☆नागदमण☆ – सांयाजी झूला

sanyaji Jhulaसांयाजी झूला महान दानी, परोपकारी भक्त कवि थे। वे कुवाव गांव गुजरात के निवासी थे। इन्होंने अपने गांव में गोपीनाथ भादेर, मंठीवाला कोट, किला तथा बावड़ियां बनवाई थी। जीवन के अन्तिम वर्षों में ब्रजभूमि जाते वक्त मार्ग में श्रीनाथद्वारा में श्रीनाथ दर्शन करने गये। वहां इन्होंने सवा सेर सोने का थाल प्रभु के चरणों में धरा था। जो आज भी विद्यमान है। उस दिन से आज तक वहां तीन बार आवाज पड़ती है “जो कोई सांयावत झूला हो वो प्रसाद ले जावें”। मृत्यु के अंतिम दिन मथुरा में एक हजार गाये ब्राह्मणों को दान दी तथा हजारों ब्राह्मण गरीबों को भोजन करवाकर हाथ जोड़कर श्री कृष्णचंद जी की जय कर इन्होंने महाप्रयाण किया। इनका लिखा हुआ “नागदमण” भक्ति रस का प्रमुख ग्रन्थ है|

भक्त कवि श्री सांयाजी झूला कृत “नागदमण”
समंवाद(संवाद) काली तणो ऐह सारो
चवे दास दासांन “सांयो” चितारो

NaagDaman

ॐ जय माताजी ॐ
☆ नागदमण☆
।।दोहा-मंगलाचरण।।
विधिजा शारदा विनवुं, सादर करो पसाय।
पवाडो पनंगा सिरे, जदुपति किनो जाय।।…१
प्रभु घणाचा पाडिया, दैत्य वडा चा दंत।
के पालणे पोढिया, के पयपान करंत।।…२
किणे न दिठो कानवो, सुण्यो न लीला संघ।
आप बंधाणो उखळे, बीजा छोडण बंध।।…३
अवनी भार उतारवा, जायो एण जगत।
नाथ विहाणे नितनवे, नवे विहाणे नित।।…४

।।छंद – भुजंगप्रयात।।
विहाणे नवे नाथ जागो वहेला।
हुवा दोहिवा धेन गोवाळ हेला।।
जगाडे जशोदा जदुनाथ जागो।
मही माट घुमे नवे निध्धि मांगो।।…१

जिमाडे जीके भावता भोग जाणी।
परुसे जशोदा जमो चक्र पाणी।।
अरोगे अधाये किया आचमन्न।
कपुरी ग्रहे पान बिडा क्रसन्न।।…२

लिया सार शृंगार, गोचार लिला।
करे आजरो जम्मुना, त्रट कीला।।
सुणे शाम आगम्म उभी सहेली।
हरेवा हरेवा हवेली हवेली।।…३

भरे मांग सिंदुर मारग्ग भाळे।
वहे सामलो व्रज्ज शेरी विचाळे।।
वहेवार लेवार पिंडार वाळे।
नवा नेहसुं देह गोपी निहाळे।।…४

हरि हो हरि हो हरि धेन हांके।
झरुखे चडी नंदकुमार झांके।।
अहि राणिया अब्ब्ला झुळ आवे।
भगवान ने धेन गोपी भळावे।।…५

इको बेवटे चौवटे आय उभी।
संभाळी लियो शाम मोरी सुरभ्भी।।
हुइ नंदरी धेन गोवाळ हेला।
भिळे वाळवा जाणि श्री गंग भेळा।।…६

परे नेर नीसार आवे प्रहट्टे।
त्रिवेणी उलट्टी समंद्र तट्टे।।
महं कंध सौधा तणी सोड माथे।
हरि मंजरी तिल्लक वेण हाथे।।…७

वाइ वांसळी सिंधळी नाद वातां।
गले माल गुंजा व्रजं बाल गाता।।
सबे सामला आमला प्रात सादा।
जमन्ना तणे नीर आहिर जादा।।…८

रमे वास मे साथ सुं हेक रागे।
कहे कीजीये कान्ह भीरु बी भागे।।
वइकुंठरो नाथ रुडी विचारे।
किया सारिखा लोक बे बे किनारे।।…९

पखे पार पिंडार था दोय पासे।
किया लाकडी कंध गेडी कला से।।
घणु गेडी ये गेंद मेदान घेरी।
घणु घुम्मरी डम्मरी फेर फेरी।।…१०

झिले आवता उलटे हेक झेरे।
फिरे राम चोटां करे दोट फेरे।।
मांझी आंकडो मांझीयो खेल मातो।
रमे संग गोवाळीया रंग रातो।।…११

मिले चोट सामो समी दोट माथे।
हुइ दुध्ध मल्लां तणी होड हाथे।।
चडावे घणु सांकडे फेर चाडे।
जमुना तणे नाखियो नीर जाडे।।…१२

दडु लार कान्हो चडे व्रख डाळी।
भरी झंप काळीद्रहे नाग भाळी।।
काली नागसुं कान्ह संभाळ केवा।
लधी जाण त्रुट्यो दधी मच्छ लेवा।।…१३

मंडयो दुसरो खेल खेलंत माथे।
हरी उतरी बात गोवाळ हाथे।।
करे त्रीन खंडो न मंडेय कन्ना।
जुवे धेन घडीक कांठे जम्मन्ना।।…१४

जदुनाथ काळी समी बाथ जोडे।
घणी भोम चाली चडी बात घोडे।।
उभा गाय गोवाळ झुरंत आरे।
हहाकार हहकार संसार सारे।।…१५

सुणे वात आघात माता सनेही।
जशोदा ढळी कदळी खंभ जेही।।
सब्बे हे सखी लार हाले सयाणी।
रहावी विचाळे थकी नंद राणी।।…१६

तबे नंदरी नारि आहिर टोळे।
खडे आपडे हेक हेकां खलोळे।।
जुवे जोखिता जुथ्थ भेळी जशुदा।
बपैयो हुवो कान्हवो मेघ बुंदा।।…१७

बिहुं लोचने नीरधारा वहंती।
कनैयो कनैयो जशोदा कहंती।।
कलिंदी तणे आइ लोटंत कांठे।
गयो जाणि चिंतामणी रंक गांठे।।…१८

बल्लदेव बुझे दिखावे सुदामा।
रम्यो शाम ते ठाम जोअंत रामा।।
लिये जीह दंते नही लीह लोपी।
उभा गाय गोवाळ झुरंत गोपी।।…१९

अभे छुट एको करं जास आरा।
थंभे एम उभो लहे काम थारा।।
जशोदा नके झंप साधी जमन्ना।
पहेलो मरे मात हुं तात पन्ना।।…२०

अचाणक उभो दरबार आवे।
मिली नागणी हेक हेका मिलावे।।
इखे बाल गोपाल पामी अचंभा।
रही दोवळी नागणी देव रंभा।।…२१

जपे नागपुत्री क्षत्री रुप जोती।
महा भद्र जाती तणो कान मोती।।
पणा सांभळो गात्र पीरा पिछोरा।
कणां उपरां नंग ओपे कंदोरा।।…२२

पगे घुघरी शेळ आणंद पुजा।
गले हार मोती रुले माल गुंजा।।
बिचे दुलडी हेक चोकी बिराजे।
जिसो राजवी केहरी नख्ख राजे।।…२3

बिहु बंध बाजु तणा नंग बांहे।
मणी नंग हीरा तणी जयोत माथे।।
अहि नारि जप्पे लही मोल उंची।
प्रभु रे पहुंचे लट्ट्के पहुंची।।…२४

सबे सुंदरी मुंदरी देख सोही।
वळे दाडिमे दंत चोकी विमोही।।
अधरा अमृतं न जाये अधाइ।
झिले कुंडला लोल कप्पोल झांइ।।…२५

इखे नाशिका सग्ग दीपक एरी।
कळी चंप जाणे लळी लंप केरी।।
नवे नेह दीरध्ध पंकक्ज नेत्रे।
सुभा मीन खंजन मृग्गी सवेगे।।…२६

दुहुं भ्रकुटी उर देखंत दोहे।
भ्रमे भृंग सुता अली जाण भ्रौहे।।
अली संकली जाण कीधी अल्लकं।
तणो केशरी कस्तुरी तिल्लकं।।…२७

बंधी चोळमा रंग रंगी बिरंगी।
सुहे उपरां पाघ खांगी सुचंगी।।
तवे नागणी चंद्रीका मोर तेही।
उपे चोप पाव्वस घट्टा अछेही।।…२८

अराहे सराहे घणु अव्वलोके।
रुंधो नाग लोकां तणो राजलोके।।
ईसी भागणी कुण जो कुख जायो।
हिंडोरे हलायो घणो हुल्लरायो।।…२९

हुइ देवमे रुप देखी हिरन्ये।
जपे जागसी नाग राखो जतन्ये।।
ओरो दाखवो बाल होसी अबारो।
पगल्ले पगल्ले महल्ले पधारो।।…३०

रहो तो घरे दाव दुजा रहावा।
मोरो घाट वेराट एथी न मावां।।
चमंके चमंके सबे चित चेती।
लळे पाय लागी वळे लुंण लेती।।…३१

सुण्यो रुप वेदे सुपेख्यो सबे ही।
बडा भागरी नागरी नारि वेही।।
महामोद आणंद देखे मुरक्की।
भुलाडी वळी नाथ नाखी भुरक्की।।…३२

कठा हुत आयो अठे काज केहा।
ग्रहा भुलियो बापरा साप गेहा।।
भली नागणी नावियो राह भुलो।
दियो आपरी लाज आपे दडुलो।।…३३

खटक्के मुही नागणी बोल खारो।
प्रभु जागसी मुझ पाछा पधारो।।
काळी नाग सुं लीजिये वेग काना।
परो तात सोधे चडे मात पाना।।…३४

नइ नागणी बोल एसा निकासे।
वसे रस्सणे डस्सणे विख्खवासे।।
कहो कोर चंपे रही आवका वे।
असो बाल देखी दया मोय आवे।।…३५

हजारां मुखे जागसी नाग होवां।
न डुलो न छांडे निरध्धार नेवां।।
महाकाळ काली नको बाल माने।
पडी बोकडी आज ही वाघ पाने।।…३६

जाओ नागणी नाग वेगे जगाडो।
अठे मांडशुं आज दोनु अखाडो।।
रढी जे असो मात आगे रढाळा।
चाहिजे नहीं बाळ ऐ काळ चाळा।।…३७

न दिठो कदेइ न नेत्रे निहाळी।
कने ही नहीं सांभळ्यो नाग काळी।।
दरबार काळी तणो मेल डावो।
खडे जम्मराणा, बिचे लाभ खावो।।…३८

चालेवा करे सामुहा जुध्ध चाळा।
वधेरा न थारे अजी बाळ वाळा।।
खेलीजे रमीजे घणं मात खोळा।
भरीजे नही आभ सुं बाथ भोळा।।…३९

जुडेवा जसं नाग काळी जगावे।
अजां मुख्ख पै पान री सोड आवे।।
जो ने देह थारो परस्से सनेहो।
काली नाग सुं जुध्ध संग्राम केहो।।…४०

चवां बाळ देखे कशुं काळ छेडे।
कटक्का अट्ट्का नीह तुझ केळे।।
दुबाहा दुरंगा दुहाला झुझाला।
भडां रो नहीं आमळा कुंत भाला।।…४१

नही हेदळे पेदळे मेघ नददा।
जुडेवा न को रीण उच्छाह जददा।।
सचाळा भुजाळा लंकाळा न साथी।
हठाळा पटाळा दंताळा न हाथी।।…४२

घुडांरा भंडारा नहीं घाघरट्टा।
नही घुघरे पाखरे रोळ पट्टा।।
महा बांह बाजु हजारां न मेख्खी।
जुडे जीण अंगा नही जीव रख्खी।।…४३

ठवे हथ्थडा रंग रंगा नठाइ।
प्रचे पहुंचे लोह मोजा न पाइ।।
जडे छक्कडी टोप नाही जरददा।
गुपति न कति न छति न गददा।।…४४

फिरे डम्मरी सेन नाहीं फरस्सी।
कचोळी कटारी न कस्सी सकस्सी।।
टंकारं न भारं अढारं न टंकी।
विधाणं न बाणं कबाणं न बंकी।।…४५

न फेरी न भेरी निसाणं न नददा।
रणं तुर बाजे न घोरे रवददा।।
नके वाजनां वाय पेयाळ वाइ।
छणे उफणे रेण रेणा न छाइ।।…४६

नकु नाखिये खाप खग्गा न राजे।
बडा रागरी धुनी फोजा न बाजे।।
गडे नाळ गोळा न दारु न गाजे।
वहो होक होकां नको शोर वाजे।।…४७

नको हुबके जंत्र छुटे हवाइ।
त्रंबाळे वडाळे न बाजे त्रिधाइ।।
थडे बेहडे हुह मातीन थट्टा।
घुरे जाणं आसाढरी मेह घट्टा।।…४८

ढलक्के नको ढाल नेजा न धज्जा।
दिसे मोरली हेक थारे दुभज्जा।।
आपे उमगे सुरमा एह आरे।
थतो लोहरो लोह रक्षा न थारे।।…४९

नहीं सेन सेनाधी इक्को सजाइ।
लडेसो किसे पुत्र पुछां लडाइ।।
भणा नागपुत्री जिता मुज भीरे।
तितां मांहि के को नहीं नाग तीरे।।…५०

कट्ट्का खगा वाहरां नाग का छे।
अमा नागणी पतरो झुझ आ छे।।
बुलाडो जगाडो जुओ जुध्ध बाथे।
हार्या जीतीआ वात करतार हाथे।।…५१

अशो आज जे कोण भूलोक आ छे।
काळी नाग शुं जोध संग्राम का छे।।
चडे कोण काळी तणी सीम चंपे।
काळी नाग शुं आज ही कंस कंपे।।…५२

जळे वृख नीला वहे विख्खझाळा।
वदन्ने सहस्से वधे व्योम वाळा।।
बडा श्रंग सीतंग हेमंग वाळा।
जरी फुंक आगे भरे टुंक फाळा।।…५३

अरुठो घणो शाम रुठो अमारो।
हुसे आकरो ठाकरो झुझ वारो।।
निजं नारियं वांचीया कंथ नाहं।
वढे जास वैरी वदे दथ्थ वाहं।।…५४

पनंगा नरां दाणवा देव पासा।
तुनां दाखवां आज वेगो तमासा।।
हमे हेकणी गांठ फेरां हजारी।
नहीं नागणी लाग थारो लगारी।।…५५

पुणे नाथ ने झालियो एण पिणो।
मोरो एह कं काहियो द्रोह मीणो।।
मुरं जोड होंशी घडी हेक मांहे।
निजं नागणी बोल खोटो न्र वाहे।।…५६

जम्मना जपे नागणी छोडी जोरा।
फुणा फीण नखावसी देख फोरा।।
जम्मुना भणे नागणी वेण जागी।
लियो बोलते खोजना लेण लागी।।…५७

कठे वास मुसाल ढोटो कणीरो।
वळे ताहरे दुसरो कोण वीरो।।
अमारे भगत्तां रदे एह ओरा।
मंडया आभ घेरे धरा वास मोरा।।…५८

मोरे नंदबावो जशोदा सु माइ।
भलो नाम छे हेक बलभद्र भाइ।।
मोरे कंस मामो कहे मुझ मुळे।
कियो वास नेडो जमुना झकुळे।।…५९

मनासुं न मुंके घडी हेक मामो।
सजे सुर उगा समो जुध्ध सामो।।
मामे मोकली मारवा काज मासी।
इ ता दिहरो हुं हुतो अप्पवासी।।…६०

घणां दिहरुं मेलियुं नेम घाते।
जिमेशां हमे जुजवा भांति जाते।।
चवे भ्रात माता वने धेन चारो।
वहे आज ते मांगणी मुज वारो।।…६१

सुरभ्भी तणी नागणी उंच सेवा।
गणे अध ओधां खरी खेह ग्रेवा।।
नकी खेह लागी रही देह नीको।
तसुं नागणी गायरो चंद टीको।।…६२

बधा देश दिजे द्विजां वेद बोले।
नहीं नागणी तेह गौदान तोले।।
पंचा अमृतं देव आछा पखाळे।
सबे तीर्थ वासो रहे धेन साळे।।…६३

सवामण दे दुध उगे सवारो।
एरी नागणी तोल मोटो अमारो।।
दंही दुधरी वांच्छना सुखदाही।
मठो धोळिये धृत खोहा मिलाही।।…६४

वळे हाथ सु मात आपे विरोळे।
धृतं पीजिये जाणं नौ नित धोळे।।
लिये मांगि लुणीं दिये मात लुंदो।
नख्खमे तिके नागणी बोल बुंदो।।…६५

अवनी तणो भार ले कंध आयो।
जोने नागणी ते हुतो धेन जायो।।
गरा उबका ग्रेह ग्रेही गरब्बी।
पचासा उते धेन मांही परब्बी।।…६६

कही सेंकडो कापडो कोर कांही।
मही मांगणे प्रांमणे धेन माही।।
खळा होळ नांगोळ कीजे न खेती।
अमां नागणी आथमी रात एती।।…६७

पडे लाळ रे धेन ऐ नीर पीधे।
काळी नाग जागाडिए केण कीधे।।
पिया तात ने गोत्र थारो पिछाणां।
बडा गोपरो पुत्र आयो विहाणां।।…६८

जपे मो दिशा जेम काळी जगाडो।
अशो छोडिदे मात सुं भ्रात आडो।।
हिकारो मिले बाप शुं पुछ होडे।
सुतो साप जागाडिये केण कोडे।।…६९

कहे बाप जो सापरी आळ कीजे।
तवां आविजे जागसी जाम त्रीजे।।
पछा पापरा नागणी तूं पिछाणे।
बडे ठाकरे बात बांचे विहाणे।।…७०

जा तुं बाहिरो को अजे तुं न जाणे।
निसाणे फणे मीण पाखे न माणे।।
पिता मात रे उलटयो पककवाने।
मोती री हुइ घुघरी सघ्र माने।।…७१

दुझे नंदरे धेन नौ लाख दुंणी।
लला तुं नही ऐह कुदंत लुणी।।
जहां बोलिजे उपडे बोल जेतो।
लला लेश लेखो कुणां मीण लेतो।।…७२

अशो नागणी ऐक नेठाह आणे।
जके निसरया बोल गजदंत जाणे।।
वृथा वेण जाणे नके मुझ वाळा।
पणां ऐकणी वार एकीस पाळा।।…७३

अमां पंथ खांडा तणी धार आगे।
लसे आंट मुकया पछे छांट लागे।।
मोर देख आहीर सुं जाति मांहे।
खत्री उमही खाणंको खग्गवाहे।।…७४

खत्री काहेको कंस रे हेत खासी।
विचे वाट माथे वहे व्रज्जवासी।।
घरे दुसरे तु बली तात घाटी।
तदा ताहिरे केथ खत्राटे त्राठी।।…७५

रुले कंस रे राज प्रवेश पोता।
तदा नंद रे नेह बल्लभद्र नोता।।
आवे नागणी मुज बल्लभद्र आगे।
मिले कंस रा दुत पाणी न मांगे।।…७६

जोयो नंद रे गेह खत्रोट जागी।
हवे लागवा शंक त्रीलोक लागी।।
कहुं नागणी रुप युं बोल काने।
मिले दादरा मेह तो साच माने।।…७७

काळी नाग नाथु न जो ऐक मायो।
जशोदा प्रसु नंदबाबे न जायो।।
नहीं नागणी लाग थारो नवारे।
हवे हेकणी गांठ हेरुं हजारे।।…७८

पवाडां अखाडां पहेला पवाऐ।
घणो रुंधिओ नीवडे नेट घाऐ।।
सखी वाद पुजे नहीं शाम तोले।
बधे बाढतां कोर पाघोर बोले।।…७९

सुणी जे उखाणो पुराणो सयाणी।
रुकी जे नही जंगली जट्टराणी।।
काळी नागरी कांणि राखी न कांइ।
बकी बोले मुंडी चडावे न बांइ।।…,८०

धूरां पोखियो थान ने धान ध्रायो।
वळे मोकळो मालियो लाड वायो।।
अमो सामहो हे सखी वाद आवे।
किसुं आपरो मोल आपे करावे।।…८१

पखे त्रिणि पेढी मने शीख मोरी।
ऐरो कोण लाजे पखो आव ओरी।।
नमो ढीट ढोटा चवे नाग नारी।
हवे जोड तुं सुं हवे वाद हारी।।…८२

अढंगा कहा बोल जेता अधाये।
पळुं तेतरा आज तुं ना पसाये।।
नरों नारि को नागणी नां वियाणी।
रही वांझणी देव दाणव राणी।।…८३

नारी गांठियो सुंठ दुजी न खायो।
जनुनी तुंही हेक हेकोज जायो।।
आयो नागसुं झुझ लेवा अतागे।
अडीला हुवा आज पाछा न आगे।।…८४

वडा भेंच भूपाळ के काळ वाळा।
खिडे नागसुं केण केवांण खाळा।।
अही राव ने दावडा ऐह आडा।
गुणां वेद जोता कही क्रोड गाडा।।…८५

भुजंगा तणी भेट थारा भुजारी।
दिसी अंतरा रात छोटी दुजारी।।
सदा आणीयो नागणी बोल सारो।
थयो वेद पासे नको वेण थारो।।…८६

अहि नारि सुं नारि भाखे अनेरी।
हियारी न जोवे चखे कांइ हेरी।।
मणे नागणी आपणी हद मांही।
नरं अम्मरां अस्सरा गम नाही।।…८७

पव्वनो न चंदो दडंदो प्रवेशं।
जठे एहरा गम्म एही अनेशं।।
सुणे रुप विचार ए तेह सुनी।
ढोटो रुप मोरारि निव्वाण धुनी।।…८८

जेता बोल बोले तेता दे संभाळी।
वच्चने वच्चने दिए द्रढवाळी।।
न लोटे न त्रासे बिहावुं न बुझे।
सखी लाल एना त्रिभुवन सुझे।।…८९

दिखावे कसा नागबाळा दिवाजा।
बणी बात साकाबंधी कोय काजा।।
न माने तु नारी मुरारी निरख्खो।
पढे सामद्रं जो करख्खा परख्खो।।…९०

रमा सारखी हे सखी धन्य रेखा।
व्रहमंड वाळा लहे कोण लेखा।।
सहस्सां लखी सोळ्से रे समाणी।
पचासं अभे चत्र दो पट्टराणी।।…९१

अठासी अभ्यासी दरब्बार आठुं।
सखी देक बेटा लखं लख साठुं।।
जनुनी तणो जाण मां एण जायो।
उतारं हवे भोम चा भार आयो।।…९२

म जाणे बियां बाळ चक्कचाळ माधा।
बळीराय जेहा छळे जेण खाधा।।
जशोदा तणो नंद ए देव जाणो।
छडेवा गयो आप आपे छळाणो।।…९३

बळीराज सुं तूठते दाख वाइ।
प्रतीहार कताॅर में रिध्ध पाइ।।
समाणी जसुं नागराणी सुणायो।
अरुठो अतुठो भले काज आयो।।…९४

उभो मोरली नाद लीधे अधुरे।
मारो जागशी शाम वादे मधुरे।।
विकस्से हसे वेण उंचो बजायो।
सपते पताळे सुरग्गे सुणायो।।…९५

वधाइ वधाइ जशोदा वधाइ।
करे मोरली नाद ठाढो कनाइ।।
मथे नीर आछो जिंही मच्छ माइ।
जशोदा किणे कान जित्यो न जाइ।।…९६

बडा जीतसी जुध्ध बाहु बडाइ।
गर्गाचार्य नारद संखेप गाइ।।
रही मोरली धुन बाजी रसाळी।
वळी चेतना व्रज्जरा साथ वाळी।।…९७

लुटे साथ जाणे अमीद्वार लीधो।
किणो वेण नादं सजीवन कीधो।।
विजोगी संजोगी वजे वेण वायो।
प्रभु आपरी जाण अमृत पायो।।…९८

जिसे सिंधवे राग काळी जगायो।
उपाडे फुणाफार दरबार आयो।।
फणाकार फण झाटके पुंछ फेरी।
घणो घातियो सांकडे शाम घेरी।।…९९

घेर्यो नंदरो ढोट अहि कोट एहा।
जळाबोळ जाणे कळा सोळ जेहा।।
नळी वाटती सामुही झाळ नाखी।
प्रभु अंग लागी जाणे फुल पांखी।।…१००

गोपीनाथ रा हाथ आया गड्ड्दे।
अही गारडी जाण छांट्यो अड्डदे।।
अही मुंठ वाजीन जेही उपाडे।
रमे गारडी जेम काळो रमाळे।।…१०१

जोइ गात्र टोळी मळी नागजादी।
वढे साप ने शामळो सुरवादी।।
अभे जग्ग जेठी फरी नीर उडे।
काळी नागसुं आविओ कान कुंडे।।…१०२

पेसारा ओसारा खरा पाय कारा।
लहे नाग लारां नरां नायकारा।।
मचे मुठ मारा झरे श्रोण धारा।
फणारां घणारा करे फुतकारा।।…१०३

उडाडे गळं फेगळारां अंगारा।
अंधारा झगारा उभे कीध आरा।।
काना रा करारा खमे हथ्थ थारा।
उछीरा उधारा वहेवार वारा।।…१०४

त्रधारा चोधारा जडे भव्य तारा।
पाटुरा प्रहारा ढिंका ढिंचणारा।।
पडे पाव पारा मथे मेण धारा।
ग्रहे गुंदळे जाण कुंभार गारा।।…१०५

घुमारा घसारा सहे शाम सारा।
गड्ड्दा गमारा गडी गुंठणारा।।
थमे ओज थारा भलो शेष भारो।
ध्रुजंती धरा रा थरक्के थंभारा।।…१०६

नहस्से नगारा सरा रां सवारा।
काळी नाग ने कान झुझे करारा।।
नाखी नागरी कोपरी शाम हथ्था।
रीया देखवा ठठ सु देव रथ्था।।…१०७

भरे चुंड चांडा जहे जाड भीडे।
बहु हाथरी बाथ सुं नाथ बीडे।।
जरें हाथ वाळा पडया माथ नीचा।
पडी सापरी कांचळी सुत्र काचा।।…१०८

रढे डाढ काढे वढे नाग रीसे।
वदन्ने वहे श्रोण पंचास बीसे।।
काळी नाग सुं जुध्ध मातो क्रसन्ने।
बही जमन्नां पुर सिंदुर व्रन्ने।।…१०९

कियो आपसुं आप आळोच काने।
रमे साप खेधाउ सूधो न माने।।
बिहाले हथाले गुपाले बड्ड्बे।
जुवे नागणी झाग नांखे जड्ड्बे।।११०

अही राव ने दाव काहु न सुज्यो।
असो भीडीयो सांस नासा अळुज्यो।।
पर्यो मारि प्राणे कियो गोत्र भंगे।
प्रभु मांडिओ रास माथे पनंगे।।…१११

तिसी तंत ताती बजी ताल ताळी।
मंडयो पांव आरंभियो वन्नमाळी।।
तता थै तता थै तता थै स तानं।
उरे अंतयं अंजयं सुखमान।।… ११२

गिड्ड थो गिड्ड थो गिड्ड थो कं गाजे।
वाइ वांसळी नाद धौका सुवाजे।।
काळी नाचियो उपरे नित काळी।
वळी रंभ नाटा रंभे अंकवाळी।।…११३

डरे नाग काळी झरे श्रोण डाचे।
नमो नाथ तों नाच नारद नाचे।।
पतंगे शिरे नाचियो नाथ पाखे।
भलो नंद किशोर नारद भाखे।।…११४

जपी नाथसुं नागणी हाथ जोडी।
थयो दोष मोटो अमां मत थोडी।।
तुकारे रिकारे जिकोरे तमासुं।
आया आज सा माफ कीजे अमासुं।।…११५

महाखम्मिया नद्द्सुं ब्रद मोटा।
खरो हेक तुंही बिया सर्व खोटा।।
जडो रुप तुनां त्रणावंत जेहो।
कुहाडो त्रणा उपरे मात्र केहो।।…११६

लुकाइ वचाळे प्रभु लंक लागे।
अहेडा सुणां साखरा केथ आगे।।
सम्ही सेस मांही सुजाइ न सुझे।
बुका हीणको रावळी गत बुझे।।…११७

ब्रहमांड एकीस देखी विहांणे।
जशोदा अजो राज ने पुत्र जाणे।।
पिता व्रन्नरा पास ही मध्धरावे।
भजे नंद तुही तवां पुत्र भावे।।…११८

गाढो रावळो गुण आयो गडुदे।
हवे गारडी नाग छुट्यो हडुदे।।
पडि साप री छाप यों राज माथे।
प्रभु वेदना हो कसी राज प्राये।।…११९

दियो कंत वेगो हवे वेण दिधो।
काळी नागरी नारि उच्छाह कीधो।।
आगे नागणी भेट सम्मेट आणे।
जदुनाथ लीजें जको राज जाणे।।…१२०

उवारे घणा आप आपे अरच्चे।
चुवे चंदणं काश्मीरी चरच्चे।।
अही नाथियो पोयणी नाळ आणे।
अस्सवार आपे हुवे अ पलाणे।।…१२१

काळी भारियो कम्मलां भारकाने।
पडयो आय पाताल शुं आप पाने।।
अस्वार काळी तणो कान आयो।
विविधं विधी व्रजनारी वधायो।।…१२२

भग्गवान गोविंद गोपाळ भेळा।
वडा चित फुले दुजा तेण बेळा।।
वागे झालियो ब्रज्जशेरी विचाळे।
वळे फेरिओ आंगणे नंद बाळे।।…१२३

काळीनाग काळी दुहे हत काढे।
दियो वास दुरांतकां तुझ डाढे।।
झरी द्रोह चिंता पडी कंस जंपे।
काळी कुटीओ टार केंकाण कंपे।।…१२४

महाकाल काळी तणो माण मोडे।
जशोदा भणी आवियो पाण जोडे।।
वाइ नंद रे वेण उच्छाह वाळी।
कहंता अबुझे ब्रहमा कपाली।।…१२५

गोविंद दासरे आसरे यश गाया।
वचंते न पुजे सवेशं सवाया।।
काळीनाग वाळो सम्मवाद काने।
पयां पेट नावे पडे तास पाने।।…१२६

जाणे वो न जायो जमंदुत जाडे।
पुराणे अढारे कियो बुम पाडे।।
रस्समै समथ्थै कहयो सन्न मख्खै।
समवाद गातां ग्रहे पार सख्खे।।…१२७

समंवाद काली तणो ऐह सारो
चवे दास दासान “सांयो “चितारो।।…१२८

सणे पणे समवाद नंद नंदन अहि नारी
समद्र पार संसार होय गो पद अनुहारी
अनंत अनंत आनंद सबे वपु तास सुहावे
भगत मुगत भंडार कृष्ण मुगताज कहावे
रचियो चरित्र राधा रमण दो भज कन्न काली दमण
चैतवण सुणण गहरा तणा मटण काज आवा गमण
(सम्पूर्ण)

चारण भक्त कवि सांयाजी झुला रचित “नाग दमण” यहां सम्पूर्ण हो रहा है। कई गुणीजन निजी तौर पर फोन से हमें संपर्क कर हमे प्रोत्साहित करते रहे, कई सज्जनो ने हमारा काम सराहा, उन सभी के प्रति हम आभार प्रगट करते हैं। टाइप करने मे पूरी सावधानी रखी गई फिर भी कोइ भूल हुई हो तो हम क्षमा प्रार्थी हैं। ग्रंथ की पवित्रता और गौरव कायम रहे इसका ख्याल रखने के लिये सभी से करबध्ध प्रार्थना है।
आभार जय माताजी

~~मोरारदान जी. गढवी – मोरझर – कच्छ
~~कल्याण पी. गढवी – मोटी खाखर – कच्छ

संवत 1632 की भाद्रपद विद नवमी को कुवावा गांव में स्वामी दास जी के घर जन्मे भक्त कवि श्री सांयाजी, आपका जन्म चारणों की झुला गोत्र में हुआ। आपके भाई का नाम भांयाजी था व आपके चार पुत्र थे। सांयाजी की संतान सांयावत झुला कहलाये और भांयाजी की संतान भांयावत झुला कहलाये।

नागदमण और रुक्मणी हरण के रचियता सांयाजी ईडर के राज कवी थे।

एक ऐसी घटना में आपको सांयाजी से सम्बंधित बताने जा रहा हु जो बहुत प्रचलित हे और उससे ये साबित होता हे कि सांयाजी अनन्य कृष्ण भक्त थे।
एक समय शाम को सांयाजी राव कल्याण जी की कचहरी में बेठे थे अचानक सांयाजी स्थिर हो गए और दोनों हाथों को जोर-जोर से रगड़ने लगे। सांयाजी की इस विचित्र क्रिया को देख राजा सहित सभा अचंभित रह गयी। थोड़े समय पश्चात सांयाजी हाथ रगड़ते बंद हुए और दोनों हाथो को अलग किये तो दोनों हाथ काले हो गए थे व हाथो में छाले हो गए थे। इन हाथो को देखकर राजा और प्रजा और ज्यादा अचंभित हुए। राणा जी से रहा नहीं गया तो सांयाजी से पूछा कि आप एक घडी तक स्तब्ध होकर क्या कर रहे थे जिससे आपकी हथेलियां काली पड गई और छाले पड गए, कृपा कर कविराज हमें बतावे।

तब सांयाजी बोले हे रावजी इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं, द्वारिका में श्री रणछोड राय की आरती उतारते समय पुजारी के हाथ में पकड़ी आरती की बाती से गिरे तिनके के कारण रणछोड राय के वाघो (कपड़ो) में आग लग गई तो इस घटना से मुझ सेवक को दृष्टीगोचर होने से दोनों हाथो से रगड़ कर आग बुझाने से मेरे हाथ काले हुए और छाले पड़े।

इस वक्तव्य पर राणाजी को विश्वास नहीं हुआ तो दुसरे ही दिन अपने विश्वासपात्र राठोड चांदाजी को इस घटना की सत्यता का पता लगाने के लिए द्वारिका भेजा। चांदाजी ने द्वारिका पहुंचते ही भगवान के दर्शन किये और जिस काम से आये उसका पता लगाने हेतु पुजारी से मिले और पूछा कि पुजारी जी गत मार्गशीर्ष मास की सुदी ग्यारस की शाम को रणछोड राय जी के मंदिर में कोई घटना घटी? तब पुजारी बोला में तो क्या पूरा शहर जानता हे कि आरती की बाती से गिरे तिनके के कारण रणछोड राय को नए धारण करवाए कपड़ो में आग लग गई और उस आग को सांयाजी ने अन्दर आकर बुझाई थी।

यह सुनकर चांदोजी बोले क्या उस दिन सांयाजी यंहा थे? तब गुगलिया महाराज बोले आश्चर्य क्यों कर रहे हो उस दिन सांयाजी यहाँ थे इतना ही नहीं वो तो संध्या आरती समय हमेशा यहाँ हाजिर होते हें।

यह बात सुनकर चांदोजी को और ज्यादा आश्चर्य हुआ कि ईडर की सभा में बैठकर दुसरे रूप में आग बुझाई वो तो ठीक हे मगर हमेशा यहाँ हाजिर होते हे यह तो नई घटना हुई।

शाम को आरती का समय हुआ झालरों की आवाज होने लगी चांदाजी आडी-तिरछी नजरें घुमाने लगे कि आज देखता हूँ सांयाजी को, इतने में द्वारकाधीश के द्वार की साख के पीछे सोने की छड़ी पकडे सांयाजी को खड़े देखा।

आरती पूरी हुई, सांयाजी ने सोने की जारी द्वारकाधीश के सामने रखी रणछोड़जी ने अपने हाथ लंबे कर जारी मे से जलपान किया। यह प्रत्यक्ष प्रमाण देख चांदोजी सत्य मानने लगे की ईडर में बैठे हुए सांयाजी ने ठाकुरजी के जलते हुए वाघे बुझाए थे।

एक साथ दो जगह सांयाजी की उपस्तिथि का वर्णन चांदाजी से सुनकर राव कल्याण ने उठकर सांयाजी के पांव पकड़ लिए।

धन्य हे चारण समाज जिसमे ईश्वर स्वरुपा साँयाजी ने जन्म लिया।

~~गणपत सिंह मुण्डकोशिया

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