कवि देवीदान देथा बाबिया (कच्छ) का मरसिया – कवि जाडेजा प्रताप सिंह जी

कवि देवीदान देथा बाबिया (कच्छ) का मरसिया- रचनाकार उनके शिष्य कवि जाडेजा प्रताप सिंह जी

।।दोहा।।
व्याकुल प्रबल वियोग में, अंतर रहत उदास।
देवीदान सुजान का, भगवत भवन निवास।।१

देवा! तेरे दरस को, तरस रहे नित नैन।
मनहर मूरत मन बसै, बिसरत नहि दिन रैन।।२

हरिजन मनसुध बिमल बुध, ग्यान भगति गंभीर।
सुंदर सूरत विगत मद, सदगुन सदन सुधीर।।३

दिल रंजन दरसाइये, देवा निज दिलदार।
इष्ट कृपा कर आइये, दरसन देन उदार।।४

खट ऋतु छिति छबि, छावही, पावहि जन आनंद।
देवा!तेरे बिरह में, रचों त्रिभंगी छंद।।५

।।छंद – त्रिभंगी।।
सरदं ऋतु आई, छिति त्रय छाई, घन गहराई, जरठाई।
नवकुंज फुलाई, नव निशि पाई, रास रचाई, जगमाई।
दिप माल बनाई, साज सजाई, जन सुखदाई, संसारा।
देवा!दिलदारा, इण रुत न्यारा, दरस तिहारा, दे प्यारा।।१

हिम रुत हलकारी, बहत बयारी, सदन अटारी, सुखकारी।
उष्णांबर धारी, तन सिणगारी, भ्रखबलकारी, नर नारी।
शीतल जलधारी, सरयू बारी, हेम पहारी, केदारा।
देवा!दिलदारा, इण रुत न्यारा, दरस तिहारा, दे प्यारा।।२

रुत शिशिर सुखाकर, दत्त दिगंबर, मेला सुंदर, आडंबर।
शिव रात्रि पाकर, सेवत संकर, गावत सुर भर, राग सुधर।
बज तबल मनोहर, ताल मिलाकर, रव बाजिंतर ललकारा।
देवा!दिलदारा, इण रुत न्यारा, दरस तिहारा, दे प्यारा।।३

रुत राज सुहावत, बसंत बधावत, गुनिजन गावत, मन भावत।
होली दिन आवत, मोद मनावत, खेल खिलावत, हुलसावत।
कोकिल सुर फावत, धुम छबि छावत, रास जमावत, अवतारा।
देवा!दिलदारा, इण रुत न्यारा, दरस तिहारा, दे प्यारा।।४

ग्रीषम गहराई, ताप तपाई, जन मन भाई, अमराई।
कुंजन बिकसाई, कुसुम लताई, शीतल भाई, तरु छाई।
सौरभ छहराई, मनहरताई, जल फहराई, फव्वारा।
देवा!दिलदारा, इण रुत न्यारा, दरस तिहारा, दे प्यारा।।५

बरखा रुत जोरं, गरजत घोरं, जलद झकोरं, बन छोरं।
चपला चहुओरं, दमकत दोरं, दादूर सोरं, सर ठोरं।
मल्हार मनोरम, मोर किशोरं, सरित हिलोरं, हलकारा।
देवा!दिलदारा, इण रुत न्यारा, दरस तिहारा, दे प्यारा।।६

रुत अंत न आये, प्रिय बिसराये, हरि पद पाये, मन भाये।
सज्जन बिलखाये, दरसन पाये, बिकल रहाये, गुनगाये।
मन महल बसाये, छबि छहराये, ऐ वरदाये, आधारा।
देवा!दिलदारा, इण रुत न्यारा, दरस तिहारा, दे प्यारा।७

।।छप्पय।।
मानव तन धर देव, सुयस महि पर बिस्तारै।
हरि यश काव्य संगीत, प्रीत की रीत पसारे।
ग्यान कला गंभीर, भक्ति रस को बिलसाए।
जिग्यासु उपदेस, बास हरि सदन बसाए।
कर जुगल जोरि वंदन करों, इष्ट अनुग्रह कीजिए।
दिलदार प्यार कर दिल विसै, देवा दरसन दीजिए।।

~~कवि जाडेजा प्रताप सिंह जी

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