मेहाई-महिमा – हिगऴाजदान जी कविया

।।श्री जगदम्बा विजयते।।


।।श्री मेहाई-महिमा।।

।।आर्य्या छन्द।।
पुरूष प्रराण प्रकती, पार न पावंत शेष गणपती।
श्रीकरनी जयति सकत्ती, गिरा गो अतीत तो गत्ती।।1।।

।।छप्पय छन्द।।
ओऊंकार अपार, पार जिणरो कुण पावै।
आदि मध्य अवसाण, थकां पिंडा नंह थावै।
निरालम्ब निरलेप, जगतगुरू अन्तरजामी।
रूप रेख बिण राम, नाम जिणरो घणनामी।
सच्चिदानन्द व्यापक सरब,
इच्छा तिण में ऊपजै।
जगदम्ब सकति त्रिसकति जिका,
ब्रह्म प्रकृति माया बजै।।2।।

जिण दाणव जीतिया, महादारूण रण मंड्या।
सजि नोकोड़ शरीर, वीर रण-धीर विहंड्या।
लोयण धूम्र लुऴाय, शुम्भ निशुम्भ संहांर् या।
रकत बीज आरोगि, मुण्ड चण्डादिक मार् या।
खंड्या अनेक आकृति खऴां,
जोति हेक बप जूजवा।
जां मध्य राज राजेश्वरी,
हिंगऴाज परगट हुवा।।3।।

थिर बीलोचिसथान, थान धवऴागिर थावै।
पोहो साता दीप हूँ, उठै माता नित आवै।
मांमड़ रै माल्हिया, नांव आवड़ रो आई।
आई रो अवतार, हुवा करनल मेहाई।।
जैत नूं जैत दीधी जिको,
परवाड़ो जाँरो पुणूँ।
बिदमांन सकति ताला बिलद,
सिरी इंन्द्र बाई सुणूँ।।4।।

जवण हेक जेणरी, आँख नाहर उणहारै।
जग जाहर जोधार, लाख धांसाहर लारै।
दऴ आगऴ निस दीह, विजय त्रामागऴ बाजै।
दहसत गालिब देश, आग कहतां मुंह दाजै।
कमरो जहांन जिणनूं कहै,
धोम चसम जमरो धको।
खीजियो झालि हाथै खड़ग,
जंगऴधर माथै जिको।।5।।

सुणि बेगम समाचार, बेग पतसाह बुलायो।
खांन आमखास हूं, ऊठि अन्तहपुर आयो।
धण बोलै जोधार, हिचण तोलै नभ हाथै।
रण प्रारंभ रूपरा, मंडै आरंभ किण माथै।
आरबी बंब मादऴ उभै,
धुबै नाद बादऴ धजर।
मोनूं बताय बेढीमणां,
नाह कठी टेढी नजर।।6।।

थूं हिन्दुसथान में, जंगऴधर देश न जांणै।
जठै चवद्दह जणां, हुता राजा हिंदवांणै।
धकै चाढि कमधजां, मुलक ले लीधो माडै।
जिण गाडै सजि जोर, और कुण कांधो आडै।
तिण काज आज बाहर तिकां,
साजै घासाहर सलै।
गैमराँ खुलै झंडा गयण,
घोड़ां पर पाखर घलै।।7।।

अरज एक ऊचरण, चरण छूवण हूं चांऊ।
पाऊं करण पसाव, समर न करण समझाऊं।
जंगऴधर जंग री, लाय किण आय लगाई।
खतरनाक ख्वाब में, मनै पीरां फरमाई।
बीकांण पाट वाऴी बऴू,
घंटाऴी बैड़ी घणी।
कहि अति बात सारी कथा,
तवी राव सेखा तणी।।8।।

जुगल पांण जोड़िया, मुगल सुलतांण न मानी।
चढियो कर चक्ररो, कूंच विक्रमपुर कानी।
बयऴ न सूझै बोम, पोहोम धूजै हय पौड़ां।
अटक कटक उतरै, रटक लेबा राठौड़ां।
ओपमा देण कारण उठै,
करि विचार चारण कहै।
महरांण नीर अन्दर मनहु,
बीर रींछ बन्दर बहै।।9।।

।।दोहा।।
मालिक काबुल मुलकरो, कमरो साजि कटक्क।
जंड़्ग करण नृप जैत हूं, आयो लांघि अटक्क।।10।।

।।छंन्द त्रोटक।।
धर जंगऴ ऊपर फौज धिकी,
जमराण जमात समांण जिकी।
असमांणक मेह घटा उनई,
दधि जांणक छोड़ म्रजाद दई।।11।।

रह तोप हरोल चंदोल रूखी,
मक्र कोल गयन्द मयन्द मुखी।
हचकै बहु बैल करै हमला,
टहलै लगि गैल गयन्द टला।।12।।

बमि पावक लोह झड़ी बरसै,
दगियां कलपान्त घड़ी दरसै।
करणी गढ ग्रास घणी कड़कै,
धरणी पुड़ धूजि फणी धड़कै।।13।।

चरखां गडि चक्र मगां मचलै,
चर हूं थिर थाय पगां न चलै।
जड़ हूं करि जंड़्गम देत जिका,
तन अद्र मतंड़्गज रड़्ग तिका।।14।।

मगरूर धतांधत मत्त मदां,
उनमत्त मुनेश्वर दत्त अदां।
फबि हाटक दण्ड धुजा फहरै,
कुडऴी जिम झाटक सुण्ड करै।।15।।

तिल मातर भीत न बीत तणी,
थंमि हालत अग्रकियां हथणी।
कुसमालय लेत सुबास कटां,
झझकै सपतास करां झपटां।।16।।

गढ जंड़्गम जंग समागम का,
जुलमी अतिकाय धका जमका।
सुघटा घट घाट घटा सरसै,
रसतारव डांण पटा बरसै।।17।।

दरसै मुख आगऴ दांत दुवै,
बक बादऴ आगऴ जांण बुवै।।
दुति चातक घण्ट श्रणी दमकै,
चपला घण जांण घणी चमकै।।18।।

बणि कांठऴ बेख मतंड़्ग बहै,
लगि संड़्ग पमंड़्ग मलंड़्ग लहै।
तन चंचऴ चाल तिकां तरसी,
सुख पालक आड तरै सरसी।।19।।

हद डांण मृगां अभिमांण हरै,
प्रलंबी कुरबांण उडांण परै।
घट सुंन्दर ग्रीव कबाण घटी,
पवमांण विमांण समांण पटी।।20।।

सझिया पखराऴ सझावट का,
नखरा कुलटा कि बटा नट का।
तरछी गति दीठ कटाक्ष तियां,
मरमार बहादुर पीठ मियां।।21।।

रहल्या पदचार सवार रथां,
हथियार छत्तीस प्रकार हथां।
हुबि रोस कईक चढ्या हवदां,
रण कारण जोस बढ्या रवदां।।22।।

त्रसऴां चढि भाऴ कराऴ तकै,
धड़कै नंह चित्त लंकाऴ धकै।
बिकसै रणताऴ त्रमाऴ बगां,
दमकै खिजि ज्वाऴ विडाऴ-दृगां।।23।।

छलती हिक मूंण शराब छकै,
भर धूंण पुलाब कबाब भखै।
गहली घट पिण्ड प्रतीत गणै,
घरसै नभ मुण्ड घमण्ड घणै।।24।।

कर चाप अठार टंकी करखै,
परखा सर एलम की परखै।
उडि बेध आकास हुवै उडता,
छिकजाय लुऴाय पखाऴ छता।।25।।

जमरांण जंजीर जिका जकड़ै,
पड़तो असमांण तिका पकड़ै।
अखड़ैत पटैत जवान इसा,
दर कूंच कियो दिखणाद दिशा।।26।।

चढि आभ छड़ाऴ चमंक चुभी,
खुरताऴ घमंक पताऴ खुभी।
बढि हाक त्रमागऴ डाक बजी,
त्रिपुरासुर-शत्रु समाधि तजी।।27।।

छिति हूं उड खेह अकास छई,
चक्रवाक सनेह तज्यो चकई।
घुंमडी नभ ग्रीधणि चील्ह घणीं,
गहकाय अवाज सिवा गवणीं।।28।।

करि साकणि डाकणि संग कई,
लंगड़ा मग जंग मलंग लई।
घण घूमर भूत पिसाच घली,
हऴवै पग गैल चुड़ैल हली।।29।।

कठठ्यो घमसांण प्रमाण किसा,
दहल्यो हिंदवांण दिसा विदिशा।
त्रिदसालय चाव चढ्या तरूण्यां,
समाचार थऴी छत्रधार सुण्यां।।30।।

।।छप्पय।।
बिखमखीज जिण बार, जैत भूपति उर जग्गी।
सुरा घिरत संजोग, ज्वाऴ जाणैं जग मग्गी।।
काऴदार कुंडऴी, पूंछ दाबत पलटायो।
किनां काऴबस काऴजवन, मुचकंध जगायो।।
चख चौऴ मूंछ भूंहां चढी,
तामस ऊठि तमोगणी।
मेहरी गाज जाणैं मरद,
शारदूऴ कांनां सुणी।।31।।

रोस झऴाहऴ रूप, जोश ग्रीषम रवि जोड़ै।
तुरंग भला तेड़तां, दूत च्यारू दिशि दोड़ै।।
सुणिसुणि हुकम सताब, आभ छबता मड़ आया।
रण कविता उच्चरण, बिबुध चारण बुलवाया।।
ताजीम पाय कहियो तिकां,
बाह धिनोधिन बाहुजां।
लाख हूं हेक हेको लड़ण,
भुज ठाऴक झाली भुजां।।32।।

बीरां दरबार री, उरड़ दीठां बण आवै।
नरनाहर नरनाह, सुभड़ नाहर दरसावै।।
रामायण भारथ्थ, बिगत रण चारण बांचै।
साँचै दिल सूरमां, खड़ग गहि मूंछां खांचै।।
आजानुबाह परसै उरस,
गह अथाह सरसै गुमर।
कर रह्या जोध पांडव किनां,
प्रबऴ क्रोध दुज्जोध पर।।33।।

भूपति इम भाखियो, हमै सुभड़ां किम व्हीजै।
बोल्याभड़ धजबन्ध, कमधपति सोचन कीजै।।
रण त्रामागऴ रोड़ि, जोड़ि अछरां गठजोड़ां।
सेल धमोड़ां सार, मार मुगलां दऴ मोड़ां।।
ऊपड़ै बाग घोड़ां उठै,
देख हाथ बीकम दुवा।
सुणि इसा बैण सेना सझण,
हुकम कारखाना हुवा।।34।।

झाग नाग झारिया, कई ऊझऴै कचोऴा।
घण केसर घोऴिया, होद लेवें हिलोऴा।।
बोहो गोऴा बारूद, भारहूं सकट भरीजै।
जुड़ि जुड़ि बैलां जोट, कोट बाहर काढीजै।।
त्रण कण कनात डेरा तंबू,
तिका पीठ ऊंटां तुल्या।
जुत म्होर तूटि ताऴा सजड़,
खूटि सिलहखांना खुल्या।।35।।

असि धावक आविया, शस्त्र मांजिया सताबी।
सांणां चढिया सुक्र, फूल झड़िया हद फाबी।।
दुजड़ बांण जमदाढ, सेल दे बाढ संवारिया।
अणियां धार उपेत, नेतबंध जैत निहारिया।।
बोहो लोह भूप सुभड़ां बकसि,
श्री हाथै खग साहियो।
करि क्रोध मधू माथै किनां,
लखमी-बर नंदक लियो।।36।।

तोपां रणतालरै, सकज भूपाऴ संवारी।
खै अकाऴ खाटणी, काऴ थाटणी करारी।।
जाजुलगोऴा ज्वाऴ, गरज जिणकाऴ उगल्लै।
त्रासै सुरग पताऴ, दिगज दिकपाऴ दहल्लै।।
दांमणी मेह प्रगटै दग्यां,
अधिक देह अध्रियामणीं।
सांमणीं कोट किल्लां सको,
गैवर टिल्लां गामणीं।।37।।

जिकां काट मांजिया, छांट ऊजऴ जऴ छोऴां।
रचि सिंन्दूर चितराम, चरचि आनन रंग चोऴां।।
दै भैंसां बऴिदान, छाक मदधार छकाई।
चंडी चंडी ऊचरै, फतै झण्डी फहराई।।
हलि चलि घणां बहलां हलां,
ब्याल टलां आगी बढी।
मातंग भुजंग नाहर मगर,
कोल-मुखी बाहर कढी।।38।।

लखि तोपां सालुऴी, पुऴी पलटण्यां पटैतां।
संगीनां साबऴां, आभ छायो अखड़ैतां।।
तीर कबांणां तोकि, रिमां ऊपर रीसांणां।
त्राणां पोस नत्रीठ, पीठ खेटक खग पांणां।।
जम हूंत फेट खांणां जिका,
सिर खांणां दांणां सटै।
तैं बीर कांमरांणां तणां,
प्राणां पर खेलै पटै।।39।।

ब्यूहां बुध बानैत, आद ज्यांनें जुध आंटा।
बणता सीसा ब्यम्ब, बहै गणता बपु बांटा।।
धड़ चील्हां ग्रीधण्यां, कमऴ शंकर उपकारू।
हंस परियां पति होण, श्रोण चंण्डी पत्र सारू।।
सगराम बम्ब बागा सुणे,
अम्बर भुज लागा अड़ण।
ऊझल्या समर कालां ऊछब,
भालां खग ढालां भिड़ण।।40।।

खाड़ैत्यां खोलिया, खिड़क खासा रथखाना।
सिणगार्या सिन्दणां, मिऴण सांमां मिजमांनां।।
झड़फ पाट झणणाट, ओज जरदोज अछेरा।
धव-पैड़ां कऴधूत, कऴस असटापद केरा।।
जूसंरां धवऴ अप्रमाण जव,
की विमांण पवमांण कथ।
सुलतांण मुगल माथै सज्या,
राजथाण बीकांण रथ।।41।।

रावत झाटक रजां, गजां म्हावत गरदाया।
सपड़ाया जऴ सींच, बऴे चितराम बणाया।।
अंग झूलां ओछाड़ि, दिया कसि मेघाडम्बर।
पावां लंगर पड़्या, ऊधड़्या झंडा अम्बर।।
परचंड पिंड झरता पटां,
भणणाहट करता भमर।
कज्जऴ पहाड़ बारण कस्या,
सज्जऴ घण कारण समर।।42।।

बीर महावत बन्दि, पीर पैगम्बर पावां।
ऊचकि बन्दर एम, कूद बैठिया कलावां।।
थापलि कुम्भाथऴां, बाप बोलां बिरदाया।
तुरकां दऴ रणताऴ, दऴण दन्ताऴ दगाया।।
बाजता घण्ट बिहुवै बऴां,
ऊरध सूंड ऊछाजता।
दाझता क्रोध ज्वाऴा दग्या,
गज मतवाऴा गाजता।।43।।

राईकां रावतां, जकड़ि लीधा जाकोड़ां।
बदन कड़ां बीटियां, तरां घाती नकतोड़ां।।
मुशकिलकूच्यां मांडि, तिकां निठि किया ताबै।
अड़ता सिर आकास, फेण झड़ता मुख फाबै।।
चरख्यां चटीठ अंगीठ चख,
पीठ समोबड़ पालणां।
पाकेट सज्या सौ कोस पथ,
हेकण चांटी हालणां।।44।।

जायोड़ा जोडरा, थाट पाटां थायोड़ा।
दिल आयोड़ा दाय, तिका सोब्रण तायोड़ा।।
धर करोत अबधूत, बहुत मजबूत महाबऴ।
अजब गजब आवाज, गाज मादऴ त्रामागऴ।।
माकड़ा झाड़ आखाड़मल,
चाढ्यां मसती चालिया।
सिधराज जांण माजम मसत,
हिंगऴाज मग हालिया।।45।।

कीधा असि चाकरां, तुरत साकुरां तयारी।
खुररां मांजी खेह, धजर तुररां सिर धारी।।
खणणाहट पाखरां, नाद झणणाहट नेवर।
पट जेवर पहराय, किया सिणगार कलेवर।।
दै दै लगाम कसि तंग दृढ,
जेरबन्ध मोहरां जड़्या।
ऐराक धाट काठी उतन,
घाट बेह ठाली घड़्या।।46।।

बरचि दीप बेवड़ा, कऴी केवड़ा कनोती।
लंकी धजर अलोल, बजरमणि मोल बिचोती।।
अच्छी तरह उडाण, बेबि परमाण बरच्छी।
बाग ताग बाहुड़ै, मुड़ै जाणैं जऴ मच्छी।।
परभाव छटा ऊलट पलट,
जाव आब चकरी जिसा।
कसि कन्ध बिरथ लाऴा करै,
अश्व छन्द गाऴा इसा।।47।।

मृग मरोड़ मोड़णां, धरणि पुड़ पोड़ धुजावै।
दौड़ बसण द्रोपदा, ओड़ जिणरो नंह आवै।।
आखत पग ऊठतां, पूठ साखत पखराऴी।
काच हुलम कोमाच, नाच पातर नखराऴी।।
आगऴा कंन्ध पड़छी अलप,
मलप गुलाली मूंठियां।
धकपंख घाव खागां धकै,
ऊपड़ै बागां ऊठियां।।48।।

हद चांटी हालतां, हवा हालत रद होवै।
तवि जूनों सपतास, जिकां कांनी रवि जोवै।।
चक्र धावां चोगांन, फिरै फूटरा फिरावां।
कसि ऐड़ा केकांण, आंण दीधा उमरावां।
तोकतां बाग श्रवणां तणां,
अग्र भाग दोनों अड़्या।
जां पीठ जोध साबऴ दुजड़,
चांप बाण लै लै चड़्या।।49।।

बांमी-बंध बाघऴा, सूर सगरांम सधीरा।
तेज जेठ तावड़ा, आंखि धावड़ा अंगीरा।।
हय पाखर खऴ हऴै, भुजां भऴहऴै त्रभागा।
खाथा घोड़ा खड़ण, लड़ण माथा नभ लागा।।
अच्छरां बींद बणिया अच्छा,
भड़ां तिलक अणियां-भमर।
जमहूंत समर मांडै जिका,
कमरा पर बांधी कमर।।50।।

रण धीठा बण राव, राव दीठा उमरावां।
चसम अंगीठा चसै, करण पीठाण कलावां।।
छक बढियो अणछेह, पमंग चढियो भुवपत्ती।
जांण चढ्यो जेठरो, सूरज सपतास सपत्ती।।
झालियां सार मोसर झले,
झूझ भार भुज झालियो।
भूपाऴ जैत उणहीज भुज,
हय कंध थापलि हालियो।।51।।

मूंछां भूंहां मिऴै, छिऴै बीरा रस छोऴां।
बाजअहिमकरबाज, डकर हिमकर मृगडोऴां।।
संग बहै सामन्त, रंग घोड़ां राठौड़ां।
अड़ै भुजां असमाण, मुड़ै फण पोड़ घमोड़ां।।
कऴि फेट जिकां झेलै कवण,
खेलै खेतल आंखियां।
करि कूंच शहर बाहर किया,
डेरा नाहर डांखियां।।52।।

हुई फौज हाजरी, बोझ नाग न बरदासै।
जांण गजब गाजती, मंडी कांठऴ चवमासै।।
बादऴ मसत बयंड, रसत मादऴ घहरावै।
इन्द्र धनुष आकार, फील झण्डा फहरावै।।
मे का प्रतच्छ लच्छण मिऴै,
केका हय हूंकऴ कऴऴ।
खिण-प्रभा रूप साबऴ खिंवै,
कंस बंश कमरा कमऴ।।53।।

जोय कटक नृप जैत, शहर देसांण सिधायो।
साथ पचीस सवार, ईश्वरी कदमां आयो।।
बऴ दै दै बाकरां, भणे जय जय भगवत्ती।
धारि रूधिर मद धार, छाक दीधी छत्रपत्ती।।
जऴमूक सजऴ बीजऴ जिसी,
धकै खाग खेटक धरी।
कर जोड़ जुलम जालिम कथा,
कमधमोड़ मालिम करी।।54।।

उरड़ मेछ आविया, मुरड़ि जंगऴ धर माथै।
झगि तोड़ा दव झड़ै, खड़ै घोड़ा जव खाथै।।
बह हरोऴ जऴ बीच, कीच चन्दोल कदम्मा।
थाट जांण थाटियो, पुनः दस आठ पदम्मा।।
पाताऴ लोक आतप पड़ै,
अड़ै आभ भालां अणी।
जां हूंत भिड़ै “जैतो” जठै,
तनै लाज मेहा तणीं।।55।।

प्रारथना भूपरी, करी कांनां किनियांणी।
दिया इसा बरदान, धरा जंगऴ धिनियांणीं।।
जैत भूप “जैतरी”, हार “कमरा” री होसी।
मृडपोसी मुंडमाऴ, जगतचख कौतुक जोसी।।
घोड़ा सवार ऐहिज घणां,
चांपर कर सागै चढण।
मैं चढे पीठ डाऴा-मथै,
लै हाला आई लड़ण।।56।।

पाय हुकम पागड़ै, पाव दीधो छत्रपत्ती।
भैरव दोनों भेजि, सकति तेड़ी त्रिसकत्ती।।
थाया सकत्यां थाट, थाट नैड़ा ऐ थाया।
धकै गरद धूंधऴा, दुरद झंण्डा दरसाया।।
आपड़ी कंकपत्यां अठी,
अठी सकत्यां अड़बड़ी।
अपछरां चढी रथ्यां अतै,
चंड्यां नोहत्थां चड़ी।।57।।

।।छन्द मोतीदाम।।
चढी नभ रेण छई चहुंचक्क।
धरा चढि कम्प थई धकधक्क।।
गई चढि चील्हणि गीधणि गैण।
नसो करि बैल चढ्यो त्रण-नैण।।58।।

काऴी बणराज चढि किलकारि।
बढ्यो चढि पाज पयोनिधिबारि।।
चढ्या चवसठ्ठि चितां अति चाव।
रंभादिक दाय चढ्या उमराव।।59।।

नैड़ो घमसाण चढ्यो नृप नज्र।
गुणां चढि बांण मंड्यो धमगज्र।।
किया चठठारव ज्यां फटकारि।
दिया घट गोऴम दाज बिदारि।।60।।

तिकां हिज हेत दगी नंह तोप।
रही बजि रीठ बिहूं बऴ रोप।।
जिका सणणंकि भणंकियजेह।
सुवा भड़भुम्मि हुवा धड़ सेह।।61।।

बऴी नृप जैत करां बऴिहार।
पत्री अणभीज परां खऴ पार।।
बाणां थट कैरव राण बिराट।
ब्रहन्नट जांण करै द्रह बाट।।62।।

सत्रां दऴ मूगऴ सैयद सेख।
बणै ग्रह बाज कबूतर बेख।।
सरां अप्रमांण पठाण संहारि।
लिया कर सेल नरां ललकारि।।63।।

छटा सतकोट कचोट छड़ाऴ।
बिसारत चेतन नेत बिड़ाऴ।।
चढै अंग फूटि अणी रंगचोऴ।
बिलोकत जज्रक जीह तंबोऴ।।64।।

भड़ां धड़ सांगि छटै अदभूत।
धतांधत भांगि नटै अबधूत।।
हाथां बरमाऴ उमाहत हूर।
सूरां हथ बाह सराहत सूर।।65।।

घंमघम सेल बभक्कत घाव।
रमझ्झम अच्छर झांझर राव।।
मिऴै कर मूंछ गऴै बरमाऴ।
चंडी पत्र रत्र रऴै दहचाऴ।।66।।

जगच्चख भाऴत कोतुक जुध्द।
माऴा कज संकर ठाऴत मुध्द।।
बिचै बह हूर कियां गऴ बांह।
मियां रजपूत हिचै रण मांह।।67।।

बहै नृप साबऴ ऊरस बाट।
झबाझब बीज उड़ै खग झाट।।
तराछत सोहड़ आछत त्राण।
कलेवर साबण तांत कृपाण।।68।।

धड़च्छत सीस तड़त्तड़ धूप।
रूपै धड़कन्न महाभड़ रूप।।
मिलम्मिल मुण्ड पुवै सिव माऴ।
तिल त्तिल रूण्ड हुवै रणताऴ।।69।।

हमा चहुंवाण अलावद हेल।
खांगी-बन्ध जैत रच्यो खग खेल।
सिवा सिव कारण झेलत सीस।
उझेलत पत्र उमा कज ईस।।70।।

परस्पर दम्पति सम्पति पाय।
हिकोहिक भेंट करे हरखाय।।
हली बिहुं ओड़ भली चंन्द्रहास।
तणी तद बाग घणी सपतास।।71।।

सूरां जमदाढ लई उण संग।
लई रवि रेवत माड मलंग।।
हुवो असताचऴ ओट अहेस।
सक्यो नंह देख कुतूहऴ सेस।।72।।

घिरी घर ग्रीधणि चील्ह अघाय।
अंत्रावऴी नाड़ि नखां उऴझाय।।
माऴा उड़ जोत लसीसुर माग।
चसी रण आंगण जोत चिराग।।73।।

महाबऴ बीर बहादुर मार।
करै दहुंवै बऴ पार कटार।।
घलै दहुंवै बऴ खंजर घात।
दहूं बऴ पंजर पार दिखात।।74।।

बहै दहुंवै बऴ पेस कबज्ज।
संग्राम दहूं बऴ श्याम सकज्ज।।
दहूं बऴ रट्टत राम खुदाय।
पलट्टत आंत दहूं बऴ पाय।।75।।

जगामग जोत दहूं बऴ जोत।
हूरां गठजोड़ दहूं बऴ होत।।
दहूं बऴबीर बिदीरण दंस।
हलै परलोक दहूं बऴ हंस।।76।।

मियां पतसाह पखै मजबूत।
राजा छऴ छोह छकै रजपूत।।
लड़ै दहूं काबुल जंगऴलज्ज।
उदंगऴ जांण दिल्ली कनवज्ज।।77।।

पड़्या रण जूझि सवार पच्चीस।
बेऴाउण आभ अड़्या भुजबीस।।
नखायुध हाकलियो करनल्ल।
चराचर सृष्टि थई हलचल्ल।।78।।

बणाधिप झम्प भरी उणबार।
भुजड़्गंन झालि सक्यो भुव भार।।
भेऴी हिज आवड़ बाहर भूप।
रू नाहर चक्र सुदस्सण रूप।।79।।

बणी दहूं काऴ तणी तसबीर।
गणी नंह जाय घणी हमगीर।।
सझ्या खग खप्पर चक्र त्रशूऴ।
झल्या कर डैरव भैरव झूऴ।।80।।

दुहाड़त शेर हल्यारण-धीठ।
देब्यां कर चक्र चल्या अणदीठ।।
हुई अप्रमाण अचाणक हल्ल।
कुम्भी हय सैयद सेख कतल्ल।।81।।

पड़ै कटि सीरस बीर पठाण।
मद्राचऴ चक्र चमू महराण।।
गुड़ै गिड़-कंध मदन्ध मुगल्ल।
ख्याली रिखराज हंसै खलखल्ल।।82।।

चोऴै झड़ मेह बणै चत्रमास।
दोऴै पड़िसास गणै जमदास।।
कट्या चक्र झाटक हेक रकाब।
बणै चमचाटक बेख नवाब।।83।।

अपाकर टोप बगतर अंग।
रगै नंह चक्र रगतर रंग।।
चंड्यां चक्र पांण बिछूटत चित्र।
नवै लख तूटत जांण नखित्र।।84।।

बिधूंसण जांणक हांणक भूप।
रच्या अप्रमांण सुदस्सण रूप।।
घणी जगदम्बि धकै घमसाण।
बूढो कवि दाखि सकै न बखांण।।85।।

निवेदन चंद धजाबंध नांम।
सुणू अब इन्द सको संगरांम।।
लिया खब खप्पर गेंद गुलाल।
खऴां घट घावक जाव पखाऴ।।86।।

पत्रां भरि रत्र हेको हिक पांण।
आणे करकंठ कढावत आंण।।
बढावत केहरि केहरि बाग।
नखायुध गाजत भाजत नाग।।87।।

पड़ै सिंघ गैल जड़ै रह पट्ट।
थरथ्थर धूजि गुड़ै गज थट्ट।।
आछी भड़ चाढि धकै अखड़ैत।
जड़ै जम दाढ लड़ै छऴ जैत।।88।।

गुड़ै हुय बिम्भऴ गात गनीम।
रटै मुख नब्बीय रब्ब रहीम।।
छेछी कर छूटक वार छडाऴ।
भलो थरकंत पटाझर भाऴ।।89।।

महा अदभूत जचै ऊपमांण।
जसोमति पूत नचै फण जांण।।
गंजै दऴ रेपऴ लांग गहल्ल।
मारै बोहोमीर अमीर मुगल्ल।।90।।

पऴासण अंग भखै भर पेट।
भेऴा उतमंग सदा शिव भेट।।
लालां कर थापलि कंध लंकाऴ।
फूलां सिंघ संग भरावत फाऴ।।91।।

सेलां बड़ भागणि बेधत शेख।
बातायण वाह सुहागणि बेख।।
हणैं खऴ आवड़ बिव्वड़ होल।
दऴै दऴ चक्रक सक्र दंभोल।।92।।

करै चख नाहर राहर केत।
नेत-त्रण भाऴ डरै निसनेत।।
अंबा इण आदक और अनेक।
हिचै रण हेकण हूं बढि हेक।।93।।

सेना बण ओपम कोप क्रसाण।
जाऴै मझ पण्डव खण्डव जाण।।
नमो करनल्ल बऴू अवनीस।
तोक्यां कर पत्र ससत्र छत्तीस।।94।।

दाढी रंग उज्जऴ भाऴ सिंदूर।
प्यालां मतवाऴ नसो भरपूर।।
लोई सिर फाबत-धाबऴ लंक।
चमू पर साबऴ सूऴ चमंक।।95।।

महाबऴ काणण-रांण मलड़्ग।
दारू मझ जांण कृसाण दमड़्ग।।
सत्रां उर घोर घमोड़त सेल।
झलै पत्र चोसठि रत्र उझेल।।96।।

खमां भणि जोगणि खांचत खून।
सुरां कर मांचत मेह प्रसून।।
झषध्वज भूपति दोयण झूऴ।
त्रलोयण लोयण रूप त्रसूऴ।।97।।

अछै धमगज्र अचाणक वार।
पबै पर जाणक बज्र प्रहार।।
भलम्भऴ सूऴ भुजां भऴकंत।
खवख्खऴ खून नदी खऴकंत।।98।।

बीरा रस रत्त बऴब्बऴ बीर।
भयातुर पत्त चऴद्दऴ भीर।।
खऴां दऴकंस बिधूसण खीज।
बीजूबऴ जांण झबूकत बीज।।99।।

उडै गति गेंद नरां उतमंग।
गहै झट कंज करां जट-गंग।।
महानट हाथ हकालत मुण्ड।
रोऴा मझ घुम्मर घालत रूण्ड।।100।।

कुसी रिखराज करै झण कार।
धजाबंध पत्र भरै रत्र धार।।
झटझ्झट खेतल देत झलाय।
पूठो पत्र लेत गटग्गट पाय।।101।।

भयंकर रूप भुजां जुझ भार।
हणैं खऴ भूप भणैं बऴिहार।।
खणख्खण खेटक भेटत खाग।
रिखेश्वर बीण झणझ्झण राग।।102।।

बिथा भुव भार फणफ्फण ब्याऴ।
कणक्कण फौज जणज्जण काऴ।।
पृथीपति बाहर एण प्रकार।
डकावत नाहर लेत डकार।।103।।

तंबेरम कुम्भ दुहाथऴ तत्थ।
आडागिरि मत्थ क हत्थ अगत्थ।।
प्ररोहत होकर खोफ अपार।
अधोफर आभ डरै असवार।।104।।

अंबा सिर सूदत कूदत एम।
तजै गिरि श्रृंड़्ग प्लवड़्गम तेम।।
थावै गज कायल खाय सथाप।
झुकै घट घायल आय झुवाप।।105।।

लियां पत्र पेज भणैं लटियाऴ।
घणैं तप तेज खमा घटियाऴ।।
दुवै बऴ चंचऴ पांण दराज।
हुवै कुरबांण कवि हिंगऴाज।।106।।

भलां मृगराज चढी छऴ भूप।
रच्यो रण तीरथ राज सरूप।।
हाथ्यां मवताहऴ गंग हिलोऴ।
छिऴै रत्रधार सरस्वति छोऴ।।107।।

झूलां मखतूऴ जमां जऴ झाग।
पगप्पग होत उद्योत प्रयाग।।
मंदाकण भाण-नंदा बह मंद।
बहै सरसुत्ति प्रवाह बलंद।।108।।

माता कर मक्र लहै चक्र मोख।
तिलत्तिल अंग न जंग संतोख।।
चटच्चट पत्र रगत्र चटट्ठि।
समै अनुसार रमैं चवसट्ठि।।109।।

भिऴै मझ साकणि डाकणि भोत।
हलीसक नाच भली विधि होत।।
घटै दऴ मुग्गऴ सैयद घाण।
पटैत कटै कई सेख पठाण।।110।।

कजाकणि डाकणि काढि कऴेज।
जिमावत साकणि जूह अजेज।।
चूड़ावऴि नूंतत भूत पिशाच।
अछै रण ताऴ पखावज आच।।111।।

बजै रव डैरव बीस बतीस।
उचैं रव फेरव देत असीस।।
चंडी द्रहवाट करै चतुरंग।
उडै खग झाट चुखच्चुख अंग।।112।।

न लाभत साबत सीस नत्रीठ।
देतो रण चक्र फिरै रण दीठ।।
बऴोबऴ मैगऴ बाह दुबाह।
प्रऴैलखि हाथ मऴै पतिशाह।।113।।

रहि कटि फौज गई अध रात।
बेई तद तेण हिये मझ बात।।
जड़ै शमसेर हिको हिक जैत।
पड़ै रण जूझि अनेक फटैत।।114।।

बराछत बागत आयुध बोह।
लूणा-सुत अंग न लागत लोह।।
तिको तिण मात तणो परताप।
धरा इण जेज घणों धणियाप।।115।।

हत्यो महरावण तेण हकारि।
बध्यो महिखासुर बीर बकारि।।
घणा करि दाणव पत्र बघूऴ।
तक्यां चंड मुण्ड त्रणा समतूऴ।।116।।

दिती सुत शुम्भ निशुम्भ बिदारि।
कई रक्तबीज गई अडकारि।।
मुणी जिण कीरत पीर समाज।
रजा जिण सीस धरी जमराज।।17।।

सको हिज आज अनेक सरूप।
बिधूंसत फौज सहायक भूप।।
तिका अग्रमो भड़ कीट पतंग।
जिका जुड़ि जीत सकै नंह जंग।।118।।

ठावो पड़ि येम हिया मझ ठीक।
दसों नख दांत थया नजदीक।।
जयो जगदम्ब कह्यो कर जोड़।
छड़ै-दऴ कूंच चह्यो बऴछोड़।।119।।

मुड़्यौ तजि खेत पुऴ्यो प्रतमाग।
खड़्यो नृप जैत दऴै करिखाग।।
पृथीग्रह पन्द्रह साल पंवार।
बदी सह चौथ सनीसर वार।।120

घड़ी नवचंद चढ्यां घटियाऴ।
प्रणामत पाव लख्यो भुवपाऴ।।
भऴै कर खांति लखी रण भूमि।
घावां भरपूर रह्या भड़ घूमि।।121।।

कट्या घण सज्जऴ छज्जऴ कान।
सिर गिर कज्जऴ कूट समान।।
ससूदित साप समाक्रत सुण्ड।
दतूसऴ मूसऴ रूप दुरंड।।122।।

पड़्या पग देवऴ थम्भ प्रमाण।
नकेवऴ पिण्ड अद्रां अहनाण।।
गुड़्या गज ग्राव गुड़ावत गोड़।
घणां सहि घाव पड़्या कई घोड़।।123।।

पड़्या मुख मूरत सूरत पाक।
पड़्या चकचूरत कंध पिनाक।।
उभै गजगाह पड़्या दहुं ओड़।
पड़्या खुरताऴ जड़्या चहुंपोड़।।124।।

पड़्या कई आसण जीण उपेत।
चड़्या असवार पड़्या अणचेत।।
गरद्दन कद्दन केक मुग्गल्ल।
छटे खग बेखक मेख छग्गल्ल।।125।।

पड़्या कई सय्यद सेख पठाण।
मियां जम लेख चढ्या अप्रमाण।।
ठावा उपमाण घट्या उण ठोड़।
कट्या जदुजाणक छप्पन कौड़।।126।।

आई सर सोखण तंत अनंत।
दल्या जऴ जंतक अंतुक दंत।।
ढऴ्या बण जारक बाऴद ढाऴ।
किनां कऴपान्त बिना हिजकाऴ।।127।।

मुवो चतुरंग लखे अणमीत।
चंडा सुर भंग हुवो रण चीत।।
अपूरब आसति लोवड़ियाऴ।
कृपा तवतास न ग्रासत काऴ।।128।।

आया रण काम जिका उमराव।
पाया तन नूतन प्राण पसाव।।
जिकां धजराज पचीस जिवाय।
जोई छवि श्रोण नदीतट जाय।।129।।

कुसुमल छोऴ भरे नड खड्ड।
करद्दम आमिख हड्ड कवड्ड।।
गजां ढह पद्द गरद्दन गोप।
हिया भ्रम भंजत कंज पहोप।।130।।

नदी जऴनील सुफील निसाण।
उझेलत छीलर ढीलन आंण।।
बगत्तर झीवर जाऴ बहंत।
आवै नंह माऴ-रगत्तर अंत।।131।।

धुणीं उण लोहित पाय धपाय।
मोड़्या गज-गाहण बाहण माय।।
चखां जिण जांण मुसाल चसंत।
सदा जमराण नखानि बसंत।।132।।

दुहाथऴ बज्र दढां जज्र-दण्ड।
पूरा नव हाथ महाबऴ पिण्ड।।
पेरिया पुर बीकम पंथ पटैत।
जिकां बिच बाज डकावत जैत।।133।।

भयंकर शोर शिवा अग्रभाग।
चोऴै मुख होत उदोत चिराग।।
जिकां जगि जोति छिपा छिपजात।
द्रगां मग भोत सपष्ट दिखात।।134।।

डमंकत डैरव भैरव डाक।
छकी बह जोगणि श्रोणत छाक।
जपै जय साकणि डाकणि जुथ्थ।
रचै कई खेल चुड़ैल बरूथ्थ।।135।।

दबै रद खोट न ओट दकूल।
फबै हंसि होठ चड्यां मुख फूल।।
हकालत बीस हथ्यां नव-हथ्थ।
रूड़ा सुखपालक हालत रथ्थ।।136।।

कई सुरराय डकाय कंठीर।
बणैं छबि छूटक मूंठ अबीर।।
जिकां लखि बावन बीर जरूर।
देव्यां जस गावत थावत दूर।।137।।

जेऴै कई जब्बर बब्बर जोर।
दिखावत वायु बरब्बर दोर।।
रथां पलटाय पछा प्रति राह।
अछा झपटाय कहावत वाह।।138।।

सिरी घटियाऴ अरोहित सेर।
सख्यां मवताहऴ माऴ सुमेर।।
किया सरजीवत तेड़ि कबन्ध।
बूझै पितु मात खुशी धजबन्ध।।139।।

खड़ै सुरलोक भणीजत खांत।
भणी हिंगऴाज सुणी जिण भांत।।
पृथी-पति राजसथान पुगाय।
अंम्बा निज थान थई थित आय।।140।।

।।छप्पय।।
मैं उणहिज मायरो, रूप हिरदा मझ राख्यो।
जैत भूप जैत नूं, दिई जिणरो जस दाख्यो।।
जुकती उकती जेण, दाय आई ज्यों दीधी।
काली गैली काव्य, करी सो मालिम कीधी।।
मोनूं सुगन्ध सोनूं मिऴ्या,
बलिहारी इण बातरी।
साक्षात सकति इन्दर सुणै,
महिमा करनल मातरी।।141।।

।।दोहा।।
श्री डाढाऴी रा सुरू, बद्या पद अरबिन्द।
अब बन्दू अवसाण में, ऐ पद पंकज इन्द।।142।।
मेहाई-महिमा मुणी, मैं मूरख मति मन्द।
जिण अन्दर चूको जिको कीजै माफ कविन्द।।143।।

।।सोरठा।।
आठ आठ नव एक, जेठ बीज उज्जऴ जदिन।
बूढो कवि अविवेक, मेहाई-महिमा मुणी।।144।।

विक्रमी संवत 1988 जेष्ठ शुक्ल पक्ष की बीज (द्वितिया) तिथी के दिन श्रीमढ खुड़द मे माँसा श्रीकरणी जी के मंन्दिर की प्रतिष्ठा के शुभ पावन अवसर पर श्री इन्द्रबाईसा महाराज को हिगऴाजदानजी कविया ने स्वंय ने बनाकर यह रचना (ग्रंथ) सुनाई थी।।

~~हिगऴाजदानजी कविया “सेवापुरा”
प्रेषित: राजेन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर (राज.)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *