कीनी क्यूं जेज इति किनियांणी!! – जंवारजी किनिया

आजकल किसी चमत्कार की बात लिखते हुए ऊहापोह की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि लोग अंधविश्वासी घोषित करते हुए जेज नहीं करते !! कुछ हद तक यह बात सही भी है कि आजकल स्वार्थी लोग मनगढ़ंत बातों को प्रचार का सहारा लेकर प्रसारित कर दुकानदारी चलातें हैं।

मैं आपसे उन लोगों के संस्मरण साझा कर रहा हूं जिनके हृदय में अगाध आस्था और भक्ति की भागीरथी प्रवाहित होती थी।
मेरे दादोसा (गणेशदानजी रतनू) का ननिहाल सुवाप था। वे अपने ननिहाल का एक संस्मरण सुनाते थे कि सुवाप में जंवारजी किनिया थे। उनके एक ही पुत्र था। पुत्र जवान हुआ और एक दिन दोपहर को अकस्मात काल कवलित हो गया। लोगबाग अर्थी बनाने लगे तो जंवारजी ने दृढ़ता से मना कर दिया और कहा कि “भूवा अवस हेलो सुणसी।”

उन्होंने मृत देह के पास बैठकर एक गीत कहा जो अविकल रूप से आपसे साझा कर रहा हूं। कुछ लोग भूलवश इस गीत को जंवाहरदानजी रतनू थूंसड़ा का बताते है जो कि वस्तुतः गलत है।

जब यह गीत मेरे दादाजी सुनाते थे तब उनकी आंखों में अविरल अंश्रुधारा प्रवाहित होती थी।

।।गीत।।
कीनी क्यूं जेज इती किनियांणी,
धणियांणी नह और धणी।
खाती आव रमंती खेल़ा,
वेल़ा अबकी आंण बणी।।

अवलंब नको दूसरो अंबा,
जगतंबा किणनै कहूं जाय।
म्हारै जोर आपरो मोटो,
धाबल़वाल़ चाड सुण धाय।।

सात दीप हिंगल़ाज सगत्ती,
मनरंगथल़ धिन माता।
सांभल़ अरज कहै इम सकवी,
खड़े पधारो खाता।।

आवड़जी री आंण ईसरी,
करनी जेज न कीजै।
रोग पिसाच न रहै अंग नैड़ो,
देवी ओ वर दीजै।।

आद अनाद सगत अजोनी,
पाल़ण समरथ पातां।
प्रगट करो नवो परवाड़़ो,
जाय नहीं जुग जातां।।

ब्रह्मा विस्नु महेस सेसवर,
एको थांन अखंडी।
सेवग सदा जंवारो सरणै,
चाकर थारो चंडी।।

उक्त गीत को वे पूरी रात पढ़ते रहे। भखावटे (सूर्योदय से काफी पहले का समय) उनकी कौटुम्बिक चांदा भुवा जो कि बाल विधवा थी और वहीं रहती थी के रूप में करनीजी स्वयं आई और कफन से ढके उनके पुत्र के पास जाकर कहा

“अजै कांई सूतो हे रै!! उठ ज्या!!”

और जंवारजी को संबोधित करके कहा कि “जंवारा ओ तो सूतो है उठा इणनै।”

इतना कहकर वे वहां चली गई जहां महिलाएं बैठी थी।

इसे देवीय संयोग कहा जाए या करनीजी का चमत्कार कि जंवारजी का पुत्र उठ खड़ा हुआ। लोग दौड़कर महिलाएं बैठी थी, वहां चांदाभुवा के पास गए लेकिन वहां कोई चांदाभुवा नहीं थी। महिलाओं ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि यहां कोई चांदाभुवा नहीं आई। लोगों को विश्वास हो गया कि जंवारजी की करुण पुकार सुनकर करनीजी स्वयं चांदाभुवा के रूप में आई थी।

~~प्रेषित: गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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