मीठी मसकरी

मीठी मसकरी


—(39)—

किणी गांम में एक डोकरी रैवती। पेट रै गांठां देय-देय सौ रूपिया जोड़ लिया। उण दिनां सौ रुपिया ई सांवठी रकम बाजती। उवा इण रुपिया रै ताण चोखल़ै में बोरगत करती अर आपरो पोरियो करती।

एक’र उणरै गांम में कठै रा ई कोई म्हाराज आय सतसंग करण लागा। उणरी ई अकल निकल़गी सो उवा ई सतसंगत में जावण लागी।

म्हाराज रा मोह माया सूं बचण रै उपदेशां रो इण माथै ई असर हुयो अर एक दिन उण छानैक म्हाराज नै पूछियो कै- “म्हाराज!म्हारै कनै ई कीं रकम है! आप कैवो इण माया रै फंद में नीं पड़णो चाहीजै तो ऐड़ै में म्हनै कांई करणो चाहीजै? आप ई बतावो कै म्हैं इण नाणै रो कांई करूं?”

आ सुण’र म्हाराज कह्यो-
“माई! तूं संतां नै रसोई दिया कर! दियोड़ो साथै चालसी सो सीरो अर पुड़्यां कर’र म्हाराज नै जीमा अर तूं ई जीम। मिनख जमारो कोई बार-बार थोड़ो ई मिलै! तैं सुणी हुसी कै ‘घर माफक दान करो अन्न का।”

डोकरी म्हाराज रै उपदेशां में आय’र दस-पंदरै दिन सीरो-पुड़्यां करी जणै उणनै लागो कै आधाक रुपिया नीठग्या लागै। ऐड़ै में उण म्हाराज नै बतायो कै-
“बापजी म्हारा आधा रुपिया नीठग्या! सो ओ ई सीधो बैवण दूं कै कोई नवो आदेश है?”

आ सुण’र म्हाराज कह्यो- “कीं बात नीं माई तूं तो अब इयां कर कै अबै आगै सूं लापसी किया कर । लापसी जैड़ो दूजो कोई पुन्न नीं है।”

महीणोक डोकरड़ी लापसी रांधी जणै उणनै लागो कै हमै तो उणरै कनै फखत दसेक रुपीड़ा बचिया हुसी जणै उणरै खल़बल़ी मची अर उवा म्हाराज रै गुढै पूगी अर बोली-
“म्हाराज जुलम हुया! हमै म्हारै कनै तो फखत दसेक रुपिया बचिया हुसी ! ऐड़ै में हमै लापसी घणा दिन म्हैं नीं जीमा सकूंली सो अब बतावो कांई करूं?”

इयां म्हाराज ई थोड़ा दयावान हा सो उणां सोच्यो कै ऊपर वरसाल़ो आवै अर डोकरी रो झूंपड़ो बिनां कातरै लागै सो झूंपड़ियो चोवसी अर बिचारी भीजसी सो इणनै झूंपड़ो छझण रो कैणो ठीक रैसी आ सोच’र उणां कह्यो कै-
“माई!, तूं अबै इयां कर थारी छानड़ी छझायलै।”

आ सलाह डोकरी ई रै हाडोहाड बैठगी अर उण दैनगिया कर’र आपरी टापरी छझायली। टापरी छझावतां ई रकम पूरी ऐढै लागगी।

एक दिन कोई जरूरतमंद आदमी डोकरी कनै आयो अर बोल्यो कै “माजी ! पांच-सात रुपियां री जरूरत है। आंटो काढसो जणै पार पड़सी।”

आ सुणतां ई डोकरी नै आपरी मजबूरी रो ठाह लागो अर उवा म्हाराज माथै रीसां बल़तां बोली कै मींढा-

पैला कराई सीरा पूड़ी, पछै कराई लापसी!
रह्यै-सह्यै री छान छझाई, मोडै करदी आपसी!!


—(38)—

पोकरण रै पाखती एक गांम है ओढाणिया। कोई कैवै कै ओ गांम पैला ‘आढां री ढाणी’ रै नाम सूं जाणीजतो। लोकमानता है कै करनीजी रो नानाणो अठै ईज हो। कालांतर में आढा अठै सूं कठै ई दूजी जागा गया परा अर घणै वरसां पछै जैसलमेर रावल़ कल्याणमलजी ओ गांम रतनू पताजी वरसावत नै इनायत कर दियो। खैर..

इणी गांम में लारलै सईकै रा चावा डिंगल़ कवि गंगजी मूल़ियां परण्योड़ा हा।

एक’र गंगजी रै गांम इणां रा कोई मित्र कविवर गया पण उणांनै उठै फोड़ा घणा पड़्या। जणै उणां कह्यो-

परजापत्त पाडौसी, कारू जात निकाम।
माधव टाल़ै मूल़ियां, गंगजी वाल़ो गांम।।

गंगजी नै आपरै सासरै माथै मोद हो। उणां कह्यो-

ओ दीसै ओढाणियो, वनरावन रो वास।
गंग कवि रो सासरो, कुदरत कैलास।।

गंगजी रो ओ दूहै अठै रै किणी दूजै जंवाई सुण्यो, जणै उणरै हिये आ बात ढूकी नीं क्यूंकै सायत उवो परणीजण गयो हुसी जणै नेगचारां अर खारभंजणां सूं टिमचर घणो कूटीज्यो हुसी!चांदी वाल़ी हरेक रै करकै।जणै उण दूहो कह्यो कै-

ओ दीसै ओढाणियो, वींदां रो वैरीह।
खोटा मांगै खरचणा, कोआसंग कैरीह?


—(37)—

महेवा री धरा में एक गांम बागूंडी। गांव री बसावट ऐड़ी कै गांव ऊ़चाण में बस्योड़ो पण पाणी री व्यवस्था ठीक ई रै उलटी। एक’र कोई दूजै गांम रा बाजीसा उठीक’र निकल़ै हा कै उणां देख्यो कै एक बहुआरी पाणी रो घड़ो उखणियां साम्ही चाढ दोरी-दोरी चढै ही क्यूं माथै ऊपर भर्योड़ो घड़ो,साम्ही एकदम हियाचढ धड़ो(धोरो) तिण ऊपर बापड़ी पेटसूणी। बहुआरी री आ करूण दशा देख’र बाजीसा रो काल़जो पसीजग्यो अर उणां एक दूहो कह्यो-

सिर घड़ो साम्हीं धड़ो, पेट ज पूरै मास।
मत दीजो को धीवड़ी, (इण)बागूंडी रै बास।।

आं बाजीसा तो माईतां नै खाली ओपती भोल़ावण देय’र छोड दिया पण एक दूजा बाजीसा चूरू रै गांम बूचावास कनैकर निकल़ै हा जणै उणांनै याद आयगी कै अठै आपांरै फलाणसिंह ठाकरां री बाई परणायोड़ी है तो क्यूं नीं बाई सूं मिलतो हालूं। समाचार लेय ई लूं लो अर देय ई दूं लो। ता ऊपर बाई म्हारै ई लाडकी ही सो बा नै देख’र कितरी राजी हुसी! राजी हुवणी ई है क्यूंकै पीहर रा तो रूंख ई रल़ियावणा लागै पछै म्हनै देख्यां तो बाई कितरी राजी हुसी कै पूछो मत। आ सोच’र बाजीसा बूचावास कानी टुरग्या।

ज्यूं ई बाजीसा बूचावास रै धोरै चढ’र गवाड़ में पूगा तो देख्यो कै गांम रा मिनख तो पीपल़ री छिंयां में चौपड़ अर चरभर रमै हा अर गांम री बहु-बेटियां रो एक झूलरो पाणी लावै हो।

उणां देख्यो कै ठाकरां री उवा बाई जिणनै ठाकर अर गांम री परगै हथाल़ी रै छालै ज्यूं राखती उवा बीकानेरियो घड़ो उखणियां दोरी-दोरी बैवै ही। दोरी बैवणी ईज ही क्यूंकै सागी बागूंडी वाल़ी ईज स्थिति अठै ही। उवा ई पेटसूणी ही अर उठै ई गांम चढाण में बस्योड़ो !

बाई नै पाणी लावतां अर धोरै चढतां देख’र बाजीसा नै रीस आयगी अर उणां गवाड़ में बैठै मूंछाल़ां नै सुणायो कै-

सामा टीबो सिर घड़ो, कामण पुरै मास।
नारी सींचे नर पीवै, (तन्नै) बाल़ूं बूचावास।।


—(36)—

महाकवि ईसरदासजी कह्यो है ‘भाग बडा तो भागवत, सांभल़िये श्रवणेह।’

इण आदर्श ओल़ी नै अंगीकार करनै आजकाले केई भगत जठै-तठै ई भागवत बांचीजै उठै ई त्यार। त्यार हुवणा ई है क्यूंकै एक पथ अर दो काज। यानी भगती री भगती अर मनरुचियो भोजन ऊपरनेत रो।

एक’र ऐड़ी ई फल़दायक कथा कठै ई बांचीजै ही। उण जागा रै थोड़ो आगो एक किरसाण रैवतो। कथा रै सुणाकां अर भोजन रै जिमाकां सोचियो कै बापड़ै ई किरसाण नै बैती गंगा में ग्यान खंखोल़ी खड़ाय लावां। आपांरै तो आंगल़िया पुन्न है पछै इणसूं क्यूं चूकणो? आ धार विचार’र एक भगतराजजी उण किरसाण नै कह्यो-
“ले सुणै रे! गैलिया थारै गोडै गुढै भागवत बांचीजै अर थूं कानसारो ई नीं दे। ले हाल आज थनै ई कथा सुणाय’र लावां। एक दिन सुणली अर चसको लागग्यो तो म्हांरै सूं पैला उठै लाधसी।”

आ सुणतां ई उण किरसाण कह्यो कै-
“नीं, म्हनै कठै बखत है? एकै कानी सिट्टा झड़ै तो दूजै कानी मोठोड़ै तिड़ै। कथा में कांई खावूंलो? धान वल़ाणो कर लियो तो कथा खेड़ै में ई करा दूं लो।”

पण भगतराजजी नीं मान्या अर जोर देय’र उणनै लेयग्या।

किरसाण आयग्यो जणै पूरी कथा मन सूं सुणी अर ग्यान ग्रहण कियो कै पर-धन धूड़ जैड़ो, दग्गो किणरो ई सग्गो नीं। मोटी सो मा-बैन अर छोटी सो बेटी। चोर चंडाल़ां सूं आंतरै रैणो अर कूड़ लारै धूड़ फैंकणी।

उवो आय आपरी ढाणी में सूयग्यो। पगड़ो हुयो अर भगतराजजी तो दे पाछा उणरी ढाणी। आवतां ई कह्यो-
“ले हाल भाई फलाणा!”

उण पूछ्यो “सिध?”

“कथा में और भल़ै सिध? कोई एक दिन में कथा समझ में थोड़ी आवै!” भगतराजजी कह्यो तो उवो बोल्यो-

एक बार कथा सुणी, ग्यान आयो हरड़।
बार-बार कथा सुणो! कान है कै दरड़?

भगतराजजी आ सुण’र मूंढो छाछ हुवै ज्यां कर परा’र बुवा ग्या।


—(35)—

एक म्हाराज हा। बाणियां री बस्ती में रैवता। बाणियां माथै लछमी री कृपा ही सो म्हाराज रै ई किणी बात रो तोटो नीं हो। चोखी रसोई लावै अर मौज मनावै। इयां करतां-करतां म्हाराज री जीभ चटोकड़ी हुयगी सो जितरै उणरै मनमाफक भोजन नीं आवतो तो उणांरो जीव तिरपत नीं हुवतो।

एक’र किणी सेठां रा माजी चालता रह्या। सेठां चोखल़ो निंवतियो। ढूल़ रा ढूल़ जीमण गया जणै म्हाराज ई लारै कीकर रैवता!विध-विध री मिठाइयां पुरसीजी पण म्हाराजा रो मन मालपुवा जीमण सारू हुयग्यो। जोग सूं सेठां मालपुवा नीं कराया हा।
म्हाराज खरड़ी माथै गया अर बोल्या कै-
“सेठां! ओ एढो माजी री आत्मा नै शांति मिलै अर उवा तिरपत हुवै इण सारू ई कियो है कै थांरै धन री धजा फरूकावण सारू?”

आ सुण’र सेठां कह्यो- “नीं, दादा ओ एढो तो माजी री आत्मा री तिरपती सारू ईज कियो है। जे सकल़ नै मिलै तो ओ पुन्न म्हांरी माजी नै मिलै अर उणांरी आत्मा राजी हुय म्हांनै आशीष देवै।”

आ सुणतां ई म्हाराज कह्यो-
“जणै तो थांरी आ सगल़ी खेचल इयां ई गई क्यूंकै माजी तो मरती वेल़ा म्हनै कैय’र गया कै म्हारो मन फखत मालपुवां माथै है अर थे फालतू ई कितरो दूजो धान बिगाड़्यो है! माजी तो इणमें नख ई नीं डुबोवै क्यूंकै उणांरी आत्मा तो कठै ई मालपुवां में अटक्योड़ी हुसी-

भली करी रै बाणियां! भलो बिगाड़्यो अन्न!!
माजी मरतां कह गया, म्हारो,मालपुवां पर मन्न्!!


—(34)—

कवि नै देवकरणजी बारठ बखत रो केमरो कह्यो है।

इणरो सीधोसीक अरथ ओ है कै कवि केमरे रै ज्यूं साचो अर सटीक चित्रण करै। अंकै ई पखापखी नीं करै। इण बात री पुष्टि सारू एक दाखलो दैणो समीचीन समझूं।

पोकरण रै पाखती चारणां रो एक गांम है माड़वो। अठै केई कवि हुया पण मयारामजी अर आसूदानजी दो ऐड़ा नाम है जिकै साची-कैवणियां में शुमार हा। खरी खल़कावणी तो खल़कावणी ईज। पछै भलांई कोई राजी रैवो कै बेराजी।

माड़वा रै च्यारां कानी पोकरणां रो जाड हो तो माड़वा में चारणां अर जोस्या़ं रो। पण सिरदारां नै ऐ दोनूं ई जातां पूग नीं सकै क्यूंकै जे आथरणा रो ऊंठ झोख में बांधै तो दिनूंगै आंरै प्रताप सूं आल़मेट!

इण सारू आपरी लाचारगी अर राम रै रूठणै रो फल़ बतावतां मयारामजी कह्यो-

मिल़ै वास माड़वो, जनम चारण कै जोसी।
बार ओठा घर बंध, पोकरणा पाड़ौसी!
खेत आथूणो खड़ै, जठै भूतां रो जाल़ो।
हाल़ी अमली हेक, वल़ै पग मांयां वाल़ो!
अंतरै समै धरणी अपै, घरै लेणायत गांम रा।
मयाराम !राम रूठां मिल़ै, इतरा काम अकाम रा।।

पण आसूदानजी लिखै कै ओ कारण तो हो जिको हो ईज इण ऊपर कोढ में खाज आ ही कै आधो गाम तो अकल सूं आंधो है अर आधै नै अकल अर्जीण हुयोड़ी है जद ई तो खूंटै बंध्योड़डी भूरकी अज्या नै भूरकी झोटी मानै-

आधो गांम अकल सूं आंधो, पारख पड़ै न पूरी।
सांपरतेक अज्यां नै समझै, भैंस बंध्योड़ी भूरी!!


—(33)—

एक थल़वासी रै टाबरियो मोटो हुयो जणै उण, उणनै परणावण री तेवड़ी अर भाईसैणां नै भल़ घाती।

दो भाईसैण न्यारो-न्यारो रिश्तो लाया। एक आथूण सूं अर दूजोड़ो शेखावाटी सूं।

छोरै रै जचगी कै आथूणो नीं परणीजूं। हूं तो शेखावाटी ई परणीजसूं। बाप कह्यो रै मींढा! आपांरै भांयखै री होड नीं हुवै। अठै री लुगाई लावैलो तो सुख पावैलो-

जे सुख चावै जीव रो,
धण धाटेची आण!!

पण छोरै कह्यो नीं सा, म्हनै परणावो जणै तो शेखावाटी ई परणावो, नीतर तो हूं कंवारो ई भलो। बाप उणनै उणरी मनचाई जागा परणायो।

घरणी सूं घर री शोभा बधै क्यूंकै इणनै घर-लछमी कह्यो जावै। भारतीय नारी पतिव्रता हुवै। मतलब पति री सेवा में सदैव हाजर।

ऐड़ी ई पतिव्रता नार इण थल़ियै रै आई। पैलै ई दिन सासू उणनै रसोई रो सारो सूंपियो। उण एकसेर री पतल़ी-पतल़ी सोल़ै रोट्यां पोई अर धणी नै हेलो कियो कै लो ! जीमलो। थे जीमो तो पछै हूं ई काया नै भाड़ो दूं। छोरो मोटयार हो सो पूरो सीधो जीमगो।

जणै इण बड़बड़ाती सवासेर आटै री एक रोटड़ी पोय माडै-साडै ई आपरै पेट नै भाड़ो दियो! जीम’र चल़ू करियां पछै उणनै आपरै धणी री खुराक माथै अचूंभो आयो कै ओ कांई धान रो कोठलियो पांति आयो है! –

म्हैं परणती परखियो, धोल़ी आंख धणीह।
ऊठण री आसँग नही, अन्न में सूरत घणीह।।

जको ठालोभूलो एकसेर रा सोल़ै सोगरा जीमगो अर कठै म्हैं ‘पावचूण पदमणी’ री गत संतोखण! फखत सवासेर री एक रोटड़ी जीम’र मन री थिरता कायम राखी हूं।

उवा सीधी आपरी सासू कनै पूगी अर धणी री शिकायत करती बोली-

एक सेर की सोल़ा पोई, सवा सेर की एक।
आप निगोड़्यो सोल़ा खागो, म्हैं संतोखण एक।।


—(32)—

पैला री बखत काल़ पड़ता रैवता सो हरेक रै घरां में नाज कमती ई हुवतो ऐड़ै में आप मरतां बाप किणनै याद आवै? वाल़ी बात आम ही।

ऐड़ी ई कसूत बखत में शेखावाटी रा कोई दो सिरदार जिकै सगा भाई हा, आपरी कोटड़ी में बैठा आराम सूं चिलम पीवै हा। जितरै मोटैड़ै भाई नै कोटड़ी कानी आवतो कोई मेहमान दीस्यो। मेहमान दीसतां पाण ई उणरो मन दोघड़चिंता में पड़ग्यो कै मेहमान नै आवण दियो जावै कै ऊचकायो जावै!! सेवट उण तय कियो कै काल़़ री बखत मेहमान किणी कटक सूं कमतर नीं हुवै सो इणनै ऊचकायो जावै।

उण पाखती बैठै आपरै भाई नै कह्यो-
“तूं उठीनै सूं तरवार काढ अर म्हैं अठीनै सूं म्यान मांय सूं काढूं सो आपांनै लड़तां नै देख’र मेहमान आपै ई आगै गैलै-गैलै बगेगो।

“नक्की है भोड में बटीड़ खावण अठै नीं आवै।”
पैलै भाई कह्यो-

तूं उठा तरवाड़ी, म्हैं राखस्यूं टेक।

जितरै दूजोड़ै कह्यो कै हां-

पांवणा तो गैले जासी, आपां दोन्यूं एक।।

दोनां ई मनोमनी सीख’र मलोमली झाल़बंबाल़ हुय’र एक-दूजै माथै तरवारां सूंती। आंनै तरवारां सूंतता देख’र मेहमान नमाज गल़ै नीं पड़ जावै आ सोच’र डरतै आगलै गांम री डांडी पकड़ी।


—(31)—

आथूणै राजस्थान रै किणी गांम सूं एक सोनारां री जान चढी। सोनार कमाऊ जात। खाण-पीण अर कपड़ै लतै रा शौकीन। एक सूं बध’र एक सोनी शौकीन। जान चढी जणै जान में जांगड़ियो भेल़ो। उवो ई घणै कोड सूं जान चढियो कै सोनारां री जान में घोल़ां घणी हुसी।

पैला जान ऊंठां माथै जावती सो आई जान ऊठां माथै ई गी। कोई गांम आवै’र कोई सोनीजी बोलै-
“हां भाई राणा! कोई दूहो उघेर। उवो कोड कोडायो ठावको दूहो उघेरे पण निछरावल़ रै नाम माथै ठणठण गोपाल़। उण घोल़ नै उडीकतै दो तीन गांमां में तो दूहा बोलिया पण जद आमद पाई ई नीं हुई जणै उवै तेवड़ली कै सोनीजी नै कोई परचो दैणी पड़सी जको आयंदै किणी राणै नै सफागरो नीं राखैला। उवै आ धार विचारली। राणो ई फिरोकड़ हो। उवो आ जाणतो कै किण गांम अर किण ठयै कैड़ो आदमी रैवै। उणनै ठाह हो कै हमकै धकलै गांम री कांकड़ में बाघजी धाडवी रैवै सो सोनारां नै बाघजी सूं लूटायदां।

ज्यूं ई धकलै गांम रा रूंखड़ा दीखण लागा अर कोई सोनीजी बोल्या-
“हां भाई! राणाजी जान में अबोला कांई हालो? कोई दूहो बीजो कैवो। जान बोल़ी कांई कांम री?”

आ सुण’र ढोलीजी कह्यो –
“हां सोनीराजा!, अबार लो। थे कांई जाणोला कै कोई गायबी जान हालियो। म्हारो दियोड़ो दूहो याद नीं रैवै तो म्हनै कैवजो।”

इतरी कैय उण दूहो उघेरियो-

लाल किनारी धोतिया, दो-दो मुरकी कान।
(अरे!)बेगा आवो बाघजी, (आ तो)सोनारां री जान!!

दूहो सुणतां ई बाघजी संभ’र आडा फिरिया अर जानियां सूं माल असबाब सगल़ो खोस लियो।


—(30)—

बाणियां रै पाड़ौस में एक पुरोहितजी रैवता। थितियै नेम माल़ा-मिणियो करियां पछै फेरी फिरै अर पाछा आय खेजड़ी नीचै मांचो ढाल़ सूवै परा।

बाणियां री लुगायां गुराणी नै सिखाया कै बैठो मजूर मांदो पड़ै। म्हाराज फेरी फिरियाया अर पाछा आय पोढग्या आ बात ठीक नीं, म्हाराज नै कैवो कै कोई बिणज करै, बिणज नै घोड़ा ई नीं नावड़ै। बिणज में बरकत है उतरी किणमें ई नीं है। आ बात गुराणी रै हाडोहाड बैठगी कै म्हाराज आल़स रा ठाम हुवता जा रैया सो बिणज में घालणा पड़सी। बाणियां में उठसी-बैठसी जणै मतैई कमावण री तजबीज जाणलै ला। म्हाराज फेरी फिर’र आया अर दब मांचो ढाल़’र सूता ईज हा कै गुराणी बोली कै-“म्हाराज इयां टांग माथै टांग चाढ’र सूतण सूं इण बखत में पार नीं पड़ै। इयां तो टाबर पल़णा अर घर चलणो आंझो है सो कोई न कोई बिणज करो।”

बात म्हाराज रै ई हियै ढूकगी।

उणां घरै कीं धान-चूण हो जिको बेच’र शहर गया अर उण नाणै सूं टीपणा खरीद लाया। घरै दुकान जचाई पण गांम में टीपणा कुण बाप खरीदै? म्हाराज ई दुकानदारी सूं आंती आयग्या। एक दिन बाणियां नै कह्यो कै भाईड़ां इण वौपार सूं हमकै-हमकै पिंड छोडावो-

बिणज करो रै बाणियां, म्हे बिणज सूं धाया।
अबकै अबकै पतड़ा बिकज्या, और गंगाजी न्हाया।।


—(29)—

एक मियैजी रै अर चौधरीजी रै बेलीपा। एकै दांत रोटी तूटै। मियैजी रै फातिया पढावणा पण उणां सूं किणी बात सारू मौलवीजी रूठग्या सो फातिया पढण आया नीं। मियोजी मूंढो उतार्यां बैठा पिछतावो करै हा कै मौलवीजी नै नाराज नीं करणा चाहीजता। मौलवीजी रो काम मौलवीजी सूं ई सरै हमै कांई करणो रह्यो ? जितरै किनै सूं ई मारग बैता चौधरीजी आंरै घरै आयग्या।

मियैजी आपरी दोघड़चिंता चौधरीजी नै बताई अर कह्यो कै “कीकर ई उणरै अर मौलवीजी रो रूठणो भंगायो जावै क्यूंकै मोलवीजी बिनां फातिया कुण पढावै?”

आ बात सुणतां ई चौधरीजी कह्यो –
“ई में मौलवी की के जरूरत? फातिया तो हूं पढदूं लो।”

आ सुण’र मियोजी बोल्या कै-
“भाई तूं कीकर फातिया पढसी? थारो-म्हारो कतेब ई न्यारो!”

आ सुणतां ई चौधरीजी कह्यो –
“तूं तो कूंडां में रोट्यां जचा ला। फातिया म्हनै पढणा आवै। तूं अंकै ई आगोपाछो मत हो।”

मियोजी दो कूंडां में रोट्यां री जेठ लगाई चौधरीजी रै आगै राखी अर देखण लागा कै चौधरी कीकर फातिया पढसी?

जितै तो चौधरीजी बोल्या-

तनै फातिया म्हनै फातिया, फातिया पड़ी पुकारै।
ल्होड़ियो कूंडो तूं ले, बडोड़ै धरिया म्हारै।।


—(28)—

भाटीपै रै एक आदमी ढल़ती उमर मतो कियो कै अठै आधी उमर तो ठाकरां री सेवा करतां-करतां ई बीतगी। ओल़भां लेवण अर माजनो पड़ावण रै टाल़ कीं नीं मिल्यो। लूखो लाड अर खमा घणी! क्यूं नीं मथपचिये सूं लारो छोडायलूं। पछै घणी गई अर थोड़ी रैयी अर उणमें ई उमर छिण-छिण जाय रैयी है। ऐड़ै में क्यूं नीं तीरथ जात्रा करलूं अर सीधो सुरग पूगण सारू गंगा में खंखोल़ी खाय पिंड रा पाप गाल़लूं।

आ धार विचार’र उवो आपरै घर सूं तीरथां री जात्रा सारू निकल़ बहीर हुयो। उवो पांच दसेक कोस पूगो हुसी कै उणनै एक बाजीसा मिलग्या। उणां उण आदमी नै इयां खमखमियोड़ो देख्यो तो पूछ्यो कै-
“भाई! इयां कीकर? आज सिध सारू?”

उण जवाब दियो कै-
“हुकम लगटगै बूढापो आयोरो सो जितरै हाथ-पग हालै उतरै तीरथां री जात्रा करण री तेवड़ली अर गंगाजी में हाड खोल़’र पाप गाल़णा चाऊं।”

आ सुणतां ई बाजीसा कह्यो-
“भइया मनचंगा तो कठौती गंगा ! पछै उठै जावण री कांई जरूरत ?”

जणै उण कह्यो- “हुकम ! पाप गंगा ईज गाल़ै ! दूजी जागा पाप नीं गल़ै!!”

आ सुण’र बाजीसा हंसता बोल्या- “गैला तूं जिकी जागा चाकरी कर रह्यो है नीं ! उठै ई कर बो कर क्यूंकै उठै तूं खुदोखद गल़ जावैला। जे खुदोखद गलग्यो तो पछै पाप कठै रैसी ? इणमें गंगाजी जावण री क्यूं माथाफोड़ी करै अर क्यूं पगां रा बल़ काढै ? आ बात तो अठै ई तूं कर सकै।”

आ सुणतां ई उण इचरज में पड़तां कह्यो -“हुकम! आ कीकर हुय सकै कै हूं अठै बैठो ई गल़ पूरो होऊं? अर साथ ई पाप विलाय जावै।”

बाजीसा कह्यो –
“भइया! इणमें आधैसांसै पड़ण री कांई जरूरत? तूं तो म्हारै ई दूहै नै सुण अर पाछो जा परो। इण दूहै नै समझ अर काम में ले-

क्यूं पंथीड़ा पंथ करै, क्यूं हेमाल़ै जाय ?
कर भाटी री चाकरी, घर बैठां गल़ जाय!!

आ सुणतां ई उण पाछो कह्यो –
“अरे हुकम ! गल़ण सारू आधी माथाफोड़ी तो ई खातर ई करी हूं क्यूं कै-

हाथ हिलावै पगला पटकै, डोल़ा काढै डाकीड़ा।
वांरा चाकर भूखां मरसी, ज्यांरा ठाकर भाटीड़ा।।


—(27)—

पैला लोगां नै गांमतरै बीजै पाल़ो कै ऊंठ-घोड़ां माथै जावणो पड़तो। आंझो समय सो लोगां नै टंक टाल़ण अर थाकेलो उतारण सारू कोई न कोई ठयो जोयोड़ो राखणो पड़तो। छतापण जे कोई ठयो बीजो नीं हुवतो तो कठै न कठै कोई न कोई तोजी बैठावणी ई पड़ती। नीतर पेट में कूदता ऊंदरा ठंभता नीं।

एकर देसाण रा देपावत सिरदार मारग-मारग जावै हा। रोटी वेल़ा हुयगी पण जाण-पैचाण बिनां पोल़ै कुण जीमावै। उवै इण भांग-घड़त में ईज हा कै एक मोतबर जैन बाणिये रो घर आयो। जठै जीमण रा धोपटा उडै हा। लोगबागां नै जीमतां नै देख’र इणां ई खींप में गोह मारणी चाही। ऐ थाल़ी लेय ठाट सूं जीमण बैठग्या। मोल़िया बांध्योड़ा अर मूंछां रै बट दियोड़ो देख्यो जणै सेठां नै बहम पड़ियो कै ऐ बाणियां नीं हुय सकै। ऐ कोई धसल़ देवणिया लागै। बाणिया बुद्धिमान हुवै सीधो-सीधो तो इयां कीकर कैवै कै थे बाणियां नीं, कोई मोफतिया लागो! सो उवां आपरी अकल उपाय उणांनै पूछण री तेवड़ी-तेवड़ी जितरै सिरदार लगटगै जीम लिया पण तोई बाणियां रै इतरी पोल कठै जको हर कोई माल मिटाय जावै सो सेठां आपरी बुद्धि मुजब पूछियो-
“कैड़ा गोता ?”

आं जवाब दियो-
“करनी पोता!!”

आ नवी जात सुण बाणियां ई चमक्या अर एक-दूजै रै साम्हीं जोयो अर आगै पूछियो-
“दसा कै बीसा ?”

आ पडूंत्तर दियो-
भाई म्हे तो को दसा न को बीसा!
चल़ू करावो, करां तैतीसा!!

अर चल़ू कर’र आगले गांमतरै टुरग्या।


—(26)—

एक किरसाण रै अधगावल़ो सोक बेटो हो। किरसाण उणनै कोई तोजी बैठाय भलै घर में परणा लियो। थोड़ै दिनां पछै छोरै रै जचगी कै हमे खेत में खोदरड़ो नीं कर’र दिखण में कमावण जावूंलो।

आ बात जद उण आपरी लुगाई नै सुणाई जणै उण कह्यो कै-
“थांनै प्रदेश में जावण री कांई जरूरत? आपांरै गायां दूजै, ठावकी बल़धां री जोड़ी। उपजाऊ खेत। अठै ई खावो-कमावो।”

उवो नीं मान्यो जणै उणरी मा उणनै समझायो पण उणरै जची नीं अर उवो खावण-कमावण प्रदेश बुवो गयो। थोड़ै दिनां में कनला ई खाय मिटाया। उणरै कोई कामधाम ताबै नीं आयो। केई भचभेड़ा खाया पण कमाई तो आगी उलटी कनली कीं ही जकी निवड़गी अर कोढ में खाज आ हुई कै उवो आपरै गांम रो नाम ई भूलग्यो। अबै पाछो जावै तो जावै कठै? आखिर मरता क्या नहीं करता? सो इण ई मांगणो अर खावणो शुरू कर दियो। इयां भटकतो-भटकतो एक दिन सांझ री वेल़ा आपरै ई घर आगै आयग्यो। आगै इणरी ईज घरवाल़ी ठांम मांजै ही। ई आवतै ई उणनै संबोधित कर’र कह्यो-

गाडी छोड बल़दिया छोड्या, घरां सुलखणी नारी।
तेरे द्वारे बजै टमकला, ला रोटी तरकारी!!

लुगाई सैंधी बोली ओल़ख’र साम्हो जोयो तो उण ओल़ख लियो कै तो उणरो ई घणकमाऊ भरतार है। उवा उठी अर आपरी सासू नै शुभ संदेश सुणावती कह्यो-

कासण मांजण म्हैं गई, रोयो न हांस्यो जाय।
सासू तेरो डीकरो, आयो दिखण कमाय!!


—(25)—

एक बात चालै कै जोधपुर रै किणी राजाजी माथै आवण वाल़ी विपदा री मोगड़ा रा सिंढायच रामदानजी नै सुपनै में आगूंच ठाह पड़गी। जणै उणां पूरी बात दरबार नै बताई अर दरबार विपत सूं बचग्या। उणां तय कियो कै इण सारू रामदानजी नै एक गांम इनायत कियो जावै।

कुजोग ऐड़ो बणियो कै गांम लेवण सूं पैला ई रामदानजी नीं रह्या। आ बात दरबार सुणी जणै उणां रामदानजी रै बेटे टीकमदासजी नै बुलाय’र उदारता रै वशीभूत बिलाड़ो देवण रो आदेश दे दियो। आ बात दीवान सुणी जणै उणां आय दरबार नै अरज करी कै-
“हुकम बिलाड़ो तो बिलाड़ा दीवानजी रो है उणां सूं तागीर हुयां बिनां आप कीकर दे सको? अर पछै बिलाड़ा जैड़ो उपजाऊ गांम बाजीसा नै कोई दीरिज्या करै?”

आ सुणतां ई दरबार गताघम में पड़ग्या अर बोल्या कै –
“दीवानजी हमे आप ई कोई उपाय करो। म्हैं हमे कीं नीं कर सकूं।”

जद दीवानजी टीकमदासजी नै बुलाया अर कह्यो कै-
“हुकम! आप बिलाड़ियो लेसो कै बेहगढ?”

आ सुणतां ई बाजीसा कह्यो-
“अरे! बिलाड़ै माथै पड़ो सिलाड़ो! म्हे तो बेहगढ लेस्यां। !”

जणै दीवानजी कह्यो–
“हुकम! आप म्हांरै घणी बात हो। आपरी बात तो राखणी ई पड़सी।” अर दीवानजी, बाजीसा नै बेहगढ रो तांबापत्र दे दियो।

टीकमदासजी बेह आया तो देखियो कै घणी आकां री झंगी। थोथी थल़ियां। एक बोड़ियो कुवो। बाकी गढ में हरे!हरे!!
पण बाजीसा निराश नीं हुया अर नीं बेह नै बिलाड़ै सूं कमतर मानियो। उणां बेह अर बिलाड़ै री तुलना करतां कह्यो-

बाणगंगा ज्यूं बोड़ियो, बिलाड़ै ज्यूं बेह।
(उठै) काठा गेहूं नीपजै, (अठै)आकां री थेह।।


—(24)—

बीकानेर महाराजा सूरसिंहजी रै समकालीन हा चाचोजी मीसण। कन्नै घोड़ा अर घणो वित्त।

बात चालै कै चाचोजी अर आंरा मासयात भाई चोल़ोजी गाडण, सूरसिंहजी रा बिखै में मदतगार रह्या।

जद सूरसिंहजी राजा बणिया जणै चोल़ोजी नै डांडूसर जैड़ो ठावको गांम अर ओपतो सनमान दियो पण जोग सूं चाचैजी रै विलासी जैड़ो छोटोक गांम पांति। इण विषय में बात चालै कै जद गांम इनायत हुवण लागो जणै दरबार आदेश दियो कै चाचैजी नै छापर इनायत करी जावै। आ बात दीवान नै ठाह लागी जणै उणां दरबार नै कह्यो कै- “हुकम छापर मोटो गांम है! इतरो मोटो गांम बाजीसा नै मत देवो।”

आ सुण’र दरबार कह्यो –
“बाजीसा रो आपां माथै एहसान हो सो म्हैं दे चूको अबै तो आप ई कोई उपाय करो। म्हैं हमे पाछो छीबाछल़ नीं लगावूं।”

जणै दीवान चाचैजी नै बुलाय’र कह्यो-
“हुकम! आप छापरड़ी लेवोला कै विलासी ?”

आ सुण’र बाजीसा कह्यो- “छापरड़ी तो नाम ई पोचो है म्हैं तो विलासी लेसूं।”

बाजीसा नै पट्टो जारी हुयग्यो। बाजीसा अठै आया तो देखियो कै गघूधड़िया़ं रै बिचाल़ै आयोड़ो एक छोटोक गांमड़ो। पण पांती आयो सो भीरू। आपरै गांम माथै मोद करतां बाजीसा कह्यो-

छापरड़ी दोय टापरड़ी, जींदांणै घर च्यार।
ऊंचै मगरै वीलपुर, (म्हारो)सांभर रै उणहार।।


—(23)—

एक शेखावटी रा सिरदार कबाण लियां मारग-मारग बैवै हा। बैतां-बैतां उणां सोचियो कै क्यूं नीं थोड़ो शिकार रम लियो जावै, जिणसूं थोड़ो अभ्यास ई हुय जासी अर रल़ी ई पूरीजसी। आ सोच’र उणां धनुष माथै तीर चढायो अर बायो जिको जाय’र सीधो चूगो चुगती एक गैरी(कमेड़ी) रै जाय’र लागो। तीर लागतां ई उवा तड़ाछ खाय’र धरती भेल़ी हुई।

सिरदारां नै पूरो पतियारो हुयग्यो कै धू आपरी जागा सूं चूकै तो उणांरै बायो तीर चूकै।

अबै रोजीनै उणां रै शिकार रमण री धुन चजगी। एक दिन घर सूं निकल़िया अर गोरवैं पूगा ईज हा कै तिस्सां मरतो एक भूंईजतो स्याल़ियो निगै आयो। उणां तो फट धनख चढायो अर बायो। तीर सीधो स्याल़ियै रो भेजो चीरतो बारै निकल़ग्यो। अबै सिरदारां रै धुन ऐड़ी चजी कै बापड़ै इण छोटोड़ै जानवरां रो शिकार नीं करूं, अबै सीधो नवहत्थै सिंघ रो ई करसूं।

आ धार-विचार’र रोही कानी निकल़िया। कोसएक गया हुसी जितरै उणांनै एक सिंघ रा पंजा निगै आया। उणां तो पंजां री सीध बैणो शुरू कियो ईज हो कै जितरै एक बाजीसा आयग्या। सिरदारां नै पागीपो करतां देख’र पूछ्यो कै-
“हुकम ! कांई गमाय दियो जिको इयां पागीपो करो ?”

आ सुणतां ई सिरदारां आपरी वीरता री पूरी वारता बाजीसा नै सुणावतां कह्यो कै-
“हुकम! ओ खोज देख लिरावो। ओ जींको है बींको ई शिकार रमसूं!”

बाजीसा गुढै आय’र जोयो तो पग ठालैभूलै वनराज रो हो! आ देखतां ई बाजीसा कह्यो–

दाणा चुगती मोडी मारी, गादड़ मार्यो तासो।
अबकै खोज बडां का लीन्हां, जड़ामूल़ सूं जासो!!


—(22)—

किणी ठिकाणै रै करणावतां री कोटड़ी में एक गोघड़मिन्नो(बोड -बिलाव) हिल़ग्यो। वेल़ा-कुवेल़ा आवै अर धाप’र उजाड़ करै। आखिर सिरदार गोघड़मिन्नै रै उतपात सूं उथपग्या। जणै भाईपो पूरो जाजम माथै जुड़ियो अर विचार कियो कै इण गोघड़मिन्नै सूं कीकर लारो छोडावणो रह्यो? ताकि बिगाड़ सूं लारो छूटै। आखिर तय हुयो कै कीकर ई इणरी कड़ियां में जैवड़ो घाल’र काबू कर लैणो चाहीजै। सेवट इयां ई करीज्यो। परियां सूं सरकाफास बाही अर उणरै गल़ै मांयकर कड़ियां में रंढूं कसीज्यो। तो ई इणां रो मन मान्यो नीं जणै इणां बरत(लाव) मंगाई अर इणरै गल़ै में घाली अर पछै पूरै लसकर इणनै भाल़ां सूं बींध’र मारियो। गोघड़ नै मारियां पछै उणांनै लागो कै इतरी वीरता बताई अर कवि रै आखरां नीं मंडी जणै आ तो अकारथ ई गई। एक-दूजै चरचा करी जणै सेवट तय हुयो कै कोई बाजीसा नै आ वीरता बताई जावै अर अमरता वरी जावै। जोग सूं उणी दिन आंरी कोटड़ी कोई बाजीसा आयग्या। आं धुरामूल़ सूं पूरी बात बताई कै किणगत बोडबिलाव नै मार्यो। पछै इणां बाजीसा सूं कोई कविता ठावण रो निवेदन कियो। बाजीसा नै कांई सांभणो हो? उणां तो घटना री विगत सुणतां ई कविता सुणाई-

कड़ बांधी काठो कियो, गल़ में घाती लाव।
करड़ी कूंत करणावतां, मार्यो बोड-बिलाव।।


—(21)—

एक बारठजी कठै ई आपरो कविता पाठ करै हा। जिणमें उण वीरां रा बखाण हा जिणां आपरी वीरता बताई। वीररस री कविता सुण’र उठै बैठे एक शेखावत सिरदार रै ई सूरापो चढियो अर बाजीसा नै कह्यो कै-
“बाजीसा ! आप ई दूजै सिरदारां री वीरता रा बखाण करो तो एक कविता म्हांकी ई बणावो नीं।”

आ सुण’र बारठजी कह्यो –
“हां ! म्हांनै वीरता व्हाली है सो आप आपरी वीरता री कोई वारता म्हनै बतावो।”

आ सुण’र शेखावत सिरदार बोल्यो कै –
“म्हैं रात री सुपनै में म्यान मांय सूं तरवार काढी अर वीरता बताई।”

आ सुण’र बारठजी कह्यो कै-
“आप सुपनै में तरवार काढ’र बाही किण माथै ?”

आ तो याद नीं रैयी पण आ नकी है कै कींकै ई कींकै माथै तो बाही। शेखावत कह्यो जणै बारठजी कह्यो कै आपरी वीरता तो वारणाजोग है सो दूहो सुण लिरावो-

शेखै कै बेटे, झट म्यान सूं लीनी।
आखड़तै पड़तै अल़वल़िये, क्यांकै तो क्यांकै दीनी!!


—(20)—

पैली री बखत लोगबाग संबंध-सगपण करण में केई काण-कायदां नै पाल़ता। यानी किणी गांम में बेटी अर बेटो दोनूं परणावता तो कठै ई फखत बेटो ई बेटी नीं। आ रूढी दासोड़ी में ई हुती। सींथल़, दासोड़ी रै आदू गिनायतां रो गांम पण पुराणी बखत में दासोड़िया आपरी बेटी नै सींथल़ियां नै नीं परणावता फखत बेटे रो ब्याव ईज उठै करता। आ सींथल़ियां नै खटकती अर उवै रीसां बल़ता दासोड़ियां नै ‘खुरला’ कैवता। खैर..

सींथल़ रै कविराज परिवार मांय सूं मूल़जी रो शायत पैलो ब्याव दासोड़ी हुयो। मूल़दानजी रै जसजी हुया। पछै इणां रा ई भाई मुकनजी अर पारिवारिक भाई रिड़मलदानसा रो ब्याव दासोड़ी हुयो। ई परिवार में ई करनीदानजी हा जिणां री सगाई करण सारू कोई बाजीसा दासोड़ी सूं सींथल़ गया। सगाई लगैबगै तय हुय चूकी ही। रात री हथाई जमी। जैड़ो कै कैताणो है

जाट जंवाई भाणजो, रेबारी सोनार।
इतरा कदै न आपणा, कर देखो उपकार।।

जसजी ई दासोड़ी रा भाणेज हा। उणां रिश्ता गिणावतां कह्यो कै ‘दरियाव’ में अजै तो तीन चारण ई डूबा है यानी परणीजिया है अर तीजा करनीदानजी त्यार है डूबण नै-

दासोड़ी दरियाव में, चारण डूबा च्यार।
मूल़ो मुकनो रिड़मलो, चौथो करनो त्यार।।

आ सुणतां करनीदानजी ई कह्यो- “भाई! हूं तो नीं डूबूं।”

जणै उठै बैठे किणी कह्यो कै- “डूबण नै ओ हरसुख खुरमुरी खावै।”

जणै हरसुखजी री सगाई दासोड़ी हुई ता पछै ओ दूहो इयां चाल पड़्यो- ‘चौथो हरसुख त्यार।’


—(19)—

महाराणा भीमसिंहजी दातार अर उदार राजा हा सो उणां रो चावो नाम सुण शेखावाटी रै किणी गांम रो एक कवियो सिरदार उठै पूगो।

जैड़ी उक्ति अर जुक्ति बैड़ी कविता ठाई अर ठरकै सूं सुणाई। दरबार राजी हुया अर आदेश दियो कै- “बाजीसा हुकम करावो कांई रीझ करूं? आप फरमावो सो हाजर।”

आ कैती बखत दरबार रै कानां री लंबी लोल़ सूं कुंडल़ जगमगाट करै हा सो कविवर कह्यो- “हुकम जैड़ो आप रो वंश बडो उणीगत म्हे अलौत ई बडै कुल़ में मानीजां सो रीझ क्यूं बडी हुवणी चाहीजै। छोटी आपनै ओपै न को म्हनै!”

“तो फरमावो।” महाराणाजी कह्यो जणै अलूजी रो पोतरो बोल्यो-

बडै घर का छोरूं बाजां, मोटो ई दत्त पावां।
कानां मांला म्हांनै दे दो, म्हे ई कान हिलावां।।

ओ गूढार्थ राणैजी रै कीं पल्लै नीं पड़्यो जणै उणां आपरै कविराजजी साम्हों जोय’र फरमायो कै- “बाजीसा री कांई इच्छा है ?” जणै उठै रा कविराजजी बोल्या-

मोटै घर रा छोरू बाजै, मोटो ई दत्त पावै।
कांन हलावण हूंस हुवै तो, लाधूवास सिधावै।।

अर्थात लाधूवास कनफटा जोगियां रो मठ है जठै कवियोजी नै मेल दिरावो सो कान फड़ाय, कुंडल़ धार’र कान हिलावण री आपरी मनसा पूर लिरावै।


—(18)—

अचलैजी बारठ री संतति अचल़ावत बाजै। अचल़ोजी, मल्लिनाथ जी, जगमालजी रै समकालीन हा। इणां रा डिंगल़ गीत मिले-‘गीत बारठ अचल़ै महेवै रो कहियो’ एक म्हारै ई संग्रह में है। इणां री संतति रा गांम बागूंडी, भिखाड़ाई, कजोई, कसूंबला, लापूंदड़ा आद।

एक’र एक गायबी(दमामी) लापूंदड़ै गयो। उठै रो पाणी पीवो भलांई घोल़ियोड़ो लूण पीवो। रैवासियां रै तो सद्योड़ो हो पण बारलां नै ओ पाणी परचो दिया बिनां रैवै नीं सो दमामी पाणी पियो, केई ताल़ जजमानां सूं हथाई करी अर पछै पाखती रै गांम मलंग आयग्यो। रागै रो भाई वैरागो। ‘डावो भलो न जीवणो, दोनूं एकणकार!’ अठै ई पाणी ऐड़ो’र ऐड़ो!! सो पेट में खल़बल़ो मचग्यो! सांझ रो गुढै रै गांम चीबी पूगो। चीबी वाल़ां कोड किया। जिमायो अर सूवण नै मांचो दे दियो पण सूवै कुण? पेट में मरोड़ै माथै मरोड़ा हालै। पूरी रात पेट छूटो। दस्तां लागती रैयी पण उपाय कांई? दिनूगै उठै सूं बहीर हुयो अर आपरै मारग-मारग जावै हो जितरै कोई लापूंदड़ै रा सरदार मिल्या अर दमामी नै पूछ्यो-
“रे! किनै आयो, लापूंदड़ै गयो कै ना ?”

उण कह्यो – “बापजी आपरो गांम है बाकी म्हारै आगै पाछो नाम मत लिया?”

आ सुणतां ई बाजीसा आपरै गांम री बडाई करी-

खारो पाणी खड़ घणो, चरणै लंबो जोड।
लहरी समंद लापूंदड़ा, हुवै न थारी होड!!

आ सुणतां ई दमामी आप में बीती बतावतां कह्यो-
“धण्यां रीस मत कर्या एक दूहो म्हारो ई सुण लिरावो-

लांपो देवुं लापूंदड़ै, मोरो देवुं मलंग।
चीबी थारै चोवटै, पड़िया रह्या पलंग।।


—(17)—

लच्छीरामजी सांदू बीकासर(बीकानेर) रा हा। महाराजा मानसिंहजी जोधपुर रा समकालीन। खरी कैणी अर वा ई बिनां किणी लाग-लपेट रै।

एक’र उवै किनै सूं ई आपरै घरै आया, जोग सूं घर-धणियाणी घरै नीं लाधी जणै उणां पतो करायो कै कठै है? तो ठाह लागो कै पड़ौस में। जणै उणां आपरी सायधण रै सभाव, रूप नै बखाणतां जोर सूं एक दूहो सुणायो-

कुंजर नैणी जव लंकी, खरणी जिसो सभाव।
लैणायत लच्छीराम री, (तूं)ऊंठ पगी घर आव।।

इणां रै एक बेटे रो नाम केसरोजी हो। बेटो मोटो हुयो पण काम रै नाम माथै हरे!हरे!

बाप कमावै अर मोटयार माल बेटो बैठो खावै आ बात जोगती नीं। जणै लच्छीरामजी आपरै बेटे नै संबोधित कर’र कह्यो-

कहरे केसरियाह? लैणायत लच्छीराम रा!
(म्हैं)भव बीजै भरियाह! कह बाकी रहिया किता?


—(16)—

सीलवा (बीकानेर) रै पाखती आयो मूल़वास आसियां रो गांम। अठै रा आसिया भग्गू री भाईप। भग्गू जिणरो हणै नाम श्रीबालाजी है। मूल़ावास नै भाईसैण सीलवै रै नाम सूं ई जाणै। इण गांम रो पाणी अकंदर। चिड़ी चांच डबोवै तो मर जावै। रैवासी जिंयां-तिंयां धाको धिकावै। अठै दो भाई हा जैतरूपजी अर समरथजी। जैतरूपजी मोटा कवि हा। पाणी रै तसियै सूं उथप’र समरथजी दियातरा गया परा अर उठै ई रैवण लागा। आ बात जैतजी रै जची नीं उणां आपरै भाई नै दो दूहा लिख्या अर पाछो आवण रो निवेदन कियो-

सुणजै भाई समरथा, कूड़ी हेक न काय।
तूं तजनै उण ताल नै, पाछो उरिया आय।।
सिमरथा सुणजै सही, लेस म्हारी चित लाव।
तज मगरै रो बैठणो, तूं तज नीर तल़ाव।।

ऐ दूहा सुण’र सिमरथदानजी पाछा लिख्या-

सुण जैता सिमरथ कहै, कूड़ी कहै न काय।
नख डूबां जिण नीर में, जोय चिड़ी मर जाय।।
सुण जैता सिमरथ कहै, कूड़ी कहै न काय।
ओ इमरत अरोगतां, जैर कनै कुण जाय।।


—(15)—

बीकानेर इलाके रै किणी एक गांम रा वासी हा बीठू अंबादानजी। बियां ई बीकानेर में कदै ओ कैताणो चावो हो-

‘कै बीकां कै बीठवां,
दीपै जांगल़ देश।’

अंबादानजी नै खावण अर पीवण रो चाव। पूरी उम्र ओ ई काम कियो। दिनां आयां खेजड़ा ई पड़ै पछै मिनख री कांई जनात ? सो अंबादानजी नै ई सौ वरस पूगा। इण बात री ठाह जद उणांरै दूजै प्रेमियां नै मिली तो दुख हुयो। हुवणो ई हो! क्यूंकै मित्र विछोह ई कठण स्थिति हुवै सो एक मित्र सहन नीं कर सक्यो अर आपरै दुख नै मरसिया बणाय प्रगट कियो। उण उवै मरसिया आपरै एक दूजै मित्र नै सुणाया।

उण मित्र दूहो सुणायो-

वीठू वसुधा ऊपरै, नर कज कीना नेक।
अंब कवि इहलोक तज, पूगो सुरपुर पेख।।

दूहो सुणाय’र आपरै मित्र नै पूछ्यो कै “कियां, भाव कीकर है? अंबजी रै व्यक्तित्व लायक ठयो कै नीं?”

दूजोड़ै मित्र माथो धूंणतो कह्यो –
“भाई ! भाव धाव तो थारा ठीक हुसी पण तूं आ बात पक्की जाणले कै आ पोल-धोल धरती माथै ईज है बाकी सुरपुर में इती पोल कठै जको हर कोई मूंढो ऊंचो कर’र उठै धस जावै? पछै अंब कवि नै उठै कुण बड़ण दे ला? क्यूंकै उणां जिका काम किया उवै थारै सूं कांई छाना सो सुण-

ओरण में अकरम किया, छैल बकरिया छून।
अंब कवी उभै जित्ती, सुरपुर में कित सून ?


—(14)—

आथूणै राजस्थान में पैला हर दूजै-तीजै वरस धराल़ काल़ पड़ता ई रैवता। गांमां में पूगता सराजाम नीं हुवण सूं लोग उठै जावता जठै काल़ रो प्रभाव नीं पड़तो।

एक’र किणी काल़ री मार सूं आंती हुय नोखड़ा रा आसिया सरदार भेला हुय आदमतंड जावै हा। बीच में मथाणिये रुकिया। मथाणिया रै जैन वाणिये मानमल री दुकान सूं कीं चीज-वुस्त खरीदण नै किणी एक-दो नै मेलिया। वाणियो कवि हो अर कोगती ई। उण आसियां नै संबोधित कर’र एक दूहो कह्यो-

फाकै फाको न छोडियो, जबर मचायो झुंड।
आवै घणा ई आसिया, जावै आदमतंड।।

आसियां रै आ बात खुबगी पण चीज लावणियां में कोई कवि नीं हो जणै उणां डेरे आय वांकजी आसिया नै आ बात बताई।
वांकजी कवि हा। उणां जाय मानमल नै कह्यो –
“सेठां दूहो थे बणायो ?”

सेठां कह्यो – “हां हुकम म्हैं तो म्हांरै सरदारां रा तन जाण आप सूं मसकरी करी, बाकी म्हनै किसो दूहो आवै।”

आ सुण वांकजी कह्यो – “जणै सेठां थांरो व्याज बधियो सो एक दूहे रै बदल़ै म्हैं दो दूहा थांनै सुणावूंलो।”

आ कैय उणां कह्यो-

फाकै फाको न छोडियो, आसाम्यां रै ऐन।
मथरा ढाबी मा’जनां, बापां हंदी बैन।।
फाकै फाको न छोडियो, करसा आया कूक।
बससी किणविध वाणिया, दे भणणाटा भूख।।

कह्यो जावै कै थोड़ै दिनां पछै ई सेठां रो वौपार सफा मंदो पड़ग्यो।

मथरा-मथाणिया
#बापां हंदी बैन-भूवा अर्थात भूख


—(13)—

रारी(किसनगढ) चारणां रो एक गांम है। उठै एक’र मोतीसर कवेसर आयो। रारी वाल़ां आवभगत तो आगी रैयी उणनै जुगतसर जीमायो तक नीं। प्रभात रो उवो बहीर हुयो। रीस आयोड़ी ही, मारग में उण देख्यो कै एक आदमी आगै-आगै दोड़ै हो अर उणरै लारै-लारै तीड्यां रो झुंड चालै हो।

उण दिनां रारी रै आखती-पाखती तीडी आयोड़ी ही। आज वाल़ै दांई तीडी महकमो तो हो नीं। उठीनै गांमां में तीडी नै वश में करण सारू ओ काम जोगी जात रै जिम्मे हुवतो। उवै किणी मंत्र रै पाण तीड्यां नै झुंड में भेल़ी कर’र आगलै गांम री कांकड़ में घाल देता। इण सारू उणां नै बाकायदा आजीविका दिरीजती।

मोतीसर कविवर ओ खिलको देख्यो तो जोगी नै पूछ्यो कै –
“भाई ओ कांई करै? तूं आगै-आगै दोड़ै अर थारै लारै-लारै आ तीड्यां री हेड़! ओ कांई प्रभाव है?”

जणै जोगी कह्यो कै- “मंत्र रै प्रभाव सूं तीड्यां नै रारी सूं काढ’र आगली कांकड़ में घालण रो म्हारो जिम्मो है सो ओ ईज काम करूं।”

आ बात सुणतां मोतीसर कवि बोल्यो –
“रे गैलसफा ! रारी सूं तीड्यां नै मत काढ, ई गांम में तो तीडी उतरणी चाहीजै।”

“नीं सा ओ म्हारो काम है इण सारू म्हनै आजीविका दिरीजै।” जोगी बोल्यो तो कवेसर कह्यो –
“अरे ! थारै मंत्र में इतरी करामात नीं है जितरी म्हारै मंत्र में है।”

आ कैय’र उण एक दूहो कह्यो-

आंखड़ियां रतनारियां, पील़ी पांखड़ियांह।
एक रल़क्को और दे, (तूं)रारी री रड़ियांह।।

ई दूहै रो ऐड़ो प्रभाव पड़्यो कै तीडी रारी सूं आगै नीं गई। जोगी खप हार्यो।

गांम वाल़ां जोगी नै ओल़भो दियो कै –
“तनै धान बीजो किण काम सारू देवां ? तूं तीडी आगै नीं मेल सक्यो।”

जणै उण बापड़ै कै कह्यो – “बापजी आपरै कविवर कांई ठा कांई कह्यो? जको एक तीडी आगै नीं हाली।”

आ सुणतां ई रारी वाल़ां नै आपरी भूल रो अहसास हुयो।


—(12)—

घोड़ारण रा कवि काल़ूदानजी रै पाबूजी रो इष्ट हो। यूं तो पाबूजी रो इष्ट काल़ूदानजी रै ईज कांई? हरेक चारण रै हुवै जद ई तो कह्यो गयो है-

चवड़ै सूवो चारणां, निरभै बांधो वित्त।
धिन ज्यांरै धांधल धणी, पाबू पौरायत्त।

पण काल़ूदानजी रै कीं बधीक इष्ट हो। सो उवै जम्मै में पाबूजी रै गायकां साथै गावता। आ बात किणी दूजै कवि रै जची नीं जणै उण काल़ूदानजी नै ओल़भो देतां कह्यो-

कवि काल़ूदान ! अकल रो घाटो।
थोर्यां साथै बैठणो! अर मूंढै आगै मोटो!!

आ बात सुण’र काल़ूदानजी सहजता सूं पाछो कह्यो-

कवि काल़ूदान, अकल रै बाधै।
ऊनाल़ै री लापसी, (आ)थोर्यां साथै लाधै।।


—(11)—

रामदानजी रतनू दासोड़ी रै रतनू डूंगरदानजी रा बेटा हा। उणां खुद लिख्यो है-

रामो डूंगरदान रो,
करै मजूरी मोल।

बेबाक अर खरी कैवणी। आपरी कविता में हास्य अर व्यंग्य रो सांगोपांग समावेश हो। एक’र इणां आपरो खेत बायो। दूजां रै धान हुयो पण इणां रै कोई खास नीं हुयो। जणै किणी पूछ्यो कै जमानो कैड़ोक हो ? जणै कवि जवाब दियो-

दो ओठा दो बाल़दा, हल़ बाया हरसूंह।
रूड़ी लागी राम नै, घींसाई घर सूंह।।

दासोड़ी रै पाखती गांम लूणा रा खेसला प्रसिद्ध हा। बेजारा मन सूं बणावता। अमुमन लोग चौमासे में सिट्टा खूंटण सारू झोल़ी बणावण नै लावता। रामदानजी ई आपरै परिवार में काका भूरदानजी साथै लूणा रा खेसला मंगाया पण उणां लूणै सूं नीं लाय’र फल़ोदी सूं लाय’र दे दिया। कवि देखतां ओल़ख लिया। हथाई जुड़ी अर किणी पूछ्यो कै लूणै सूं कितरा खेसला मंगाया जणै कवि बेबाकी सूं कह्यो–

फल़ोदी सूं खेसला लाया, ले लूणै रो नाम।
भूरजी काकै भोड में ठोकी, धूड़ में रल़ग्या दाम।।


—(10)—

भदोरा गांम आपरी साहित्यिक अर सांस्कृतिक विरासत रै पाण चावो रह्यो है। ओ गांम प्रसिद्ध कवि मालाजी सांदू नै करोड़ पसाव रै साथै बीकानेर महाराजा रायसिंह जी दियो। इण बात रो दाखलो कवि खुद आपरै एक गीत में दियो है।

मालाजी री संतति में जितरा कवि हुया, उतरा शायद दूजै किणी एक कवि री संतति में नीं हुया हुसी।

इणी गांम में मोतीसर गिरधरजी प्रसिद्ध कवि हुया। मोतीसर, चारणां सारू पूजनीक जात। उणां रै एक बकरी ही। जोग सूं बकरी किणी सांदू सरदार रै हाथ सूं सुरग सिधारगी। बकरी ई कानिये री मा री कटारी रै दांई ही।

कवि पंचायती कराई पण सरदारां भाईपे री भीर खांची। आ बात मोतीसर कवि गिरधरजी सूं सहन नीं हुई। उणां एक ‘प्रहास साणोर’ गीत में ओल़भो देतां लिख्यो कै- “म्हारी बकरी जिकी ककड़ाय री सीम तक चर’र भदोरे आय’र पाणी पीवती। आपरी डांडी जाणो अर आपरी डांडी आणो। सरदारां उण अबोले प्राणी नै ई नीं मारियो है बल्कि म्हारै टाबरां रो धीणो पण खोस लियो।”

गीत रो छेहलो दूहालो —

सोगरा ज्वार रा खाय लूखासणा,
करै कांदो तणो रोज कीणो।
चहूं पोल़ां तणा बडाबड चारणां,
धण्यां मोटां लियो खोस धीणो।।


—(9)—

दासोड़ी गांम रा हिंगलाजदानजी उच्चकोटि रा वैद्य अर ठावा कवि हा। पशुवां सूं उणांनै घणो प्रेम हो। गायां राखता पण जोग सूं उणां एक पाडकी ले ली। जोग ऐड़ो बणियो कै पाडी, झोटी हुई अर झोटी फांडर रैयगी। उणां किणी नै कह्यो कै म्हारै झोटड़की नै दैणी। आ बात सुण’र खिखनिया रा भाटी भोजराजजी उण झोटी नै मोल लेय ली। भोजराजजी रै मन में दया बीजी नीं ही। उवां उणनै कुए कै हल़ बावण नै ली। खूंटे सूं खोली जणै पाडी रिड़की अर तपड़कै हुई। जणै कवि भैंस नै हकीकत बतावतां कह्यो-

छान में ठाण रही नित ऊपर,
सेवण लीलोय रोज चर्यो है।
और तो काम सर्यो नहीं एकोय,
गोबर धाप नै आप कर्यो है।
मत मोद करै महकी मन में,
आज थारो दिनमान फुर्यो है।
जीव दोल़ो जमराज फिरै जिम,
भैंस दोल़ो भोजराज फिर्यो है।

आं हिंगलाजदानजी रै एक बूढा काकी हा। उणां रै कोई औलाद बीजी नीं ही सो सेवा ऐ ईज करता। आं काकीजी रो पीहर मूंजासर हो। एक’र ऐ आपरै पीहर गया जणै जावता एक पटू ओढ’र गया। उठै पीहरियां फूठरो पटू देखियो जणै पोटाय राख लियो। आ बात कवि नै आंझी लागी जणै उणां एक दूहो कह्यो–

लुचां लियो लंकारियो,
कर-कर मनमें कोड।
मंझ सियाल़ै सी मरै,
(थांरी )भूवा उगाड़ै भोड।।


—(8)—

दासोड़ी गांम में शभजी जोशी हुया। डिंगल़ रा सिरै कवि। आज ई उणांरी रचना लोक-जीह्वा माथै अवस्थित है। फल़ोदी री अधिष्ठात्री देवी लटियाल़ रो छंद, म्हैं बाल़पण में म्हारै जीसा(दादोसा गणेशदानजी रतनू) सूं सुणतो-

जय जय लटियाल़क, विरद उजाल़क,
रास दयाल़क मात रमै।

इणां रा ई भाई अन्नारामजी जोशी वीतरागी हा। रामस्नेही बणग्या अर दासोड़ी रामद्वारै रा महंत हा। आं अन्नारामजी रा ई दतक-शिष्य हा रामसुखदासजी महाराज। इणी सारू स्वामीजी दासोड़ी नै पीहर कैता। इतरै बडै त्यागी पुरूष रो दासोड़ी रै प्रति लगाव जगजाहिर हो। खैर..

अन्नारामजी एक बार भंडारो कियो अर आपरी जमात यानी रामस्नेहियां नै तेड़’र जीमाया। जद आ बात शभजी नै ठाह लागी तो ऐ रामद्वारै गया अर देखियो कै जीमणवार हुवै हो। उणांनै उठै साधुवां में किणी जात विशेष रा साधू घणा निगै आया जणै अन्नारामजी महाराज नै ओल़भो देता बोल्या कै–

आपै कीजै कामड़ा, देवां किणनै दोष।
गुर बैठा जीमै गधा! ओ ई बडो अफसोस।।
अन्नाराम तो अकल रो, देवां किणनै दोष।
माल मिटावै मसकरा, ओ ई बडो अफसोस।।

अन्नारामजी रा काकाई भाई किसनदासजी। विद्वान आदमी हा पण इणांरा बेटा एक मुल़ताणचंदजी नै छोड’र बाकी सगल़ा ठठे मींडी ठोठ तो हा ई लखणा रा लाडा ई हा। एक दिन किसनदासजी आपरै छोरां माथै हाका करै हा। शभजी सुणिया तो बोल्या-

गँगाविशन तो गधै चढै, पाडै चढै पैल़ाद।
क्यां किसना कारा करै, (थारी) बिगड़ गई औलाद।।

शभजी री विद्वता री चर्चा आज ई चौपाल़ में चालती रैवै।


—(7)—

महाराजा मानसिंहजी जोधपुर उदार रै साथै-साथै चारण कवेसरां माथै घणा मेहरबान हा अर उणांरी काव्य प्रतिभा रा कद्रदान ई। ओ ई कारण हो कै उणां चारणां नै छोटा-मोटा इकसठ गांम इनायत किया-

इकसठ सांसण आपिया,
मानै गुमनाणी।।

महाराजा री उदारता अर दातारगी री बात सुण’र पोकरण रै पाखती गांम रै च्यार चारणां ई मतो कियो कै हालो दरबार सूं कीं रीझाय’र लावां।

जणै उवां मांय सूं एक बाजीसा बोल्या कै –
“भइया! कविता करणी घणी आंझी है! आपां कविता कदै करी?”

आ सुण’र दूजोड़ा बाजीसा बोल्या-
“भइया बात थारी ई काली नीं है! कोई डागो आगो-पाछो करणो हुवै तो करां बाकी कविता रै आपांरै की काम?”

जणै तीजोड़ै बाजीसा कह्यो-
“तो की करां? जूंवां रै खाधां गाभा पा न्हांखां! बुद्धि रां सरस्वती रा पूत हो, कोई अकल पी उपावो।”

आ बात सुण’र चौथोड़ां बा कह्यो-
“ई में शंकै जैड़ी की बात? हेक-हेक झड़ च्यारूं कैवांला। ओ चोकड़ियो ठह्यो। महाराजा आखरां रा पारखी है। हेक दूहे सूं पा रीझसी, घणी झकाल़ री ओथ की जरूत?”

च्यारूं जोधपुर आया।

देखियो कै दरबार संपाड़ो करै हा। एक बाजीसा कह्यो –

“सांभल़ै भइया साबल़ो रहे, हूं हेक झड़ ठावां-
झबल बाबा झबल।

जणै दूजोड़ां कह्यो-
माथो जाणै तबल।

जणै तीजोड़ां कह्यो-
दाढी जाणै खरहण!

जणै चौथोड़ा बा बोल्या-
बाल़ भूंडा दरहण!

च्यारूं ई राजी हुया कै चोकड़ियो ठह्यो।

जणै पैलड़ा बा बोल्या कै-
“हेक चोकड़िये सूं बात ठहे नीं दरबार नै हेक भल़ै कैवांला।

जणै किणी एक कह्यो कै साकल़ै भल़ै कविता विचारसां।

दिन ऊगो। उवै गढ में आया तो दरबार हाथी सवार होय शहर में घूमण पधारै हा।

एक बाजीसा कह्यो-
हूं झड़ उपावां। साबल़ो रहे-
बडाल़ो हाथी सूंड बडाल़।

जणै दूजोड़ां कह्यो-
ज्यां पर बैठो भूप जबराल़।

जणै तीजोड़ां कह्यो-
पचाहे ऊपर आपरी पीठ।

जणै चोथोड़ां कह्यो-
ढबोरै जाणै मोटो ढींक।

भला! भला! की चोकड़िया ठह्या है। साकलै दरबार रै कान पसाव कराय रीझांवांला।

दिन ऊगो। दरबार लागो। जणै हाजरिये आय अरज करी कै पोकण पट्टी सूं च्यार कवेसर आया है। हाजर हुवण री रजा मांगै।

दरबार कह्यो आवण दो।

कवेसरां आय मुजरो कियो-
खमा ! खमा! हेक खमा री सौ खमा!!

दरबार राजी होय कह्यो कै-
“हुकम ! कोई गीत बीजो सुणावो।”

जणै च्यारूं ई खमखमाय संभिया अर च्यारूं ई क्रमशः बोल्या-

झबल बाबा झबल।
माथो जाणै तबल।
दाढी जाणै खरहण।
बाल़ भूंडा दरहण।।

दरबार अर दरबारी-कवि ऐड़ी उदबुद्धि कविता सुण’र एक’र तो चमक्या पण पछै जका मोटा हुवै उणां रो काल़जो ई मोटो हुवै। उवै समझग्या कै बाजीसा रै कविता रै वरगै-वैर। मुल़कता बोल्या-

वाह कवेसरां वाह!!

जणै एक बा बोल्या हुकम हेक चोकड़ियो भल़ै सांभलो-

बडाल़ो हाथी सूंड बडाल़।
ज्यां पर बैठो भूप जबराल़।
पचाहे ऊपर आपरी पीठ।
ढबोरै जाणै मोटो ढीक।।

नवी उपमावां सुण’र एक’र तो दरबार री आंख्यां रो रंग बदल़ियो पछै सोचियो कै कविता दंडै जैड़ी पण इणमें रीस कैड़ी ? कोठै में हुसी उतरो ई खेल़ी में आवैला। पछै ठा आंनै ई नीं है कै आं कांई कह्यो। छो ! चारण है। ओपती रीझ कर’र विदा करसूं। ऐ कांई जाणसी कै आ मान महिपत नै रीझायो है। दरबार बोल्या कै मांगो बा कांई हाजर करूं? च्यारां एक एक कड़ी कैयी-

महाराजा भल मानसी,
मोटो ऊंठ मिल़ैह।
हेक रात बिच में रहां,
बीजोड़ी उजल़ैह।।

दरबार मुल़कतां थकां ऊंठ बगसावण रो होकम फरमायो।


—(6)—

मारवाड़ में दो पुस्करणा ब्राह्मण हा चर्तुभुजजी अर शिवदत्तजी। दोनूं मा जाया भाई। नाम तो दोनां रा ई ठावका हा पण आदत में जमी आसमान रो फरक हो। चर्तुभुजजी सुफेर अर अकल रा आगार हा तो शिवदत्तजी अकल रा सफमसफा। इण दोनां रै एक कवेसर सूं बेलीपा हा। उवै कविवर चर्तुभुजजी री अकल अर उणांरै मिनखपणै री गाहेबगाहे आपरी कविता में बडाई कर देता पण शिवदत्तजी माथै कीं नीं लिखता आ बात शिवदत्तजी नै अखरती।

एक दिन शिवदत्तजी, कविवर नै कह्यो कै “आप म्हारै भाई माथै तो रोजीनै कीं न कीं लिखता रैवो कदै ई तो म्हैं माथै ई कीं लिखो।”

जणै कविराजजी कह्यो कै -“ले आज एक दूहो तनै ई केयदूं।”

उणां कह्यो-

चतुरभुज तो चतुरभुज,
शिव-वाहण शिवदत्त।
समझणवाल़ा समझलो,
इणरो कांई अरत्थ।।

दूहो सुणरो शिवदत्तजी तो राजी हुया पण कनै बैठा वाह!वाह! सही कैय’र मुल़कण लागा।


—(5)—

मगरै रो गांम दियातरा एक जूनो गांम है। इण गांम रै नाम पेटे केई कैवै कै ऋषि दतात्रेय अठै तपस्या करी इण सारू इणरो नाम दयातरा/दियातरा है तो केई कैवै कै बीठू देवायत रो गांम हुवण रै कारण पैला इणनै लोग ‘देवायत रो’ कैता अर पछै मुख सुख रै कारण दियातरा कैवण लागा। खैर…अठै एक माधजी बीठू रैता। कविता करण रो घणो कोड हो पण असल में कविता करणी आवती नीं। तोई उवै कवियां में कै सभा में टांग अड़ा ई देता। इणांरी इण आदत सूं आंती आय किणी कवि इणांरै गांम आय इणांरै कड़ूंबै नै भेल़ो कियो अर कह्यो कै रातै कविता म्हारै कनै आई। बापड़ी कोजीढाल़ै कूकै ही अर माधजी बीठू री मार सूं बचावण री अरज करै ही। उणां कह्यो कै-

लघु गुरू रो भेद न लेखै,
ले लठ पड़ियो लारै,
कविता जाय वर्ण में कूकी,
(म्हनै)माधो बीठू मारै।।

सगल़ा रै साथै उठै बैठा माधजी ई हंसण लागा।


—(4)—

भेल़ा बैठा बासण ई खड़बड़ै सो मिनख तो खड़बडणा ई है। ऐड़ी ई खड़बड़ीजण री मसकरी है कूंपड़ावास री। कूंपड़ावास जिणनै भाई-सैण नगरी रै नाम सूं ई बतल़ावै अर प्रगाल़ रा भूखा हुवै तो नाम लेता थोड़ो शंको ई करै! शंको क्यूंकै करै? आ बात अठै नीं लिखूं क्यूंकै साच ई प्रिय बोलणो चाहीजै, अप्रिय साच नीं बोलणो। इण गांम में दो भाई। नाम लिखणा ठीक नीं। पाठक आपै ई समझ जावैला। दोनूं ई नामजादीक अर कवेसर। पण जोग ऐड़ो बणियो कै आपसरी में तणगी। तणी तो ऐड़ी तणी कै दोनूं कचेड़ी चढग्या। मुकदमो लंबो चालियो। उठै जज दीनानाथजी नाम रा कोई सैण हा। जणै मोटोड़ै भाई दीनानाथ अर्थात भगवान नै संबोधित कर’र जज साहब नै आपरी स्थिति दरसाई-

पगरखी फाटी परी, गाभा फाट गयाह।
अजूं न करी मो ऊपरै, दीनानाथ दयाह।।

ओ दूहो सुणतां ई छोटोड़ो भाई सावचेत हुयो अर सोचियो कै दूहो सुण’र जज साहब पसीज नीं जावै! जणै उणां आपरै भाभै रा असल लखण बतावतां दीनानाथजी नै सुणायो कै-

दीसत दीसै दूबल़ा, कइ कइ जुलम कियाह।
इसड़ां पर मत आंणजै, तूं दीनानाथ दयाह।।

जज साहब गताघम में पजग्या कै कांई निर्णय करणो चाहीजै ?


—(3)—

अमल लैवणिया अमल नै जैर नीं बल्कि काल़ो इमरत मानै। जदै ई तो आंरी हां में हां मिलावतां भक्त कवि किसनदासजी छींपा लिखै-

बढै पुराणो वैर, सगपण जिणसूं व्है सही।
जिणनै कुण कह जैर, (ओ तो) काल़ो इमरत किसनिया।।

ऐड़ो ई काल़ो इमरत अरोगणिया दो मिनख गांमतरै जावता रात रा एक गांम रै गोरवैं डेरा किया। धूंई जगाई, चिलमां भरी अर मावो लियो। सियाल़ै री रात ही सो आपरै कनला गूदड़ ओढ’र उठै ई सोयग्या। चंचल़ इतरा हा कै रात रा लघुशंका री हाजत हुई जणै एक धूंई रै इनै कियो अर दूजेड़ै बिनै कियो। सूरज ऊगो। सी उडियो जणै दोनूं बहीर हुयग्या।

उवां रै बहीर हुवतां ई गांम री दो लुगायां छाणा चूगण आई। गांम रै गोरवैं मोटो धूंणो देखियो जणै एक लुगाई आपरी अटकल़ करती कह्यो-

मोटा ढिगला राख रा, कनै छींछरियाह।
हूं तनै कैवुं हे सखी! अठै (कोई) तपसी उतरियाह।।

दूजोड़ी कनै आय’र देखियो तो उणनै धूंई रै एकदम माथै दोनां कानी पेशाब कियोड़ो निगै आयो। उण तुरत आपरी बुद्धि उपजाई अर बोली-

मोटा ढिगला राख रा, कनै मूतरियाह।
हूं तनै कैवुं हे सखी! अठै (कोई)अमली उतरियाह।।


—(2)—

बीकानेर रो खारी गांम मेहडू चारणां रो। बीकानेर रा संस्थापक बीकोजी खुदोखुद ओ गांम चारणां नै इनायत कियो। कालांतर में अठै मेहडू मानजी रैता। खेती करता पण खेत कदैकद ई जावता। उठै ई कोई बाबोजी रैता सो एक दिन मानजी रै खेत मांय सूं निकल़ै हा कै देखियो घेर-घुमेर बाजरी। सिट्टां सूं झरां हुयोड़ी। बाबैजी रो मन डुल़ग्यो। उणां सोचियो क्यूं कठै ई फेरी फिरणी? क्यूं नीं सिट्टां री झोल़ी भरली जावै। पण आखिर हा ग्यानी सो चोरी करणी पाप समझता। उणां ग्रंथां रै ग्यान मुजब बात रो तोड़ काढियो कै क्यूं नीं बाजरी रै घेरे नै ई पूछ’र झोल़ी भरली जावै? इण बात सारू उणांरो मन ई मानग्यो।

उणां आपै ई प्रश्न कियो अर आपै ई पडुत्तर दियो-
“ओ रे बाजरी रा घेरा!”
“कहरे गुरु मेरा ?”
“तोड़ूं हूं सिट्टा तेरा!”
“तोड़ै नीं बोहतेरा!”

उणां सिट्टा तोड़’र झोल़ी भरली अर आगै सारू जद ई धान निवड़तो तो सीधा मानजी रै खेत जावता अर ऐ ई प्रश्न कर’र झोल़ी भर लावता।

मतलब खासै सिट्टां नै बाबोजी डांडिया दे दिया जणै एकदिन मानजी खेत रै फेरो देवण गया। आगै देखै तो खेत कैवै म्हारै नैड़ा ई मत आया!!

मानजी गताघम में पजग्या। खेत में ढोर-डांगर रो पग ई नीं अर बाजरी री घाड़़ां में सिट्टा नीं ! बडै इचरज बात ही!

मानजी रै जचगी कै सिट्टा आपै ई पग कर’र गया तो कठै गया? पतो लगावणो। उवै रोजीनै बखतसर खेत आवण लागा।

एकदिन उवै घेरै में बैठा मतीरो जीमै हा कै बाबोजी आवतां ई प्रश्न दुसराया कै-
“ओ रे बाजरी घेरा!”
“कहरे रे गुरु मेरा ?”
“तोड़ूं हूं सिट्टा तेरा!”
“तोड़ै नीं बोहतेरा!”

मानजी पूरो खिलको समझग्या। उवै उठिया अर बाबैजी नै पकड़’र सिट्टा चोरण रो कारण पूछियो।

बाबैजी कह्यो- “भइया थारै खेत में चोरी किण करी? म्हैं तो सिट्टा बाजरी रै घेरे नै पूछ’र खूंटिया हूं। इणमें चोरी कैड़ी? कह्यां चीज दुनिया ले जावै जणै हूं ले ग्यो।”

मानजी बाबैजी रो बूकिया झाल’र गांम रे गौरवैं लाया जठै मुढ खोदण रा खंदेड़ा हा।

मानजी ऊंडो खंदेड़ो देख’र बाबैजी नै कह्यो-
म्हैं ई बापजी ई खंदेड़ो रो कह्यो कर रह्यो हूं सो आप घबराजो मत।

उणां पूछियो-
“ओ रे मुढ रा खाना!”
“कहरे मेहडू माना ?”
“आवै है गुरु मेरा!”
“आवणदे ऊंडेरा!”

इणरे साथै मानजी, बाबैजी नै खंदेड़ै में जरका दिया।


—(1)—

सरवड़ी(बाड़मेर) रा दो चारण कवेसर आपस में साम्हैं धड़ै भाई। दोनूं ई कवि। एक रो नाम हेमजी बोगसा तो दूजोड़ां रो जैतजी बोगसा।

जैतजी रै घरै चारो निवड़गो। उणां हेमजी नै एक दूहो कैय’र एक ओडी चारो मांगियो। हेमजी ई कवि हा सो उवां पाछो दूहो कह्यो अर आपरी बेबसी दरसाई।

जैतजी कह्यो-

हेमा थारी होड, नर दूजो करसी नहीं।
एक भरी दे ओड, सांप्रत तूं चारा तणी।।

ओ दूहो सुण’र हेमजी चारा री जागा बड़सी दूहे में उतारी। उणां कह्यो-

कहो जको कारज करूं, रहूं होय नै रैत।
इतरी डुई आंपणै, जावण दो नीं जैत।।

हालांकि हेमजी चारो दे दीनो पण आ मीठी मसकरी आज ई कायम है।

ढुई अथवा ढुसी उस चारे को कहते हैं जिसमें सभी तरह का महीन चारा शामिल हो तथा साथ ही रेत की पुट भी रहती है। अतः कवि ने यहां व्यंग्यात्मक रूप से कहा है कि यह तो ढुसी है इसको लेकर आप क्या करेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *