कूड़ लारै, धूड़!!

जोधपुर रै थल़वट इलाकै रो जुढियो गांम आपरी साहित्यिक अर सांस्कृतिक विरासत रै पाण चावो रह्यो है। इणी जुढिये में सोनथल़ी (एक धोरै रो नाम) माथै थल़वट री आराध्या देवी सैणीजी रो मढ(मंदिर) है–

धिन-धिन रै धोराह, वेदासधू विराजिया।
सकवी रह सोराह, सरण तिहारी सैणला।।

सैणीजी रै कारण ई रियासत काल़ में जुढियो प्रसिद्ध अर गजबंध गांम मानीजतो-

प्रथम शेरगढ परगनै, गजबंध जुढियो गांम।

ओ ई कारण हो कै इणनै कवियां जोधाण रै बरोबर मींढियो–

तखत दोहूं तड़ोबड़ै, जुढियो नै जोधांण।
उत राजावां बैठणो, (ओ) सैणी तणो सुथांन।।

अठै साहित्यकारां री एक लंबी श्रृंखला रैयी है। जिणां में पीरदानजी लाल़स, जीवणजी, रामचंदजी, रामदानजी, आवड़दानजी, नवलजी, नाथूरामजी, धूड़जी, पन्नारामजी आद नाम घणा चावा है।

जुढियो गांम ईंदावटी रै धणी सिखरैजी उगमावत, लूणैजी लाल़स नै दियो-

पसाव लाख मोती पमंग,
कव लूणो अभरी कियो।
साख रे रूप ईंदे सिखर,
दत सांसण जुढियो दियो।।

सिखरोजी, खेड़ रा धणी मल्लिनाथजी अर राव जगमालजी रै जोगतै राजपूतां मांय सूं एक हा। जिणांरै विषय में ओ कैताणो घणो चावो है कै ‘सिखरो बहल़ेवै गयो रैसी।

इणी सिखरैजी, लूणैजी लाल़स नै जुढियो गांम इनायत कर’र कवि रो आघ बधायो।

उनीसवें सईके में आं लूणैजी री ई परंपरा में शंभुदानजी हुया। आं शंभुदानजी रै एक बेटे रो नाम हो नाथूरामजी लाल़स। आं नाथूरामजी रो जनम वि.सं.1836 रै लगटगै जुढिया में लाल़स शंभुदानजी रै घरै हुयो।

नाथूरामजी लाल़स री बातां लोखमुख माथै घणी चावी है। जद ऐ बातां सुणां तो महाराजा मानसिंहजी रा चारण कवेसरां रे पेटे कह्यै अंतस रै उद्गारां री इण पंक्ति रै पेटे दृढता अर पतियारो चौगणो बध ज्यावै। जद उवै, कैवै कै-

‘स्वामीभक्त सत्यवक्ता रू वचनसिद्ध’

यानी चारण कवियां री स्वामीभक्ति, सत्यवादिता अर वचनां री सिद्धाई असंधिग्ध अर वारणाजोग ही।

आ बात कोई घर-धणी कै गांम-धणी कैवतो तो थोड़ो सोचणो पड़तो पण जद आ बात नवकोटी मारवाड़ रा धणी मानसिंहजी खुदोखुद फरमावै तो पछै शंकै कै गिचरपिचर री जागा ई नीं रैवै। क्यूंकै उवां कैयी ही तो कीं धार विचार’र ई कैयी ही। मतलब परख’र कैयी। क्यूंकै राजा रो बोल ई उण बखत आदेश अर प्रमाण-पत्र हो।

ज्यूं-ज्यूं आपां मानसिंहजी नै पढांला त्यूं-त्यूं उवां री संवेदनशीलता रा दाखला आपांरै साम्ही आवता जावैला। मानसिंहजी रै दरबार में उण बखत जुढिये रा केई कवेसर आपरी प्रज्ञा अर प्रतिभा री ओल़ख देय प्रतिष्ठा पाई। जिणां में ईज एक नाम हो नाथूरामजी लाल़स रो।

नाथूरामजी नै शंभुदानजी रा ई कौटुंबिक भाई रामदानजी आपरै खोल़ै(दतक पुत्र) ले लिया हा। रामदानजी डिंगल़ रा दिग्गज कवि अर ठावका मिनख हा पण ईश्वर संतति जोग नीं दियो। जणै इणां नाथूरामजी नै आपरै खोल़ै लेय शिक्षा दी अर एक श्रेष्ठ कवि बणाया। रामदानजी नै मानसिंहजी तोल़ैसर गांम जागीर में दियो। ऐ आपरी उदारता अर सरल़ता कारण चावा हा–

घीयां आधण घात, पांत जीमावै पांतिये।
नमो तौल़ैसर-नाथ, ईढ करै कुण आपरी।।

नाथूरामजी ई डिंगल़ रा जोगता कवि, मिनखाचार सूं मंडित अर साच रा साक्षात रूप हा। उणांरी बातां लोखमुख सूं सुणां जणै मानसिंहजी रो आखर-आखर सोल़ैआना साचो लागै। ज्यूं मध्यकाल़ रै मोकल़ै वीर नायकां री आखड़ी(नियम, प्रण) पाल़ण री बातां चावी है। जिणांमें रामदास वैरावत, अमरसिंह कल्याणमलोत, जैमल मेड़तिया आद आपरी आखड़ी पाल़ण री द्रढता रै पाण चावा रह्या हा। उणीगत नाथूरामजी रै चार ई आखड़ी ही कै

  1. सदैव साच बोलणो
  2. व्यभिचार नीं करणो
  3. दुखी अर गरीब नै नीं सता्वणो।
  4. मांस मदिरा रो सेवन नीं करणो।

इण च्यारूं आखड़ी री पाल़णा, वै द्रढता रै साथै करता। इण पेटे नीं तो व्है दबाव सैवता अर नीं किणी लालच में आवता। कोई पण रंग नीं चढतो–

सज्जन सज्जन सब करै, सज्जन महा विमेक।
बो रंगा बोतै मिल़ै, इक रंगा कोइ एक।।

इणांरै महादेव अर सैणीजी रो घणो इष्ट हो। सैणीजी रै प्रति तो इणांरै अंतस में अगाध आस्था ही। आ आस्था उणांरै केई गीतां में प्रगटी है-

दीधो सुख जिको प्रथम तैं दीधो,
दे छै फेर तिहारी दाय।
देसी सोय फेर तूं देसी,
म्हनै सुख संपत महमाय।।

एक’र सोनथल़ी माथै कवेसर सैणीजी रो स्तवन कर रह्या हा। नाथूरामजी ई एक गीत पढियो। जिणरी पैली ओल़ी ही-

आई सैणला जुढिये थेह ऊभी,
खाग लियां खल़ खंडी।

इणमें आए ऊभी शब्द नै सुण’र इणी गांम रा सिरै कवेसर आवड़दानजी कह्यो कै-
“तो कांई सैणला अठै ऊभी ईज रैवैला ? विराजै नीं कांई?
कांई डोकरी ऊभी थकै नीं!”

आ सुण’र नाथूरामजी कह्यो कै-
“हुकम आप फरमावो ! हूं चूको।”

जणै आवड़दानजी एक गीत कह्यो। उणरो पैलो दूहालो इयां है–

भांजण केवियां त्रिशूल़ लियां भुज,
दुख मेटण सुख दैणी।
बीसहथी सिरताज विराजै,
सांप्रत जुढिये सैणी।।

इणी आवड़दानजी अर रामदानजी रै बिचाल़ै पुश्तैनी बंट नै लेयर मनमुटाव बधग्यो। दोनूं ई प्रभावशाली मिनख हा जणै किणी छोटे-मोटे री दखल दैण री हिम्मत नीं हुई। सेवट आवड़दानजी, मानसिंहजी नै रामदानजी री शिकायत करी अर कह्यो कै-
“रामदानजी घणाघणी कर रह्या है। सो आप म्हांरां धणी हो। न्याय करावो।”

आ सुण’र मानसिंहजी कह्यो कै–
“म्हारै सूं मतीरां रा भारा बंधणा मुश्किल। पछै म्हारै लाडू री कोर में कुण खारो अर कुण मीठो। म्हैं कीकर मनूं कै आप हरिचंद हो अर रामदानजी कूड़ां रा सिरताज?”

जणै आवड़दानजी कह्यो-
“हुकम ! आप तो खामंध हो। चावो सो करो। किणरी जनात कै आपनै रेटो देवै? पण आप इतरो फरमावो जणै म्हारी आ ई अरज है कै “इणांरो बेटे नाथूराम कैवैला उवा बात सराघम हुसी।”

“मतलब आपरो गवाह नाथूराम रामदानजी रो है!”
दरबार पूछियो तो आवड़दानजी उणी द्रढता सूं कह्यो कै-“हां, हुकम नाथूराम कैवसी उवा सिरमाथै।”

दरबार नाथूरामजी नै बुलाया अर पूछियो कै-
“इणमें अन्यायी कुण है?”

नाथूरामजी रै कूड़ नीं बोलण री आखड़ी ही। उवांनै केवल साच प्यारो है। क्यूंकै साचै राचै राम। उवै तो ईसरदासजी रै इण दूहै नै नीं विसरता-

साच पियारो सांईया, सांई साच सहाय!
साचां आग न जाल़ही, साचां साप न खाय!!

उणां कह्यो-
“हुकम! निर्णय तो आपरै अर पिताजी रै जचै ज्यूं करजो पण म्हनै राम नै जीव दैणो है। म्हैं कूड़ नीं बोल सकूं। ई में गल़ती म्हारै पिताजी री है। आवड़दानजी साव साचा।”

आ बात सुण’र दरबार रीझिया अर इणांनै ‘सिंघासनी‘ गांम इनायत कियो।

साच ई एक भांत रो तप है। कठण साधना है। कवियां लिख्यो ई है कै-

साच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जांकै हिरदै साच है, तांकै हिरदै आप।।

ईश्वर साच में वास करै इण बात नै जिकां समझी उणां रो ई सुजस धरा पसरियो। भलांई हरचंद हुवो कै जुजिठल। ऐड़ा ई एक साचड़िया मिनख हा नाथूरामजी लाल़स।

आपां नाथूरामजी लाल़स रै बारै में ज्यूं ज्यूं जनकंठां में संजोयोड़ी कथावां सुणांला तो आपांनै लागैला कै उवै साच सूं किणी पण स्थिति में नीं डिगिया। यानी साच ही उवां रो भूषण हो। सही ई कह्यो गयो है कै कंठां रो भूषण केवल अर केवल साच है-
सत्यं कंठस्य् भूषणम

पण कैड़ो सत्य ? उवो सत्य, जिणनै सुणियां ई किणी रै मन नै पीड़ा ई नीं पूगै अर आखड़ी पण निभै। जणै ई तो कह्यो गयो है कै- सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यं प्रियम।

नाथूरामजी सदैव इण बात माथै अडिग रह्या कै साच ई बोलणो अर उवो सुहावणो बोलणो।

एक’र किणी महाराजा मानसिंहजी नै भिड़ाया कै “नाथूरामजी रै नेम है कै उवै मद री मनवार किण री ई नीं मानै। जे दरबार खुदोखुद मनवारै, तो ई ना परी देवै।”

आ सुण’र मानसिंहजी कह्यो कै-
“आ कीकर हुय सकै? नवकोटी रो धणी प्यालो धामै अर नाथूरामजी ना दे! जचै नीं।”

जणै कैवणियै कह्यो कै-
“हुकम हाथ कंगन नै आरसी कांई? गाल अर थाप रै छेतीक कितीक है? आज मनवार कर’र पतयाय लिरावो।”

दरबार उणी दिन भरी महफिल में नाथूरामजी नै प्यालो मनवारियो। नाथूरामजी समझग्या। उणां प्यालो सीस चढाय’र दरबार नै अरज करी कै- “हुकम! आप खामंध हो। म्हारो बडभाग है कै आप आपरै हाथां मनवार करी हो। पण म्हारै सारू आपरी आ छेहली मनवार हुसी। सवारै म्हैं इण तन सूं आपरा दरसण नीं कर सकूं।”

दरबार पूरी बात अर नाथूरामजी री द्रढता समझग्या। उवां उणां री तारीफ करतां मद नीं पीवण री बात ई मानी।

बात चालै कै जद लाडूनाथजी आपरा कान चिराय कुंडल धारिया जणै उणां आपरी कूड़ी सिद्धाई री बात फैलावण सारू उठै हाजर सरदारां अर कवियां नै आदेश दियो कै दरबार पूछै तो आ ई बात कैवणी है कै “नाथजी बापजी रै कानां में लोही री जागा दूध आयो।”

यानी नाथजी कोई साधारण नाथ नीं बल्कि कोई अवतारीक मिनख है। बाकी तो सगल़ां नाथजी सूं डरतां हां भरी पण नाथूरामजी नीं हां कैयी अर नीं ना कैयी। जणै नाथजी, नाथूरामजी नै कह्यो कै-
“थे म्हारी बात सूं सहमत नीं हो जणै थे थांरै गांम जावो परा।”

नाथूरामजी गांम गया परा पण जद कानां में दूध आवण री बात घणी पसरी जणै दरबार कह्यो कै- “नाथूरामजी लाल़स कैवै तो आ बात मानूं। ई बात री ताईद करण सारू नाथूरामजी नै बुलाया अर दरबार पूछियो कै-
“नाथूरामजी थे बातावो कै बापजी रै कानां में लोही आयो कै दूध?”

जणै नाथूरामजी कह्यो कै-
हुकम बापजी रै कानां में आयो तो दूध ई हो पण दूध रो रंग रातो हो!!

दरबार पूरी बात समझग्या कै साच कांई है?

बात चालै कै तोल़ैसर में नाथूरामजी रा पिता रामदानजी राजपुरोहितां नै एक डोल़ी दी ही। डोल़ी री जमी नै लेय’र नाथूरामजी रा बेटा चाल़कदानजी मन बदल़ा लियो यानी ‘धुर बैसागां डोल़ी दीनी, आधै जेठ उथापी!!‘ दादै दी अर पोतै पाछी कब्जा ली। राजपुरोहितां ई कह्यो कै इयां पाधरियां में डोल़ी नीं छोडां। विवाद बधियो। सेवट बात दरबार तक पूगी। दरबार, राजपुरोहितां नै पूछियो कै-
“आ डोल़ी थांरी है, कीकर मनै? कोई गवाह का लिखत है?”

जणै राजपुरोहितां कह्यो कै-
“हुकम! म्हांरै कनै लिखत अर गवाह फखत नाथूरामजी है। उवै कैय दे ला वा सिक्का है।”

लोगां पुरोहितां नै कह्यो कै “चाल़कदानजी तो नाथूरामजी रा एकाएक बेटा है। इणां रै खिलाफ ऐ गवाह कीकर देसी? थे कठै ई फादल नीं फड़ जावो।”

आ सुण’र पुरोहितां कह्यो कै-
“ध्रूव आपरी जागा सूं डिगै तो नाथूरामजी साच सूं डिगै। म्हांनै पूरो पतियारो है कै कोई मोह कै लालच बाजीसा नै नीं डिगाय सकै।”

दरबार नाथूरामजी नै बुलाय अर पूछियो कै- “हकीकत कांई है?”

जणै नाथूरामजी कह्यो कै- “चाल़को कूड़ो, अर पुरोहित साचा।”

फैसलो पुरोहितां रै पख में हुयो पण उण दिनां घणकराक मिनख साचड़िया अर संवेदनशील हुवता। फैसलो सुण’र पुरोहितां कह्यो कै-
“हुकम म्हैं ई जमी नै आज सूं गोचर करां। म्हैं ई भेल़ा बैठां हां सो आ डोल़ी हमे म्हैं नीं जोतां। चाल़कदानजी री ई बात रैणी चाहीजै।”

राठौड़ां री ख्यात में वर्णन आवै कै मानसिंहजी रा गुरु लाडूनाथजी साहित्यिक अभिरुचि राखता अर खुद ई कवि हा। कवियां रो घणो आदर करता। इण सारू घणा चारण कवेसर इणां रै गुढै रैवता। एक’र नाथजी गिरनार री जात्रा करण गया। पाछा आवतां नै बीच मारग में ताव चढियो अर परमधाम पूगा। चूंकि नाथजी दरबार रा गुरु, श्रद्धेय अर पूजनीय हा। दरबार नै घणो दुख हुयो। उण बखत चारण कवेसरां सूं ईढ राखणियां दरबार रा कान भरिया कै-
“आ नाथजी री मोत नीं है बल्कि हत्या है अर इणमें जिकै चारणां जात्रा में साथै हा उणांरो हाथ है। यानी आं ईज
मान तणो गुरु मारियो।”

राजा ई कानां रा काचा हुवता सो आ बात थोड़ी दरबार रै ई जचगी। चूंकि मामलो चारणां सूं जुड़्यो थको हुवण सूं दरबार सीधी कार्यवाही नीं कर’र नाथजी रा कामदार कुशल़राजजी सिंघवी जिकै खुद जात्रा में साथै हा, सूं पूछण अर उवै कैवै जिकी बात माथै अमल करण री तेवड़ी। जद कुशल़राजजी नै पूछियो तो उणां कह्यो कै-
“हुकम ! बात हतीतती है। इणमें चारणां रो कोई लैणोदैणो नीं।”

ख्यात रै मुजब-
“गुजरात रै गांव बामणवाड़ै लाडूनाथजी महाराज ताव आय देवलोक हुवा। आयसजी कनै चारण मर्जीदान घणा था सो किणी नै गिणता नहीं जिणसूं सिरकार रा कामदार वगैरै सारा दोरा था सो लाडूनाथजी देवलोक हुवण री झूठी बदनामी चारणां ऊपर दीवी। सो इण बात री सायद आयसजी रा कामदार सिंघवी कुशलराजजी ऊपर थापी।”

जद कुशल़राजजी नै पूछियो तो उणां कह्यो–

“तरै कुशल़राजजी अरज कीधी कै आ बात झूठी है।”

कुशल़राजजी री साच री साख भरतां उणांनै सरावतां नाथूरामजी लाल़स लिख्यो-

देवा रो दातार, फूटंतां फाटी जती।
निज कव पातां नाव, कुशल़ै हिक राखी करां।।

जरूरत है ऐड़ै साचड़ियै मिनखां री सत्यप्रियता री बातां सूं आज री पीढी नै ओल़खाण करावण री।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़़ी

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