पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – प्रथम मयूख

प्रथम मयूख

मंगलाचरण

छंद – अनुष्टुप्
गुणालंकारिणो वीरौ, धनुष्तोत्र विधारिणौ।
भू भार हारिणौ वन्दे, नर नारायणो उभौ।।१।।
उत्तम गुणों से विभूषित, धनुष एवं चाबुक को धारण करने वाले तथा पृथ्वी के भार को हरने वाले, नर-नारायण इन दोनों वीरों (अर्जुन एवं कृष्ण) का मैं वन्दन करता हूँ।

दोहा
ध्यान-कीरतन-वंदना, त्रिविध मंगलाचर्न।
प्रथम अनुष्टुप बीच सो, भये त्रिधा शुभ कर्न।।२।।
ध्यान, कीर्तन एवं वन्दना ये तीन प्रकार के मंगलाचरण हैं। प्रथम अनुष्टुप छंद में मंगल करने वालों का तीनों प्रकार से मंगलाचरण किया गया है-यथा त्रिविध पृथक्करण :-

१. धनुष्तोत्र धारण करने वाले रूप-स्वरूप का वर्णन अर्थात् ‘ध्यान’ पूर्वक मंगलचरण है।
२. पृथ्वी का भार हरने वाले रूप का वीरत्व वर्णन अर्थात् ‘कीर्तन’ पूर्वक मंगलचरण है।
३. वंदना करने के रूप में नमस्कार का वर्णन अर्थात् ‘वन्दना’ पूर्वक मंगलचरण है।
इस प्रकार कवि ने ध्यान, कीर्तन एवं वंदन तीनों तरह से मंगलाचरण किया है।

नमो अनंत ब्रह्मांड के, सुर भूपति के भूप।
पांडव यशेंदु चंद्रिका, बरनत दास स्वरूप।।३।।
देवताओं के राजा इन्द्रादि सहित अनन्त ब्रह्माण्ड के अधिपतियों के अधिपति उस ईश्वर को नमस्कार कर कवि स्वरूपदास पाण्डवों के यश रूपी चन्द्रमा की चन्द्रिका का वर्णन करता है अर्थात् उनके यश प्रस्तार का वर्णन करता है।

स्वामी के पीछे रहै, आदि होहि उच्चार।
नर नारायण शब्द कों, दास स्वरूप विचार।।४।।
कवि स्वयं का विचार कर, कहता है कि जो मालिक (स्वामी) के पीछे रहता है पर जिसे पहले उच्चारित किया जाता है, ऐसे सेवक और स्वामी के सम्बन्ध रूप ‘नर-नारायण’ शब्द पर विचार कर। जैसे कि नर (अर्जुन) अनुगामी है पर इसका उच्चारण पहले है जब कि नारायण (विष्णु) अग्रगामी हैं पर इस शब्द का उच्चारण बाद में होता है। अर्थात् प्रभु ऐसे उदार हैं कि सेवक को अग्रपद देते हैं। ऐसे में सेवक होना अत्युत्तम है।

घनाक्षरी
गरल तैं भीम कौं त्यों ज्वाल हूं तैं पांच हू कौं,
द्रौपदी कौं सभा औ विराट वन तीन बार।
किरीटी कौं अच्छर के श्राप तैं युधिष्ठिर कौं,
मारिबे कौं मरिबे पै उदै भये असीधार।
दुरवासा श्रापिबें कौं आयो ताकौं आदि दैकै,
श्रूपदास केते कहै एक छंद में प्रकार।
तेइ मेरे ग्रंथ आदि मंगल उदय करो,
एते ठां अमंगल कौं मंगल करनहार।।५।।
आप भीम सेन को (लड्डू के) विष से, पांचों पाण्डवों को (लाक्षागृह की) ज्वाला से, द्रौपदी को सभा में (दु:शासन द्वारा चीर हरण के अवसर पर), वन में (जयद्रथ हरण करने आया उस वक्त) और वैराट नगर में (कीचक की कुचाल के समय) इस प्रकार तीन बार बचाने वाले हैं। अर्जुन को (उर्वशी) अप्सरा के श्राप से बचाया। अर्जुन द्वारा युधिष्ठिर को मारने के संकल्प-समय बचाने के लिए तलवार की धार पर प्रकट हुए। इसके अतिरिक्त दुर्वासा जब श्राप देने आए तब भी आपने ही इतनी सारी विपत्तियों में पाण्डवों की रक्षा की। कवि स्वरूपदास कहता है कि इतनी बार चमत्कार दिखा कर रक्षा करने वाले प्रभु! आपके कर्मों का बखान भला मैं एक छन्द में कैसे करूं? उपर्युक्त इतने स्थलों पर अमंगल की बेला मंगल करने वाले श्री हरि ! आप मेरे ग्रंथ के आरम्भ में प्रकट हो कर मंगल करें।

घनाक्षरी
पोढ़े परियंक पर केशव किरीटी जू की,
जंघा पर व्हेके पांव द्रौपदी की गोद में।
त्यों ही पद अर्जुन के सत्यभामा रुक्मनी के,
अंक बीच परे तीनों पलोटैं विनोद में।
अन्त:पुर-चारिन सो देखत निमग्न भये,
राजसू में नैन मीन आनन्द के होद में।
ज्यों निरंतराइ दास स्वामी की स्वरूपदास,
त्यौं ही प्यास मेरी चारौं पाय ध्यान मोद में।।६।।
श्री कृष्ण शय्या पर लेटे हैं, इस स्थिति में उनके चरण अर्जुन की जंघाओं पर से हो कर द्रौपदी की गोद में पड़े हैं। इसी प्रकार अर्जुन के चरण सत्यभामा और रुक्मणी की गोद में पड़े हैं। ऐसे परिदृश्य में तीनों जन आनन्दपूर्वक चरणों की चंपी कर रहे हैं। इस समय अन्त:पुर के दास-दासी यह दृश्य देख कर जिस प्रकार राजसूय यज्ञ में नेत्र रूपी मछलियां आनन्दरूप होद में गर्क हो गई थी, वैसे ही आनन्द में विभोर हो गए। कवि स्वरूपदास कहता है कि जिस प्रकार की ये सेवक-स्वामी की अभिन्नता है, उसे देखते हुए इनके चारों चरणों में आनन्द पूर्वक ध्यान धरने की मेरी अभिन्न आकांक्षा हो।

कवि की मान्यता
घनाक्षरी
गुणी गुण अंशी अंश विकारी विकार भाव,
कारण औ कार्य जाति व्यक्ति हू बखाने हैं।
सेवक औ सेव्य उपचार स्तुति साद्रशता,
उपमा परायन ये तीन पद आने हैं।
नौ विकल्पना को जीव ईस में अद्वैतवादी,
करे हैं अभाव तत्ववेत्ता लोक जाने हैं।
वासुदेव अर्जुन में घटै है रु घटै नाहिं,
ऐसी ज्ञान भक्ति लीये श्रूपदास जाने है।।७।।
(१) गुणवान और गुण (२) अंशी और अंश (३) विकारी और विकार भाव (४) कारण और कार्य (५) जाति और व्यक्ति (६) सेवा योग्य और सेवक, (७) उपचार, अर्ध्यादि भेंट-पूजा, (८) स्तुति और (९) साम्य। ये (उपर्युक्त कवित्त के) तीन पद उपमा के सहारे गिनाने में आए हैं। इनमें प्रथम के छ: द्वंद्व पदार्थ तथा उसके बाद के तीन अद्वंद्व पदार्थ मिला कर एक के भीतर से जो नो की कल्पना की गई है। इसे भी अद्वैतवादी, जीव तथा ईश्वर अलग कह कर नकारते है पर जो तत्ववेत्ता हैं वे जानते हैं। ऊपर बताई गई कल्पना वासुदेव और अर्जुन की जोड़ी पर घटित होती है और नहीं भी होती है। यह ज्ञान-भक्ति के माध्यम से कवि स्वरूपदास भली-भांति जानता है।

दंपति परिहास-मंगलाचरण
कवित्त
विष्णु कहै रमा तेरे पिता की त्रिया जो गंगा,
शिव ने छिनाय लीनी ताको वैर का लयो।
रमा कहे जारत त्रिलोक जैसो दीनो विष,
आप तें छिप्यो है का? बिख्यात विश्व में भयो।
आपको जरायो पुत्र काम सो अनंग नाम,
ताको चिन्ह हाथ लेकै पूजत नयो नयो।
ऐसो परिहास कियो दम्पति स्वरूपदास,
मंगल की रासी ध्यान ह्रदै चित्र व्हे गयो।।८।।
विष्णु भगवान लक्ष्मी जी से कह रहे हैं कि हे लक्ष्मी! तुम्हारे पिता की स्त्री गंगा को शिव ने छीन ली, इसका तुम्हारे पिता (समुद्र) ने क्या वैर लिया? यह सुन कर लक्ष्मी जी भी परिहास करते बोली-हे भगवान! स्वर्ग, मृत्यु एवं पाताल लोक को जला डाले ऐसा विष मेरे पिता ने महादेव को दिया, यह बात जगत में प्रसिद्ध है, क्या आप नहीं जानते? परन्तु आपके पुत्र जो कामदेव हैं उसे महादेव ने जला कर भस्म कर दिया और बाद में जिसका नाम उन्होंने अनंग रखा। फिर भी आप ऐसे महादेव का चिन्ह (लिंग) हाथ में ले कर नये-नये ढंग से जिसकी पूजा अर्चना करते हैं, किस कारण से? कवि स्वरूपदास कहता है कि नयनाभिराम युगल ने आनन्दपूर्वक ऐसा परिहास किया कि मंगल स्वरूप इस दिव्य-दम्पत्ति की छवि मेरे हदय पर अंकित हो गई।

दोहा
हरि हर सत तम गुणमयी, चहिये गौर रू श्याम।
अन्योन्य के सुध्यान तैं, भये विलोम नमाम।।९।।
विष्णु और महादेव सत्वगुण एवं तमोगुण वाले देव हैं। इससे तो इनका शरीर गौर वर्ण तथा श्याम वर्ण होना चाहिए परन्तु है इसका उल्टा। यह इसलिए कि ये अन्योन्याश्रित हैं, परस्पर एक-दूजे का ध्यान करते हैं। यही कारण है कि विष्णु श्याम वर्ण हैं और महादेव गौर वर्ण। मैं दोनों को प्रणाम करता हूं।

अर्जुन के बीस नाम
कवित्त
धनंजय विजै स्वेतवाहन किरीटी जिष्णु,
अर्जुन विभत्सु सव्यसाची नाम गहिये।
फालगुन कृष्ण कृष्णसखा नर गुड़ाकेस,
वासवी संगीतवेत्ता विश्वजेता कहिये।
कौन्तेय गांडीवधारी कपिध्वज अभैकारी,
और कालखंजारी उचार किया चहिये।
क्षत्रि कौं जरूर और कोऊ कौं स्वरूपदास,
बीस नाम जपै तैं त्रिवर्ग सद्य लहिये।।१o।।
(१) धनंजय = पृथ्वी का धन जीतने वाला, ऐसा अर्जुन
(२) विजय (विजै) = जिसकी विशेष जय होती हो, वह अर्जुन
(३) श्वेतवाहन = युद्ध में जिसके रथ के घोड़े उज्जवल दिखते हो, वह अर्जुन
(४) किरीट = इन्द्र का दिया हुआ मुकुट धारण करने वाला, अर्जुन
(५) जिष्णु = इन्द्र के अंश से उत्पन्न हुआ, वह अर्जुन
(६) अर्जुन = उज्जवल कर्म करने वाला, वह अर्जुन
(७) विभत्सु = युद्ध में स्फूर्ति रखने वाला, ऐसा अर्जुन
(८) सव्यसाची = युद्ध में अपना बांया हाथ भी दाहिने की तरह बरतने वाला, अर्जुन
(९) फालगुन = पूर्वा फाल्गुन तथा उत्तरा फाल्गुन नक्षत्र के बीच के समय में जन्मा हुआ, अर्जुन
(१०) कृष्ण = मन को आकर्षित करने वाला (देखें, विराट पर्व कवित्त सं. ७० की टिप्पणी)
(११) कृष्ण सखा = कृष्ण जिसके मित्र हैं, वह अर्जुन
(१२) नर = जिसके छाती के चिन्ह नहीं हो, ऐसा अर्जुन। अन्य अर्थ में वीर और योद्धा भी
(१३) गुडाकेश = निद्रा को जीतने वाला, अर्जुन
(१४) वासवी = इन्द्र का पुत्र, अर्जुन की संज्ञा
(१५) संगीत वेत्ता = संगीत विद्या का जानकार (अज्ञातवास में ब्रहनल्ला रूप में रहने से)
(१६) विश्वजेता = विश्व को जीतने वाला, महावीर अर्जुन का विशेषण
(१७) कोंतेय = कुंती का पुत्र, अर्जुन
(१८) गांडीवधारी = गांडीव नाम के धनुष को धारने वाला, अर्जुन की संज्ञा
(१९) कपिध्वज = जिसकी ध्वजा में वानर का चिह्न है, वह अर्जुन
(२०) अभैकारी अथवा काळखंजारी = अभय करने वाला अथवा काळखंज को मारने वाला, अर्जुन
ये अर्जुन के बीस नाम क्षत्रियों को अवश्य जपने चाहिए, उनके साथ दूसरों को भी जपना चाहिए। इस नाम-जप से कवि स्वरूपदास कहता है कि त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ एवं कामादिक) की सत्वर प्राप्ति होती है।

षोडश कला
कवित्त
कीर्ति लज्जा शांति बुद्धि प्रज्ञा धृति आस्तिकता
शमता रु दमता तैं तमता बिनासी है।
सुघराई गिरा क्षमा वीरता उदारताइ,
विद्या उपकारताइ विश्व में विकासी है।
व्यास मुख प्राची दिशि सज्जन कुमुदवृंद,
श्रूपदास बुद्धि सो चकोरनी हुलासी है।
भीमानुज नकुलाग्रज ता जश उदै भौ इन्दु,
षोडस कला की ताकी चंद्रिका प्रकासी है।।११।।
(१) कीर्ति (२) लज्जा (३) शांति (४) बुद्धि (५) प्रज्ञा (६) धृति (७) आस्तिकता (८) शमता (मनोविग्रह) (९) दमता (इन्द्रिय निग्रह) इन के द्वारा अज्ञानता का जो नाश करता है। (१०)सुघड़ाई (११) वाणी (१२) क्षमा (१३) शौर्य (१४) औदार्य (१५) विद्या (१६) पर-उपकार, ये सभी जिसके गुण विश्व में विस्तरित हैं। उदय स्थान रूप आदि कवि वेदव्यास की मुख रूपी पूर्व दिशा है। सज्जन रूपी कमल-समूह है और कवि स्वरूपदास की बुद्धि रूपी चकोरी प्रसन्न है, कारण कि भीमसेन से छोटे और नकुल से बड़े ऐसे अर्जुन के उगे यश रूपी चन्द्रमा की ऊपर वर्णित कलाओं की चान्दनी प्रकाशित हो रही है।

मंगलाचरण-किमर्थ
कवित्त
आदि सभा अरन्य विराट औ उद्योग पर्व,
भीष्म अरू द्रोण कर्ण शल्य पर्व कहिये।
सुषौप्तिक त्रिया शांति अनुशिष्या अश्वमेध,
व्यासाश्रम मूशल विचार करि गहिये।
महापर्व लेकै स्वर्ग आरोहण आदि देकै,
अनुक्रम ही तैं पर्व अष्टादश लहिये।
तिनको संक्षेप चहै बरन्यो स्वरूपदास,
किरीटी के सारथी सहाय नैक रहिये।।१२।।
(१) आदि–पर्व (२) सभापर्व (३) अरण्य पर्व (वन पर्व) (४) विराट पर्व (५) उद्योग पर्व (६) भीष्म पर्व (७) द्रोण पर्व (८) कर्ण पर्व (९) शल्य पर्व (१०) सुषौसिक पर्व (११) स्त्री पर्व (१२) शान्ति पर्व (१३) अनुशासन पर्व (१४) अश्वमेध पर्व (१५) व्यासाश्रम पर्व (१६) मूशल पर्व (१७) महाप्रस्थान पर्व (१८) स्वर्गारोहण पर्व, अनुक्रम से ये अठारहों पर्व, मैं संक्षेप में वर्णन करना चाहता हूं इसके लिए हे अर्जुन के सारथी (श्री कृष्ण) ! आप कृपा कर मेरी सहायता करना। (इस कवित्त में परिकरालंकार है, सं.)

सवैया
पाँव छतै करि गौन हरी दिश फेर ये पांव चलैं न चलैं।
जीभ छतै गुनिये हरि को जस फेर ये जीभ हलै न हलै।
नैन छतै लखि रूप विराट को फेर ये नैन खिलै न खिलै।
श्रोन छतै हरि कीरत कौ सुनि फेर ये श्रोन मिलै न मिलै।।१३।।
श्री हरि ने मनुष्य देह को जो अवयव सोंपे हैं इनका सदुपयोग करने के आशय से कवि कहता है कि-पाँव चलते-फिरते हैं तब तक हरि की ओर चल (अर्थात् उनके स्थानों की यात्रा कर) बाद में फिर ये पाँव साथ दें न दें। जीभ चलायमान है तब तक श्री हरि के गुण या उनका नाम स्मरण कर क्योंकि बाद में जीभ साथ दे न दे। आंखों में ज्योति है तब तक श्री हरि के विराट रूप के दर्शन कर ले नहीं तो क्या पता बाद में आँखों की ज्योति रहे न रहे। जब तक कान ठीक हैं तब तक ईश्वर की कीर्ति सुन ले नहीं तो क्या पता बाद में (अगले जन्म में) कान मिले अथवा न मिले।

किं प्रयोजनं
दोहा
लाभ जीविका सुजश को, पुनि परमारथ सांच।
विघ्नशांति परलोक की, सिद्धी प्रयोजन पांच।।१४।।
ग्रंथ प्रणेता, ग्रंथ रचने के पांच प्रयोजन बताते हैं-(१) जीवन निर्वाह (२) सुयश प्राप्ति (३) सत्य-परमार्थ (४) कुशलता और (५) स्वर्ग सिद्धि ये पांच प्रयोजन लाभ रूप हैं।

वार्ता-(वचनिका) मेरे पांच हू हैं, मेरी जीविका, हरि हरिदासन का कीर्तन, ग्रंथ किये जस भी है। पढ़ेंगे जिनको बुद्धि सुकर्म-प्राप्ति, परमार्थ, ग्रंथ विषे विघ्र-शांति सिद्धि है ही।
कवि स्वरूपदास कहते हैं कि मेरे लाभ रूप पाँचों प्रयोजन हैं, (१) हरि का और हरि के दासों का कीर्तन ही मेरी जीविका है (२) ग्रंथ रचने से यश भी मिलता है (३) मेरे ग्रंथ को जो पढ़ेंगे उन्हें सुबुद्धि एवं सदकर्मों की प्राप्ति होगी, यह परमार्थ है (४) ग्रंथ रचने में कौशल्य की प्राप्ति और (५) स्वर्ग सिद्धि तो है ही।

श्री हरिको हरिदासन को मिश्रित यश, साक लौन, सरकंज, निशा–चन्द्र न्यायेन।।
शाकभाजी (सब्जी) में नमक-मसाला, तालाब में कमल, और रात्रि में चन्द्रोदय की भांति ग्रंथ में हरि का और हरि सेवक का सुयश, यह मिश्रण न्याय संगत है।

अष्टादस पर्व-सूची पत्र

आदि पर्व-सूची
कवित्त
जन्मेजय सर्पं सत्र ययाती भरत जन्म,
अंशा अवतर्न शस्त्र शिक्षा अनुमानिये।
लाक्षागृह बद्ध त्यों हिडंब औ बकासुर को,
द्रौपदी स्वयंवर औ राधा वेध जानिये।
राज्य अर्थ लाभ वनोवास वर्ष द्वादश को,
अर्जुन को सुभद्रादि त्रिया लाभ मानिये।
खांडु दाह कम्बु अखैतून धनु सभा लाभ,
आदिपर्व सूचीपत्र निके कै पिछानिये।।१५।।
जन्मेजय राजा का सर्पयज्ञ, राजा ययाति एवं भरत का जन्म, दानव और देव अंशों द्वारा कौरवों और पांडवों की उत्पति, उनका शस्त्र विद्या का प्रशिक्षण, लाक्षागृह वर्णन, हिडिंबासुर और बकासुर का वध, द्रौपदी स्वयंवर, मच्छवेध, अर्ध राज्य प्राप्ति, पांडवों को बारह वर्ष का वनवास, अर्जुन को सुभद्रा प्राप्ति, खांडव वन का दहन, देवदत्त शंख, अक्षय-तुणीर, गांडीव धनुष और मयदानव कृत सभा का लाभ। यही सारी आदि पर्व की अनुक्रमणिका (विषय-सूची) है इसे अच्छी तरह जान लीजिए।

श्लोक-संख्या
दोहा
मुनी अयन द्रग वाम गति, अंक लिखहु अध्याय।
वेद वसू ग्रह फिर वसू, श्लोक-अनुष्टुप न्याय।।१६।।
मुनि की संख्या सात है, अयन की संख्या दो है, नैत्र की संख्या भी दो है, इन अंकों को उलटी ओर से गिनने पर आदि पर्व के अध्याय (२२७) दो सौ सत्ताइस होते है। इसी प्रकार वेद की संख्या चार, वसु की संख्या आठ है, ग्रहों की संख्या नव और पुन: वसु की संख्या आठ है। इन सभी को ऊपर बतायेनुसार गणना करने पर (८९८४) आठ हजार नव सौ चोरासी श्लोक होते हैं जो आदिपर्व में हैं।

सभा-पर्व-सूची
कवित्त
नारद ने देवन की सभा बहुधा सी कही,
पांडु को संदेश पुनि राजसूय करिबो।
चारों दिगविजै चारों भ्रातन तें मागध की,
भीम तै विनाश शिशुपाल हू को मरिबो।
सभा बीच कैबो अपमान त्यों सुयोधन को,
मत्सरता लिये पितु-मातुल तै लरिबो।
रच्यो द्यूत खेंच्यो चीर स्वसुर ने दीनो वर,
फेर द्यूत तेरा अब्द बन में विचरिबो।।१७।।
पांडवों के पास आ कर नारद का देव-सभा का विविध प्रकार से वर्णन करना, पांडुराज का सन्देश और राजसूय यज्ञ करना, चारों भाइयों की चारों दिशाओं में विजय, भीम सेन द्वारा मगध-प्रदेश के राजा जरासन्ध का विनाश और श्रीकृष्ण का शिशुपाल को मारना। दुर्योधन का पांडवों की सभा में अपमान और अभिमान वश पिता एवं मामा से कलह करना, युधिष्ठिर से द्युत खेलना, द्रौपदी का चीर हरण, द्रौपदी का धृतराष्ट्र से वरदान लेना, धर्मराज का फिर से द्युत क्रीड़ा में संलग्न होना और तेरह वर्ष का वनवास भुगतना। यह वृतान्त इस पर्व में है।

श्लोक-संख्या
दोहा
वसू मुनी अध्याय हैं, सभा पर्व में जान।
चंद्र मही सर अयन लखि, श्लोक प्रमानहि मान।।१८।।
वसु की संख्या आठ, एवं मुनि की संख्या सात हुई इस संख्या को उलटने से, पर्व में अठहत्तर अध्याय हैं। चन्द्र (१) पृथ्वी (२) शर (काम देव के बाण) ५, अयन (उत्तरायन और दक्षिणायन) २, इस तरह संख्या हुई (११५२) इस को उलटने से बना (२५११) अत: दो हजार पाँच सौ ग्यारह कुल श्लोक हैं, इस पर्व के।

वन-पर्व-सूची
कवित्त
भास्कर तैं अखे पात्र प्रापत प्रथम भयो,
कृष्ण को मिलाप इतिहास नृप नल को।
जिष्णु तप अस्त्रलाभ कपट निषाद जुद्ध,
नाक गौन रंभा श्राप नाश दैत्य – दल को।
घोष यात्रा बंधु मोक्ष द्रौपदी-हरन ता में,
जन्म भ्रष्ट व्हेबो दुष्ट जैव्रथ विकल को।
राम कथा तीर्थाटन कर्न–जन्म अरनी तै,
चार बंधु मृत्यु यक्ष जोग पान जल को।।१९।।
सूर्य द्वारा प्रदत्त प्रथम अक्षय-पात्र की प्राप्ति और श्रीकृष्ण से मिलाप होना। नल राजा का इतिहास, अर्जुन का तप, अस्त्रों की प्राप्ति, कपट से निषाद संग युद्ध करना। स्वर्गारोहण, उर्वशी अप्सरा से श्राप मिलना, समुद्र के पार बसने वाले दैत्य-दल का संहार, दुर्योधन की घोष यात्रा (गायों एवं बछड़ों के स्थान पर जाना), उसे गंधर्व से छुड़ाना। द्रौपदी-हरण में दुष्ट जयद्रथ का व्याकुल हो कर जन्म भ्रष्ट होना, श्री रामकथा का प्रसंग, तीर्थाटन, कर्ण के जन्म की कथा, ब्राह्मण के यज्ञ हेतु अरणी (यज्ञ में ज्वाला उत्पन्न करने की विशेष लकड़ी) लेने जाते हुए पानी पीने से पहले चारों भाइयों का मरना, बाद में युधिष्ठिर द्वारा यक्ष के प्रश्नों का सही प्रत्युतर देकर भाइयों का जिलाना आदि वृतान्त इस पर्व में है।

श्लोक-संख्या
दोहा
रत्न उर्मि द्रग वन परव, कहे व्यास अध्याय।
वेद राग रितु विधु मही, संख्या श्लोक जताय।।२०।।
रत्नों की संख्या नव, उर्मियों की संख्या छ: और द्रग दो, इसकी संख्या को पूर्ववत उलटने से (२६९) दो सौ उनसत्तर अध्याय, व्यास मुनि ने इस वन-पर्व में कहे हैं। वेदों की संख्या चार, ऋतुओं की छ: विधु की एक और पृथ्वी की संख्या एक इन सारे अंकों से प्राप्त संख्या को उलटने से बनी (११६६४) ग्यारह हजार छ: सौ चौंसठ श्लोक इस पर्व में हैं।

विराट–पर्व–सूची
कवित्त
कंकभट वल्लवजू वृहन्नष्टा ग्रंथिकार,
तंत्रीपाल सैरन्ध्री व्है आकृति छिपायबो।
द्विज के महोत्सव में हतन जिमूत मल्ल,
द्रौपदी के काज वंश कीचक खपायबो।
दक्षिण गो ग्रहण अर्ध-मुंडन सुशर्मा को,
दूजै गो ग्रहण कुरु सैन्य मुरछायबो।
पासे को प्रहार भूप मच्छ तैं युधिष्ठिर कौ,
उत्तर तें सौभद्रेय ब्याह कौं रचायबो।।२१।।
पांडवों और द्रौपदी का छद्म वेश में रह कर अपने को छुपाना, ब्राह्मण के यहाँ महोत्सव में जिमूतमल्ल को मारना, द्रौपदी की रक्षार्थ कीचक को वंश सहित मारना, दक्षिण दिशा से गायों का घेरना, सुशर्मा का अर्द्ध-मुंडन, दूसरे दिन फिर से गायों का घेरना, कौरवों की सेना का मूर्छित होना, मच्छराज द्वारा युधिष्ठिर पर पासे का प्रहार करना और उत्तरा कुमारी से अभिमन्यु का विवाह आदि सारे वृतांत इस पर्व में विद्यमान हैं।

श्लोक-संख्या
दोहा

वार राग वैराट में, कहे अध्याय बखान।
व्योमाम्बर शर कर सहित, श्लोक समूह पिछान।।२२।।
वारों की संख्या सात, रागों की छ: इन अंकों से प्राप्त संख्या को उलटने से (६७) सतसठ अध्याय विराट पर्व में वर्णित हैं। व्योम (आकाश) की संख्या शून्य, आकाश की शून्य, शर की संख्या पाँच और हाथों की संख्या दो, और इन अंको से प्राप्त संख्या को उलटने से बनी (२५००) दो हजार पाँच सौ, यह इस पर्व की कुल श्लोक संख्या है इसे पहचानो अथवा जानो।

उद्योग-पर्व-सूची
कवित्त
आदि मंत्र नागपुर गौन भी पुरोहित को,
दूजे गौन संजय को नीति है विदुर की।
तीजे भो श्रीकृष्ण–गौन मुनि इतिहास कथा,
धारन विराट रूप देखी सभा धर की।
दश हू दिशा के भूप आगम निमंत्रण तै,
सात ग्यारा क्षोहणी मिली है घर घर की।
आगम उलूक दोनों सैना गौन कुरुक्षेत्र,
रथी संख्या अंबा-कथा नारी भयो नर की।।२३।।
प्रथम बार शांति प्रस्ताव लेकर पुरोहित का हस्तिनापुर जाना, उसके बाद संजय का पांडवों के पास आना, विदुर नीति वर्णन, इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर गमन, ( भगवान परशुराम, कण्व, नारद, व्यास आदि) मुनियों के वर्णन करने वाले इतिहास का वर्णन, श्रीकृष्ण का विराट रूप धरना जिसे देखकर दुर्योधन की सभा का त्रस्त हो जाना, आमंत्रण पर दशों दिशाओं से राजाओं का आना, सात और ग्यारह अक्षौहिणी घर-घर की सेना का मिलना, उलूक (शकुनि पुत्र) का दूत बन कर पांडवों की छावनी में आना, रथियों की गणना, स्त्री की देह छोड़ कर पुरुष बनी अंबा की कथा आदि सारे वृतान्त उद्योग पर्व में वर्णित हैं।

श्लोक-संख्या
दोहा
राग सिद्धि अरु चन्द्रमा, पर्व अध्याय उद्योग।
वसू रत्न उर्मी रितू, श्लोकन को सहजोग।।२४।।
रागों की संख्या छ:, सिद्धियों की संख्या आठ, चन्द्रमा का संख्या वाचक अर्थ एक, इन सारे अंको को उलटने से बने (१८६) एक सौ छियासी, इतने अध्याय उद्योग पर्व में है। और वसु (८), रत्न (९), उर्मि (६) ऋतु (६) इन अंको वाली संख्या को उलटने से बना (६६९८) अर्थात् उद्योग पर्व में कुल छ: हजार छ सौ अठानवे श्लोक हैं।

भीष्म-पर्व-सूची
कवित्त
खंड निरमान उतपात को प्रमान हानि,
भीष्म-अभिसेचन प्रणोता सैन्य सारी को।
अर्जुन-विषाद गीता अष्टादशाध्याय जानि,
तीन वरदान धर्मपुत्र धर्मचारी कौं।
इरावान उत्तर औ शंख द्वै विराटपुत्र,
सतरा सुयोधन के बंधु अपकारी को।
भयो परलोक बाणसज्जा गंगापुत्र पोढे,
बाण-गंगा दीनो जस अखै तूणधारी कौं।।२५।।
खण्डों का निर्माण, उत्पात और उससे होने वाली हानि का आकलन, भीष्म पितामह का सेनाभिषेक, सारी सेना को देखकर अर्जुन को पीड़ा होना, श्रीकृष्ण द्वारा वर्णित अठरह अध्याय वाली गीता, धर्माचरण पर अडिग रहने वाले धर्म-पुत्र (युधिष्ठिर) को तीन वरदानों की प्राप्ति, अर्जुन के पुत्र इरावान, विराट नरेश के दो पुत्र उत्तम कुमार एवं शंख तथा कृतघ्न दुर्योधन के सत्रह भाइयों का परलोक जाना, भीष्म पितामह का शर शय्या पर लेटना, अक्षय तुणीर धारी अर्जुन द्वारा बाण गंगा के प्रकटन से भीष्म पितामह का प्रसन्न होकर अर्जुन का सुयश कथन आदि सभी घटनाओं का समावेश भीष्म पर्व में विद्यमान है।

श्लोक-संख्या
दोहा
वार इन्दु गनपति रदन, भीष्म पर्व अध्याय।
वेद सिद्धि वसु वान लौं, श्लोक हि दिये जताय।।२६।।
संख्या वाचक संज्ञाओं के अन्तर्गत वार अर्थात् सात, इन्दु एक और गणपति का दाँत एक, इस तरह के अंकों वाली संख्या को उलटने से (११७) एक सौ सत्रह अध्याय भीष्म पर्व में हैं। इसी प्रकार वेद अर्थात चार, सिद्धि आठ, वसु आठ, बाण पाँच से बनी संख्या को उलटने पर बनी (५८८४) पाँच हजार आठ सौ चोरासी इतने श्लोक हैं, इस पर्व के यह जानें।

द्रोण-पर्व-सूची
कवित्त
द्रोन की प्रतिज्ञा जुद्ध संसप्तक अर्जुन को,
चक्रव्यूह वेध वध सुभद्रा के नन्द को।
नर की प्रतिज्ञा जुद्ध बिना रथ वध भयो,
भूरिश्रवा जैद्रथ औ बिंद अनुबिंद को।
रात्रि युद्ध वासवी अमोघ शक्ति ही तें भयो,
पात हेडंबेय गन शत्रु निहकंद को।
पैंतालीस भ्राता दुर्योधन के द्रौण पात,
द्रौणी अस्त्र नारायन प्रेयों अस्त्र पुंज फंद को।।२७।।
द्रोणाचार्य की प्रतिज्ञा, संसप्तकों का अर्जुन से युद्ध, अभिमन्यु द्वारा चक्रव्यूह भेदन, अभिमन्यु का वध, अर्जुन की प्रतिज्ञा, रथ बिना युद्ध करना, भूरिश्रवा, जयद्रथ, विंद एवं अनुविंद का वध, रात्रि में युद्ध, इन्द्र द्वारा प्रदत अमोघ शक्ति से शत्रुओं के समूह को निकंदन करने वाले घटोत्कच का नाश, दुर्योधन के पेंतालीस भाइयों का मारा जाना, द्रौणाचार्य का मरना, फन्दों के समूह वाले नारायणास्त्र का अश्वत्थामा द्वारा प्रयोग आदि उपरोक्त सारा वृतान्त द्रोण पर्व में वर्णित है।

श्लोक-संख्या
दोहा
व्योम द्वीप अरु चंद्रमा, द्रोणपर्व अध्याय।
ग्रह अंबर निधि सिद्धिजुत, गिनती श्लोक गिनाय।।२८।।
व्योम का अंक शून्य, द्वीप का सात, चन्द्रमा का एक इन अंकों से बनी संख्या को उलटने से बनी (१७०) एक सौ सत्तर अध्याय द्रोण पर्व में हैं। इसी तरह ग्रह ९, अंबर ०, निधि ९, सिद्धि ८, इन अंकों से बनी संख्या को उलटने से बनी (८९०९) अर्थात् इस पर्व में श्लोकों की संख्या आठ हजार नो सौ नो है।

कर्ण–पर्व–सूची
कवित्त
कर्ण-अभिषेचन औ-द्वंद्व युद्ध एक द्यौष,
रात्रि समै मंत्र सल्य सारथी विचार्यों है।
दूजै दिन सारथी महारथी विवाद तामें,
मरूदेश सेनानी को माजनो बिगार्यों है।
ऐंच्यों चीर तेई भुज ऐंचि दोउ सैन्य बीच,
पीयो श्रोन भीमसेन दुशासन मार्यो है।
युधिष्ठिर अर्जुन की स्व तैं मृत्यु टारी कृष्ण,
पुत्र वृषसेन जुत कर्णा मारि डार्यो है।।२९।।
कर्ण का सेनापति होना, एक दिवस का द्वंद्व-युद्ध, रात्रि समय शल्य को सारथी बनाने का विचार, दूसरे दिन शल्य एवं कर्ण का विवाद जिसमें शल्य द्वारा कर्ण का अपमान, दु:शासन ने अपने जिन हाथों से द्रौपदी का चीर-हरण किया था उन्हीं हाथों का भीम द्वारा तोड़ा जाना और दोनों सेनाओं के मध्य भीम द्वारा दु:शासन का रक्त पीना, युधिष्ठिर और अर्जुन के बीच विवाद से होने वाली मृत्यु को श्री कृष्ण द्वारा टालना। वृषसेन सहित कर्ण का मारा जाना। कर्ण पर्व में यह सभी वर्णित है। अध्याय-

श्लोक-संख्या
दोहा
रत्न रितू अध्याय है, कर्ण पर्व में शोध।
वेद राग निधि वक्त्र विधि, गिन्यो श्लोक को बोध।।३०।।
रत्न अर्थात् नव, ऋतुओं की संख्या छ: हैं, इन अंकों से बनने वाली संख्या को उलटने से बने (६९), उनसतर अध्याय कर्ण पर्व के हैं और वेद अर्थात् चार, रागों की संख्या छ:, निधी नव एवं ब्रह्मा के मुख चार हैं, इन सारे अंकों से बनी संख्या को उलटने से बना (४९६४) अर्थात् इस पर्व में चार हजार नो सौ चौसठ श्लोक हैं।

शल्य-पर्व–सूची
कवित्त
शल्य स्नान सुशर्मा उलूक सकुनी को वध,
धर्मपुत्र ही तैं नाश सल्य अर्ध दिन में।
सुयोधन नीरसय्या दूतन तैं शोध पाइ,
धर्म कटुवाद तैं जगायो एक छिन में।
कृष्णाग्रज तीर्थयात्रा कुरुक्षेत्र सरस्वती,
दोनों की प्रशंसा पांचौं श्रौन कुंड तिन में।
द्रौपदी कौं सभा बीच दिखाई जो वाम जंघा,
तातैं सोई तोरि भीम मारि लियो रन में।।३१।।
राजा शल्य का सेनापति के रूप में अभिषेक, उलूक, शकुनि और सुशर्मा का वध, धर्म के पुत्र द्वारा आधे दिन में ही शल्य का नाश, दुर्योधन का जल में जा छिपना, दूतों द्वारा उसे ढूंढ़ निकाले जाने पर युधिष्ठिर द्वारा कड़वे वचन कह कर जगाना, कृष्णाग्रज बलदेव द्वारा तीर्थयात्रा का वर्णन, कुरुक्षेत्र तथा सरस्वती की प्रशंसा और उसमें विद्यमान रक्त के पाँच कुण्डों की कथा, दुर्योधन ने सभा के मध्य द्रौपदी को जो अपनी बांई जंघा दिखाई थी उसे तोड़ कर भीमसेन द्वारा उसका वध आदि वृतान्त इस शल्य पर्व में वर्णित हैं।

श्लोक-संख्या
दोहा
रत्न बाण अध्याय हैं, शल्य गदा युत पर्व।
व्योम नैन कर अग्नि गनि, श्लोक भये मिलि पर्व।।३२।।
संख्या के अनुसार रत्न अर्थात् नव, बाण पाँच, इन अंकों से बनने वाली संख्या को उलटने से बने (५९) उनसठ अध्याय हैं इस पर्व में। इसी प्रकार व्योम का अर्थ शून्य, नेत्र अर्थात् दो, हाथ भी दो, एवं अग्नि तीन इन अंकों से बनी संख्या को उलट देने से बने (३२२०) तीन हजार दो सौ बीस श्लोक शल्य पर्व में हैं।

सुषौप्तिक-पर्व-सूची
कवित्त
द्रोणी अभिषेचन उलूक उपदेश निशा,
खड्ग ही तैं द्रौपदी के भ्राता पुत्र मारे हैं।
अठारों हजार शस्त्र अस्त्र ही तैं नाश कीनो,
पांचौं बंधु सेना बाह्य केशव उगारे हैं।
द्रौपदी-विलाप सुनि प्रात नर कीनो नेम,
शत्रु को रु आपको द्वै ब्रह्म अस्त्र टारे हैं।
बाँधि लाये शिखा छेदि विप्र जानि छांडि दियो,
उत्तरा को गर्भ राख्यो कृष्ण काज सारे हैं।।३३।।
अश्वत्थामा का सेनापति बनना, रात्रि को उलूक द्वारा दिये गए उपदेशों के माध्यम से द्रौपदी के भाई और पुत्रों का तलवार द्वारा वध, फिर अपने अस्त्र-शस्त्र द्वारा शेष बचे अठारह हजार योद्धाओं का नाश करना, श्री कृष्ण द्वारा पांचों भाइयों को बचाना, द्रौपदी का विलाप सुन कर अर्जुन का प्रण करना, अश्वत्थामा और अर्जुन को अपने ब्रह्मास्त्रों से लड़ते हुए टालना, फिर अश्वत्थामा को बांध लाना, उसका सिर न काट कर मात्र शिखा काटना और ब्राह्मण जान कर छोड़ देना, उत्तरा के गर्भ की रक्षा करना आदि श्री कृष्ण द्वारा पांडवों के कार्य करना। इन सारी घटनाओं का वर्णन सुषौप्तिक पर्व में वर्णित हैं।

श्लोक-संख्या
दोहा
सर्व पुरान अध्याय हैं, पर्व सुषौप्तिक मानि।
व्योम वार वसु श्लोक हैं, यहै अनुक्रम जानि।।३४।।
सभी पुराणों का सख्या वाचक अर्थ हुआ अठारह, अर्थात् सुषौप्तिक पर्व में अठारह अध्याय हैं। इसी प्रकार व्योम अर्थात् शून्य, वार सात, वसु आठ इन अंकों से बनी संख्या उलटने पर (८७०) हुई। अत: आठ सौ सत्तर श्लोक हैं।

स्त्री-पर्व–सूची
कवित्त
संजय युयुत्सु लेकै आये राजलोकन कौं,
गांधारी कौं कोप जुत व्यास तैं सिरायबो।
तोहू कोप ज्वाल नेत्र पाटी बँधी अधोभाग,
करत प्रनाम धर्म नख को जरायबो।
मरेन के नाम लै लै कहत युधिष्ठिर सों,
सुयोधन माता को विलाप ताप गायबो।
लोह में बनायबो मिलायबो अचक्षु तैं सो,
चूरन दिखायबो रु भीम कौं बचायबो।।३५।।
संजय एवं युयुत्सु का राजलोक (गांधारी, धृतराष्ट्र आदि) को ले कर कुरुक्षेत्र में आना, वहीं क्रोधित गांधारी को व्यास मुनि का सान्त्वना देकर शान्त करना, गांधारी की आंखों पर पट्टी बंधी होने पर धर्मराज के प्रणाम करने पर नीचे देखने में क्रोध-ज्वाल से युधिष्ठिर की अंगुलियों के नखों का जल जाना, मृतकों के नाम ले लेकर युधिष्ठिर को सुनाते हुए विलाप करना, भीमसेन की वज्र की आकृति बना कर धतराष्ट्र की बाँहो में देना, धृतराष्ट्र द्वारा पुतले का चूरा कर देना, इस यत्न से भीमसेन को बचाना आदि वृतान्त स्त्री पर्व में वर्णित है।

श्लोक-संख्या
दोहा
द्वीप नैन स्त्री पर्व में, गिनि अध्याय अनूप।
बाण वार मुनि श्लोक हैं, कहे व्यास कवि भूप।।३६।।
संख्यावाचक संज्ञाओं में द्वीप अर्थात सात, नेत्र-दो और इन अंको से बनी संख्या को उलटने पर बने (२७) अत: सत्ताईस अध्याय स्त्री पर्व में हैं। इसी प्रकार बाण-पाँच, वार-सात, मुनि-सात इन अंकों से बनी संख्या को उलटने से बने (७७५) सात सौ पिचहत्तर श्लोक हैं।

शान्ति–अनुशासन-पर्व-सूची
कवित्त
राजधर्म–दानधर्म-आपत्ति कह्यो है धर्मं,
मोक्ष को जो धर्म शरशय्या के शयन में।
और हू अनेक इतिहास दोनों पर्वन में,
पांच रत्न गीता बिन भीष्म-मोक्ष इन में।
युधिष्ठिर भ्राता–पुत्र-पितामह–गुरु–विप्र,
इनको विनाश देखि ताप घोर तन में।
कृष्ण उपदेश तैं ना व्यास-उपदेश तैं ना,
भीष्म उपदेश ही तैं शीतल भो मन में।।३७।।
धर्मराज युधिष्ठिर को शर-शय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह ने राज्य धर्म, दान-धर्म, आपद-धर्म एवं मोक्ष धर्म का उपदेश किया। इसके साथ ही दोनों पर्वो में कई इतिहासों का वर्णन भी है। पाँच रत्नों वाली कथा में गीता के अतिरिक्त दूसरे चार रलों की कथा कहने पर भीष्म पितामह का मोक्ष होना। भाई, पुत्र, पितामह, गुरु एवं ब्राह्मणों का विनाश देखकर युधिष्ठिर के मन में घोर संताप उठा, जो कृष्ण के उपदेश से नहीं, और न ही व्यास के उपदेश से मिट पाया पर भीष्म पितामह के उपदेश से अवश्य धर्मराज के चित्त में शान्ति हुई। शान्ति एवं अनुशासन पर्वो में यह वृतान्त है।

शान्तिपर्व-श्लोक-संख्या
दोहा
रत्न काल संध्या सहित, शान्ति पर्व अध्याय।
द्वीप व्योम मुनि वेद विधु, श्लोक अनुक्रम गाय।।३८।।
रत्न अर्थात् नव, काल–तीन, संध्या-तीन इन अंको से बनी संख्या को उलटने से बनी (३३९) तीन सौ उनचालीस। इतने अध्याय है शान्तिपर्व में। इसी प्रकार द्वीप अर्थात् सात, व्योम-शून्य, मुनि-सात, वेद-चार और विधु-एक, इन अंकों से बनी संख्या को उलट देने पर हुई (१४७०७) अत: इस पर्व में चौदह हजार सात सौ सात श्लोक हैं।

अनुशासन पर्व-श्लोक-संख्या
दोहा
राग वेद विधु जानिये, अनुशासन अध्याय।
नभ अंबर वसुद्वीप जुत, श्लोक अनुक्रम गाय।।३९।।
राग अर्थात् छ:, वेद-चार, विधु-एक इन अंको से बनी संख्या को उलटने पर बनी (१४६)। अनुशासन पर्व में एक सौ छियालीस अध्याय हैं ऐसा जानिये। इसी प्रकार नभ अर्थात् शून्य, अंबर-शून्य, वसु-आठ, द्वीप-सात, इन अंकों से बनी संख्या को उलटने पर बनी (७८००)। अत: इस पर्व में सात हजार आठ सौ श्लोक क्रम से लिखे गए हैं।

अश्वमेध पर्व-सूची
कवित्त
मरु जज्ञ कथा और चामीकर कोष-लाभ,
परीक्षित जन्म अस्त्र तेज तैं बचायो सो।
अश्व मोक्ष रक्षा जुक्त दीक्षा त्यों युधिष्ठिर की,
सुदर्शन कथा धर्म वैष्णव बतायो सो।
चित्रांगदा-पुत्र बभ्रुवाहन को अद्भुत सो,
विक्रम सुनत लोक विस्मै उपजायो सो।
मख की समाप्ति भये दक्षिणा अनेक द्रव्य,
पायी मन वांच्छित जो जाचबे कौं आयो सो।।४०।।
राजा मरुत के यज्ञ की कथा, युधिष्ठिर को स्वर्ण निधि का मिलना, ब्रह्मास्त्र के प्रहार से बच्चे परीक्षित का जन्म, अश्वमेध यज्ञ के घोड़े का पृथ्वी पर रक्षकों सहित छोड़ा जाना, युधिष्ठिर की यज्ञ-दीक्षा, राजा सुदर्शन की कथा, वैष्णव धर्म का दिग्दर्शन, चित्रांगदा के पुत्र बभ्रुवाहन का अद्भुत पराक्रम सुन कर लोक में विस्मय होना, यज्ञ की समाप्ति पर आए याचकों को मनवांछित दक्षिणा में बहुत से द्रव्य का मिलना आदि वृतान्त अश्वमेध-पर्व में वर्णित है।

श्लोक-संख्या
दोहा
हर चख संध्या चंद्रमा, अश्वमेध अध्याय।
व्योम अयन पुष्कर अगनि, दीन्है श्लोक गिनाय।।४१।।
शिव नेत्र अर्थात् तीन, संध्या-तीन, चन्द्रमा-एक इन अंकों से बनी संख्या उलटने पर बनी (१३३)। अश्वमेध-पर्व में एक सौ तेतीस अध्याय हैं। इसी प्रकार व्योम अर्थात् शून्य, अयन-दो, पुष्कर-तीन, और अग्नि के तीन इन अंकों से बनी संख्या उलटने पर बनी (३३२०)। अत: इस अश्वमेध-यज्ञ पर्व में तीन हजार तीन सौ बीस श्लोक हैं।

व्यासाश्रम पर्व–सूची
घनाक्षरी
भयो निरवेद भूप अचक्षु विपिन गौन,
पृथा सासु स्वसुर सुसेवा काज कियो साथ।
युधिष्ठिर पिताभक्ति पूर्व अदभूत कीनी,
तीजे अब्द भेटिबे कैं गयो लिये राज साथ।
क्षता परलोक व्यास कृपा सबै क्षोहनी के,
मारे बीर मिले जातैं सारे ही भये सनाथ।
दो तैं पृथा युक्त बिना संजय सुन्यो है दाह,
नारद तैं पूछ्यो है विलापि कै सु जोरी हाथ।।४२।।
धृतराष्ट्र का आत्मज्ञान होने पर गांधारी सहित वन-गमन करना, कुंती का अपने सास स्वसुर की सेवा हित साथ गमन, युधिष्ठिर का अपने राजकाज के तीसरे वर्ष में अपने मंत्रियों सहित वन में मिलने जाना, युद्ध में मारे गए अठारह अक्षौहिणी सेना के योद्धाओं का व्यास मुनि की कृपा से परलोक में गति होना, संजय को छोड़ कर कुंती सहित गांधारी और धृतराष्ट्र के अग्नि रहित दाह की बात को युधिष्ठिर का हाथ जोड़ कर नारद मुनि से पूछना आदि वृतान्त व्यासाश्रम पर्व में वर्णित है।

श्लोक-संख्या
दोहा
अयन वेद अध्याय हैं, व्यासाश्रम में देखि।
राग व्योम शर चंद्रमा, गिनती श्लोक विशेखि।।४३।।
अयन अर्थात् दो और वेद के चार, इन दोनों अंकों से बनी संख्या को उलटने पर बनी (४२)। व्यास-पर्व में ये बयालीस अध्याय हैं। इसी प्रकार राग अर्थात् छ:, व्योम-शून्य, शर–पाँच और चन्द्रमा का एक, इन अंको से बनी संख्या उलट देने पर हुई (१५०६)। अत: इस पर्व में एक हजार पाँच सौ छ: श्लोक हैं।

मूसल पर्व-सूची
सवैया
भूसुर शाप के ब्याज तैं कृष्ण, कियो जदुवंश को नाश विचार कै।
शीख लै कृष्ण की वीर धनंजय, कीनौ पयान जदूत्रिय लार कै।
लूटि गई त्रिय आप मर्यो चहै, व्यास की शीख तैं प्रान कौं धार कै।
भ्रात ये जाइ सुनाइ विराग भो, वर्ष छतीस को राज विसार कै।।४४।।
ब्राह्मणों से मिले श्राप को विचार कर श्री कृष्ण का यदुवंश का नाश करना, श्री कृष्ण के सिखाये अर्जुन का यादवों की स्त्रियों को द्वारिका से ले कर हस्तिनापुर को प्रयाण करना, रास्ते में इन स्त्रियों का काबाओं द्वारा लूटे जाने पर अर्जुन का आत्मघात की इच्छा करना पर व्यास के कहने पर प्राण-त्याग न कर युधिष्ठिर के पास आकर हकीकत सुनाना, जिससे छत्तीस वर्ष तक राज्य करने की बात बिसार कर युधिष्ठिर को वैराग्य होना इत्यादि घटनाएं मूसल-पर्व में वर्णित हैं।

श्लोक-संख्या
दोहा
वसु अध्याय मूसल परव, गिनत श्लोक पुनि धारि।
व्योम अयन संख्या सहित, लिखि विपरीत विचारि।।४५।।
वसु अर्थात् आठ अध्याय मूसल-पर्व में हैं और व्योम अर्थात् शून्य, अयन-दो, संख्या-तीन, इन अंकों से बनी संख्या को उलटने से बने (३२०)। अत: इस पर्व में कुल श्लोकों की संख्या तीन सौ बीस है।

महाप्रस्थान पर्व-सूची
दोहा
वज्र नाभ कौं मधुपुरी, अभिमन-सुत पुर नाग।
दै कोटिन निधि द्विजन कौं, चले तुहिन बन भाग।।४६।।
वज्रनाभ को मथुरा का एवं परीक्षित को हस्तिनापुर का राज्य दे कर, उन्होंने ब्राह्मणों को करोड़ों की दक्षिणा दी। तत्पश्चात् पांडव हिमालय के वन-प्रदेश में चले गए। महाप्रस्थान-पर्व के इन अध्यायों में यही वर्णित है।

अध्याय-श्लोक-संख्या
दोहा
सर्व तीन अध्याय हैं, पर्व महा प्रस्थान।
श्लोक तीन सप्त वीश हैं, जाहर कहेउ सुजान।।४७।।
महाप्रस्थान-पर्व में कुल तीन अध्याय हैं और तीनों अध्यायों में तीन सौ सत्ताईस श्लोक हैं। सुजान लोग इसे मान लें।

स्वर्गारोहण पर्व–सूची
कवित्त
चारों भ्रात द्रौपदी को यान में पतन भयो,
युधिष्ठिर व्योम-गंगा न्हाय तन त्याग्यो है।
श्वान-कथा सुयोधन आदि दे कै नाक विषे,
देवदूत गैल बंधु देखवे कौं राग्यो है।
अर्जुन कौं आदि दे कै नरक निवास देखे,
करत विलाप सुनि अद्भुत सो लाग्यो है।
बिचार्यो तहां निवास इन्द्रादिक आय पास,
बतायो विलास नृप सोवत सो जाग्यो है।।४८।।
भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी सभी ने विमान में अपनी देह त्यागी, युधिष्ठिर ने आकाश गंगा में स्नान कर काया छोड़ी, कुत्ते की कथा, युधिष्ठिर का देवदूत को साथ लेकर दुर्योधन आदि बांधवों को देखने स्वर्ग-लोक जाना, अर्जुन आदि को नरक में देख कर विलाप करते हुए मन में आश्चर्य होना, मन ही मन स्वयं का भी वहीं रहने का विचार करना, यह कथा और इन्द्रादि देवताओं द्वारा पास आकर स्वर्ग का वैभव बताना, युधिष्ठिर को वर्णित दृश्य स्वप्नवत लगना इत्यादि वृतान्त स्वर्गारोहण पर्व में वर्णित हैं।

अध्याय-श्लोक-संख्या
दोहा
पूर्ण पांच अध्याय हैं, स्वर्गारोहण मांहि।
श्लोक दोय सत्त हैं सबै, घटती-बढ़ती नांहि।।४९।।
स्वर्गारोहण-पर्व में पूरे पाँच अध्याय हैं और यह कुल दो सौ श्लोकों में वर्णित है। इससे कम-अधिक नहीं।

सर्वाध्याय-सर्व-श्लोक-संख्या
दोहा
काल राग ग्रह चंद्रमा, सर्व पर्व अध्याय।
छँद कर शरधर बाण वसु, बिन हरिवंश गिनाय।।५०।।
काल अर्थात् तीन, राग-छ:, ग्रह-नव, चंद्रमा-एक इन अंकों से बनी संख्या को उलटने पर बनी (१९६३) अत: एक हजार नव सौ तिरसठ अध्याय महाभारत के अठारह पर्वो में हैं। इसी प्रकार हाथ अर्थात् दो, शर-पाँच, धर (पृथ्वी)-एक, क्षण-पाँच और वसु-आठ इन सारे अंकों से बनी संख्या को उलटने से बनी (८५१५२)। अत: पचासी हजार एक सौ बावन श्लोक महाभारत ग्रंथ में है पर इनमें हरिवंश-पुराण के श्लोक नहीं गिने गए हैं।

अढार अक्षोहिणी-पतन
दोहा अष्ठादश अक्षौहिणी, अष्ठादश ही पर्व।
अष्ठादश दिन में कटे, द्वादश बिनु नर सर्व।।५१।।
महाभारत ग्रंथ के अठारह पवों में, अठारह अक्षौहिणी सेना में से बारह गीताओं को छोड़ कर, सारे के सारे योद्धा, अठारह दिनों में मारे गए।

सात अक्षौहिणी-सेनापति
कवित्त
द्रुपद विराटराज मागधेश सहदेव,
घृष्टकेतू चैद्यपति नीके निरधारिये।
युयुधान यदूवंशी पांडय कौशलाधिपति,
एक एक अक्षौहिणी स्वामी ये विचारिये।
कुंतीभोज केकय के पाँचों भ्रात मासी पुत्र,
इनकी युधिष्ठिर की एक कै संभारिये।
सात ही अक्षौहिणी ए पांडव की महासेना,
अष्ट वीर बिना कटि युद्ध में विचारिये।।५२।।
द्रुपदराज, विराटराज, मगधपति सहदेव, चंदेरी का राजा धृष्टकेतु, यदुवंशी युयुधान, कौशल देश का राजा पांडय, ये छ: राजा एक-एक अक्षौहिणी सेना के स्वामी थे। इसी प्रकार कुंतीभोज तथा केकय राज के पाँचों राजकुमार जो युधिष्ठिर के मौसेरे भाई थे उनकी और युधिष्ठिर की मिला कर एक अक्षौहिणी सेना थी। पांडवों की कुल ये सात अक्षौहिणी सेना, मात्र आठ योद्धाओं को छोड़ कर महाभारत के युद्ध में मारी गई। अर्थात् पांडवों की पूरी सात अक्षौहिणी सेना में से मात्र आठ योद्धा जीवित बचे।

ग्यारह अक्षौहिणी-सेना नायक
कवित्त
भगदत्त दैत्यवंश भुरीश्रवा कुरुवंशी,
सल्य मद्रपति बिंद अनुबिंद जूदे जानि।
सिंधुपति बहनेउ जैद्रथ सुयोधन को,
सुदक्षण कांबोजी यवनष्क की सैन्य मानि।
अक्षौहिणी एक कृतवर्मा की ये आठ भई,
तीन घर ही की छोटे मोटे भूपति बखानि।
ग्यारह प्रकार नदी गांजिव की धार बीच,
डूब गई चार बीर बिना सबही की हानि।।५३।।
दैत्यवंशी भगदत्त, कुरुवंशी भूरिश्रवा, मारवाड़ (मद्र) का राजा शल्य तथा विंद और अनुविंद इन्हें अलग से माने। दुर्योधन का बहनोई सिंध देश का राजा जयद्रथ, यवनों की सेना वाला कांबोज देश का अधिपति सुदक्षिण, इन सातों राजाओं की सात अक्षौहिणी सेना और एक अक्षौहिणी कृतवर्मा की सेना मिलाने से कुल आठ अक्षौहिणी सेना हुई। इसके अतिरिक्त दूसरे छोटे-मोटे राजाओं की सारी सेना को मिला कर दुर्योधन की स्वयं के राज्य की सेना सहित तीन अक्षौहिणी सेना थी। कुल मिला कर कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना अर्जुन के गांडीव रूपी नदी की तेज धारा के बहाव में बह गई अथवा डूब गई। सारी सेना में से मात्र चार योद्धा जीवित बचे बाकी तमाम मारे गए।

अश्व-संख्या
दोहा
नभनिधि ग्रह अरु काल वसु, रितु विधु कुरु तुरंग।
व्योम काल रितु महि मुनी, नभ विधु पांडव संग।।५४।।
नभ अर्थात् शून्य की संख्या, निधी-नव, ग्रह-नव, काल–तीन, वसु-आठ, ऋतु-छ:, और विधु-एक इन सारे अंकों से बनी संख्या को उलटने पर बनी (१६८३९९०)। अत: सोलह लाख तिरासी हजार नव सौ नब्बे घोड़े कौरव योद्धाओं के महाभारत युद्ध में थे। इसी प्रकार व्योम अर्थात् शून्य, काल-तीन, ऋतु-छ:, महि-एक, मुनि-सात, नभ-शून्य, विधु-एक, इन अंकों से बनी संख्या को उलटने पर बनी (१०७१६३०)। अत: दस लाख इकहत्तर हजार छ: सौ तीस घोड़े पांडवों की सेना में थे।

सुभट–संख्या
दोहा
व्योम वेद वसु रितु मुनी, द्वीप नयन कुरु वीर।
नभ वसु नभ मुनि रितु मुनी, विधु पांडव रनधीर।।५५।।
गणना हेतु व्योम अर्थात् शून्य, वेद-चार, वसु-आठ, ऋतु-छ:, मुनि–सात, द्वीप-सात, नेत्र-दो इन अंकों से बनी संख्या को उलटने पर बनी (२७७६८४०)। अत: कौरव सेना में सताईस लाख छहतर हजार आठ सौ चालीस योद्धा थे। इसी प्रकार नभ-शून्य, वसु–आठ, नभ–शून्य, मुनि–सात, ऋतु-छ:, मुनि-सात और विधु-एक। इन सारे अंकों से बनी संख्या को उलटने पर बनी (१७६७०८०)। अर्थात् पांडव सेना में यौद्धाओं की संख्या सत्रह लाख सड़सठ हजार अस्सी थी।

हस्ती-संख्या
दोहा
नभ मुनि सर नभ वर्ण द्रग, गज कुरुवंशिन केर।
नभ ग्रह व्योम रु काल सर, चंद्र पांडु गज हेर।।५६।।
नभ अर्थात् शून्य, मुनि-सात, शर–पाँच, नभ-शून्य, वर्ण–चार, द्रग–दो इन अंकों से बनी संख्या को उलटने पर बनी (२४०५७०)। अत: कुरु वंशियों की सेना में दो लाख चालीस हजार पाँच सौ सत्तर हाथी थे। इसी प्रकार नभ अर्थात् शून्य, ग्रह-नव, व्योम-शून्य, काल-तीन, शर-पांच और चन्द्र-एक इन अंकों से बनी संख्या को उलटने पर बनी (१५३०९०)। अर्थात् पांडवों की सेना एक लाख, तिरपन हजार नब्बे हाथियों से सुसज्जित थी।

सारथी-संख्या
दोहा
नभ द्रग ग्रह संध्या बरन, बान वेद दोउ सैन।
सारथि आदिक बीर सब, मरनहार गनि ऐन।।५७।।
नभ अर्थात् शून्य, द्रग–दो, ग्रह-नव, संध्या–तीन, वर्ण–चार, बाण–पाँच और वेद-चार इन सारे अंकों से बनी संख्या को उलटने पर बनी (४५४३९२०)। अत: दोनों सेनाओं में पेंतालीस लाख तियालीस हजार नव सौ बीस सारथी एवं अन्य वीर युद्ध में मरने वाले थे।

वीर-अश्व-हस्ती-सर्व संख्या
दोहा
व्योमाम्बर द्रग काल ग्रह, राग मुनी मिलि होड़।
बीर अश्व गज जोड़ि कहि, दोनों दल की जोड़।।५८।।
व्योम अर्थात् शून्य, अंबर-शून्य, द्रग-दो, काल-तीन, ग्रह-नव, राग-छ:, मुनि-सात, इन सारे अंकों से बनी संख्या उलटने पर बनी (७६९३२००)। अत: कौरवों और पांडवों दोनों की सेना में घोड़े, योद्धा एवं हाथियों की संख्या का योग छहतर लाख तिरानवे हजार दो सौ था।

युद्ध निर्माण-तिथि
कवित्त
त्रयोदशी कार्तिक की पांडुरा प्रभात समै,
प्रारंभ भयो है महा दुस्तर संग्राम को।
सोही मास कृष्ण पक्ष सतमी दिनास्त समै,
बान–सज्जा–सोवन भो गंगापुत्र नाम को।
द्वादशी असूर संध्या, द्रोन को पतन भयो,
चतुर्दशी कर्ण पंथ लीनो निज धाम को।
अमावस्या सल्य औ सुयोधन विनाश भयो,
रात्रि समै नीच काम द्रोणपुत्र वाम को।।५९।।
कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के प्रात:काल में महाभारत युद्ध आरम्भ हुआ। इसी माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी के दिन सूर्यास्त बेला में भीष्म पितामह शर-शय्या पर पोढ़े। इसी माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी के संध्या-समय द्रोणाचार्य मारे गए और दो दिन पश्चात् चतुर्दशी के दिन कर्ण ने अपने लोक (सूर्यलोक) का मार्ग लिया। कार्तिक की अमावस्या के दिन शल्य और दुर्योधन का विनाश हुआ और रात्रि समय में दुष्ट अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पुत्रों को मार डालने का अधम कार्य किया। ऊपर वर्णित तिथियों के अनुसार दस दिन तक भीष्म पितामह, पांच दिन तक द्रोणाचार्य और दो दिन तक कर्ण ने युद्ध का नेतृत्व किया शेष एक दिन में आधा दिन शल्य ने और आधा दिन दुर्योधन ने सेनापति होकर युद्ध किया। इस प्रकार कुल अठारह दिन युद्ध चला।

कवि की क्षमा याचना
दोहा
कविता मैं सूधी करी, प्रकट अर्थ के काज।
मंडन खट अनुप्रास बिन, क्षमा करहु कविराज।।६०।।
कवि स्वरूपदास कहता है कि मैंने स्पष्टार्थ प्रकट करने के हिसाब से सरल भाषा में काव्य-रचना की है। मुझ से इस काव्य में छ: अनुप्रासादि अलंकारों का नियम नहीं सध पाया, इसलिए कविश्वरो ! मुझे क्षमा करना।

पुनर्यथा
दोहा
म्होरा बिगरन दीन पै, अर्थ न बिगरन दीन।
तातैं खट अनुप्रास बिन, क्षमिहहु दोष प्रवीन।।६१।।
मोहरा-मेल (अन्त्यानुप्रास) को बिगड़ने दिया पर अर्थ और तात्पर्य बिगड़ने नहीं दिया। इसी कारण से मैंने अपने काव्य में अनुप्रासों को महत्ता नहीं दी पर यदि अनुप्रास विहीन काव्य को दोषयुक्त गिना जाता हो तो पंडितो ! मुझे क्षमा करना।

दोहा
संस्कृत जे बिगरे सबद, ताकी भाषा होत।
मम कृत पद भ्रष्टहि निरखि, क्षमिहु सुकवि बुधिपोत।।६२।।
संस्कृत के जो बिगड़े हुए शब्द होते हैं, उन की, प्राकृत (देशज) भाषा होती है, इस पर भी यदि मेरे रचे पद्यांशों में काव्य (इस कारण) भ्रष्ट होता जान पड़े तो हे बुद्धि के जहाज रूपी सुकवियो ! मुझे क्षमा करना।

संस्कृत तथा प्राकृत कवि
दोहा
वालमीक रवि व्यास शशि, माघादिक उडुजोत।
भाषा कवि जीगुन कहूं, कहुँ कहुँ करत उद्योत।।६३।।
आदि कवि वाल्मीकि सूर्य रूप हैं, व्यास मुनि चन्द्र सामान हैं, माघ आदि कवि नक्षत्रों (तारों) के ज्योतिरूप हैं। प्राकृत कवि जुगनु की तरह कभी-कभी प्रकाश करने वाले हैं।

शुद्धाशुद्ध शब्द
दोहा
नाम श्रूप ही दास ज्यों, स्वरूपदास को होय।
पार्थ पाथ शब्द हु सबद, भाषा के मत सोय।।६४।।
जिस प्रकार स्वरूपदास का नाम श्रूपदास हो जाता है और पार्थ का पाथ बन जाता है। इसी प्रकार ‘शब्द’ का ‘सबद’ रूप देशज भाषा में हो जाता है। यह देशज भाषा की अपनी प्रकृति है।

पुनर्यथा
दोहा
बिधि बुध बिधु बुधि बंधु बध, बाध वेध ज्यौं बोध।
मात्र बिगरि बिगरे अरथ, श्रूप दास पढ़ शोध।।।।६५।।
विधि (ब्रह्मा) का बुध (पंडित अथवा बुध ग्रह), बिधु (चंद्रमा) का बुधि (बुद्धि), और बंधु (भाई) का बध (प्राण लेना), हो जाता है, इसी प्रकार बाध (पीड़ा) का बेध (बिंधना) बन जाता है यदि मात्राएं बिगड़ें तो अर्थ बिगड़ जाता है। इसलिए कवि स्वरूपदास कहता है शब्द का शुद्ध रूप में ही उच्चारण हो, उसे शुद्ध रूप में पढ़ा जाए। जैसे बिधि का बधि इसमें छोटी ‘इ’ की मात्रा न लगने से ब्रह्मा से बधि (बधिक, हत्यारा) आदि अर्थ होने की संभावना रहती है। इसी प्रकार ‘बंधु’ का ‘बध’ (नाश) अर्थ हो जाता है क्योंकि ‘ब’ पर अनुस्वार नहीं लगा और ‘ध’ को छोटा ‘उ’ की मात्रा नहीं लगी। अत: मात्राएं बहुत महत्वपूर्ण हैं।

कारज पखुरी एक बिन, वारज सो होइ जाय।
बुधजन लेखक दोष कौं, शोधहु चित्त लगाय।।६६।।
‘कारज’ शब्द में ‘क’ वर्ण की पंखुड़ी (‘क’ को ‘व’ लिखना) नहीं लगे तो वह ‘वारज’ शब्द बन जाता है और इस तरह अर्थ भी दूसरा हो जाता है। अत: हे पंडित जनो ! यदि मेरे किसी लिपि-कर्ता का दोष हो तो ध्यान-पूर्वक उसे शुद्ध कर पढ़ना।

लगे पटाम्बर पखुरिया, होत फटाम्बर सोइ।
मात्र वरन विपरीत तैं, अर्थ विपर्यय होइ।।६७।।
यदि ‘पटाम्बर’ शब्द में ‘प’ वर्ग पर अनावश्यक पंखुड़ी लग जाए तो वह “फटाम्बर” शब्द हो जाता है इस प्रकार अर्थ ही उलट जाता है और अर्थ का अनर्थ हो जाता है। इसलिए पूरे मनोयोग पूर्वक लेखन और पठन करना चाहिए।

ग्रंथोद्भव
दोहा
द्रग ग्रह वसु अरु चन्द्रमा, संवत अंक गति वाम।
चैत्र शुक्ल एकादशी, ग्रंथ-जन्म सुख धाम।।६८।।
गणना की उपर्युक्त प्रणाली अपनाते हुए, द्रग अर्थात् दो, ग्रह-नव, वसु-आठ और चंद्रमा-एक इन अंकों से बनी संख्या को उलटने पर बनी (१८९२)। अत: इस ग्रंथ का लेखन काल संवत् १८९२ (१८३५ ई.) के चैत्र माह के शुक्लपक्ष की एकादशी का दिन है। उत्त तिथि को सुख के धाम रूप (यह ग्रंथ कदाचित इस तिथि को सम्पूर्ण हुआ होगा) इस ग्रंथ का जन्म हुआ।

।।इति प्रथम मयूख।।

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