न्यात न्यात में होवत नाथो!

जोधपुर माथै महाराजा सूरसिंहजी रो राज। सूरसिंहजी रै खास मर्जीदानां मांय सूं एक पुष्करणा ब्राह्मण नाथोजी व्यास ई हा। नेकदिल अर उदारमना मिनख। उणांरै एकाएक बाई ही। दिन लागां बाई परणावण सावै हुई।

बेटी मोटी हुवै जणै बाप सूं पैला मा नै चिंता हुवै। इणी चिंता रै वशीभूत एक दिन गुराणी रै मन में जची कै हमै बाई रा हाथ पील़ा कर दैणा चाहीजै। इण सारू एक दिन उवां व्यासजी नै कह्यो कै –
“जगत में खांचिया फिरो। डूंगर बल़ता निगै आवै पण पगै नीचै सिल़गती निगै नीं आवै। बाई मोट्यार माल हुई है अर थे आंधा हुयोड़ा हो। कांई आ बोल’र कैसी कै म्हनै हमे परणावो।”

आ सुण’र नाथोजी बोल्या कै –
“बात तो थारी ठीक है पण ऊभां खेजड़ां बेज नीं पड़ै। तूं तो कालायां करै। म्हारी बाई है! तो छोरो ई ढंग रो जोवणो पड़सी। किणी ऐरे गैरे नथूखेरै नै तो दिरीजै नीं। पछै तूं ठैरी अचूगाल़। दावै जैड़ो छोरो तनै दाय नीं आवै। इणसूं ठीक आ रैसी कै तूं म्हनै थोड़ो इसारो करदै कै छोरो कैड़ोक अर कितोक हुवणो चाहीजै।”

आ सुणतां ई गुराणी आपरो रसोइयो, जिको पुष्करणा जात रो ईज एक टाबर हो। उण कानी इसारो कर’र बोली कै-
“ओ आपांरो रसोइयो है नीं! ई जैड़ो गोरो, रूपाल़ो, अर डील-डोल़ वालो हुवणो चाहीजै। ई नै लुकायलो अर आप देखो जिणनै काढलो बस कोई फरक नीं हुवणो चाहीजै। ज्यादा सितर-बितर म्हैं किया न को म्हनै आवै। आप तो ऐड़ो छोरो जोय बाई नै बहीर करदो।”

“ठीक है।”
कैय व्यासजी दरबार में गया परा। बात आई गी हुयगी। कोई महीणैक पछै गुराणी पाछो पूछियो कै-
“बाई सारू कोई टाबर देखियो कै अजै सूती गंगा ईज बैवै ?”

जणै गुरां कह्यो –
“हां देख लियो अर सगाई पक्की ई करदी।”

आ सुण’र गुराणी चमकिया अर बोल्या-
“कठै ई संदेशां खेती तो नीं पकाई है?किणरो रो है अर कैड़ोक है टाबरियो?” गुराणी पूछियो जणै व्यासजी थावस सूं कह्यो कै -“ओ आपांरो रसोइयो ईज म्हनै दाय है। थारै परख्योड़ो है। काम रो राछ अर सूधो गाय जैड़ो है।”

“कांई ई रसोइये नै म्हैं म्हारी छोरी दूं ला? कठै ई भांग बत्ती तो नीं ले ली है! ई रै घरै आथरणा-सवार कोनी। उठै म्हैं म्हारी लक्ष्मी जैड़ी बाई दूं! लोग म्हारी अकल नीं बखाणै!”

व्यासजी उणी थावस सूं बोल्या कै-
“भली आदमण तूं इणनै लक्ष्मी दे ला तो इणरै घर सूं भूख आपै ई छेड़ो लेय ले ला। लक्ष्मी जासी जठै भूख नै कोई ठिकाणो नीं। पछै इणमें कमी एक ईज है अर उवा आ है कै ओ गरीब है। बाकी तो फूठरो-फररो, गोरो निचोर। काम रो कारीगर। मिनखापणो सो कीं है। जणै ई तो, तैं ई जैड़ो’र जैड़ो टाबर जोवण रो कह्यो। पछै हूं दूजो जोवतो क्यूं फिरतो? बैठी भैंस्यां खेत आयग्यो ! भल़ै कांई चाहीजै?
रिश्तो सदैव दिल सूं जोड़णो, दिमाग सूं नीं। म्हारो माथो थोड़ो ई भमियोड़ो है जिको हूं खाक वाल़ै नै फैंक’र पेट वाल़ै री आस में पगरख्यां फाड़तो। ई में कमी आ एक ईज है कै ओ गरीब है! तो गताघम में पड़ण री कांई जरूरत? गरीबी तूं आगी कर देई। बाई नै दिल खोल’र दे। ओ ई आपां जैड़ो।
पछै किण बात री कमी? छोरी देय’र छोरो लैणो है-

मन सग्गा सो ई सग्गा, हाड न सग्गा होय।
नेह बिहूणी ईसरा, करै न सगाई कोय।।

गुराणी रै बात हाडोहाड बैठगी। बाई नै आपरै घर माफक दत-दायजो देय उण रसोइये साथै परणाय लाडैकोडै बहीर करी।
आं नाथैजी री ईज एक बात भल़ै चालै कै महाराजा सूरसिंह रै शासनकाल़ में लगैटगै 1680 वि.में एकर भयंकर काल़ पड़ियो। लोगां रै दांतै अन्न वैर हुयो। उण बखत खावण नै उबासै अर गिणण नै रात रा फखत तारा हा। लोगां दिन काढण अर विखो तोड़ण सारू माल़वै जावण रो तय कियो। उण बखत गरीब पुष्करणां ई मऊ रै साथै माल़वै जावण री तेवड़ी।

नाथैजी नै ठाह लागो कै किणगत जातीय बांधव गरीबी सूं आंती आय माल़वै जावण री त्यारी कर रह्या है। उवै द्रवित हुया अर सोचियो कै हूं इणां में जोगतो अर पूगतो मिनख। आगैनैड़ै रा सगल़ा म्हनै सैण मानै। जिको सैण, सैणां रै अबखी में आडो नीं आय सकै तो पछै किसो सैण अर किसी सैणप?

सैण कुसमै परखिये, मिंत्री दूर गयांह।
तिरिया तोटै परखिये, ठाकर खून कियांह।।

ओ माल-मतो भाई-सैणां रै काम रो नीं तो पछै भेल़ै किए रो कांई फायदो? आपरै हींग्योड़ो तो मिनड़ी ई बूरै! ई में इचरज री कांई बात? पण दुनिया तो उवां नै याद करै जिकै-

हरिनाम कथा नित ऊठ करो,
अभिमान तजो अपने मन का।
सतसंगत बैठ करो चरचा,
घर माफक दान करो अन्न का।
पारकी पीर में जाय पड़ो,
मत सोच करो अपने धन का।
हाथीराम कहै सब लोग सुनो,
इण भांत सुभाव हरिजन का।।
~~हाथीरामजी रतनू

आ सोच उणां पूरी न्यात नै संदेशो करायो कै कोई पण पुष्करणो धान रै विजोग माल़वै नीं जावैलो। उवो आवै अर आपरी जरूरत मुजब नाथै रै कोठार मांय सूं बिनां संकै धान ले जावै। भूख रै विखै न्यात मालवै जावैली अर हूं अठै गजरां करूंलो! म्हारै सारू ऐड़ो धन अर धान धूड़ जैड़ा है।”

लोग आया अर बिनां संकोच अन्न ले जाय काल़ बाढियो।

सही है जिकै मोटमना हुवै उवै सावजोग रूप सूं जाणै कै तन, मन, धन री कोई थिरता नीं है। आंख फरूकण रै साथै पासो पल़ट सकै। इण सारू उवै अवसर माथै त्याग अर ऐसान करै जिणरो दुनिया सदैव नाम याद राखै-

तन मन धन अवचल़ नहीं, समै न रहत समान।
समझत नर सोही करत, अवसर पर ऐसान।।

जणै ई किणी कह्यो कै जे उण बखत ऐड़ो एक-एक नाथो हर जात में हुतो तो लोग माल़वै क्यूं जावता–

न्यात-न्यात में होवत नाथो!
काहे लोग माल़वै जातो!!

ऐड़ै उदारमनां रा नाम ई सोनलिये आखरां में अमर रैवै।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *