कविता रो प्रभाव

दूहो दसमो वेद,
समझै तैनै साल्है।

काव्य मर्मज्ञां दूहै नै दसमे वेद री संज्ञा दी अर कह्यो कै ओ फखत उणरै काल़जै नै ईज छूवै जिको इणरो मर्म जाणतो हुवै !नीतर आंधै कुत्तै खोल़ण ही खीर वाल़ी बात है। जिणांरै सातै सुआवड़ी हुवै उणांरै दूहे रो मर्म नैड़ैकर ई नीं निकल़ै पण जिकै रै नैड़ैकर निकल़ै, उणनै ओ चित नै चकित करै तो साथै ई चैन ई देवै। आ ई नीं ओ उणरै दिल में दरद उपावै तो साथै ई दवा पण करै-

दूहो चित चक्रित करै, दूहो चित रो चैन।
दूहो दरद उपावही, दूहो दारू ऐन।।

दूहो यानी कविता! कविता उवा जिकी करणी अर पढ़णी में समवड़ हुवै। क्यूंकै –

कविता करबो बोलबो,
बोत काम बारीक।

ऐड़ी असरदार कविता उवो कवि ई कर सकै जिकै रो व्यक्तित्व प्रभावशाली हुवै। ऐड़ै ई एक प्रभावशाली व्यक्तित्व रा धणी हा दूदाजी आसिया।

दूदाजी आसिया सिरोही राव सुरताण देवड़ा रा खास मर्जीदान। जितरी अजरी वाकशक्ति तो उतरो ई भुजा़ं में आपाण। जद रायसिंह चंद्रसेनोत, जगमाल सिसोदिया रै भेल़प में सिरोही राव सुरताण माथै आक्रमण कियो उण बखत दोनां कानी री सेनावां में केई चारण वीरां आपरै बाहुबल़ री जिकी ओल़खाण दी, उवा इतिहास में आज ई अमर है तो साथै ई चहुवांणां रै कानी सूं दूदाजी आसिया अर राठौड़ां रै कानी सूं बारठ ईसरदास देवरिया री दरसाई वीरता सोनलिये आखरां में अंकित है।

राठौड़ां री वीरता रै आगै चहुंवाण पतल़ा पड़िया अर जुद्ध में ओला तकण लागा उण बखत सेना रै हरोल़ में आय नामी धर्नुधर दूदैजी आसिये आपरै तीखै तीरां सूं राठौड़ वीरां रा काल़जा कंपाय सिरोही री आबरू राखी।

जुद्ध रा साखीधर दुरसाजी आढा लिखै-

गहरी देखै गज घटा, सब भग्गा चहुंवाण।
उण पुल़ दूदै आसिये, कर ग्रहिया कब्बाण।।

इणीगत ईसरदास बारठ ई आपरी अमामी वीरता बताय सुरगगामी बणिया। समकालीन कवि देवराज रतनू लिखै कै जिणगत ईसरदास मोटो बोलतो उणीगत मोटम राख’र वीरगत वरी। उण जुद्ध में जिकै नायक हा उवै तो नीसरिया अर ईसर तरवारां झाली-

अइयो ईसरियाह, बारठ आडा बोलणा।
नायक नीसरियाह, तूं बढियो तरवारियां।।

इण जुद्ध पेटे इतिहासकार रघुवीरसिंहजी सीतामऊ ‘वीर सतसई री भूमिका में लिखै-
“जाडाजी मेहडू, ईसरजी बारठ युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। महाराज सिरोही की ओर से दूदाजी आशिया लड़े, उन्होंने अपनी धर्नुविद्या से शाही सेना को तितर- बितर कर दिया था।”

उण जुद्ध में राव सुरताण री फतह हुई पण जद बीकानेर महाराजा रायसिंहजी पातसाह अकबर रै आदेश सूं सिरोही माथै हमलो कियो उण जुद्ध में रावजी री हार हुई। हार ई नीं हुई बल्कि राव सुरताण नै बीकानेर वाल़ां पकड़ कैद कर बीकानेर ले आया।

दयालदासजी सिंढायच आपरी ख्यात में लिखै-
“पीछै सीरोही मै थाणो राख महाराज वीकानेर पधारिया। अरु सुरताण नूं बंध कर लाया वा नवघरै ऊपर राखियो।”

उण बखत दूदोजी आसिया बीकानेर आय महाराजा रायसिंहजी रै हाजर हुया। दरबार लागो अर दूदैजी आपरी ओजस्वी वाणी में निपख भाव सूं महाराजा री सिरोही में दरसाई वीरता री मुक्तकंठ सूं प्रशंसा करी।

कवि लिख्यो कै-

“सिरोही रै विकट भाखरां रै सिखर पूग’र अर रायसिंह निसंक अचल़गढ माथै आपरा घोड़ा फेरिया। देवड़ां, रायसिंह सूं डरतां चूं ई नीं करी। जणै उणां री सहुआल़िया़ं आप-आपरै खांमधां नै अभैदान देवण री विणती की-
पूजवै सिंघ पाहाड़ सिर पांगरां।
कमंध अस फेरिया अचल़ रै कांगरां।
हुवै हैकंप तिण वार वीजड़हरां।
वीनवै अभै मांगत त्रिय नूं वरां।।

दूदाजी आपरी दूजी कविता में कह्यो कै-

किणगत काल़ीझर, चितौड़, लंकागढ, आद नै धूंसण सारू उण वीरां वरसां तांई घेरो दियो राखियो
जदकै रायसिंह तो आयो अर एक घड़ी में आबुवां नै पाधरा कर दिया–

कालंझर घेर्यो नवलाख असवार मिल,
सूर सकबंधी जुर मुवां आप वल में।
चितावर घेर्यो सुलतान हूं अलावदीन,
बारा वरस जुध कलकांत भयो दल म़े।
लंकागढ रामचंद छेकियो छ मास धकै,
रात हू दिवस काई सुनी नाय कल में।
आबू गढ काढ्यो च्यार जोजनहू ऊंचो बढ्यो,
घोरा चढ रायसिंघ घेर्यो एक पल में।।

कविता सुण महाराजा रीझिया अर कह्यो –
“म्हारो दिल जीत लियो कविवर! हूं तूठो चाहो सो मांगो!”

आ सुण दूदैजी कह्यो-
“हुकम रीझिया हो तो वचन दिरावो। ”

रायसिंहजी कह्यो- “ऐ वचन!”

जणै दूदैजी कह्यो –
“हुकम ! मूल़ो पानां सूं फूठरो लागै। राव सुरताण आपरी कैद है जणै म्हांरो जमारो ध्रिग है। आप राजी हो तो रावजी छूटणा चाहीजै।”

दूदैजी रै त्याग अर स्वामीभक्ति माथै प्रसन्न होय महाराजाजी कह्यो –
“कविवर ! सिरोही अर राव सुरताण थांनै दिया।”

दयालदासजी लिखै-
“तिण पर माहाराजा सीरोही अर सुरताण दूदै नूं बगसिया।”

किणी समकालीन कवि रो इण विषय में एक दूहो साखीधर है-

सीरोही सुरताण सूं, लीधी तैं रासल्ल।
दीनी महीणा दोय सूं, गढां उबारण गल्ल।।

किंवदंती तो आ ई है कै राव सुरताण, दूदाजी रै इण काम सूं इतरा प्रभावित हुया कै उणां सिरोही आय, सिरोही कविश्रेष्ठ दूदाजी नै इनायत करदी। जणै दूदाजी कह्यो कै –
“हुकम ! डूंगरां माथै छिंयां नीं हुवै! कामां ज्यांरां जामा है। राज आपनै ओपै, म्हैं आपरा कविराज ओपां। सिरोही आपरी है जणै ई म्हांरी है।”

जणै रावजी उणांनै वलदरा गांम अर करोड पसाव देय सम्मानित किया-

बाव बंधणो वड़दरो, त्रिणसै सात निवांण।
लाभै दूदो आसियो, दियै राव सुरतांण।।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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