जोगण चाळकनेच जयो – महादान महडू

।।सोरठा।।
गरढी थई गिरराय कां श्रवणे सुणती नहीं।
मावल तणी ज माय लाज रखे लोहड़ीयाळी।।१।।
देवी दे वांणी वेहतां केवांणो वचन।
आई आपांणी बिरद संभाळे बिस हत्थी।।२।।
त हुंती न होय दाळिद्र घर दुथी तणे।
कुरंग न बेसे कोय वाघ तणी थय विस हत्थी।।।३।।
थारो ना थळराय को कळजुगीयो डाकर करे।
जेने मेटे तुं महामाय भांय तुळे ज्यां विस हत्थी।।४।।
बड़के डाढ बराह कड़के पीठ कमठ री।
धड़के नाग धराह वाघ चढे जद विसहत्थी।।५।।

।।दोहा।।
चाळराय रे जाळ री झाले जो नर झम्ब।
वळियो दन टळियो विघन आंगण फळियो अम्ब।।१।।
कुम्भ बोलावण काज मावल करे ज मंत।
आमंत्रण सुण आवजो साते बहन सुकत।।२।।
नव दुर्गा नां निमतरां निमतरां नव लाख।
होडां कोडां हरखत हुवे हिंगळाज रथ हाक।।३।।
देह से जंजीरां रोक दुख परा बेड़ी खळपेंच।
बालक तेड़ी आवजे नेड़ी चाळकनेच।।४।।
घट रमण लागो घुमण नव मुख किया निहाल।
माई बिराजे ऊभट सहुवांणी शुभ भाल।।५।।

।।छन्द – रूप मुकून्द।।
शुभभाळक देव संभाळक सेवक झाळ बंबाळक रोख झड़े।
विकराळक सिंह चढे बिरदाळक खेतरवाळक अग्र खड़े।
चख नख सरूप रचे चिरताळक दानव गाळक शंभु दयो।
प्रतपाळक बाळक रोग प्रजाळक जोगण चाळकनेच जयो।।१।।

रणताळक झाळ शत्रां सिर राळक के महिपाळक सेव करे।
चमराळक शीश ढुळाळक चौसठ तेज ऊजाळक भांण तरे।
अकड़ाळक थाट लग ओपत थाट थड़ांलग जांण थयो।
प्रतपाळक बाळक रोग प्रजाळक जोगण चाळकनेच जयो।।२।।

चट पट पाटम्बर पैहर चौसठ नाच अघड अमट नचे।
अटमट मुगट धरे सिर ऊपर रास सुभट प्रगट रचे।
झणणाट सुघट बजे पग झांझर थाट थड़ांलग जांण थयो।
प्रतपाळक बाळक रोग प्रजाळक जोगण चाळकनेच जयो।।३।।

धमधम नचे धमधम बजे घर जेवर पे ठमठम नथां।
नमनम भवानीय चामुण्ड नाचत हैं डमरू डमडम हथां।
चमचम आभुषण अंग चमकत भांण ऊदेगिर जांण भयो।
प्रतपाळक बाळक रोग प्रजाळक जोगण चाळकनेच जयो।।४।।

नमके ध्रमके ठमके पग नुपूर चुड़ भुजां दमके चमके।
क्रमके दुुहू कुंडळ कानन का छत्र आंगळीयां रमके छमके।
समके सिन्दुर री रेख संवारत भाल कंकू अभके भरियो।
प्रतपाळक बाळक रोग प्रजाळक जोगण चाळकनेच जयो।।५।।

चंड मंड घुमंड वेहण्ड के चामुण्ड नव खण्ड अरू ब्रहमण्ड नमे।
प्रचंड हुडंड भुडंड प्रखंडज तंड मुण्डां गळ माळ तमे।
झुण्ड जोगण थुण्ड ऊभंड झटोझट खंड रू चंड वेहण्ड खयो।
प्रतपाळक बाळक रोग प्रजाळक जोगण चाळकनेच जयो।।६।।

भरळक त्रिशुल बने अंग भुषण कोर जरी प्रळक किये।
नचतां खरळक पगां बज नेवर हार नगां हरळक हिये।
प्रळप पहेप का फुल झड़े मुख तेज रवि झरळक तयो।
प्रतपाळक बाळक रोग प्रजाळक जोगण चाळकनेच जयो।।७।।

चलतां ललकार हिलोमिल चौसठ हाक भेरू हलकार हसे।
नचतां भलकार वळोवळ नाचत लाल चुड़ी मलकार लसे।
तिलकां भलकार करे पलकां तिस प्रेत मुखां बलकार पयो।
प्रतपाळक बाळक रोग प्रजाळक जोगण चाळकनेच जयो।।८।।

खळ थोगण थोग आरोगण खुपर छेड़त जोगण जौश छिले।
मद भोगण मांस आरोगण मैमत घाव त्रभोगण देत घिले।
अंग रोग नां भेट ढके पर औगण किरत अमोगण रीत कियो।
प्रतपाळक बाळक रोग प्रजाळक जोगण चाळकनेच जयो–।।९।।

वज डाक त्रंबाक ध्रमाक त्रिशुलवे हाक चंडी नव लाख हमे।
पड़ धाक नरां चड़ चाक प्रथी पर नाक सुरां असुराक नमे।
मदछाक ऐराक पियाक हमे लो वकराक कराक लियो।
प्रतपाळक बाळक रोग प्रजाळक जोगण चाळकनेच जयो।।१०।।

झणणाट बजे नचतां पग नेवर व्योम डंका गणणाट बजे।
खपरां खणणाट हुवे रत खावण छोळ रतरां छणणाट छजे।
नचतां झणणाट पगां पज नेवर छत्र छटा छणणाट छयो।
प्रतपाळक बाळक रोग प्रजाळक जोगण चाळकनेच जयो।।११।।

ब्रहमाणीय वाणीय वेद वंचाणीय जाणीय मानीय चार जुगां।
असुराणीय घांणीय मार ऊडांणीय खेल भवानीय मेल खगां।
सगतांणीय बोहो बहनांणीय साथे नाच रूद्राणीय घाट नयो।
प्रतपाळक बाळक रोग प्रजाळक जोगण चाळकनेच जयो।।१२।।

चाळराय सेहाय बधायसुचारण गाय बजाय रीझाय गुणां।
सुर राय नमो महामाय सुरांपत खाय खळां खफ्रबाज खणां।
गढ गाम देराय चढाय गजांपर आद भवांनीय सहाय अयो।
प्रतपाळक बाळक रोग प्रजाळक जोगण चाळकनेच जयो।।१३।।

बुधवान निधान समो बळवांन हैं थापना थान सुथान थपंग।
मेरवांण होयो सुभियाण मया जांण जुगान जहान जपंग।
“महादान” वरदान व्रवे मन मावल चैन सदा अनुमान चयो।
प्रतपाळक बाळक रोग प्रजाळक जोगण चाळकनेच जयो।।१४।।

।।छप्पैया।।
जात चाळकने जाय आस कर कवियण आवे।
प्रथम दरसण पाय पात नवे निध पावे।
नमो आद अनाद नमो मां चाळकनेची।
गुण गावां हिंगोळ रवेची डुंगरेची।
कोयला शिखर सरसी कळा गढ दांते अम्बा गणी।
सकत मात अरजी सुणे जका बिरदां जोगणी।।१।।

~~महादान महडू

इस रचना को जयादातर विद्वान महादान महडू की मानते है। हालाँकि आवड मां के जनम चरित्र के लेखक मूल सिंह भाटी इसे मावल जी वरसडा की मानते है। शक्ति शुयस मै एक रोमकंद छंद और पाया जाता है एवं इस रचना का कलश छप्पय भी अलग है।
~~प्रेषित: नरपत आशिया “वैतालिक”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *