पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – दशम मयूख

।।दशम मयूख।।

भीष्मपर्व

वैशंपायन उवाच
दोहा
द्वैपायन रिख नागपुर, सुत समुझावन आय।
कहत सभा बिच शांतिहित, जो उत्पात लखाय।।१।।
वैशंपायन कहने लगे, हे जन्मेजय! कौरव तथा पांडव जब परस्पर लड़ने को तैयार हुए तभी मुनि वेदव्यास हस्तिनापुर आए और उत्पात देख कर राज सभा में गए। वहाँ वे सुलह शान्ति के लिए धृतराष्ट्र को समझाने लगे।

व्यास वचन
कवित्त
द्यौषचारी कूकै निशा निशाचारी कूकै द्यौष,
बनचारी नग्र नग्रचारी बन धावै हैं।
आम बीच फूलै कंज कंज मैं लगे है केरी,
काल देश वस्तु को विरोध सो लखावै हैं।
बिना पौन तूटै ध्वजा जलै ना आहूति होम,
गृद्धन के झुंड कुरु क्षेत्र ही पै जावै हैं।
होत उतपात क्षत्रिवंश के अदन काज,
कुल को कदन पुत्र क्यों न समुझावै हैं।।२।।
वेदव्यास कहने लगे कि हे राजा धृतराष्ट्र! जो जानवर सामान्यतः दिन को फिरते हैं वे रात्रि-समय किकिया रहे हैं और निशाचर दिन के समय बोल रहे हैं। गाँव में फिरने वाले वन में और वन में विचरण करने वाले गांव की ओर दौड़ रहे हैं। जब आमों पर कमल फूल लगें और कमल पर आम लगें ऐसे समय में देश, काल और वस्तुस्थिति का प्रभाव विपरीत दिखाई देता है। पवन के बिना ध्वजाएं टूटने लगें और यज्ञ में आहुति नहीं जले और गिद्ध पक्षियों के झुंड कुरुक्षेत्र की दिशा में जाने लगे तो समझ लो क्षत्रिय वंश के लिए कुदिन समीप हैं। इसलिए वंश का नाश करवाने वाले अपने पुत्र को आप समझाते क्यों नहीं?

धृतराष्ट्र वचन
दोहा
भवतव्य ऊपर जतन कछु, मेरो चलै न तात।
करिये आप उपाय कछु, सुनौं युद्ध की बात।।३।।
धृतराष्ट्र प्रत्युत्तर में कहने लगे कि हे तात! भविष्य पर मेरा कुछ भी वश चलता नहीं इसलिए अब तो आप ऐसा कुछ करें कि मुझे युद्ध का समाचार शीघ्र सुनने को मिले।

गुप्त प्रगट जुध की कथा, कहिहै संजय तोहि।
देवादिक हू पै प्रबल, जो भवतव्य सु होहि।।४।।
वेदव्यास ने कहा कि हे धृतराष्ट्र! देवताओं पर भी यह भावी (भवितव्य) प्रबल है और वही होता है परन्तु युद्ध की खबर और गुप्त बातें आपको संजय सुनायेगा।

दश दिन बीते जुद्ध के, संजय नृप ढिग आय।
पूछी नृप जैसी भई, तैसी कहत सुनाय।।५।।
इसके बाद युद्ध के दस दिन बीत जाने पर संजय, धृतराष्ट्र के पास आया, तो धृतराष्ट्र ने संजय से युद्ध का हाल पूछा। इस पर संजय ने जैसा घटित हुआ वह हाल राजा को कह सुनाया।

संजय उवाच
छत्रिन को गुरु छत्रधर छत्रि धर्म नर रूप।
सांतनु गंगा तैं प्रभव, गिर्यो पिता तव भूप।।६।।
संजय युद्ध का हाल बताने को बोला कि हे धृतराष्ट्र! क्षत्रियों के बड़े छत्रधारी और धर्म के साक्षात छत्र रूप, नरभूषण शान्तनु और गंगा से उत्पन हुए तुम्हारे पिता भीष्म आज रण-संग्राम में घायल हो कर गिर पड़े।

धृतराष्ट्र
सुनि पितुवध मूर्छित भयो, ह्वै सचेत किय प्रष्ण।
कैसे छल करि मम पिता, कहहु गिरायो कृष्ण।।७।।
पिता का वध हो गया सुन कर धृतराष्ट्र मूर्च्छित हो गए। थोड़ी देर बाद जब उन्हें होश आया तब उन्होंने पूछा कि हे संजय! कृष्ण ने छल-कपट रच कर मेरे पिता को युद्ध में किस तरह ढहाया?

संजय उवाच
कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी, जुध आरंभ सहेत।
मच्छव्यूह भीषम रची, अर्धचंद्र कपिकेत।।८।।
संजय ने उत्तर दिया कि हे धृतराष्ट्र! कार्तिक शुक्ला त्रयोदशी के दिन आरम्भ हुए युद्ध में भीष्म पितामह ने मच्छव्यूह (मछली के आकार की सैन्य जमावट) की योजना कार्यान्वित की और अर्जुन ने जवाब में अर्धचन्द्र (आधे चन्द्रमा की आकृति वाले) व्यूह की रचना की।

पश्चिम पांडव पूर्व कुरु, जुरी सैन्य यह भाय।
मानहु लोप मृजाद कौं, सिंधु मिले दो आय।।९।।
पाश्चिम दिशा (पूर्वाभिमुख) में पांडवों की और पूर्व (पश्चिमाभिमुख) कौरवों की सेनाएं आमने सामने आ खड़ी हुई जैसे अपनी मर्यादा भूल कर दो समुद्र आ मिलें हों। (इसमें वस्तूप्रेक्षा अलंकार है-सं.)

कह्यो युयुत्सू तिहि समय, अग्रज कौं उपदेश।
जाके बल गर्जत नृपति, सैन्य न रहिहै शेष।।१०।।
हे धृतराष्ट्र! इसी समय तुम्हारे पुत्र युयुत्सु ने अपने बड़े भाई (दुर्योधन) को सम्बोधित करते हुए कहा कि हे दुर्योधन! तुम जिस सैन्य-बल पर बड़े गर्व से गर्जना कर रहे हो, इस सेना में से कोई शेष नहीं बचेगा।

भूप जुधिष्ठिर धर्मनिधि, उपदिष्टा जगदीस।
भीम धनंजय भट जहां, है जय विसवा वीस।।११।।
जहाँ धर्म के आगार रूप स्वयं युधिष्ठिर हों, भगवान कृष्ण जैसे उपदेशक (सलाहकार) और सारथी हों और भीमसेन तथा अर्जुन जैसे योद्धा हों, विजय शर्तिया वहीं है।

कहे सुयोधन कटु वचन, मिल्यो धर्म तैं जाय।
अर्ध क्षोहणी सैन्य लै, लियो पार्थ उर लाय।।१२।।
यह सुन कर कुपित हो कर दुर्योधन कडुवे वचन बोलने लगा तो वह युधिष्ठिर से मिल गया। अपनी आधी अक्षौहिणी ले कर उसने अर्जुन को कलेजे से लगा लिया, अर्थात् उन्हें अपने पक्ष का मान कर उनकी ओर से लड़ने को गया।

कहि अर्जून दोउ सैन्य बिच, रथ थापहु यदुवीर।
जौ-लौं जुध करता पुरुष, लखौ मोर सम धीर।।१३।।
तभी अर्जुन ने श्री कृष्ण से कहा कि हे यदुवीर! मैं अपने समान युद्ध करने वाले योद्धाओं को अच्छी तरह देखना चाहता हूं इसलिए आप मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलें।

रथ थापत अर्जुन लख्यो, दोउ अनीक कर ध्यान।
बांधव संबंधी समुझि, डारि दिये धनु-बान।।१४।।
कृष्ण के दोनों सेनाओं के मध्य रथ को स्थापित करने के बाद अर्जुन ने दोनों तरफ खड़े योद्धाओं को ध्यानपूर्वक देखा। फिर उसने अपने भाइयों और सगे- संबधियों को इस प्रकार मरने को तत्पर युद्ध में खड़े देखा तो उसने अपने धनुष- बाण नीचे पटक दिये।

अर्जन उवाच
कवित्त
काके और भतीजे मामे भागनेय साले बंधु,
बहनेउ पितामह गुरु द्विज मारिबो।
रुधिर के भूने भोग कौन ऐसो राज चहै,
यातैं श्रेय मानत हौं भिक्षा अन्न धारिबो।
पुल्कित भये हैं रोम कंपत शरीर मेरो,
विकल हृदय ताकौं कैसे कल पारिबो।
कोउ कहो सूर कोउ कायर असाधु कहो,
ऐसे जीतिबे तैं तो सदैव भलो हारिबो।।१५।।
और तब अर्जुन श्री कृष्ण से कहने लगा कि हे महाराज! यहाँ सामने तो मेरे भाई, चाचा, भतीजे, मामा, भानजे, साले, बहनोई, पितामह, गुरु और ब्राह्मण खड़े हैं, मैं इन्हें कैसे मारूं? रक्त से सने (और रक्त के साथ भूने हुए) ऐसे भोग वाले पदार्थो का सेवन कौन करे? ऐसा राज्य किसे चाहिए जो मेरे ही आत्मीय जनों के रक्त से रंगा हो? इससे तो मैं भिक्षा मांग कर अन्न ग्रहण करना अधिक उत्तम मानता हूं। मेरा रोम-रोम कांप रहा है, मेरा हृदय विकल है। यह जघन्य अपराध कर मैं कैसे चैन पाऊंगा? मुझे कोई शूरवीर कहे अथवा कायर और भले ही असाधु (दुर्जन) कहे, मेरे लिए तो इन स्वजनों को मार कर जीतने से अच्छा है हार जाना। (इसमें अनुज्ञा अलंकार है – सं.)

श्रीकृष्णोवाच
अर्जुन अखंड आतमा को नास माने मत,
पौन तैं सुषत नाहिं आगि तैं न जरिबो।
जल तैं गलत नाहिं छिदै नाहिं शस्त्रन तैं,
व्यापक अद्वैत व्योम को सो चित्त धरिबो।
जीतिबे तैं राज मरै ही तैं लाभ स्वर्ग साज,
क्षत्रि को अनन्य धर्म उत्सव तैं लरिबो।
बारिबो न बरिबो ना गारिबो न गरिबो त्यों,
हारिबो न हरिबो ना मारिबो न मरिबो।।१६।।
श्रीकृष्ण प्रत्युत्तर में अर्जुन को समझाते हुए कहने लगे कि हे अर्जुन! आत्मा अखंड है इसका नाश संभव नहीं। न यह पवन द्वारा सोखी जा सकती है, न अग्रि से जलाई जा सकती है, न पानी से गलाई जा सकती है, न शस्त्रों से काटी जा सकती है। वह आकाश की तरह व्यापक और द्वैत भार से रहित है। ऐसा जान कर अपने चित्त में यह धारण कर। युद्ध जीतने पर राज्य की प्राप्ति होगी और मरने पर स्वर्ग की प्राप्ति, इसलिए उत्साह पूर्वक युद्ध लड़ना ही एक क्षत्रिय का धर्म है। इस अनन्य धर्म के पालन में न जलना है न जलाना, न गलना है न गलाना, न हारना है न हराना और न मरना है न मारना।

खट आतताई
दोहा
अग्निदत्त विषदत्त नर, क्षेत्र दार धन हार।
बहुरि बकारत शस्त्र गहि, अवध वध्य षटकार।।१७।।
सुनो अर्जुन! आग लगाने वाला, जहर देने वाला, जमीन, स्त्री तथा धन का हरण करने वाला और मारने के इरादे से शस्त्र उठाने वाला ये छः प्रकार के काम करने वाले आततायी पुरुषों को चाहे वे अवध्य हों, उन्हें मार देना चाहिए।

कवित्त
प्रथम हलाहल दियो हो भीमसेन जू कौं,
दूजे लाखागेह बीच अग्रि में जराये हैं।
त्रीजे द्रौपदी को अभिमर्षन द्वै बार कीनो,
चौथे सब वैभव के अंग ही छिनाये हैं।
पंचम रसा कौं खोसि बन में पठाय दिये,
छठे आत शस्त्र बंध मारिबे कौं आये हैं।
एक अंग ही तैं वध दोष नहिं कृष्ण कहै,
कुरु षट अंग आतताई तैं अघाये हैं।।१८।।
फिर हे अर्जुन! उन्होने पहली बार भीमसेन को जहर दिया, दूसरी बार लाक्षागृह में तुम सभी को जलाने का उपक्रम किया। तीसरी मर्तबा द्रौपदी का दो बार अपमान किया, चौथी बार तुम्हारा राज्य वैभव हर लिया। पाँचवी बार तुम्हारा सब कुछ छीन कर वनवास में भेजा और छठी बार शस्त्रों से सज्जित हो कर आततायी बन तुम्हें मारने को सामने खड़े हैं। अतः ऊपर बताए छः प्रकार के आततायियों में से एक प्रकार का आततायी भी मारने योग्य है फिर कौरव तो छहों प्रकार के आतताईपन से भरे पूरे हैं। इन्हें अवश्य मारना चाहिए।

ग्यारमें अध्याय दिव्य चक्षु दै दिखायो रूप,
केउ सीस नेत्र पाय केउ भूजाधारी है।
सूर्य चंद्र अग्रि जैसे शस्त्र और भूषन हैं,
दांतन की रेख बीच मरी सैन्य सारी है।
ब्रह्मादिक कोट्यावधि करै हैं प्रशंसा ताकी,
देखिके किरीटी देह दशा कौं बिसारी हैं।
हूजिये प्रसन्न शांति रूप कौ दिखैये देव,
मेरो है निमित्त सबै रचना तिहारी है।।१९।।
कवि कहता है कि गीता के ग्यारहवें अध्याय के वर्णन में श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिव्यचक्षु प्रदान कर, अपना विराट स्वरूप प्रदर्शित किया था। जिसमें कई मस्तक, आखें और असंख्य हाथ धारण कर उन्होंने अपना रूप दिखाया था। इस रूप में सूर्य, चन्द्र और अग्नि जैसे शस्त्र और आभूषण थे और अपनी दंत-रेखा के बीच पूरी सेना को समाई हुई, मरते हुए दिखाई थी। ब्रह्मा आदि करोड़ों देवता जिनकी स्तुति में संलग्न रहते हैं, ऐसा स्वरूप देख कर अर्जुन अपनी सुध-बुध खो बैठा और विनती करने लगा कि हे देव! अब आप, मुझ पर प्रसन हो कर, शान्त स्वरूप दिखाएं। हे प्रभु! मैं तो निमित्त मात्र हूं, यह सारी रचना तो आपकी ही है।

दोहा
गहि अर्जुन गांजीव कौं, कियो एंचि टंकार।
तौलौं नृप पद बिचरिकै, किय पर दल संचार।।२०।।
संजय बताने लगा कि हे धृतराष्ट्र! (गीता के उपदेशों से बोध होने पर) अर्जुन ने गांडीव धनुष उठा कर, उसकी प्रत्यंचा खींच कर, टंकार किया और इसी समय युधिष्ठिर पैदल चल कर शत्रु के खेमे में आए।

भीमादिक बांधव कहत, ए न भरत कुल रीत।
अधिक देखि रिपु सैन्य कौं, आतुर होन अनीत।।२१।।
यह देख कर भीमसेन आदि भाई कहने लगे कि (इतनी उतावली करना) यह भरत वंश की रीति नहीं है, शत्रु सैन्य की संख्या अधिक देख कर इस तरह आतुर होना अनीति है।

कृष्ण कह्यो नृप क्लेव्य ना, कोउ शुभ कारन जात।
भीष्म द्रौन कौं परिक्रमन, करि नृप बूझत बात।।२२।।
यह सुन कर श्री कृष्ण बोले कि हे भीमसेन! राजा युधिष्ठिर कोई कायर नहीं हैं कदाचित वे किसी शुभ कार्य के लिए ही जा रहे हैं। इतने में युधिष्ठिर जा कर भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य की परिक्रमा कर पूछने लगे।

धर्मोवाच
सवैया
तित विष्णुपदीसुत तैं विनती, इति भूप युधिष्ठिर यों गदरावे।
अब जीत रु हार द्वै राउरै हाथ में, जापै कृपा अकृपा सोइ पावै।
घर तैं कर प्रीति किधौं बन तैं, द्विविधा मैं अहोनिश जी अकुलावै।
कुरुभूषण भीषम एक कहो, हम घोर खुदावैं कि काठ मँगावैं।।२३।।
वहाँ गंगा सुत (भीष्म) से राजा युधिष्ठिर स्वयं की वार्ता रूप अनुनय इस प्रकार करते हैं कि हे पितामह! अब जीत और हार दोनों आपके हाथ में है जिस पर आप की कृपा होगी वह आपकी कृपा से विजय को प्राप्त होगा और दूसरा अकृपा से हार को प्राप्त होगा। हम अब अपने राज्य गृह की इच्छा रखें अथवा वनगमन की? इस चिंता में मन अहर्निश व्याकुल रहता है इसलिए हे कुरुवंश भूषण! आप इन दोनों में से एक बात कहें कि हम कब्र खुदवावें कि काठ का जुगाड़ करें? अर्थात् हमें अब मर जाना है कि वन में जाना है?

भीष्मोवाच
दोहा
जो यहां आज्ञा मांगबे, नाहिं आवत कुरुराज।
हम प्रसन्न होवत नहीं, होवत तोर अकाज।।२४।।
भीष्म बोले कि हे युधिष्ठिर! यदि तुम यहाँ आज्ञा मांगने को नहीं आये होते तो हम प्रसन नहीं होते और तुम्हारा अकाज हो जाता।

अब तेरी जय होइहै, गुरुजन देत अशीष।
हम तो कारन जीविका, भये अन्याय अनीश।।२५।।
अब हम तेरे पूर्वज तुम्हें प्रसन्न हो कर यह आशीर्वाद देते हैं कि हे युधिष्ठिर! तेरी जय हो। हम तो अपनी आजीविका के कारण अन्याय पक्ष के सेनापति बने हैं।

धर्मोवाच
जौ लौं भीषम द्रोण दोउ, शस्त्र धरैं जुध न्याय।

तौ लौं इन्द्रादिकन जुत, मेरी जय न लखाय।।२६।।
यह सुन कर युधिष्ठिर कहने लगे कि हे पितामह! जब तक आप और द्रोणाचार्य के हाथों में न्याय पूर्वक उठाए हुए शस्त्र रहेंगे वहाँ तक हमारी तो बिसात ही क्या, इन्द्रादि देवगण भी जीत नहीं सकते।

भीष्मोवाच
भीष्म कहै पूरव त्रिया, तिन्हकौं दैहौं पृष्ट।
मारि बान गांजीवधर, गात करहि मम नष्ट।।२७।।
भीष्म बोले कि हे युधिष्ठिर! मेरी जो पूर्व जन्म की स्त्री है (शिखंडी) कुमार उसके सामने आते ही मैं पीठ फिरा लूंगा और उसी समय गांडीवधारी अर्जुन बाण मार कर मेरी देह को नष्ट कर देगा।

द्रोण उवाच
द्रौण कह्यो अप्रिय वचन, कहिहै सत्य पुकारि।
ताहि सुनत धनु बान सब, दैहौं कर तैं डारि।।२८।।
इसके बाद द्रोणाचार्य ने कहा कि मुझे जब तुम पुकार कर अप्रिय पर सत्य वचन कहोगे, उसे सुन कर मैं अपने धनुष और बाणों को अपने हाथ से गिरा दूंगा।

संजय कथन
सवैया
कबहूँ न लखी न सुनी कह संजय, दान कथा अदभूत नवीनी।
सुरराज के जाचिबे दानि दधीचि भो, वत्र तैं जीतिबै की विधि चीनी।
कुरु पांडव सैन्य जुरी तिहि बेर में, भूप युधिष्ठिर बीनति कीनी।
जिनते लरिबो तिन्है भीषम द्रोण ने, जीव दियो जय आशिष दीनी।।२९।।
संजय बताने लगा कि हे धृतराष्ट्र! दान की ऐसी अद्‌भुत कथा न सुनी न देखी। क्योंकि इन्द्र जब याचना करने आए तब वृत्रासुर को मारने की विधि जान कर दधीचि ऋषि दानी बने थे, परन्तु यह अजीब बात तो तब हुई जब कौरवों और पाण्डवों की सेनाएं आमने-सामने हुईं और युधिष्ठिर ने पितामह भीष्म और द्रोणाचार्य से अनुग्रह की अनुनय की। इस पर दोनों ने अग्रिम रूप से अपने प्राण अर्पण किये और विजय होने की आशीष दी। (इसमें व्याघात मूलक पंचम विभावना अलंकार है-सं.)

दोहा
गुरुजन पै बरदान लै, गयो युधिष्ठिर तात।
घोर भयो द्वै दिवस जुध, तीजे दिन की बात।।३०।।
संजय आगे कहने लगा कि हे तात! सुनों, पूर्वजों (अपने से बड़े) के पास से विजय का वरदान ले कर युधिष्ठिर स्वयं की सेना की ओर आए। इसके बाद दो दिन तक भयंकर युद्ध हुआ और मैं अब आपको तीसरे दिन का वृतांत सुनाता हूं।

कवित्त
संजय कहत एक गांजिव तैं महाबीर,
खांडव प्रजार्यो तहां सुने हैं बखान मैं।
देव-दैत्य-नाग कोट्यावधि तैं लराई उतै,
इतै मेघ बुन्दन रुकाई व्योम थान मैं।
ऐसी चपलाई तापै छाई चपलाई देखि,
तारुन्य पै वृद्ध गंगापुत्र की निदान मैं।
नैन पिता ध्यान मैं ज्यों सारथी अज्ञान मैं त्यों,
बान रहै म्यान मैं पखौवा काटे पान मैं।।३१।।
संजय बताने लगा कि एक गांडीव धनुष से महा शूरवीर अर्जुन ने जब खांडव वन को जलाया उसके बखान मैंने सुने हैं, वहाँ दैत्य, देव और नाग लोक से अनेक प्रकार की लड़ाई चल रही थी, उस समय अर्जुन ने आकाश मण्डल से बरसते बारह मेघों की बूंदों को रोका था। ऐसी जिसकी युद्ध चपलता है उस तरुण अर्जुन पर वृद्ध गंगापुत्र (भीष्म) की चपलता को मैंने देखा, कि अर्जुन की आंखें तो पितामह का ध्यान रखने में लगी हैं और उसके सारथी श्री कृष्ण अजानकार है (क्या हो रहा है से चकित)। कैसे कि अर्जुन के बाण तो तूणीर में भरे रह गये, उसे नया बाण निकालने का अवसर ही नहीं देते हुए भीष्म अर्जुन के हाथ में लिए बाणों का फाल (सिर) काट कर गिरा देते हैं। इतनी चपलता से घनघोर युद्ध में संलग्न है पितामह, इसे मैंने अपनी आखों से देखा।

दोहा
कोई कहै अज्ञान क्यों, स्वयं ब्रह्म कौं होय।
तौ क्यों श्यंदन चक्र कर, धर्यो प्रतिज्ञा खोय।।३२।।
कवि कहता है कि पूर्वोक्त कवित्त के अन्तिम पद में ये कहा गया है कि श्री कृष्ण (अज्ञान मैं त्यौं) अज्ञान में हैं, कोई पूछे कि यह कैसे संभव है कि स्वयं ब्रह्म को अज्ञान हो गया? (इस शंका के निवारणार्थ कहा है) यदि अज्ञान न हुआ होता तो वे स्वयं अपनी की गई प्रतिज्ञा को तोड़ कर रथ का पहिया कैसे उठा लेते?

कवित्त
तीजे द्यौष कुरुवृद्ध शत्रुसैन्य कौं हटाय,
किरीटी कौं आपको पराक्रम दिखायो है।
सारथी महारथी जे दोनौं कृष्ण चक्रित हैं,
प्रेरबे कौं अस्त्र शस्त्र छिद्र नहिँ पायो है।
आगे पीछे सव्य अपसव्य जो निहारे ताकौं,
रथ ना लखावैं सरापंजर यौं छायो है।
आन बीर बान तैं बचैबे प्रान वासवी के,
गंगा पुत्र बान को बितान सो बनायो है।।३३।।
हे धृतराष्ट्र! तीसरे दिन कुरुवृद्ध भीष्म पितामह ने पाण्डवों की सेना को पीछे धकेल कर अर्जुन को अपना पराक्रम दिखाया। सारथी और महारथी जो दोनों कृष्ण नाम वाले कहलाते हैं का चित्त भ्रमित हो कर चक्रवत हो गया। रथ के घोड़े और शस्त्र फेरने का मार्ग उन्हें नहीं मिला। आगे, पीछे, बाएं तथा दाएं चारों ओर से देखने पर अर्जुन का रथ दिखाई नहीं देता क्योंकि अर्जुन के रथ को भीष्म ने सर- पिंजर (बाणों का पिंजरा) बना कर ढक लिया। वह ऐसे कि मानों दूसरे किसी योद्धा ने अर्जुन के प्राणों की रक्षार्थ बाणों का मंडाण किया हो कि जिससे कोई अन्य योद्धा का बाण अर्जुन को नहीं लगे। अर्थात् चारों ओर से छा दिया।

पितामह पारथ के प्रबल प्रहार पेखि,
पार्थिव अनेक एक एक ना अरो रहो।
अर्जन उदार बल अस्त्र को बिसारि बैठो,
वाम पान स्थिरीभूत गांजीव धरो रहो।
पैज कौं निवारि भक्त पैज प्रति पारिबे कौं,
रथ अंग धारि रासि चाबक टरो रहो।
ता छिन बिसंभर वा संमर कौं कीनो कोप,
कम्मर तैं छूटी पीत अंबर परो रहो।।३४।।
भीष्म पितामह और पार्थ के परस्पर प्रबल प्रहार देख कर अनेक पार्थिव (राजा) एक-एक कर कोई सामने नहीं टिक पाया। अर्जुन अपने शस्त्र का बल भी भूल गया और बाएं हाथ में धनुष उठाए स्थिर सा हो गया। अर्जुन की ऐसी दशा देख कर श्रीकृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा भुला कर स्वयं के भक्त (भीष्म) की प्रतिज्ञा पूरी करने हेतु, घोड़ों की रस्सी (लगाम) और चाबुक छोड़ कर, हाथों में रथ का टूटा हुआ पहिया उठा लिया। उस समय विश्वंभर (श्रीकृष्ण) ने युद्ध में इतना कोप किया कि कमर से बंधा उनका पीतांबर खुल कर जमीन पर पड़ गया। अर्थात् इतने आवेशित हुए कि कमरबंध भी खुल पड़ा।

कवि कथन
करी ही प्रतिज्ञा अस्व प्रेरक प्रतोद बिना,
लोह कौं छुवौं न युद्ध आदि किये बानी है।
ताहिकौं बिसारि चक्र श्यंदन को धारि चले,
भीषम पै ताहि बार रसा अकुलानी है।
ताहि समुझाइबै कौं कटि तैं खुलो है पट,
धूजे मति दास की प्रतिज्ञा उर आनी है।
पट को तथाऽभिप्राय बड़े लोक जूंठे परे,
ताको संग छांडि दैनौ नीति की निशानी है।।३५।।
कवि कहता है कि श्री कृष्ण ने युद्ध आरंभ होने के पूर्व में वचन रूप यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं घोड़ों की रस्सी और चाबुक के अतिरिक्त लोहे को छूऊंगा नहीं, अर्थात् कोई भी शस्त्र को हाथ नहीं लगाऊंगा। अपनी इस कही बात को भूल कर रथ का पहिया उठा कर, जब कृष्ण भीष्म पर प्रहार करने चले, उस समय पूरी पृथ्वी व्याकुल हो गई। तब पृथ्वी को समझाने के लिए, कृष्ण की कमर से खुल कर पीतांबर पृथ्वी से कहने लगा कि हे पृथ्वी! तू मत कांप क्योंकि यह तो कृष्ण ने स्वयं के भक्त की प्रतिज्ञा को याद किया है। फिर नीति में कहा गया है कि जब बड़े लोग झूठ को आसरा दे तब छोटे लोगों को उनका साथ छोड़ देना चाहिए। हे पृथ्वी! यही सोच कर मैं उनकी कमर छोड़ कर भूमि पर आ पड़ा हूं। (इस कवित्त में हेतूप्रेक्षा तथा अर्थान्तर न्यास अलंकार है-सं.)

दोहा
आतुर नर रथ तैं उतरि, पकरे हरि के पाय।
यह अन्याय कहा करत हो, दौरत शस्त्र उठाय।।३६।।
श्रीकृष्ण को रथ का पहिया उठाए देख कर अर्जुन तुरन्त अपने रथ से उतर पड़ा और उनके पाँव पकड़ कर कहने लगा कि आप शस्त्र उठाते हैं? यह क्या अन्याय कर रहे हैं?

हरि आतुर लखि भीष्म हँसि, डारि दिये धनु बान।
मैं समीप अब मारिये, तजिये कोप विधान।।३७।।
श्री कृष्ण को इस तरह आतुर हो कर अपनी और दौड़ते देख कर भीष्म ने हँस कर अपने शस्त्र पटक दिये और कहा कि मैं आपके समक्ष हाजिर हूं, आप आएं मुझे मारें और अपना क्रोध ठंडा करें!

आप कही मैं शस्त्र बिन, भूमि हरिहौं सब भार।
हमैं छत्रि का न गिने? बोलहु बचन बिचार।।३८।।
आपने कहा था कि मैं शस्त्र उठाए बिना पृथ्वी का सारा भार हर लूंगा, उस समय पता नहीं क्यों आपने हमें क्षत्रिय न गिना? इसलिए अब भविष्य में जब भी बोलें सोच-विचार कर बोलें।

डारि चक्र हरि हँसि दियो, किय उत्तर ब्रजराज।
तजी प्रतिज्ञा मोर मैं, तोर प्रतिज्ञा काज।।३९।।
भीष्म से यह सुन कर श्री कृष्ण ने रथ का पहिया पटक दिया और हँस कर उत्तर दिया कि हे भीष्म! तुम्हारी प्रतिज्ञा को सच करने के लिए मैंने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी। (इसमें अभिप्रायसूचक अर्थ से उत्रेय उत्तरालंकार है – सं.)

जुद्ध भयो नव दिवस पुनि, घोर परस्पर घात।
कहत पिता तैं तोर सुत, नवम दिवस की रात।।४०।।
पिता भरोसे आपके, मैं धार्यो संग्राम।
चाहत पांडव बिजय तुम, करत अक्रत से काम।।४१।।
संजय ने कहा कि हे धृतराष्ट्र! परस्पर भयंकर घातों-प्रतिघातों सहित युद्ध को नो दिन बीत गए। तब नवमें दिन के युद्ध की समाप्ति के बाद रात को आपके पुत्र (दुर्योधन) ने भीष्म पितामह से कहा कि हे पितामह! मैंने आपके भरोसे युद्ध की ठानी और मोर्चा लिया और आप तो पाण्डवों की विजय चाहते हो। आप यह न करने योग्य कार्य करते हैं। आप से हमें यह उम्मीद नहीं थी।

भीष्मोवाच
छंद पद्धरी
अर्जुन के शर तन कढै भाल, तूं कहत बचन सुत नाटसाल।
सुयोधन सुनहु पूरब वृतांत, इक भयो भूप जुत मद अशांत।।४२।।
रिखन तैं कहत दीजे बताय, मोतैं सँग्राम कोउ जुरे आय।
नर नारायण बद्री निकेत, तिन रिखिन बताये जुद्ध हेत।।४३।।
तिन पै जुध जाच्यो नृप मदांध, शीतल तोउ बोले कृपासिंध।
हम रिखी तपस्या करत लेख, जुध काज और कउ क्षत्रि देख।।४४।।
दुर्योधन के बोल सुन कर भीष्म पितामह कहने लगे कि हे दुर्योधन! अर्जुन के तीखे फाल वाले बाण तो मेरे शरीर में से निकल जाते हैं पर हे पुत्र! तू जो नटसाल (उल्टे रोंएं वाले बाण जो शरीर में धँस के रह जाते हे, उन्हें बाहर खींचने पर वे अधिक गहरे जाते हैं) जैसे वचन बोल रहा है ये मुझे अधिक सालते हैं। हे दुर्योधन! एक पूर्व वृतान्त सुन, कि एक गर्व से भरा क्रोधी राजा था उसने एक बार ऋषियों के पास जा कर कहा कि कोई मुझसे युद्ध लड़े ऐसा योद्धा बताओ। उसकी बात सुन कर ऋषियों ने कहा कि बद्रिकाश्रम में एक नरनारायण है, वह उपयुक्त रहेगा। मंदाध राजा ने ऋषियों के बताए अनुसार बद्रिकाश्रम जा कर युद्ध की इच्छा जताई, उस समय कृपासिंधु नरनारायण शान्त थे, फिर भी बोले कि हे राजा! मैं तो ऋषियों की तरह अपने तप-अराधन में लगा हूं, तू किसी अन्य क्षत्रिय को ढूंढ निकाल।

मान्यो न बचन फिर जुद्ध जाच, नारायण नर तैं कह्यो वाच।
इक अस्त्र उचारन करहु गूढ, मदभ्रष्ट होय यह दुष्ट मूढ।।४५।।
नर सुन हँकार्यो भूमिपाल, ह्वै सावधान सजि शस्त्र जाल।
मंत्र्यो अभल्ल शर कणस मुंज, प्रेर्यो सु रुके सब शस्त्र पुंज।।४६।।
मुख रुके नैन अरु श्रवन घ्रान, सर कण तैं सबके रुके प्रान।
निज सैन्य दुखित लखि प्रणत कीन, युत दया नृपहि रिखि अभय कीन।।४७।।
इतना कहने पर भी मदांध राजा ने उनकी एक न सुनी और फिर से युद्ध करने का हठ ठानने लगा, तब श्रीमन्नारायण ने नर से कहा कि हे नर! एक गुप्त शस्त्र की साधना करो, जिससे यह दुष्ट और मूर्ख राजा जो मदभ्रष्ट हो रहा है वह होश में आए। यह सुनते ही नर ने दकाल दी – हे राजा, तू तेरे शस्त्र समूह के साथ सावधान हो जा। इतना कह कर नर ने मूंज की मंजरी के बिना फाल के बाण को मंत्रित किया और उसे चला कर शत्रु के सारे शस्त्रों को रोक दिया और उसी बाण के सहारे राजा के सारे सैनिकों की आखें, कान, और नासाछिद्रों को रूंध दिया। इस पर सारी सेना ने व्याकुल हो कर राजा की ओर से, ऋषि से अनुनय की तब ऋषि ने दया कर राजा को अभय किया।

भुव भार हरन अवतार धारि, विधि प्रारथना नीके विचारि।
तेइ अजय सुरासुर तैं अनूप, वसुदेवतनय अर्जुन स्वरूप।
प्रन कर्यो न जीतौं तोउ प्रात, तजिहौं रनतीरथ प्रान तात।।४८।।
सुनि गयो सुयोधन आप थान, सुत धर्म आय बंधुन समान।
भीष्म तैं मिल्यो हरि जुक्त भूप, आदरहि पाय आसन अनूप।।४९।।
भीष्म पितामह आगे कहने लगे कि हे दुर्योधन! उन्ही नर-नारायण दोनों ने ब्रह्मा की प्रार्थना पर अच्छी तरह विचार कर पृथ्वी का भार मिटाने के लिए अवतार धारण किया है। वे और कोई नहीं वसुदेव के अनुपम पुत्र श्री कृष्ण और अर्जुन हैं। जो देवों और दानवों से भी जीते नहीं जा सकते हैं। इतना कहने के बाद पितामह ने प्रतिज्ञा करते हुए कहा कि हे पुत्र! मैं कल प्रातः शत्रुओं से जीतूंगा, नहीं तो रणतीर्थ में अपने प्राण त्याग कर दूंगा। इतना सुन कर आश्वस्त हो दुर्योधन अपने स्थान को गया। इसके बाद युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित श्री कृष्ण के साथ भीष्म पितामह के पास आया। भीष्म नें उन्हें उचित आसन दिया।

पुनि कहत पिता तैं जोरि हाथ, सब मरत जात रन मोर साथ।
वह कौन त्रिया जिनतैं जु दीठ, जोरो न आप रन फेरि पीठ।।५०।।
कहि भीष्म शिखंडी कुँवर काज, रिन प्रात समुख मम करहु राज।
तातैं नहिं सन्मुख होऊँ तात, ता समय किरीटी करहि घात।।५१।।
ज्यों कह्यो पिता त्यों कियो व्याज, गांगेय महाबलि हतन काज।
इक एक दिवस दश दश हजार, असवार पयादे कर सँहार।।५२।।
इसके बाद युधिष्ठिर ने पितामह को हाथ जोड़ कर प्रार्थना करते हुए कहा कि हे पितामह! आपके नेतृत्व में मेरी सेना और मेरे साथी युद्ध में मरते जा रहे हैं, कठिन स्थिति है। अब आप कृपा कर बताएं कि जिसको देखते ही आप पीठ फिरा लेते हैं वह स्त्री कौन है? यह सुन कर भीष्म ने शिखंडी कुमार के लिए कहा कि हे राजा! कल सवेरे युद्ध में उसे तू मेरे सम्मुख खड़ा कर देना, इससे मैं पीठ फिरा लूंगा और उस समय अर्जुन मुझ पर वार करे। पितामह ने जैसा कहा उन्होंने वैसा ही किया। महाबली भीष्म पितामह उसी तरह लड़ते रहे और प्रतिदिन दस-दस हजार सवार और पैदल सेना का संहार करते रहे।

दोहा
राजपुत्र इक सहस पुनि, नव सत मत मातंग।
अष्ट सहस मारे रथी, दश दिन बीच अभंग।।५३।।
उन्होंने युद्ध में एक हजार राजपुत्रों, नो सौ मतवाले हाथियों और आठ हजार अभंग (जिनका नाश ना हो) रथियों को, अपने दस दिन के युद्ध काल में मार गिराया।

इरावान अर्जुन तनय, उत्तर शंख रु स्वेत।
तीन पुत्र वैराट के, मरे सु दश दिन हेत।।५४।।
नागकन्या उलूपी से उत्पन अर्जुन पुत्र इरावान तथा विराटराज के पुत्र उत्तरकुमार, शंख और स्वेत आदि पितामह के हाथों युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हुए। दस दिन के युद्धकाल में भीष्म बड़ी वीरता के साथ लड़े।

सतरा सुत तेरे सु नृप, भीमसेन के हाथ।
मरे गये द्वै बार में, भीष्म युद्ध के साथ।।५५।।
संजय बताने लगा कि हे धृतराष्ट्र! भीमसेन के हाथों तुम्हारे सत्रह पुत्र दो बार की झड़प में मारे गए पहले दस दिनों के भीतर ही, जब भीष्म पितामह कौरवों के सेनापति थे।

अग्र शिखंडी कौं कियो, रहो किरीटी पीठ।
पूर्व त्रिया अंबा समुझि, भीष्म बचाई दीठ।।५६।।
युद्ध के दसवें दिन शिखंडी कुमार को भीष्म के सम्मुख लाया गया, उसके पीछे अर्जुन रहा। शिखंडी को पूर्व जन्म की अम्बा समझ कर भीष्म पितामह ने उससे नजर बचाने को, अपनी पीठ फेर ली।

दीठ बचाई देखि नर, मेलि दिये धनु बान।
भये परामुख पित्र कौं, हतिबो पाप पिछान।।५७।।
भीष्म पितामह को इस प्रकार दीठ फिराए देख कर अर्जुन ने अपने धनुष- बाण नीचे रख दिये। यह सोच कर कि परामुख पितामह को इस स्थिति में, धर्मयुद्ध के नियमों के प्रतिकूल मारना, पाप है।

कृष्णोवाच
भीष्म द्रोण अरु कर्ण कौं, बहुरि सुयोधन केर।
मुसकल छल बिनु मारिबो, करि प्रहार हिय हेर।।५८।।
अर्जुन को इस प्रकार देख कर श्री कृष्ण कहने लगे कि हे अर्जुन! भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन को बिना छल के मारना कठिन है, इसलिए मन को कठोर कर बाण चला, प्रहार कर।

लगे बान गांजीव के, इन्द्र बज्र के रूप।
गिर्यो पिता रन भूमि मैं, सर-सज्जासन भूप।।५९।।
श्रीकृष्ण के वचन सुन कर अर्जुन पितामह पर प्रहार करने लगा। जिससे गांडीव के बाण इन्द्र के वज्र रूप हो कर भीष्म को लगे। संजय आगे बताने लगा कि हे धृतराष्ट्र! इससे घायल हो कर तुम्हारे पिता युद्ध भूमि में बाणों की शय्या पर गिर पड़े।

छंद पद्धरी
लखि गिर्यो भीष्म कुरु हीन गर्व, पांडवन आदि रहे घेरि सर्व।
किय आज्ञा भीषम नीर काज, सब लिये कमंडल कुरु समाज।।६०।।
अवलोक्यो भीषम विजय ओर, किय प्रगट गंग हनि बान घोर।
आचमन कियो जलपान आप, मुनि कह्यो करन तैं जुत प्रताप।।६१।।
भीष्म पितामह को युद्ध भूमि में गिरा देख कर कौरवों का हौसला पस्त हो गया पर पाण्डव उन्हें घेर कर खड़े हो गए। फिर भीष्म पितामह ने पानी मांगा तो कौरव कमंडल (जलपात्र) ले कर आए पर भीष्म ने अर्जुन की ओर देखा। इस पर अर्जुन ने एक विकट बाण पृथ्वी पर मारा, जिससे गंगा प्रकर हुई (जलधारा) उससे भीष्म ने आचमन कर जल पिया, उसके बाद पितामह ने कर्ण से कहा।

सुयोधन तोर आधीन बीर, मैं मर्यो करहु अब संधि धीर।
तुम लख्यो तेज गांजीव तात, किय बाण मारि गंगा विख्यात।।६२।।
हे वीर कर्ण! मैं तो अब एक मृतक समान हूं और दुर्योधन तुम्हारे वश में है, इसलिए हे धैर्यवान! अब सुलह करने में फायदा है। पुत्र, तुमने अभी अर्जुन के गांडीव का कमाल देखा है, जो बाण मार कर गंगा प्रकट कर सकता है।

आधीन भूप मम सत्य बात, ततकाल संधि जब करौं तात।
इक देहु मोहि वरदान आप, शस्त्र तैं न मरौं ताके प्रताप।।६३।।
इस पर कर्ण ने कहा कि पितामह! दुर्योधन मेरे वश में है यह बात आपने सत्य कही, मैं अभी तुरन्त सुलह कर लेता हूं पर एक शर्त है कि आप मुझे वरदान दें कि जिसके फलस्वरूप मैं शस्त्र से नहीं मरूं।

मृतलोक किरीटी बिना धीर, वधकर्ता तेरो कउ न वीर।
ऐसी अभिलाषा रहत तोर, तो करहु जुद्ध नृप करम घोर।।६४।।
यह सुन कर भीष्म बोले कि हे धीरज धरने वाले कर्ण! इस मृत्युलोक में अर्जुन के अतिरिक्त तुम्हारा वध करने वाला और कोई योद्धा नहीं पर यदि तेरी यही अभिलाषा है तो फिर एक राजा के भयंकर कर्म रूप में, युद्ध कर।

भीषम ढिग जामिक नर पठाय, अवहार सैन्य दोउ शिविर आय।
संजय कहता है कि हे धृतराष्ट्र! इसके बाद भीष्म पितामह के पास पहरेदार सैनिक छोड़ कर, दोनों दलों के लोग अपने-अपने मुकाम पर गए।

दोहा
करनहि सेनापति कियो, चाहत हो तव पूत।
कर्ण कह्यो द्विज द्रोन छत, यह नहिँ होय अभूत।।६५।।
इसके बाद आपके पुत्र दुर्योधन ने कर्ण को सेनापति बनाना चाहा, इस प्रस्ताव को सुन कर कर्ण ने कहा, जब तक द्रोणाचार्य हैं ऐसा नहीं हो सकता। वही इस पद के अब सर्वाधिक अधिकारी हैं।

भयो द्रोण सेनापती, जुद्ध बनेगो प्रात।
आज्ञा व्है जुध देखिकें, फेर कहौंगो तात।।६६।।
फिर ग्यारहवें दिन द्रोणाचार्य का कौरव सेना का सेनापति बनना निश्चित हो गया। अब कल सवेरे युद्ध होगा इसलिए हे तात! मुझे आज्ञा हो वहाँ जाने की जिससे मैं आपकौ आ कर, युद्ध का आखों देखा हाल सुना सकूं।

तेरी नव अक्षोहिणी, पांच धर्मसुत पास।
रही सु मत तेरे नृपति, व्है हैं बेगहि नास।।६७।।
हे राजा! आपकी नौ अक्षौहिणी और पाण्डवों की पाँच अक्षौहिणी सेना बची है। आपका मत यदि यही रहा तो शेष सेना का नाश भी शीघ्र ही होगा।

धृतराष्ट्र उवाच
कवित्त
जाने अश्व तीस अश्वमेधन के बांधि राखे,
जोते निज रथ ना छुराये गये काहु पै।
राम इकबीस बार नछत्री करैया भूमि,
जुद्ध को सिखैया जुद्ध जीत लीनो जाहु पै।
काशीराज हू की कन्या तीन हू पकरि लायो,
स्वयंवर जीतिकै न जीत्यो गयो ताहू पै।
ऐसो मोर पिता बली जुद्ध के निपात भयो,
सुयोधन मूढ बिजै चाहत है याहु पै।।६८।।
धृतराष्ट्र कहने लगे कि जिसने अश्वमेध यज्ञ के तीस घोड़ों को बांध रखा और अपने रथ में जोते हुए उन्हें, कोई नहीं छुड़ा सका। फिर इकीस बार पूरी पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने वाले परशुराम जिसे शस्त्र विद्या सिखाने वाले थे, और उसी शिष्य ने उन्हें हरा दिया, जो काशीराज की तीन कन्याओं को स्वयंवर में जीत कर हर लाए। ऐसे मेरे पिता धुरंधर महाबली योद्धा, भीष्म का युद्ध में नाश हो गया। वह भी इस भारत को नहीं जीत सके, फिर भी मूर्ख दुर्योधन विजय की इच्छा पाले हुए है।

दोहा
जाहु सूत कुरुक्षेत्र में, पूत न मानत रंच।
जो भविष्य सोइ होइ हैं, कीजे कहा प्रपंच।।६९।।
हे संजय! तुम कुरुक्षेत्र में जाओ, दुर्योधन जरा भी बात नहीं मानता इसलिए जो भविष्य में लिखा होगा वह होगा ही। उसका क्या उपाय है?

।।इति दशम मयूख।।

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