैं पाई-पाई का देने को तैयार हूँ। यह उत्तर सुन कर सर प्रताप और शिक्षक महानुभाव हँस पड़े।

6. सर प्रताप जोधपुर राज्य के रीजेण्ट बने, तो अंग्रेजों के प्रभाव से उन्होंने दाढ़ी-मूंछें कटवा कर अंग्रेजी वेशभूषा में रहना प्रारम्भ कर दिया था। एक बार कई रजवाड़ों के वकील आये हुए थे, जिन्हें सर प्रताप अपनी मरजी के देशी और विदेशी घोड़े दिखा रहे थे। उस समय ऊमरदानजी वहाँ पहुँच गये। सर प्रताप ने कहा – “ऊमरदान! अच्छे घोड़ों के लक्षण बता।” ऊमरदानजी ने एक कविता के माध्यम से 36 किस्म के घोड़ों के विविध लक्षण बताये। वहाँ उपस्थित लोगों ने सर प्रताप से कहा कि जोधपुर जैसे घोड़े अन्यत्र कहीं नहीं हैं। तब सर प्रताप ने ऊमरदानजी से कहा – “ऊमरदान! थूं झूठ नीं बोले, बता आ बात साची है?” इस पर सहज स्वभाव के अनुसार ऊमरदानजी बोल उठे-”गरीबनवाज! घटियोडी पूंछां रा घोड़ा और मूंडियोडी मूंछां रा जवान तो अठै इज मिळै।” उनकी इस निर्भीकता एवं स्पष्टवादिता से वहाँ खड़े सभी लोग दंग रह गये।

7. सर प्रताप ने जोधपुर राज्य में समाज-सुधार के अनेक कार्य किये जिनमें मृत्यु-भोज बन्द करना, शराब की खुली भट्टियों के स्थान पर ठेका व्यवस्था करना, विद्यालय, अस्पताल, तार-डाक, राजस्थानी भाषा का प्रचार, खादी का प्रयोग आदि मुख्य थे। तत्कालीन कवि जुगतीदानजी देथा (जो ऊमरदानजी के मित्र भी थे) ने सर प्रताप की प्रशंसा में वि.सं.1948 में ‘प्रताप-पच्चीसी’ की रचना की, जिसमें कुल 25 दोहे थे और प्रत्येक दोहे का अन्तिम चरण ‘पातल रो परताप’ तुकान्त के रूप में प्रयुक्त हुआ था; यथा-गंध नासका री गई, सहर रहै नित स्याप।

हिड़क्यो स्वान न हेक व्है, पातल रौ परताप।।1।।
देसी हय री नह कदर, झंपत लिंगूरी झांप।
वेलर अरबी बापरै, पातल रौ परताप।।2।।
जुळता सिर चीठौ जुंवां, कांगसियां खच काप।
खत पटिया खिजमत किया, पातल रौ परताप।।3।।
मौसर सादी मांयनै, वादोवद विगड़ाप।
ऐ रौळा लागा उडण, पातल रौ परताप।।4।।
पी दारू परवारता, धांन न मिळतौ धाप।
ठेकौ ह्वैतां ठीक व्ही, पातल रौ परताप।।5।।

उपर्युक्त ‘प्रताप-पच्चीसी’ के दोहे ज्यों ही एक समारोह में जुगतीदानजी ने सुनाये, तो वहाँ उपस्थित लोगों ने शिष्टाचारवश खूब प्रशंसा की। इस पर सर प्रताप ने ऊमरदानजी की राय जाननी चाही, तो ऊमर कवि ने जुगतीदानजी देथा की कविता और सर प्रताप की परीक्षा पर कटाक्ष करते हुए तुरन्त उसी तुकान्त में यह दोहा सुना दिया-

अधवीटा फीटा अरथ, सिटळी कविता स्याप।
जुगतौ (इ) कवि वाजै जकौ, पातल रौ परताप।।

यह उल्लेखनीय है कि जुगतीदानजी देथा ने ‘प्रताप-पच्चीसी’ के दोहों में बाद में कुछ संशोधन किया था। कुछ पंक्तियाँ बदली गईं तथा कुछ दोहे काट कर उनके स्थान पर नये दोहे रचे गये थे। मेरे निजी संग्रह में ‘प्रताप-पच्चीसी’ की एक हस्तप्रति है, उसमें और ‘प्रताप प्रकाश’ ग्रंथ में प्रकाशित दोहों में यह अन्तर स्पष्टत: दिखाई देता है।

8. ऊमरदानजी लालस और जुगतीदानजी देथा दोनों के ही स्वामी गणेशपुरीजी काव्य-गुरु थे। एक बार खेतड़ी के विद्याप्रेमी नरेश ने अपनी पुत्री के विवाह में चारण कुलोत्पन्न महाकवि स्वामी गणेशपुरीजी को आमन्त्रित किया। स्वामीजी उन दिनों अस्वस्थ थे; अत: उन्होंने अपनी ओर से जुगतीदानजी और ऊमरदानजी, दोनों कवि-शिष्यों को उस विवाह में खेतड़ी भेजा। दोनों ही परस्पर मित्र और अच्छे कवि थे। अत: उन्होंने निश्चय किया कि ‘मिळणी’ (प्रथम भेंट) के समय एक-एक दोहा सुनाया जाय। जुगतीदानजी ने वैण-सगाई युक्त चौकडिया अनुप्रास का यह दोहा रच कर सुनाया-

रीझ झड़ी लागी रहै, बापो घड़ी बतीस।
लोभ कड़ी नै लोपग्यौ, धिनो खेतड़ीधीस।।

ऊमरदानजी ने चार अनुप्रासों के स्थान उसी श्रेणी के एक जैसे छह अनुप्रासों वाला वैणसगाई युक्त यह दोहा सुना कर अपनी प्रतिभा को प्रमाणित किया-

दांन छड़ी कीरत दड़ी, हेत पड़ी तो हाथ।
वास सड़ी घट नां वड़ी, नमो खेतड़ीनाथ।।

वास्तव में यह दोहा भाषा और भाव, दोनों दृष्टियों से बहुत बढ़िया बन पड़ा है। ऐसी थी ऊमर कवि की विलक्षण प्रतिभा।

9. ऊमरदानजी साहित्य की भाँति संगीत के भी मर्मज्ञ थे। स्वयं संगीतज्ञ होने के कारण ही उन्होंने विभिन्न राग-रागिनियों में अनेक पद रचे हैं, जिनमें दयानन्द-दर्शन, धर्म-कसौटी, ओलंभा, वैराग्य-वचन, हमार री हाल आदि रचनाएँ प्रमुख हैं। कहते हैं कि एक बार संगीत के प्रभाव का प्रसंग छिड़ने के साथ ही ‘झेरावा’ (करुण रागिनी) की प्रस्तुति की गई। ऊमरदानजी ने कहा कि यदि ‘झेरावा’ गाने पर भी श्रोताओं की पलकें गीली न हुईं, तो वह रागिनी है ही नहीं। अन्य गवैये जब इस कसौटी पर खरे नहीं उतरे, तब ऊमरदानजी ने ऐसी करुण-रागिनी गाई कि श्रोतागण भाव-विभोर होकर बरबस ही अपने आंसुओं को रोक नहीं पाये। संगीत में भी उन्हें ऐसी पारंगता प्राप्त थी।

10. वि.सं. 1957 में ऊमरदानजी उदयपुर गये थे। वहाँ पर विक्टोरिया हॉल (अजायबघर) में उनकी मुलाकात इतिहासकार महामहोपाध्याय श्री गौरीशंकर हीराचंद ओझा से हुई। ओझाजी ने उनका नाम पूछा तो उन्होंने हँसते हुए अपना नाम ‘डेली डिलाइटफुल उम्मरदान (Daily delightful Ummardan) बताया था। ओझाजी द्वारा सन 1930 में कविवर ऊमरदानजी के विषय में लिखी गई टिप्पणी के ये शब्द उल्लेखनीय हैं-

“उनकी मुख मुद्रा से यह झलक आता था कि वे सदा प्रसन्नचित रहते हैं। अतएव उनका ‘डेली डिलाइटफुल’ कथन सार्थक है। ऐसे सहृदय कवि से वार्त्तालाप करने तथा उनकी मनोहारिणी कविता सुनने में मुझे बड़ा आनन्द आता था, जिससे उनके साथ मेरा स्नेह बढ़ता ही गया। “

11. एक बार ऊमरदानजी रायपुर ठिकाने में गये। वहाँ के कामदार ने कहा कि एक जैन साधु अच्छे कवि हैं और ‘सिलोका’ बहुत अच्छा पढ़ते हैं, सो उन्हें भी सुनना चाहिए। काव्य-प्रेमी लोगों ने गोष्ठी के रूप में उन जैन यति और ऊमरदानजी की परस्पर मुलाकात करवाई। जब ‘सिलोका’ पड़ा गया, तो उसमें न तो काव्य-कला थी और न ही संगीत का नाद-सौन्दर्य। अत्यन्त साधारण रचना को उत्तम कोटि के काव्य के रूप में मिथ्या प्रचारित किये जाने पर कटाक्ष करते हुए ऊमरदानजी ने यह दोहा सुना दिया-

जंचौ फिर फिर जगत नै, खंचौ बूढी खौर।
बांणी वंचौ बापड़ां, औ तौ संचौं (इ) और।।

उपर्युक्त चौकडिया अनुप्रास वाले दोहे में कवि ने तीखे व्यंग्य में यह बात कही है कि बूढ़ी औरतों को साथ लेकर याचना करने वाले धार्मिक ‘बाणी’ का वाचन कर सकते हैं, किन्तु कविता का साँचा ही कुछ और होता है, ‘वह चितवन औेर कछू, जिहिं बस होत सुजान।’ और उसके बाद उन्होंने वि. सं. 1956 के भीषण अकाल का वर्णन करते हुए ‘छपनै री छोरारोळ’ नामक सुरुचिपूर्ण कविता ‘सिलोका’ छन्द में ही रची। डिंगल छन्दों की तुलना में ‘सिलोका’ बहुत हल्का-सा छन्द है, किन्तु ऊमरदानजी ने अकाल के माध्यम से मरुस्थलीय जीवन के विविध चित्र इसी छन्द में अंकित कर उसे एक उच्च कोटि की लोकप्रिय रचना सिद्ध कर दी।

12. गाँव रायपुरिया (जिला पाली) के आढ़ा केसरसिंहजी पर किसी रखैल स्त्री के साथ अनुचित सम्बन्ध और तत्पश्चात् उसकी हत्या का आरोप लग गया था। दुरसा आढ़ा के वंशज तथा पाँव में सोना होने से उनकी प्रतिष्ठा को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए कई लोग सक्रिय हुए, परन्तु ऊमरदानजी ही अपने प्रभाव से उन्हें दोषमुक्त सिद्ध कराने में सफल हुए। भविष्य के लिए दिशा-निर्देश देते हुए केसरसिंहजी आढ़ा को ऊमरदानजी ने यह सोरठा सुना कर खरी चेतावनी दी थी-

रांडां रौ रगड़ौह, नित झगड़ौ आछौ नहीं।
केहर कनक कड़ौह, दूजां रै पग देखसौ।।

13. मूंदियाड़ के ठाकुर चैनसिंहजी बारहट पर एक बार कुछ स्वार्थी लोगों ने षड़यंत्र रच कर गम्भीर अपराध का आरोप लगाया और उन्हीं के गाँव के पूंजीपति और प्रभावशाली कोठारी लोग उन्हें सर्वाधिक हानि पहुँचाने में अग्रणी थे। कहते हैं कि मूंदियाड़ पर जब्ती का आदेश निकला और ठाकुर को विवश होकर सींहथल (बीकानेर) में कुछ समय तक रहना पड़ा था। मूंदियाड़ ठिकाने की बहाली के मामले में जब पं. सुखदेवप्रसाद काक (मुसाहिब आला के सेक्रेटरी) ने अपनी असमर्थता प्रकट की, तब ऊमरदानजी ने उस प्रकरण की सम्पूर्ण टिप्पणी 16 दुहालों के एक डिंगल गीत में सर प्रताप को सुनाई और उसी के प्रभाव से मूंदियाड़ ठिकाना बहाल हुआ तथा ठाकुर निर्दोष सिद्ध हुए। उस गीत के अन्तिम दो दुहाले विशेष द्रष्टव्य हैं:-

कपट कोठारियां तणा इम किताई, जिके सारा कया नांय जावै।
इणां नै सर करै जिसा जग आज दिन, आप बिन और नह निजर आवै।।
पेच मूंद्‌याड़ पर बादरौ पिलाड़ी, कंवर रै लिलाड़ी मांय करकै।
हारग्या बियां सूं हिलै ना हिलाड़ी, सिलाड़ी आप बिन नांय सरकै।।

14. घाणेराव कुँवर की शेखावाटी के किसी ठिकाने में सगाई की बात पक्की करने के लिए कवि जुगतीदानजी देथा (बोरुंदा) ने मध्यस्थता की थी। बाद में उस मामले में विवादास्पद स्थिति आ गई, तब शेखावतों ने जुगतीदानजी को बुलवाया किन्तु वे जोधपुर नहीं आये। इस घटना का पता चलने पर ऊमरदानजी ने न्याय का पक्ष लेते हुए जुगतीदानजी को शीघ्र जोधपुर आने के लिए पत्र लिखा और उसमें एक दोहा लिख कर न आने के भावी दुष्परिणाम का संकेत भी कर दिया। अनुप्रास की छटा युक्त मित्र-भाव से लिखा गया वह दोहा इस प्रकार था

जे नहि आसौ जोधपुर, (तौ) हासौ होसी हेळ।
पासौ पड़सी पाव में, जासौ सीधा जेळ।।

इस दोहे के प्रभाव-स्वरूप वे आये, और दो परिवारों के मध्य उभरे विवाद की इतिश्री हो गई।

15. स्वामी दयानन्द सरस्वती को मेवाड़ से मारवाड़ में लाने के लिए विशेष प्रयत्नशील लोगों में ऊमरदानजी भी प्रमुख थे। संवत् 1940 वैशाख वदि 9 (दिनांक 3 मई, 1883 ई.) को शाहपुरा मेवाड़ से कविराजा श्यामलदासजी (उदयपुर) को लिखे पत्र में महर्षि दयानन्द सरस्वती ने लिखा था – “एक नूतन वर्तमान यह है कि श्रीमान जोधपुराधीशों की आशा से श्रीयुत महाराज प्रतापसिंहजी तथा श्रीयुत रावराजा तेजसिंहजी और बारहट अमरदानजी आदि ने मुझको शीघ्र जोधपुर बुलाने के लिए पत्र भेजा है।”

इसके पश्चात् वैशाख सुद 4, गुरुवार (सं. 1940) को जोधपुर के रावराजा तेजसिंहजी के नाम लिखे पत्र में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि ”सवारी के साथ एक बुद्धिमान पुरुष आना चाहिए।” इसी को ध्यान में रखकर जोधपुर से तीन व्यक्ति गये, उनमें ऊमरदानजी मुख्य थे। सं. 1940, ज्येष्ठ वदि 4, शनिवार के दिन स्वामी दयानन्द सरस्वती ने शाहपुरा से जोधपुर की ओर प्रस्थान किया था। उसके पश्चात् ऊमरदानजी के साथ स्वामीजी का सम्पर्क निरन्तर प्रगाढ़ होता गया और वे आर्यसमाज में दीक्षित हो गये। यहाँ एक बात उल्लेखनीय है कि स्वामी दयानन्द सरस्वती के जो पत्र पुस्तक रूप में प्रकाशित हैं, उनमें कविराजा श्यामलदासजी (उदयपुर), कविराजा मुरारिदानजी (जोधपुर), बारहट किसनजी (शाहपुरा), नाथूरामजी उज्वल (जोधपुर), फतहकरणजी उज्जल (उदयपुर), मनीषी समर्थदानजी (अजमेर), स्वामी गणेशपुरीजी (जोधपुर), रावराजा तेजसिंहजी (जोधपुर) और कविवर ऊमरदानजी (जोधपुर) के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन विद्वान् व्यक्तियों के साथ घनिष्ठता निश्चय ही स्वामी दयानन्द सरस्वती की गुणग्राहक प्रवृत्ति की परिचायक है। यह भी एक रोचक तथ्य है कि स्वामी दयानन्द सरस्वती ऊमरदानजी को अमरदानजी कहते थे और फतहकरणजी उज्वल के लिए भी उन्होंने विजयकरण या जयकरण नाम सुझाया था क्योंकि ‘ उमर’ और ‘ फतह’ शब्द अरबी-फारसी के थे। संवत् 1939, चैत्र वदि 10, सोमवार को शाहपुरा मेवाड़ से विख्यात विद्वान् कृष्णजी बारहट को लिखे स्वामी दयानन्द सरस्वती के पत्र की निम्नलिखित पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं:- ”फतहकरण उदयपुर में हैं वा कविराजजी के साथ जोधपुर गये हैं। फतहकरण नाम (विजयकरण) हो सकता है वा नहीं। क्योंकि ‘फतह’ शब्द फारसी का है और उसका अर्थ विजय है, इसलिये ‘विजयकरण’ नाम होना उचित है।”

महर्षि दयानन्द के इस सुझाव का फतहकरणजी उज्वल पर इतना प्रभाव पड़ा कि उन्होंने अपना नाम सर्वत्र जयकरण लिखना शुरू कर दिया, क्योंकि विजयकरण तो उनके पुत्र का नाम था। इस प्रकार स्वामी दयानन्द सरस्वती को जोधपुर लाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका ऊमरदानजी की ही थी और उसी के परिणाम-स्वरूप मारवाड़ में आर्य-संस्कृति की लता लहलहाने लगी थी।

16. जोधपुर राज्य में स्टेट काउंसिल के मेम्बर और बख्शी जागीर बच्छराजजी सिंघवी को किसी कारण राज्य से निष्कासित कर दिया गया था। तब वे उदयपुर चले गये। उन दिनों ऊमरदानजी भी उदयपुर गये और अपने मित्र बच्छराजजी सिंघवी से मिलकर यथासम्भव उन्हें सम्मान दिलाने का वचन दिया। सिंघवी ने कहा कि महाराणा फतहसिंहजी को प्रसन्न करने के लिए कोई युक्ति निकाली जाय। इस पर ऊमरदानजी ने महाराणा प्रताप की महिमा से मंडित 76 सोरठों की जोधपुर में रचना की और उसे महाकवि दुरसा आढ़ा की कृति बताकर बच्छराजजी सिंघवी को दे दी। सिंघवी जी की तरफ से उस पुस्तक को वि.सं. 1958 में पं. रामकर्ण आसोपा के प्रताप-प्रेस, जोधपुर में सर्वप्रथम प्रकाशित किया गया और उसकी प्रति महाराणा को भेंट की गई। इससे प्रसन्न होकर महाराणा फतहसिंहजी ने सिंघवी बच्छराजजी की दो सौ रुपये माहवार पैंशन कर दी थी। ‘विरुद छिहतरी’ के विषय में विस्तार से तो कवि की काव्यकृतियों के अन्तर्गत प्रकाश डाला जाएगा, परन्तु यह निश्चित है कि यह कृति ऊमरदानजी की ही रची हुई है। ऊमरदानजी ने इतना बड़ा त्याग केवल इसीलिए किया कि वे अपने मित्र और मारवाड़ के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति को संकट की घड़ी में भरपूर सहायता करना चाहते थे। इस घटना से ऊमरदानजी की सुहृद् एव सहयोगी प्रवृत्ति का पुष्ट प्रमाण मिलता है।

उपर्युक्त प्रसंगों के अतिरिक्त कुछ अन्य छुटपुट प्रसंग भी हैं, जिन्हें विस्तार भय से यहाँ देना सम्भव नहीं है। संक्षेप में यही उल्लेख करना पर्याप्त होगा कि ऊमरदानजी का व्यक्तित्व बड़ा प्रभावशाली था। वे कोई नशा नहीं करते थे, सदैव प्रसन्न रहते थे, परोपकारी, साहसी, सत्यवक्ता एवं निष्कपट व्यक्ति थे। ऐसा महान कवि भौतिक सुख-सुविधाओं से तो प्राय: वंचित ही रहा और 52 वर्ष की अवस्था में संवत् 1960, फागुन सुदि 13, बुधवार (दिनांक 11. 3. 1903 ई.) को कंठबेल की बीमारी से चल बसा। जोधपुर के बागर चौक स्थित किराये के एक मकान से उनका पार्थिव शरीर श्मशान भूमि ‘कागा’ में ले जाया गया। उनके दाह-संस्कार के समय जोधपुर के अनेक गणमान्य व्यक्ति एव कवि के निजी मित्र उपस्थित थे। ऊमरदानजी जैसे सहृदय सुकवि के स्वर्गवास पर तत्कालीन अनेक कवियों ने मर्सिये लिखे थे, जिनमें से दो तीन उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हैं-

(दोहा)
हमैं निपट अळगौ हुवौ, लाळस नेह लगाय।
कागा बिच डेरा किया, जागा अबखी जाय।।1।।
विद्या कविता वीरता, ऊमर तो उपदेस।
एकरहां फिर आवजे, देखे मरुधर देस।।2।।
~~जुगतीदानजी देथा, बोरुंदा

(कवित्त)
पंडित सभा में सत्य बोल दिग्विजय कीन,
हुय के हरोल आर्यामत को हला गयौ।
वेद वो पुरान छन्दवेत्ता खट काव्य रस,
छौळ गुरु ज्ञान शिष्य वारिधी छिला गयौ।
उक्त को अनूप थौ सो रूप कुल लाळस को,
मूंदी गजपात जोत प्रभु में मिला गयौ।
मिटै सब साज प्रलैकाल जल भँवर लौं,
गुन की जहाज आज ऊमर विला गयौ।।1।।
~~धूड़जी मोतीसर, जुढ़िया

(कवित्त)
विद्या को अगार हास्य रस को विचित्र चित्र,
सभा को श्रंगार आज सुन्यसान करगो।
बघीराम-नन्दन थो चारन कुल तारन को,
मित्रता को ‘गोर’ कहै कोट ही बिखरगो।
बाहुयुद्ध सिंहन तें जूटो केऊ बेर धीर,
नेक कंठपीर हू तें भूमी शीश गिरगो।
गुन को जहाज कविराज ऊमरेस आज,
सबै संग ले के भवसिंधु पार तिरगो।।1।।
~~गोरखदानजी कविया


~~सन्दर्भ: ऊमरदान-ग्रंथावली (सम्पादक – डा. शक्तिदान कविया)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *