खोटे सन्तां रो खुलासो – जनकवि ऊमरदान लाळस

।।दोहा।।
बांम बांम बकता बहै, दांम दांम चित देत।
गांम गांम नांखै गिंडक, रांम नांम में रेत।।1।।

।।छप्पय।।
अै मिळतांई अेंठ, झूंठ परसाद झिलावै।
कुळ में घाले कळह, माजनौ धूड़ मिलावै।
कहै बडेरां कुत्ता, देव करणी नें दाखण।
ऊठ सँवेरे अधम, मोड चर जावै माखण।
मुख रांम रांम करज्यो मती, म्हांरो कह्यो न मेटज्यो।
चारणां वरण साधां चरण, भूल कदे मत भेटज्यो।।2।।

।।दोहा।।
खळ तिण री खोटी करे, पापी अन जळ पाय।
मौको लागां मोडिया, चेली सूं चिप जाय।।3।।

।।छप्पय।।
मारग में मिळ जाय, धूड़ नांखो धिक्कारो।
घर माहीं घुस जाय, लार कुत्ता ललकारो।
झोळी मांला झाड़, रोट गिंडकां नें राळो।
दो जूतां री दोय, करो मोडां रो काळो।
कुळ न्यात हीण फीटा कुटळ, जिके बिगाडू जात रा।
मम सेंण बात सुणज्यो मती, रहण न दीज्यो रात रा।।4।।

।।दोहा।।
गृह धारी ओड़ां गिणां, नर थोड़ां में नेक।
भेक लियोडां में भला, कोड़ां मांही केक।।5।।

।।छप्पय।।
स्यांन छोड वहै साध, रसा माता पितु रोवै।
सुत तिरिया दुख सहै, जिकण दिस फेर न जोवै।
ढूंग उघाड़े ढगळ, पूंछ मुख घुरड़ मुंडावे।
जन्मभूमि में जाय, भीख ले जन्म भुंडावे।
नर देह धार सोचो नरां, गोळी दे के गौर री।
निज लाज सरम पाखै नहीं, ऐ कद राखै और री।।6।।

।।दोहा।।
सांडां ज्यूं ऐ साधड़ा, भांडां ज्यूं कर भेस।
रांडां में रोता फिरै, लाज न आवै लेस।।7।।

।।छप्पय।।
जिकण लाज नें जीव, कांम निस दिवस कमावै।
जिकण लाज नें जीव, करज कर भला कहावै।
जिकण लाज नें जीव, धरा पहली उठ धावै।
जिकण लाज नें जीव, आज लग देता आवै।
च्हारही वरण सुणजो चतुर, पाज पुकारे पेज में।
आ लाज सरम कुळ री अबै, साध गमावै सेज में।।8।।

।।दोहा।।
खाय खला खर खलक में, पला पाप रा पेख।
सला भलां री आ सदा, भला न लेवै भेख।।9।।

।।छप्पय।।
रुळ्या खुळ्या रजपूत, बिरांमण मिळगा बिटळा।
वैश्य मिळ गया विकळ, शूद्र कुळ रळगा सिटळा।
चौड़े धाड़ै चोर, ढंग बिन ढेढस ढेढी।
जिके नहीं किण जोग, मिळ्या घर घर रा मेढी।
चांपज्यो मती वांरा चरण, कांप कांप रो कीचड़ो।
फांप री देर मुख फेरज्यो, खांप खांप रो खीचड़ो।।10।

।।दोहा।।
बोदा रे आडा बहै, सोदा मिळ नै सेंग।
भूखोड़ा भँवता फिरै, लाडू खावै लेंग।।11।।

।।छप्पय।।
मारवाड़ रो माल, मुफत में खावै मोडा।
सेवक जोसी सेंग, गरीबां दै नित गोडा।
दाता दै वित दांन, मौज मांणै मुरसंडा।
लाखां लै धन लूट, पूतळी पूजक पंडा।
जटा कनफटा जोगटा, खाखी पर धन खावणा।
मरुधर में कोड़ां मिनख, करसा एक कमावणा।।12।।

।।दोहा।।
सांधा जोड़े साधड़ा, साधां तोड़े संग।
दरसण दे लेवै दिरब, आंधा भींत अनंग।।13।।

।।छप्पय।।
देदे दरसण दौड़, कितां घर सूंना कीना।
देदे दरसण दौड़, लूट केतां धन लीना।
देदे दरसण दौड़, भेद घर रौ लै भारी।
देदे दरसण दौड़, निलज भागै ले नारी।
त्यागो फळ दरसण तणों, करदे खोटी करसणां।
कर जोड़ इतो थोरो करूं, दीज्यो मोरो दरसणां।।14।।

।।दोहा।।
बिदर-सहेल्यां बीच में, हँस-हँस मारै होड।
चेली सूं चूकै नहीं, मौकौ लागां मोड।।15।।

।।छप्पय।।
फबे जूत सिर फूल, पत्र सोइ पटक पछाड़ै।
फळ ढूंगां में फाड, तोय बांसां सूं ताड़ै।
धक्का मुंक्की धूप, दीप लातां रौ देवै।
नाक भांग नैवेद, साथ पद इण बिध सेवै।
घट मार दंड घंटा घुरे, ठीक कळेजौ ठारती।
उतारे कोइक सेवक इसा, आं सन्तां री आरती।।16।।

~~जनकवि ऊमरदान लाळस

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