करणी माता रा छंद – कवि खीमदान बारहठ

।।दोहा।।
संकट को हरणी सदा, भरणी जग को भात।
अशरण शरणी आपका, मन रट करणी मात।

।।छंद – रोमकंद।।
जब मानव जट्टीय कुड़ कपट्टीय, काम निपट्टीय नीच करै।
मरजाद सुमट्टीय लोकन लुट्टीय, पाप प्रगट्टीय भुम परे।
कय आपस कट्टीय वारन वट्टीय, देख दुषटिय लोक डरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रुप धरयो।
देवी धिय सुधारण रुप धरयो।।1।।

जद चारण जातीय खुब दुखातीय, कोय न वातीय लाग करे।
जस पूत जगातीय आतुर आतिय, प्रेम निभातीय टेम परै।
खित राकस खातीय रीझ दिरातीय, संत सुहातीय काम सरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धीय सुधारण रूप धरयो।।2।।

चित मैह सुँ चारण वंश वधारण, पुत्र निहारण चाह पड़ी।
भगती किय भारण शकती सारण, घाट उधारण तेण घड़ी।
कुख देवल कारण तो अवतारण, जात सुधारण ताप जरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।3।।

कद रूप कृपालीय माँ वय वालीय, तेज विधालीय ऐण तरै।
किनीया कुल वालीय भुवाय भालीय, दै मुख गालीय नाह डरै।
ठुवलो दिय ठालीय आय अंतालीय, कालीय पाँण वैकार करयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रुप धरयो।
देवी धिय सुधारण रुप धरयो।।4।।

भुयमी हुय भारण ताहि उतारण, किरत धारण वात कयी।
मद दाणव मारण डील से डारण, ज्ञान प्रचारण आय गयी।
सुय भुवाय सारण पाछ पधारण, हाथ सुधारण दुख हरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।5।।

मध आत समाड़िय सांप डसाड़िय, तात जीवाड़िय ऐण तरै।
कज जीत कराड़िय दान दिराड़िय, सेन जीमाड़िय शेख सिरै।
मयहै घर माड़िय पुत्र रमाड़िय, ज्योत जगाड़िय शोक जरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रुप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।6।।

सुवहो धिन सालीय आतम आलीय, दीन दयालीय भाव दख्यो।
सुत देय सिंगालीय जा दुख जालीय, नित निरालीय पै निरख्यो।
भय भूपत भालीय शाह संचालीय, पाव पखालीय ओट परयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।7।।

संग देप संचावत ब्याव रचावत, विठु ही चावत भाग्य बड़ै।
ब्रहम च्यार वचावत जांन मे जावत, ख्यात दिरावत रूप खड़ै।
पति पारख पावत माथ नमावत, सावत गोत्र कहै सुधरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।8।।

अणदे विच आतीय वैत वरातीय, कोड से खातीय आय कयो।
पुण नाम प्रभातीय वो वण वातीय, रातीय माँ घर मैह रयो।
तणरो पय तातीय घृत करातीय, दुख पड़ातीय नाह डरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।9।।

सासरे सुरराईय साठिकै आईय, केलु कराईय कोड किता।
घुर नोबत घाईय मोतीन माईय, जान वधाईय थाल जिता।
दुय एम दुवाईय विछु गंवाईय, त्रास हराईय बोल तरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।10।।

छक न्याय सुछापीय कै दुख कापीय, बैन समापीय दीप बयो।
धण नी जब धापीय बोध वियापीय, प्रही सरापीय खार पयो।
मृत पंथी अमापीय कांत कलापीय, जीवण आपीय आह जरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।11।।

अस्थल नवल वसा वण नूँ अल, कूच करनल कल कियो।
बल बीजल को मुख स्याल करै वल, थल सयंकल वास थयो।
पल चार प्रबल वणै शकती पल, हाथल से खल कान हरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।12।।

दल बल के बिना रिडमल को देवीय, रावल जांगल आप रच्यो।
वल दीध मंडोवर जीत वलोवल, सावल भूप कवल सच्यो।
जंगड़ु जल डुबत तल जहाजन, तें बल मे पल मांय तरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।13।।

देशनोक वसा सुख झोकत देवीय, थोक कुटम्ब भलोक थया।
सुर लोक गयो सुत लाखण को सुण, धोक करै जमलोक गया।
उण ओक विलोकर आतम आणीय, जीवत तो कर शोक जरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।14।।

सिर शेख सड़किय वीज कड़किय, ध्राती धड़किय ध्यान धयो।
दीव्य देह दड़किय आथ अड़किय, लोहड़की झट ओट लयो।
भड़ उद भड़किय जुध जुड़किय, दुष्ट गिड़किय शोभ दरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।15।।

जग जांण जोधांण बिकांण घणै जस, दो बलवान राजांण दिया।
कमधांण घरांण नवांण नृपांकर, दुष्ट अजांण खलां दलीया।
जण जोध सुजांण थपांण विको जीत, भांण कुलां अहसान भरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।16।।

मुलतान मंझारिय आप पधारिय, जैल निवारिय शैख जिकै।
मुख्य मोहिल मारिय कालु संहारिय, धारिय तें तिरशुल धकै।
पत वीक पुकारिय वारमवारिय, काज सुधारिय पार करयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।17।।

अंणदै इक जाविय कुप खोदाविय, मोद रखाविय कै मन मे।
खित ऊंच खिंचाविय आध मे आविय, डोर तुटाविय ता दिन मे।
करनल कहाविय नागण थाविय, डोर जुडाविय ते न डरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।18।।

अमरो सुत जांणीय गाम मथांणीय, संकट पांणीय मेट सबै।
गड़ नाह गिरांणीय होय न हांणीय, आंणीय फैल न रोग अबै।
थिर थांन थपांणीय पाई पुजांणीय, सो सुख मांणीय तें सुधरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।19।।

जुध छापर जावत वीक जीतावत, चोथ संधावत उंठ चंडी।
रथ मोकल रावत सीं जोतरावत, वच्छ जीवावत आप वडी।
परचा परखावत पार न पावत, भोप चांपावत वार भरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।20।।

विप भुषण तेवर धाबल सुंदर, चीर सजै जर रूप चड़ी।
पद नुपर नेवर हेम चुड़ी कर, लाल नगां गल हार लड़ी।
झिल कानन झुंबर सो व्रन केशर, आस्य हिमंकर सो उचरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रुप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।21।।

देशनोक पुरंदर माँ तोय मँदर, कुंगर शीखर क्रीत करै।
अति ऊँदर अंदर पत्थर ऊपर, संगमरमर खोद शिरै।
महा मुरत ते पर छत्र चमंकर, घंट निरंतर पूज घुरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।22।।

सब जांणीय तुँ ब्रहमांणीय सोहत, रांणीय रद्र त्रिलोक रचै।
कहलाणीय तुँ कमला किनीयांणीय, वांणीय खांणीय जीव वचै।
सत पोन समाणीय पावक पांणीय, काम प्रमाणीय बंब करयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप जरयो।।23।।

प्रम रूप तुंहि ब्रह्म रूप तुंहि, भीम रूप तुंहि पुर तीन भजै।
क्रम रूप तुंहि ध्रम रूप तुंहि, श्रम रूप तुंहि जग ने सिरजै।
गुण रूप तुंहि नम रूप सदागत, हिय मोहि भ्रम तुप हरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।24।।

सब काम वणाय अणाय घणो सुख, ईजत मान दिराय अति।
घण संपत आय सदाय हमां घर, साच रखाय हिंये सुमति।
कव खीम कहाय सहाय करनल, तो शरणै महमाय तरयो।
करणी जग कारण पाप प्रजारण, धर्म वधारण रूप धरयो।
देवी धिय सुधारण रूप धरयो।।25।।

।।दोहा।।
तरणी रूप अनेक तुँय, धरणी क्रोड़ धरात।
करणी प्रवाड़ा किया, वरणी जाय न वात।

~~कवि खीमदान बारहठ
प्रेषित: खेतदान जी

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