पाबू जी रा छन्द – कवि पूंजराज जी हड़वेचा

।।दोहा।।
कवियों रे अस काळवीं आणंद घर अनूप।
दीठी न अवर देश मों भाळै सगळा भूप।।
पह धांधल घर परण्यो जायल रो जींदराव।
मांगी घोड़ी मोल री दूथी मूझ दीराव।।
रैणु कहै रै राजवी देवल नां अस दीध।
देवल दियै न दीकरी कवियण थारी क्रीत।।
देवल घोड़ी दीजिये आखंत जींदो एम।
मांगो रुपिया मोल रा जायल समप्पे जेम।।

।।छन्द – भुजंगी।।
कया वैण सो काळवीं क्यों न केनों,
धरा भूप ले जावंत बाल धेनों।
महा दुष्ट खींची गयो मांह मोड़ै,
जबे पाल घोड़ी मांगी हाथ जोड़ै।।१।।

द्यों काळवीं मुज्झ नों बैण दीजै,
करै वाहरु धेन रा बोल कीजै।
भणै अम बाबू सुणो हो भवानी,
ममु वेण दीजै तमों साच मानी।।२।।

मही भूपति सीम चांपे न म्हारी,
तके कूण ऐसो नको गाय थारी।
भलों दीजिये तुज्झ नों खेंग भाई,
समप्पे ऐसी भांत मंडे सजाई।।३।।

सजै जांन घोड़ों भड़ां भूप सारां,
बणे बींद बाबू चलै पंथ बारां।
रखे खैद जींदो करे फोज रो संग,
मुझे दी न घोड़ी अबे आय मो संग।।४।।

कठट्टे थटों जींद चींतार केवा,
दळो मेळ पाबू धरा रेस देवा।
अढ़ंगा वडा बोलतो बोल आडा,
जलां पूर हालै दलां खूर जाडा।।५।।

छणे ऊफणै व्योम गैणाक छायो,
ऐसी भांत फोजों लियों जींद आयो।
धुबै धांधलों खींचीयों वैर हाको,
सबै धेन ले जावसूं जोड़ साको।।६।।

लहै सांसणां प्रात में बात लोड़ै,
घणी धेन हाको कवियों सैन घोड़ै।
होहोकार होकार धेनों होकारो,
पुगे पाल नां जाय वेगो पुकारो।।७।।

भजै ग्या तजै ग्वाल देखे भयंका,
सबै बात कानें सुणी मान संका।।
ऐसी भांत लै वित्त घेरे अंताळा,
लेयों हाथ गेडी गयां गाम ग्वाळा।।८।।

सबै मीसणां गाय लै जाय सारी,
भणे जोग आयो हणो वैर वारी।।
सुणों साहलों चारणी हाथ सेळो,
मंड्यो व्याव सोढ़ों घरे जाग मेळो।।९।।

ब्रहमा वेद चंवरी विच्या वेद वाचै,
रच्यो ब्याव ओ छाव ज्यों इन्द्र राचै।
सुणो पाल देवी कहां बोल सारा,
थटों गाय वाळों ऐसा वेण थारा।।१०।।

पखां बोल पालै रखे तूं न पाबू,
इळा शेष छड्डे डिगे मेर आबू।
लड़ेवा न चालै छत्री वंश लाजै,
करै वाहरू तूं वक्यो केण काजै।।११।।

भलों पाल राठौड़ उठे भुजालो,
भड़ों साथ लीधों चढ़े हाथ भालो।
बरां पूर मांझी मुखां पाल बोलै,
भरे डांण पंचांण ज्यूं आभ तोलै।।१२।।

द्यों लाय तूंनै सबै गाय देवी,
करूं थाट भांजै क्यों वार केवी।
तुरी झींण त्यारी करो तांण तंगा,
पवंगा वैग जाय पूरा अढ़ंगा।।१३।।

सझै सैन टोपं कड़ा बीड़ सारा,
चढ़ै जोध कोफं चखों बीच ज्वाला।
मुखां बोल चांदो वधै वीस लाखूं,
ऐसी खाग बांधै ज्यूं वाकार खाकूं।।१४।।

ढ़ळै वाहरों पारधी साथ ढ़ेंबो,
थटों ओ भड़ों हेक दे आभ थांभो।
जिता पाल साथी उता भीम जोड़ै,
मदां छाकियों गेंयदों मान मोड़ै।।१५।।

झरै आग नैणों प्रलयकार झारै,
प्रलयकार रूपं जमों दूत पालै।
उसस्से भुजा गैण लागो अभंगी,
रच्चे रूप सैना वणी च्यार रंगी।।१६।।

भीलों सात बीसां बांधे बांण भाथों,
होकारे लियों साथ धानक्क हाथों।
ढ़ळक्के भुजा डंड को मंड ढ़ाळों,
भड़ै तेग भूथांण ज्यूं जुद्ध भालों।।१७।।

सहै हाथ सिया भुजा कूंत सींची,
खैड़े आपणी धेन ले जाव खींची।
आका रीठ जोधा ऐसी पीठ आया,
सबै डांण सींचांण ज्यों व्योम छाया।।१८

वहतां दळों साबळो सोक वाजै,
गहक्के धके सींधुवो राग गाजै।
लड़ैवा खेड़े आपड़ो धेन लारै,
वधै वाग ज्यां जोध आया वाकारै।।१९।।

वकै वीर वंका धकै धेन वाळा,
चखों चोल कीधा लखों बंध चाळा।
धुरे पूर वाजा सत्रों सोक धाई,
लगी खेथ भारथ मंडी लड़ाई।।२०।।

बिहूं साबळा भूप साळो बनेही,
सत्रों भाव राखै सक्रोधों सनेही।
वधै वाहरो फोज सामां विवादंग,
जलां बोल समंद्र लोपै मर्यादंग।।२१।।

हुवो राग सिंधूं ग्रहे खाग हाथों,
भुजा चाप चाड़ै लियों आप भाथों।
छुट्टे बांण कोमंड गैणाक छायो,
ऐसी भांत फोजां लेयां जींद आयो।।२२।।

धुबे नाल गोळों हुवै भोम धुजै,
जुड़ै जुद्ध जोटों जंगां क्रोड़ जूझै।
भिड़ै कूंत हाथों लड़ै अंग भालों,
ढ़ुळै रुद्र खाळों मिलै तेग ढ़ाळों।।२३।।

सचै सूर वीरों रचै जुध मातो,
निराताल जूझै सत्रों पाल नातो।
रुकों झींक वाजै दिपै घाव रीठा,
नको पीठ फोरे लड़ै ज्वान त्रीठा।।२४।।

नटों खेल मंडी न चंडी न संका,
वधै वीर वाजीगरां जांण वंका।
बहालों खगां अंग उडै बरंगा,
जुड़ै कोरवां पांडवां क्रोध जंगा।।२५।।

धड़ों शीश उड्डै चढ़े खाग धारों,
पड़ै खेथ जोधां हुवा शरण पारों।
वजै तीर बांणां सझै मेघ बूंदों,
गळै ग्रीध पंखी मिळै मांस गूंदों।।२६।।

दिपै वीर ताड़ै वजै हाक डाकां,
सिला वै पियै जोगणी रुद्र छाकां।
रथों आभ ठांभे किया सुर रम्भा,
चखों देख तेंतीस क्रोड़ी अचंभा।।२७।।

पखां नीर चाड़ै बड़ा बोल पाळै,
समप्पे सुरभ्भी सबेही सम्भाळै।
रचै खेथ भारत्थ पोढ़े रुंढ़ाला,
महेशं बणावे गळे रुंढ़ माला।।२८।।

भला रूप कां छन्द सारा भुजंगी,
पढ़ों तूं नै पाबू अनुसार पंगी।
कहै जोड़ पूंजो कृपा मूझ कीजै,
दया जांण पाबू रिधि दान दीजै।।२९।।

लिख्या है छंदंगे सबै वाच लीजो,
कठै चूक व्हे तो कवि शुद्ध कीजो।

~~कवि पूंजराज जी हड़वेचा
प्रेषित: हिंगलाज दान रतनूं “दीनूं” (चौहटन)

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