कांमेही काल़ो नाग

अन्याय, अत्याचार अर अनाचार रै खिलाफ चारणां में तेलिया, तागा अर जम्मर करण री परंपरा ही। किणी आतंक रै डंक सूं चारण शंक’र नीं रह्या। जद-जद किणी राजा, ठाकुर या मधांध मोटै आदमी इणां माथै अत्याचार करण री कोशिश करी तो इणां मोत नै अंगेजण में रति भर ई जेज नीं करी।

ऐड़ी ई एक गरवीली कथा है मा कांमेही रै आत्मोत्सर्ग री। यूं तो आप सुधिजन इण बात नै जाणो पण तोई म्है एकर आपनै पाछी याद दिराय दूं।

हारोबड़ी(गुजरात) रै चारण जसाजी रै घरै कांमेही रो जनम हुयो अर पाखती रै गांम पींपल़िया में ब्याव। लारलै दिनां म्हनै ई पीपल़िया जावण अर मा कांमेही रा दरसण करण रो सौभाग मिलियो। नदी रै कांठै अर हरियल झाड़ां झंखाड़ां रै बिचाल़ै कांमेही रो विशाल मंदिर इण गर्विली गाथा रो साखीधर है। लागै कै इण एकांत में मा कांमेही साक्षात विचरण करती हुवै।

मां कांमेही रै पाखती छोटैक मंदिर में उण मेघवाल़ री खांभी (मूर्ति) थापित है जिको कांमेही रै पीहर रो हो। उण मां कांमेही नै आपरा थण काट’र रावल़ जांम रै लारै फैकती नै अर रावल़ जांम नै भयातुर नाठतां देखियो। वो ई द्रवित अर रीस में आयग्यो। पण करै कांई ? उण विचारी, कै न तो म्है घोड़ै सवार नै पूग सकूं अर नीं इणगत छिड़्योड़ी नागण मा कांमेही नै!! उण आपरी कटार काढी अर आपरै पेट में पैरली। पेट में पैरतां ई उण जोर सूं चिरल़ी करी अर ऐड़ी करुण कूक सूं मा कांमेही रो ध्यान राजा सूं हट’र उण कूकणियै कानी गयो। उणां देखियो कै उणांरै मेघवाल़ ई कटार खायली अर मरण नै पूगण वाल़ो है। मा गुढै आय बोली-

“अरे डीकरा! ओ कांई कियो? तनै आ करण री कांई जरूत ? कांई तनै थारी आई माथै पतियारो नीं हो!!”

मेघवाल़ बोलियो-
“नीं आई ! हूं घोड़ै सवार नै पूग नीं सकियो अर तनै रगत न्हायोड़ी देख नीं सकियो !! म्हारै छेकडला प्रणाम स्वीकारजै!!”

“नीं डीकरा ! हूं तनै साथै ई राखूंली।” कांमेही आ कैय भल़ै रावल़ रै नाठी।

कथा आ है कै मा कांमेही कनै देवांगी अर पांणीपंथी नाम री दो नामी अर उटीपी घोड़ियां हुती। एकर द्वारिका सूं आवतां रावल़ जाम रो डेरो पींपल़िया कनै हुयो। किणी रावल़ जाम नै भरमाय दियो कै कांमेही री घोड़ियां थांरै तबेलै में ओपण लायक है, आप देखण रै मिस मंगायलो। पाछी मांगै तो दिया मत। चारण कांई उजर करसी?

जाम रावल़ आपरा आदमी मेल घोड़ियां आ कैय’र मांगी कै सांझ तक देखर पाछी पूगती कर देवांला। उण बखत कांमेही री सासू अर धणी दोनूं ई घरै नीं हा। जाम रै आदम्यां घणो जिद्द कियो जद घणै तगादे साथै घोड़ियां, कांमेही रावल़ रै आदम्यां नै देय दीनी।

सांझ रा खेत सूं सासू अर धणी आया अर जद पायगै में घोड़ियां बंधी नीं देखी तो पूछियो कै घोड़ियां कठै? कांमेही पूरी बात बताई अर सुणतां ई सासू नै रीस आयगी अर बोली “थारै बाप नै घोड़ियां क्यूं दी ? जा अबार अबार घोड़ियां ला!!”

इतरो सुणतां ई कांमेही नै ई रीस आयगी अर वै आपरी कटार लेय जांम रै डेरै पूगा। कांमेही जावतां ई आपरी घोड़ियां अजेज पाछी देवण री कह्यी। रावल़ कैयो कै घोड़ियां रा दाम देयदूं पण घोड़ियां नीं।

आ सुणतां ई कांमेही आपरी कटार काढी अर कैयो कै “आ दीसै!! इणनै खाय अठै ई देह लीला पूरी करलूं ला।”

जाम केयो – “नीं -नीं भाभी थारा मरण रा दिन नीं। थारा तो घर मांडण रा दिन है!!”

आ सुणतां ई कांमेही कैयो कै- मोरो (अगनी) लागै रै ऐड़ै देवर!!

इतरो कैतां ई कांमेही आपरी कटार सूं आपरो थण काट जाम कानी बगायो। ओ दृश्य देखतां ई जाम री जाड़ां चिपगी। एकर कीं सोच ई नीं सकियो पण दूजै क्षण आपरै घोड़ै चढ नाठो। आगै जांम अर लारै कांमेही आपरै शरीर रा अंग काट -काट बगावती गी। ठेठ जामनगर पूगो जितै जाम चितबगनो हुयग्यौ। भलै मिनखां समझायो कै “थांरै राज थापणा में तुंबेल चारणां रो घणो जोगदान है अर थे ओ अजोगतो काम कियो। अजै ई समय है। कांमेही सूं माफी मांग!! कांमेही तो मा है, अवस माफी देवैला।”

जा़म लोगां कैयो ज्यूं ईज कियो अर पोतियो पगै मेलियो।

कांमेही उणनै माफ करती बोली कै – “म्हारा वचन नीं बदल़ै पण इत्तो कर सकूं कै तूं थारै महलां पीपल़ियै कानी बंद राखसी तो नीं बल़ै। पण याद राखजै कदै ई उठीनै जोयो नीं अर सिल़कियो नीं।”

जाम कैयो कै “हमे आगे आप तागो मत करो। म्है पाटा करावू़ंला!!”

कांमेही बोली कै “चारण इयां पाटां करावैली तो तागै अर जम्मर री मरजादा ई कांई रैवैली?”

जाम डर्योड़ो घणो उठै नीं ठैर सकियो। कांमेही अंतिम तागो कियो। देह निढाल हुई। जाम रो कोई आदमी अग्नि संस्कार करण नीं गयो। उण बखत मारवाड़ रा दो मोटा चारण ई उठै हा। एक भादाजी वणसूर (नांदिया) अर दूजा आसाजी बारठ भादरेस। उणां आपरै हाथां कांमेही री इच्छा मुजब दाघ दियो अर वरदाई बणिया।

कांमेही कैयो कै म्हारी भसम ई अठै सूं ले जाया, इण भसम नै जठै राखोला तो आ देखजो कै जे उणमें जाल़ अर कैर भेल़ा ऊगोड़ा है तो हूं प्रतख उठै हूं। उणां कांमेही री भसम आपरै गांम लाय मंदिर थापिया। जिकै आज ई इण ऐतिहासिक कथा रा साखीधर है।

हालांकि केई लोगां इण घटना ने जाम लाखा सूं तो केई पछै री बतावै पण जामनगर रा कविराज अर यदुवंश जस प्रकाश रा रचयिता मावदान रतनू, कच्छ कलाधर रा लेखक दूलाभाई काराणी इण बात नै जाम रावल सूं संबंधित मानी है। इण बातां सूं ई पक्को अर पुष्ट प्रमाण जाम रावल़ रा समकालीन दिग्गज डिंगल़ कवि मेहाजी वीठू री रचनावां में मिलै। एक समकालीन कवि इण बातनै आपरी रचना में लिखी है जिणमें रावल़ रो स्पष्ट नाम है-

जग वात राखण जल़ण जल़ियुं
बौत मिंदर बाल़ियूं।
आ़गल़ी आग ब्रजाग ऊठी
जा़म रावल़ जाल़ियूं।
रेवंत साथै साथ रावल़
अगन दाघो अंगऐ।
चारणी वडियां पाट चारण
जस्स करनी जग्गऐ।

इण सब बातां नै समेटतां थकां म्है मा कांमेही री अमर कीर्ति में एक पुष्प भेंट कियो है। जिको आपरी निजर-

।।दोहा।।
महि गढवाड़ां मंडणी, जाहर करणी जात।
वैरी उथापण वर्ण रा, महि कामेही मात।।1

ग्यो मांग ले घोड़ियां, जद न्रप रावल़ जांम।
मन विटल़ायो मोटमन, करवा पूठो कांम।।2

लोवड़धर गी लेयबा, पाछा निज पमँगांण।
रावल़ वड लोपी रसा, कीरत वाल़ी कांण।।3

रूप सरायो राजवी, बोल्यो खोटा बोल।
उण पुल़ आई अंब नै, अंतस रीस अतोल।।4

स्वाभिमान कज सांपरत, तिल तिल कीधो तन्न।
जसा तणी ली जगत में, धिन कामेही धिन्न।।5

पींपल़ियो कीधो प्रसद्ध, सद बातां सिरमोर।
कामेही कीरत कल़ा, तर तर बधतै तोर।।6

नव तागा कीधा निमल़, इल़ बातां अखियात।
जाहर जसाई जगत में, सुजस जपां सुखदात।।7

।।छंद-मुकंदडंबरी।।
सुखदात सुणी विखियात सदामत,
पांण दुणांदस जांण पखै।
कट गात कटारिय धारिय कीरत,
राज सुधीरत बात रखै।
जसजोग जसाइय आइय जोगण,
सात्रव सोखण वर्ण सया।
कर रूप कराल़िय नागण काल़िय,
जाल़िय रावल़ जोगमया।।1

सपतास समोवड़ साकुर सोहत,
मोहत भूप अनेक मनां।
गढवां घर आय लुभाय गढप्पत,
कारण रेवँत आप कनां।
बिन देर लगा उण वेर वडांहथ,
दीपत रावल़ सूंप दिया।
कर रूप कराल़िय नागण काल़िय,
जाल़िय रावल़ जोगमया।।2

कँतजामण पूछिय वाज गया कित,
साच नको हणणाट सुणी।
जद जाहर मांड किनी जगजामण,
बात इसी घर मांय बणी।
वरहास रल़ी कज भूप लिया वड,
कारण ना इनकार किया।
कर रूप कराल़िय नागण काल़िय,
जाल़िय रावल़ जोगमया।।3

सुण वैण सासू जद रीस सँपूरण,
बोल उठी मुख सूं बड़की।
महिपाल़ मतंगन केम दिया मुझ,
काण छडी फिर यू़ कड़की।
सत रूप सताबिय भूप दिसा सज,
बीसहथी झट आप बया।
कर रूप कराल़िय नागण काल़िय,
जाल़िय रावल़ जोगमया।।4

भरियो दरबार भलाभल भेल़प,
आयल बाघण रूप अई।
अमणा वड हेवर आप असप्पत,
साख वडानर राख सई।
जद कांन जाडेज करी नहिं जाहर,
मांण दियो नह ध्यान मया।
कर रूप कराल़िय नागण काल़िय,
जाल़िय रावल़ जोगमया।।5

मुख बोल कह्या हल़का बुद्ध-मूरख,
लेस करामत नाय लखी।
रजपूतपणो तजियो रच राफड़,
रीत नको घरवाट रखी।
भगनीपण मेट भणी मुख भावज,
भीत लखासुत नाम भया।
कर रूप कराल़िय नागण काल़िय,
जाल़िय रावल़ जोगमया।।6

झड़ जाय जबान तिहारिय जाहर,
जांम तुंं तो जल़ जाय जठै।
इम वैण जसाइय आखिय आयल,
और बोलै फिर मोर अठै।
पड़ियो जद कूक पगां बिच पांमर,
देख विचारिय मात दया।
कर रूप कराल़िय नागण काल़िय,
जाल़िय रावल़ जोगमया।।7

नव ठौड़ कियो रगतां कर नावण,
भोम रखावण नाम भवा।
नव ही धर तीरथ लोक नमै नित,
साख सबै सिरमौड़ सवा।
झट भूप तणो भमियो चित जाहर,
दीठ जोति दिस मीट दिया।
कर रूप कराल़िय नागण काल़िय,
जाल़िय रावल़ जोगमया।।8

जग गीध कही कथ सीध हुती जिम,
तीख सुण्यो इम कांम तमां।
नहीं जोड़ कल़ा नहीं भाव निकेवल़,
आखर ले स्वीकार अमां।
सिर पांण रखै मुझ होय सहाइय,
काज इयै कवि मांड कया।
कर रूप कराल़िय नागण काल़िय,
जाल़िय रावल़ जोगमया।।9

।।छप्पय।।
महि कामेही मात, बात राखी विरदाल़ी।
रावल़ रै सिर रूठ, करी उण री घर काल़ी।
उजवाल़ी इल़ आप, जात जाहर जग जांणै।
आंणै अंजस ईहग, विमल़ जस सको बखांणै।
मत मुजब गीध कीरत मुणी, सबद -सुमन स्वीकारजै।
जद पड़ै बखत अबखी जठै, धुर तूं भीरत धारजै।।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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