काव्यशास्त्र विनोद का अनूठा मंच काव्य-कलरव पटल

हमारे काव्यमनीषियों ने लिखा कि विद्वान एवं गुणी लोग काव्यशास्त्र विनोद में अपना समय सहर्ष व्यतीत करते हैं जबकि मुर्ख व्यक्ति का समय या तो नींद लेने में बीत जाता है या फिर परिजनों एवं परममित्रों से कलह करने में ही मुर्ख व्यक्तियों का समय बीतता है।-

काव्यशास्त्र विनोदेन कलोगच्छति धीमताम
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रहया कल्हेनवा। 

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब लोग साहित्य तथा स्वाध्याय से कटने को विवश है तथा यदि कोई संस्कारवश रुचि भी रखता है तो उसे सद साहित्य की संगत मिलना बहुत मुश्किल भरा काम है।  यही कारण है कि आज लोगों के जीवन में तनाव की भरमार है।  आलम यह है कि भारत जैसे देश में ‘तनाव प्रबंधन’ एवं बॉडी लेंग्वेज के कोर्स चलाने पड़े हैं।  लोगों के पास मनोरंजन एवं विनोद का कोई उत्तम साधन नहीं रहा।  टीवी एवं सोशल मीडिया दोनों की हालत यह है कि उनसे जुड़कर व्यक्ति बेहद भयभीत होने लगा है।  धारावाहिक देखो, समाचार सुनो, व्हाट्सएप या ट्विटर पढ़ो सब जगह नैराश्य फरेब धोखा एवं पारस्परिक विश्वासघात के हादसों की भरमार को देखकर अच्छाखासा आदमी बीमार जैसे महसूस करने लगा है.

कहते हैं की ‘निर्बीज भूमि कबहू ना होई’ यह धरती निर्बीज नहीं होती अतः  ऐसे विकट समय में  भी साहित्य ने नवीन मंचों के माध्यम से विद्याव्यसनी लोगों को आशा की नवीन किरण दिखाई है।  ऐसी ही एक आशा की रमणीय रश्मि का नाम है ‘काव्यकलरव व्हाट्सएप समूह’. इस समूह के निर्माण एवं संचालन की बात फिर किसी अंक में करेंगे। आज तो  इस पटल के काव्यशास्त्र विनोद की एक झलक आप सुधिमित्रों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत करने का मन हुआ।  आशा है आप विद्याव्यसनी मित्रों को इसे पढ़कर आनंद की  प्राप्ति होगी।

पृष्टभूमि इतनी सी है कि दो दिन पहले काव्यकलरव पटल पर हमारे विद्वान एडमीन वरिष्ठ कवि श्री मोहनसिंह जी रतनू ने विनोदवश एक दोहा लिखा, जिसमें उन्होंने कहा की व्यक्ति को नित्यप्रति दो पेग वारुणी का सेवन करना चाहिए और दूसरी पंक्ति में इसके गुणावगुण का ब्यौरा देते हुए कहा कि अभी सावण का महीना है इसमें तो शराब सेवन मना है उसके बाद भले ही आप रोज रावण बनना।  अन्वय से अर्थ यही था कि शराब का सेवन करना आसुरी वृत्ति है अतः जो शराब पान करता है वह रावण सदृश है।  कलरव पटल की यह खासियत है कि यहां पूर्वनिर्धारित विषय नहीं होने के बावजूद प्रतिदिन यकायक कोई विषय चर्चा का आधार बनता है और कवियों द्वारा अपने काव्यमय तर्कों से आलोच्य विषय का सांगोपांग विवेचन होता है।  उस दिन भी यही हुआ।  मोहन सिंह सा के उक्त दोहे के प्रत्युत्तर में पटल के बहुत से विद्वानों ने अपने अपने तर्क देने शुरू किए।  इस दौरान कवि नीतिराज जी सांदू  एवं मेरे मध्य हुई काव्य-हथाई  बिना किसी भूमिका के आप सब विद्वजनों के काव्य विनोदार्थ प्रस्तुत है –

एडमीन मोहनसिंह सा रतनू
दोय पैग दारू तणा,डैली लैणा डोज।
सावण बित्यां सायबा,रावण बणजै रोज।।

डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’
सावण माँहीं सोरको, बिन आसव बेचैन।
पल भी पेग न पांतरै, मोहन इसड़ो मैन।।

नीतिराज सा सांदू
सकल पदारथ साज, ईश्वर जग ने आपिया।
कहो मिलै किम काज, निरभाग्या ने नीतिया।। 

डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’
अवनी रतन अमोल, मोल ज्यांरो हद मोटो।
तंत मंत सूं तोल, तनिक नहं आवै तोटो।
समझ्यां बिना सुजाण, हाण घर माँहीं होसी।
ऊँधा-सूँधा अरथ, जबर कर बणिया जोसी।
‘गजराज’ समझ सांदू गुणी, पात राह मत पांतरो।
सजन इती सी सीख है, आसव सूं रख आंतरो।।

डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’
आटो घाटो नहं करै, खाटो भी न खराब।
नेम धरम सूं नीतिया, संकट देय शराब।।

नीतिराज सा सांदू
 बिन आसव बेकार, मानवी तन जग मोटो,
प्यालो माँ परसाद, खरो कुण केवै खोटो।
उच्चरे वेदा आप, सोमरस नाय सरिखो,
होमे अगनी हवन, फगत ना लागै फीको।।
कव सान्दू नीतो कहै, सुरपत वाहण साज रे।
हजार रोग तन रा हरै, कहो बुरो किम काज रे।। 

डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’
तरक तकड़बंद तोय, फरक नहिं ‘नीता’ फेरूं।
वारुणी तज इण वार, सार इण माँहीं सेरूँ।
वेदां हंदी बात, रात री घातां रळगी।
सुरापान रै साथ, मिलण री टेमाँ टळगी।
कवि गजादान साची कहै, आसव पास न आणजे।
संतां हंदी सीखड़ी, जकी साच कर जाणजे।।

डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’
अब सो ज्याओ ओलियां, तपग्या फोन तमाम।
कॉलेज जाणो काल भी, करणा नितप्रत काम।।

नीतिराज सा सांदू
निर्भय मोटो नाम, जगत मे मानव जाणै,
पाता वेद पुराण, बहुविध तौय बखाणै।
रतन अमोलक रूप, देवता दानव दीठो,
ऊपज्या कुल़ अनुरूप, मुदै मन लागत मीठो।।
ऐक ही कुख जनम्यां अवस, बा भगनी तू भ्रात रे।
कव सान्दू नीतो कहैं, हरख हियै रख हाथ रे।।
एक ही कुल़ यानी समुद्र मंथन मे गजराज व वारूणी का जन्म होना🙏🙏

डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’
सोयाँ पाछै समपियो, सांदू ओ संदेस।
पढ़ियो उठ शुभ प्रात में, लागी वात विसेस।।
लागी वात विसेस, पड़ूतर सांभळ पाछो।
जे जचज्या जिय मांय, आखजे कविवर आछो।
दाखै कवि ‘गजदान’, ईश मानव तन अपियो।
पक्को असुरां पेय, (जो) सोयां पाछै समपियो।

डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’
साची कही सुजाण, जकी सब दुनियां जाणै।
समदर जलम्या सबै, कव्यां मुख रतन कहाणै।
अड़थड़िया सुर-असुर, माल लेवण मनचायो।
नारायण कर न्याय, प्रकत सारू पकड़ायो।
तब सुरा दिवी असुरांन को, (यह) साफ साफ संकेत है।
कवि ‘गजा’ वही वारुणि वरै, (ज्यांनैं) असुरपणै सूं हेत है।।

नीतिराज सा सांदू
मझ कलयुग रे माय, देवता केत दिखावै,
मानव दानव मूल, खूब ऐ लुटै खावै।
दुष्ट प्रवृत्ति देख, अवन पे छाई आखै,
जिणरे जुल्मा जोय, भला नर कोई क भाखै।।
सकवि सुण बाता सही, सुरनर लोक सिधायगा।
असुर करत अरड़ाट अवन, पथ खो आसव पायगा।

डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’
सांदू ली स्वीकार, जूण असुरां री जीणी।
रतन रेत में राळ, प्रतख-विष दारू पीणी।
पह मिथ्या परमाण, पटक कर साच पगांथे।
आसव लेय आरोग, अहर निस ऊगे-आंथे।
आ अवनि बीज राखै अखी, परकत चाल न पांतरै।
कवि ‘गजादान’ बर-बर कहै, (इण) आसव नैं रख आंतरै।

डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’
आसव में अपराध, रह्यो है घुलियो रैसी।
आंख मींच अंधेर, कितीयक देर करोला।
फीफ़र सड़सी फेर, भवोभव दंड भरोला।
घर-हाण लोक-हाँसी घणी, बणी बातड़्यां बीगड़ै।
कवि गजादान बर बर कहै, (तू) आसव हित मत अड़थड़ै।।

डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’
ताजा तरक सतोल, एक सूं एक अनूठा।
दाखै कर कर दाय, पड़ै नहिँ कुबधी पूठा।
तळै पड़्यां भी टाँग, अहर-निस राखै ऊपर।
कळह-नीर रा कूप, भूप इसड़ा घण भू पर।
रसा रा रतन अळगा रख्या, छोड़ अमी दारू चखी।
कवि गजादान बर बर कहै, (जो) दुरविसनी सो दोज़खी।।

डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’
पी दारू पड़ जाय, खाय नहीं खांवद खाटो।
कुढ़-कुढ़ सुखी काय, घरणि घर भोगै घाटो।
बोलै अबढा बैण, नैण सूं गीड निकाळै।
राळै रिश्ता रेत, भूल नहिँ घर नैं भाळै।
कबु भलो काम रंच न करै, खंच करै बहु ख्यांत रो।
कवि ‘गजादान’ कितरो कहो, (ऐ) आसव रखै न आंतरो।।

इस पूरी काव्य हथाई का अर्थ यह कतई नहीं है कि कवि मोहनसिंह सा रतनू एवं नीतिराज सा सांदू शराब सेवन के समर्थक हैं।  इसे इस रूप में समझिए कि हमने अपनी अपनी भूमिकाओं का निर्वहन किया है।  व्यक्ति की बजाय बुरी प्रवृत्ति पर प्रहार का प्रयास किया है।  नीतिराज सा ने शराबी की ओर से अपने पक्ष में गढ़े जाने वाले तर्कों के बहाने व्यंग्यात्मक शैली में उस प्रवृत्ति की बखिया उधेड़ी है।  मैं उनकी संचेतना एवं विद्वता को नमन करता हूँ और इतनी आशा अवश्य करता हूँ कि अब इस पूरी वार्ता के सकारात्मक समापन हेतु कवि नीतिराज सा मेरे तर्कों का समर्थन करते हुए एक शराबी से अपनी गलती एवं भूल स्वीकार करवाते हुए यह घोषणा करवाए कि शराब का सेवन किसी भी रूप में सही नहीं है।
अपनी बात को निम्नांकित काव्यपंक्तियों के साथ संपन्न करना चाहूंगा –

नहं ‘नीतो’  दारूड़ियो, ना ‘मोहन’ मदहोश।
सोच समझ कविता सरस्, हम रचते रख होश।
हम रचते रख होश, तर्क गढ़ते हैं तैसे।
गुण -अवगुण सब गोख, प्रकट परकाय प्रवेसे।
कहे ‘गजो’ कविराय,  पटल कलरव को  पढ़िए।
जीवन ज्योति संजोय, शिखर उन्नति-गिरि चढ़िए।।

~~डॉ. गजादान चारण “शक्तिसुत”

 

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