पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – चतुर्दश मयूख

।।चतुर्दश मयूख।।

कर्णपर्व (उत्तरार्द्ध)

दोहा
अर्जुन के द्रष्ट न पर्यो, धर्मपुत्र ध्वजदंड।
कह्यो भीम तैं शोधि करि, कित हैं नृप बलबंड।।१।।
संजय बताने लगा कि हे राजा! दुःशासन के वध के पश्चात् अर्जुन ने रणभूमि में चारों ओर देखा और जब उसे युधिष्ठिर का ध्वजदंड नजर नहीं आया तो उसने भीमसेन से पूछा कि हे भाई! बलवान धर्मराज कहाँ हैं? जाओ उनकी खबर लाओ।

भीमोवाच
मो अरि भर्गल मानिहैं, तुम ही शोधहु तात।
आयो डेरन बीच रथ, लखि नृप चित हरखात।।२।।
यह सुन कर भीमसेन ने कहा कि हे भाई! मेरे जाने से शत्रु यह कहेंगे कि मैं भाग गया इसलिए अच्छा यही रहेगा कि आप ही ढूंढ़ें। यह सुन कर अर्जुन अपने रथ को ले कर डेरे में आया। अर्जुन का रथ आया देख कर युधिष्ठिर का चित्त हर्षित हुआ।

धर्मोवाच
कवित्त
जाके डर ही तैं मोकौं तीन दश संवत्सर,
नीक निद्रा आई नाहिं ताहि मारि आयो तूं।
जाके आगे चार दिगपालन की बिजै नाहिं,
ताहि सूतपुत्र कौं मिटाय यश पायो तूं।
तीन लोक बीच तीन काल मैं न ऐसो कोउ,
तैसो धनुधारी लोक लोक में कहायो तूं।
युधिष्ठिर कहै धन्य भाग है बधाई आज,
सारथी समेत अदभूत जश लायो लूं।।३।।
युधिष्ठिर बोले हे अर्जुन! जिसके डर से मुझे पूरे तेरह वर्ष तक अच्छी तरह नींद नहीं आई, उसे मार कर तू आया। जिसके आगे चार दिग्पाल भी टिक नहीं सकते, उसी कर्ण को मार कर तुमने सुयश कमाया। तीनों लोकों में और तीनों कालों में कोई तेरे जैसा पैदा नहीं हुआ। तेरे जैसा धनुर्धारी सारे लोकों में एक तू ही है। युधिष्ठिर कहने लगे कि इस धन्य अवसर पर तुझे मैं बधाई देता हूं कि तू यह अच्छी खबर ले कर श्रीकृष्ण के साथ यहाँ आया। अपने सुयश को बढाने के लिए बधाई।

अर्जुनोवाच
आपकी ध्वजा को दंड नजर पर्यो न भीम,
नट्यो शत्रुनिंदा तैं निहारिबे कौं आयो मैं।
अब लौं है विद्यमान मारै कर्न सोमकान,
अबी देखि आयो भीमसेन को पठायो मैं।
आपकी कुशल देखि रावरो हुकम पाय,
पायहौं विजय मारि केउ विजै पायो मैं।
इन्द्र को जरायो वन रुद्र कौं रिझायो ऐसे,
नाना युद्ध जीति देवदत्त कौं बजायो मैं।।४।।
धर्मराज के वचन सुन कर अर्जुन कहने लगा कि हे महाराज! आपकी ध्वजा रणभूमि में मुझे दिखाई नहीं दी और शत्रु निंदा करेंगे यह सोच कर जब भीमसेन यहाँ नहीं आया, तब आपको देखने मुझे आना पड़ा। कर्ण तो अभी जीवित है, वह सोमकों के साथ युद्धरत है। अब आपको कुशल पा कर, आपकी आज्ञा ले अब मैं विजय के लिए जाता हूं, जैसे मैंने पूर्व में कई शत्रुओं को परास्त कर विजय पाई है। मैंने इन्द्र का खांडव वन जलाया और युद्ध में महादेव को भी रिझाया है। इस प्रकार कई बार युद्ध जीत कर मैंने अपना देवदत्त शंख बजाया है, वह आपसे छुपा नहीं।

धर्मोवाच
पृथा के प्रसूत तेरो भयो सात द्यौस पाछे,
भई व्योम बानी यो अनाथन कौं पारिहैं।
जीतिहै त्रिलोक अभै करिहै अमर लोक,
या तैं कौन जीतै भूमिभार कौं उतारिहै।
देवबानी मिथ्या भई तूं न कन्या भई काहै? ,
जुद्ध छोरि आयो शत्रु देखि का उचारिहै।
कृष्णादिक और कौं तिहारो धनु सौंपि देहु,
यहां बैठो देखि! राधापुत्र कौं तूं मारिहै।।५।।
अर्जुन की बात सुन युधिष्ठिर कुपित हो कर बोले कि हे अर्जुन! माता कुंती की कोख से तेरा जन्म होने के सात दिन बाद आकाशवाणी हुई थी कि यह जातक (अर्जुन) अनाथों को पालेगा, तीनों लोकों को जीतेगा, देवताओं को निर्भय करेगा, इससे कोई जीत पाएगा नहीं और यह भूमि का भार उतारेगा। वह देववाणी व्यर्थ गई। हे अर्जुन! तू लड़की क्यों न हुआ? तू युद्ध छोड़ कर यहाँ आया, यह देख कर शत्रु क्या कहेंगे? अब तू अपना धनुष कृष्ण आदि किसी अन्य को सोंप दे और यहाँ बैठ कर आराम से युद्ध देख। हमनें भी गलत सोच लिया था कि कर्ण को तू मारेगा!

कविवचन
दोहा
यों सुनि कियो विकोश असि, जेष्ठबंधु बध काज।
कृष्ण कहै शत्रु न निकट, यहै कौन गति आज।।६।।
युधिष्ठिर का कहा सुन कर अर्जुन ने तेश में आकर बड़े भाई को मारने के लिए अपनी तलवार म्यांन से निकाली। यह देख कर श्रीकृष्ण ने कहा कि यहाँ कोई शत्रु भी नजर नहीं आ रहा फिर यह क्या? अर्जुन तूने तलवार क्यों निकाली?

अर्जुन उवाच
कोउ मोकौं सन्मुख कहै, डारि देहु धनु बान।
मेरो नेम अखंड हैं, सद्य हरौं तेहि प्रान।।७।।
श्री कृष्ण के प्रत्युत्तर में अर्जुन ने कहा कि कोई मेरे सम्मुख कहे कि ‘अपने धनुष-बाण फेंक दे’ यह सुन कर मैं तत्काल कहने वाले के प्राण हर लेता हूं। यह मेरा अंखड नियम है।

कहे आपके सुनत सोई, धर्मपुत्र दुर्वाद।
जिय को जय को राज्य को, मिट्यो मोर अहलाद।।८।।
अभी आपके सुनते धर्मराज ने ऐसे दुर्वचन कहे, इससे मेरे जीवन का, विजय का और राज्य का आल्हाद मिट गया।

धर्मराज कौं मारिहौं, रखन प्रतिज्ञा मोर।
फिर मेरो जीवन कहाँ, तजिहौं प्रान बहोर।।९।।
अब मैं अपने प्रण को पालने के लिए धर्मराज को मारूंगा। फिर उनके बिना मेरा जीवन भी व्यर्थ है इसलिए उसके बाद मैं भी अपने प्राण तज दूंगा।

श्रीकृष्णोवाच
कहे धर्म दुर्वाद तोहि, क्रोध बढावन काज।
कोप्यो अर्जुन करन कौं, अवसि मारिहै आज।।१०।।
यह सुन कर श्रीकृष्ण ने कहा कि हे अर्जुन! धर्मराज ने तो तुझे जोश और क्रोध दिलवाने के लिए ये दुर्वचन कहे हैं। उनका सोचना था कि क्रोधित हो कर अर्जुन आज ही कर्ण को मार देगा।

कहे सँमुख दुर्वाद रे, तूं संबोधन नीच।
गुरुजन को बिनु शस्त्र तैं, वद्ध कहत श्रुति बीच।।११।।
फिर भी यदि तुझे तेरा नियम पूरा करना हो तो तू उनके मूँह पर ‘रे! तू!’ ऐसे हल्के संबोधन दे कर दुर्वाद कर ले। क्योंकि ऐसा कहना, अग्रजों का बिना शस्त्र वध करने के समान है, ऐसा वेद (श्रुति) कहते हैं। ऐसा अपमान वध से कम नहीं।

अर्जुन उवाच
कवित्त
जुधि स्थिर तेति ताकौं कहत युधिष्ठिर सो,
आप यों पधारे युद्ध धीरता कहाँ रही।
आप तैं कनिष्ठ क्षात्रधर्म तैं गरिष्ठ भीम,
मोकौं जो कहे तो कहौ वाहू ऐसी ना कही।
आपके अभाग खोयो पिता को विभाग कीनी,
त्याग बंधु चारौं जीति दिशा चार की मही।
रावरी ये भूल होत वंश निरमूल कही,
आपकी कबूल राखि शूल आज लौं सही।।१२।।
श्री कृष्ण की बात सुन कर अर्जुन ने युधिष्ठिर को कहा कि युद्ध में जो धैर्य धारण करे उसे ‘युधिष्ठिर’ कहते हैं परन्तु आप तो यहाँ चले आए फिर युद्ध में आपकी स्थिरता कहाँ रही? अपने से छोटा भीमसेन कि जो क्षात्रधर्म का गौरव रखने वाला है वह मुझे कुछ कहे तो भले ही कहे, पर उसने तो मुझे कुछ भी नहीं कहा। आप के दुर्भाग्य से हमने अपने पिता का हिस्सा खोया और हम चारों भाइयों ने चारों दिशाओं को जीत लिया था पर उसका भी त्याग किया। यह आपकी भूल के कारण वंश निर्मूल हो रहा है। अब तक आपने जो जो कहा उसे स्वीकार कर हम ने आज तक दुःख ही दुःख झेला है।

दोहा
यों कहि ऐंच्यो खङ्ग पुनि, समझि पिता वध पाप।
आपघात कौं कृष्ण कहै, बहुरि करत कहा आप।।१३।।
ऐसा कह कर बिना शस्त्र अग्रज के वध का पाप समझ कर अर्जुन ने आत्महत्या करने के लिए अपनी तलवार वापस निकाली। यह देख कर श्री कृष्ण ने कहा कि हे अर्जुन! अब फिर यह क्या कर रहे हो?

अर्जुनोवाच
भो मोहि अग्रज भ्रात को, बिना शस्त्र बध पाप।
कैसे राखौं देह कौं, आगे प्रेरक आप।।१४।।
प्रत्युत्तर में अर्जुन ने कहा कि मुझे बड़े भाई का बिना शस्त्र वध करने का पाप लगा है, इससे अब मैं अपनी देह को कैसे रखूं? फिर आप जैसा कहें!

श्रीकृष्णोवाच
आप करै यश आपको, आपघात सम साच।
जीवन मृत गनि अपजशी, स्वायंभू मनु वाच।।१५।।
तब श्री कृष्ण बोले कि अपना स्वयं का यश अपने मुँह से करे, वह पूरी तरह आपघात के समतुल्य है, अपयश जैसा है और अपयश वाला जीवन मरने जैसा ही माना जाता है। यह स्वयंभू मनु के वाक्य हैं।

अर्जुन उवाच
छप्पय
एक धनुष गांजीव, विजय किय इंद्र सुरासुर।
एक धनुष गांजीव, प्रगट किय अभय अमरपुर।।
एक धनुष गांजीव, करी दिग्बिजै हतेउ खल।
एक धनुष गांजीव, दलेउ दुर्योधन को दल।।
बिनु सैन्य एक गांजिव धनुष, केउ शत्रु खंडन करिय।
करि कोप सौंपि धनु और कौं, आप कहा इह उच्चरिय।।१६।।
यह सुन कर अर्जुन, युधिष्ठिर से कहने लगा कि मैंने एक गांडीव धनुष से इन्द्र आदि देवताओं और राक्षसों को हरा कर विजय प्राप्त की। मैंने एक गांडीव धनुष से स्वर्ग को निर्भय किया यह प्रसिद्ध हैं। मैंने एक गांडीव धनुष के सहारे दिग्विजय कर दुष्टों को मारा है। मैंने एक गांडीव धनुष से दुर्योधन की सेना का नाश किया है। मैंने बिना सेना के भी एक गांडीव धनुष के सहारे कई शत्रुओं का नाश किया है। इसलिए हे धर्मराज! आप कुपित हो कर मुझे अपना धनुष दूसरे को सोंप देने का कहते हो तो आप ने यह क्या सोच समझ कर कहा?

दोहा
ए सुनि दुर्वच अनुज के, किय नृप बन दिशि गौन।
ताके पद गहि कृष्ण कहि, कह नृप यह गति कौन।।१७।।
छोटे भाई के इस प्रकार के गर्वोक्ति से भरे दुर्वचन सुन कर धर्मराज ने वन की ओर गमन करना शुरू किया तब श्री कृष्ण ने उनके पाँव पकड़ कर कहा कि हे धर्मराज! यह कौन सी गति आपने चुनी है?

धर्मोवाच
मैं दुर्व्यसनी भाग्यहत, दुखदायक कुल केर।
ये नृप हौ मैं तप करिहोँ, भ्रात कहत सत टेर।।१८।।
तब युधिष्ठिर कहने लगे कि मैं भाग्यहीन, दुर्व्यसनी और वंश को दुःख देने वाला हूं। इससे राज्य अब अर्जुन करे और मैं अब प्रायश्चित स्वरूप तपस्या करूंगा। मुझे मेरे भाई ने सही-सही सत्य बात कह दी है।

श्रीकृष्णोवाच
तेरी तेरे बंधु की, मृत्यु बचावन आज।
रखन प्रतिज्ञा विजय की, किये मोर गनि काज।।१९।।
यह सुन कर श्री कृष्ण कहने लगे कि हे धर्मराज! आज आपकी और आपके भाई अर्जुन की मृत्यु को टालने एवं अर्जुन के प्रण को रखने का कार्य मेरा था। यह जान कर मैंने यह किया।

कंठ लगावहु अनुज कौं, मम जुत आज्ञा देहु।
निष्कंटक सब भूमि को, राज विजय जश लेहु।।२०।।
इसलिए हे धर्मराज! अब अर्जुन को गले लगा कर, मेरे सहित उसे युद्ध में जाने की आज्ञा प्रदान करें। और आप विजय यश ले कर शत्रुरहित, सार्वभौम राज्य करें।

धर्मोवाच
धर्मपुत्र कहै आप से, जिनके नाथ कृपाल।
तिनके बिनसै छिनक मैं, क्यौं न विघन के जाल।।२१।।
यह सुन कर धर्मराज ने कहा कि हे कृष्ण! जिस पर आप की कृपा हो, आप जिसके सानुकूल हों, उसके विघ्नों के नाश में क्षण भर का समय लगता है। उसके विघ्न, विघ्न नहीं रहते।

संजय उवाच
मिले परस्पर हर्षरत, ढरत अश्रु दोउ भात।
कहत युधिष्ठिर क्षमहु मम, होहु विजय तव तात।।२२।।
संजय बताने लगा कि हे धृतराष्ट्र! युधिष्ठिर ऐसा कह कर अपने भाई अर्जुन से गले मिले। दोनों की आखों से हर्ष के आंसू ढरक पड़े। फिर धर्मराज ने कहा हे भाई! मुझे क्षमा कर। जा तेरी विजय हो!

कहि अर्जुन मेरी क्षमहु, मात पिता गुरु नाथ।
ऐसे दुर्वच आपकौं, अब लौं कहे न पाथ।।२३।।
यह सुन कर अर्जुन ने कहा कि हे धर्मराज! आप मेरे माता-पिता, गुरु और स्वामी हैं, इसलिए मेरी भूल को आप क्षमा करें। ऐसे दुर्वचन मैंने आज तक कभी नहीं कहे थे।

कै दुर्योधन आपकी, विजय आश मिटि जाहु।
कै राधा कुंता तथा, पुत्र शोक बिललाहु।।२४।।
हे महाराज! अब या तो दुर्योधन की अथवा आपकी विजय की आशा मिट जाएगी और या तो राधा या कुंती अपने पुत्र के शोक में व्याकुल होगी।

कै सुभद्रा अहवात अब, मिटि जैहे ततकाल।
तथा करन की त्रियन कौं, भूषन व्हैहै साल।।२५।।
या तो अब सुभद्रा का सुहाग तत्काल उजड़ जाएगा अथवा कर्ण की स्त्रियों के आभूषण व्यर्थ हो जाएंगे। वे उन्हें पहनने के काबिल नहीं रह जाएंगी।

धारि सुदर्शन कहत हरि, नर तैं मरै न आज।
तो मैं हतिहौं नियम तजि, करन हि कौं तव काज।।२६।।
सुदर्शन चक्र धारण कर श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे धर्मराज! यदि आज अर्जुन से कर्ण नहीं मरे तो तुम्हारे लिए मैं अपना नियम तोड़ कर कर्ण को मार गिराऊंगा।

यों कहि रथ आरूढ भये, भये शुकुन सुखमूल।
अनमित उलकापात जे, कर्न हि कौं प्रतिकूल।।२७।।
ऐसा कह कर श्री कृष्ण और अर्जुन दोनों रथारूढ हुए तब उन्हें सुखदायक अच्छे शकुन हुए और उल्कापात आदि के द्वारा कर्ण को बुरे शकुन हुए।

भीम कहै या समय जो, वीर कपिध्वज होय।
मरै दुष्ट राधातनय, डरै सुयोधन रोय।।२८।।
कर्ण के सामने लड़ते हुए भीमसेन ने अपने सारथी से कहा कि यदि इस समय कपिध्वज (अर्जुन) यहाँ हो तो दुष्ट कर्ण मरे और दुर्योधन डर कर रो दे।

मोर जुद्ध तैं श्रमित यह, भिरे विगत श्रम पाथ।
दुर्योधन की सैन्य सब, अब ही होय अनाथ।।२९।।
अभी यह कर्ण मुझसे लड़कर थका हुआ है और अर्जुन अभी युद्ध से विश्राम पाया हुआ है। इससे वह यदि इस समय कर्ण के सामने लड़े तो दुर्योधन की सारी सेना अनाथ हो जाए। अर्थात् सेनापति रहित हो जाए।

कवित्त
कहे है विशोक नाम सारथी महारथी तैं,
स्यंदन की नेमी तैं भू धूजत धुकात है।
देवदत्त पांचजन्य गांजीव की घोष ही तैं,
सैन्य कौरवी के प्रान पंछी उडि जात हैं।
स्पर्श न कियो है शस्त्र आज लौं मुकुंद अब,
कर्न प्रान कर्षन सुदर्शन सुहात हैं।
महा मेरु कंदर सी देखि ध्वज अंदर त्यों,
मंदरगिरि सो भीम बंदर दिखात है।।३०।।
यह सुन कर विशोक नामक सारथी भीमसेन से कहने लगा, कि जिसके रथ के पहियों की गड़गड़ाहट से पृथ्वी कांपती है। जिनके, देवदत्त और पांचजन्य शंखों की ध्वनि से और गांडीव धनुष की प्रत्यंचा की टंकार से कौरव सेना के प्राण रूपी पंखेरू उड़ जाते हैं। फिर जिन्होंने अब तक शस्त्र को छुआ नहीं उन्ही कृष्ण के हाथ में अब कर्ण के प्राणों को हर लेने वाला सुदर्शन चक्र शोभा दे रहा है। देखो, महामेरू की कंदरा जैसी अर्जुन की ध्वजा में मंदराचल पर्वत जैसा भीमकाय बन्दर (वानरपति) दिखाई दे रहा है।

दोहा
कह्यो सारथी तैं रथी, देहुँ चतुर्दश ग्राम।
यहै बधाई बीच ही, और गजादि इनाम।।३१।।
यह सुन कर भीमसेन ने स्वयं के सारथी विशोक से कहा, कि तेरी इस बधाई के बदले में, मैं तुझे चौदह ग्रामों की जागीर देता हूं और दूसरे हाथी वगैरह पुरस्कार स्वरूप देता हूं।

संजयोवाच
जुरे कर्न अर्जुन जबहि, कुटिल दृष्टियुत क्रुद्ध।
ढांक्यो व्योम विमान तैं, सुरन निहारत जुद्ध।।३२।।
संजय कहने लगा कि हे राजा धृतराष्ट्र! रणभूमि में आ कर जब अर्जुन कुपित हो कर कर्ण से भिड़ा तो दोनों योद्धा एक दूजे को खा जाने वाली दृष्टि से देखते हुए, घमासान युद्ध में संलग्न हो गए। उस समय आकाश को देवताओं के विमानों ने ढक लिया, सारे देवता इस युद्ध को देखने लगे।

शल्योवाच
जो व्हैहै कपिकेतु कौं, करन मरन विधि कोय।
तो हतिहौं कपिकेतु कौं, मैं सेनापति होय।।३३।।
इतने में शल्यराज ने श्री कृष्ण से कहा, कि यदि अर्जुन द्वारा किसी प्रकार कर्ण मारा गया तो मैं उसकी जगह सेनापति हो कर अर्जुन को मारूंगा।

श्रीकृष्णोवाच
जो कदाचि कर करन के, होय धनंजय पात।
करिहौं शत्रु अजात कौं, शिघ्र हि शत्रु अजात।।३४।।
यह सुन कर श्री कृष्ण ने कहा, कि यदि कर्ण के हाथ से अर्जुन मारा गया तो मैं अजात शत्रु (युधिष्ठिर) को शीघ्र ही शत्रुरहित कर डालूंगा।

संजय उवाच
हत्यो विजय वृषसेन कौं, पितु समीप करि क्रोध।
करन करन कौं प्रथम ही, पुत्रशोक को बोध।।३५।।
संजय कहने लगा कि हे धृतराष्ट्र! उसके बाद अर्जुन ने कर्ण को पुत्र शोक का बोध करवाने के लिए क्रोध कर, पिता के पास लड़ रहे उसके पुत्र वृषसेन को मारा।

छप्पय छंद
इतै कृष्ण सारथी, उतै मरुदेश नरेश्वर।
इत गांजिव टंकार, उतै धनु विजय शब्द कर।
इत ध्वज कपि की गर्ज, उतै गज कक्ष भयंकर।
इत उत स्वेत हि अश्व, इतै इंद्रादि सकल सुर।
उत भानु आदि तमयोनि सब, इच्छत विजय विवादरत।
इन बीच असंभव जय उभय, कितेक लखि ऐसे कहत।।३६।।
इधर (अर्जुन की तरफ) श्री कृष्ण सारथी हैं और उधर (कर्ण के) मद्रराज शल्य सारथी हैं। इधर गांडीव धनुष की टंकार होती हैं तो उधर विजय नामक धनुष आवाज करता है। इधर की ध्वजा में कपिराज की गर्जना है और उधर (कर्ण) की ध्वजा में हाथियों की कमर कसने वाली डोरी का चिन्ह है। इधर और उधर दोनों ओर रथों में श्वेत अश्व जुते हुए हैं। इधर इन्द्रादि देव और उधर सूर्य तथा तमयोनि (पितृगण) देव हैं जो इस युद्ध में अपने-अपने की विजय के आकांक्षी हैं। इस युद्ध को देख कर कई लोग तो यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि जीत किसकी होगी?

इत अभिमन दुख दुसह, उतै वृषसेन दुसह दुख।
इत द्रुपता दुर्वाद उतै वधु बंधन की रुख।
करि समरन जुत क्रोध, चले गन बान भयंकर।
नभ आच्छादित भयो, कटत दोउ सैन्य वीरवर।
इहै महारथी दोउ सारथी, भये बसंत पलास सम।
कहै देव किरीटी पूर्ण धन, करन धन्य कोउ कहत इम।।३७।।
इधर अभिमन्यू के मरने का दुःसह दुःख है, उधर वृषसेन के मारे जाने का दारुण दुःख है। इधर द्रौपदी को कहे दुर्वाक्यों और उधर भाइयों की पत्नियों के वैधव्य का रोष। इस प्रकार दोनों ओर दुःख को याद कर-कर उपजे क्रोध में दोनों वीरों के बाणों के समूह चलने लगे जिससे आकाश छा गया और दोनों ओर की सेनाओं के योद्धा कंपायमान हो उठे। दोनों ओर के सारथियों और महारथियों के अंग बसन्त ऋतु के पलाशों की तरह आरक्त हो उठे। अर्थात् लहूलुहान हो गए। देवता मन ही मन अर्जुन को धन्य कहने लगे और इसी प्रमाण में कोई-कोई देव कर्ण के युद्ध की सराहना करने लगे।

दोहा
ना भूतो न भविष्यती, ऐसो अद्भूत युद्ध।
इतै इन्द्रसुत बढत त्यों, बढ़त भानुसुत क्रुद्ध।।३८।।
संजय कहने लगा कि हे धृतराष्ट्र! ऐसा अद्‌भुत युद्ध न पहले कभी हुआ और न भविष्य में होने की संभावना है। कभी आवेश में अर्जुन आगे बढ़ता है तो कभी कर्ण क्रोध कर आगे बढ़ता है।

दूजे दिन रिन करन को, तीजे दिन सुत गंग।
चौथे दिन द्विज द्रौन को, अद्‌भुत जुध तिहुँ अंग।।३९।।
इस रणभूमि कुरुक्षेत्र में दूसरे दिन का कर्ण का युद्ध, तीसरे दिवस का भीष्म का युद्ध और चौथे दिवस का द्रोणाचार्य वाला युद्ध, ये तीन दिन के युद्ध तो अद्‌भुत ही कहे जाएंगे।

जुरे करन अर्जुन तहां, दोनों सैन्य बिहाल।
होत जथा दोय गज भिरत, कदली को क्षय काल।।४०।।
संजय आगे कहने लगा कि हे राजा! कर्ण और अर्जुन जब आमने-सामने लड़े तब जिस प्रकार दो मदोन्मत हाथियों की लड़ाई में केलों के वृक्षों का क्षय होता है उसी प्रकार दोनों ओर की सेनाओं का नाश होने लगा।

कवित्त
अरि को समूह घर घर को मिल्यो है सैन्य,
ताके बीच डर को न लेश जाके पर को।
वर को प्रभाव है कि नर को प्रभाव है कि,
सर को प्रभाव कै प्रभाव उभै कर को।
जेते अवनीश दीस परे ते न दीस परैं,
बीस बीस पैंड लौं बिजोग सीस धर को।
कैसो पाको व्हैसो पौन गौन तैं अनैसो होत,
ऐसो रन जैसो बन तार-नारियर को।।४१।।
घर ही घर के शत्रु समूह की सेना आपस में भिड़ी हैं जिसमें किसी को दूसरे का अंशमात्र भी डर नहीं। अभी यहाँ या तो वरदान का प्रभाव है, या फिर अर्जुन का, या फिर बाणों का प्रभाव है या उसके हाथ का प्रभाव है, कि पहले जितने शत्रु राजा रणभूमि में दिख रहे थे उतने अभी नहीं दिखाई दे रहे? और धड़ तथा मस्तक के बीच बीस-बीस कदम की दूरी दिखाई देती है। युद्ध कैसा हो रहा है? पूरी तरह से इसे यों समझा जा सकता है कि जैसे नारियल और ताड़ के वृक्षों पर से तेज अंधड़ के मारे पके फल तड़ा-तड़ गिरते हैं उसी तरह योद्धाओं के सिर कट कर धड़ से दूर गिर रहे हैं।

गांजीव की घोष देवदत्त रथ-नेमिन की,
स्त्रवे गुदा मेढ्य सुने वाहन तितै तितै।
रवि के उदै सो नर आगम तै तारागन,
भिरिबे कौं शूरवीर भासत कितै कितै।
बान दोनों हाथ को प्रयान यदुनाथ को त्यों,
भजे कुरु साथ तेज पाथ को चितै चितै।
ज्ञान भूलि जावैं लाभ हानि भूलि जावैं केते,
प्रान भूलि जावैं बान लागत जितै जितै।।४२।।
गांडीव धनुष, देवदत्त शंख और रथ के पहियों की ध्वनि सुन कर शत्रुओं के घोड़ों और हाथियों के मलद्वार तथा मूत्रद्वार स्त्रवित हो कर टपकने लगते हैं। सूर्योदय की तरह अर्जुन के रणभूमि में आने से तारों के समूह रूपी सामने के शत्रु योद्धा कहीं-कहीं नजर पड़ते हैं। अर्जुन का दोनों हाथों से बाण चलाना और कृष्ण की तरह रथ हांकना देख कर कौरव सेना के दल भाग रहे हैं और अर्जुन के पराक्रम का स्मरण कर-कर भय से आहत हो कर गिर रहे हैं। जहाँ-जहाँ अर्जुन के बाण लगते हैं वहाँ-वहाँ अच्छे- अच्छे सूरमा अपना भान भूल जाते हैं, कितने ही योद्धा तो अपना हानि-लाभ भी बिसर जाते हैं और कुछ अपने प्राणों को भी भूल जाते हैं अर्थात् जीवित भी हैं कि नहीं? यह भी भूल जाते हैं।

कौरवी हमारी सैन पांडवी मिटाय दैहै,
कायर कौं मारै नाहिँ शूरन पै क्रुद्ध हैं।
बाल काल ही तैं दुर्योधन कौं चाहै हम,
बाल काल ही तैं याके पन तैं विरुद्ध हैं।
आगे जे बढैंगे पीछे सुजस पढैंगे कवि,
केते ह्वे कढैंगे भूमि जुद्ध तैं निरुद्ध हैं।
किरीटी भिरे तैं आंख स्वप्न की सी खुलि जात,
क्रुद्ध है विरुद्ध है निरुद्ध है न जुद्ध है।।४३।।
कौरव सेना के कई वीर कहने लगे कि ‘हमारी कौरव सेना पाण्डवों की सेना को मिटा देगी! कि हम कायरों को मारते नहीं पर शूरवीरों को मारेंगे ही! कि हम बाल्यावस्था से ही दुर्योधन को चाहते आए हैं और बाल्यावस्था से ही हम अर्जुन के पक्ष के विरुद्ध हैं! इस युद्ध में जो हमारे सामने आगे बढ़ेगा, पीछे से उसका यश कविजन करेंगे और जो युद्धभूमि से निकल जाएंगे उन्हें अपने सुयश से कवि भी निकाल देंगे!’ परन्तु ऐसे बड़बोले शूरवीर जब अर्जुन से भिड़ते हैं तब उनकी स्थिति ऐसी होती है जैसे सपना देखते-देखते उनकी आंख खुल गई हो और वे कहते जा रहे हों कि यह केवल क्रोध, विरोध, कि निरोध नहीं यह तो सचमुच युद्ध है।

कमल के दल हू से कोमल जुगल कर,
जुद्ध बेर प्रबल कठोरता विचित्र है।
अर्जुन है एक तथा अर्जुन अनेक जैसे,
जुरै शत्रु जेते कौं लखावै जत्र तत्र है।
भाथन तैं शत्रुन मैं शत्रुन तैं भाथन मैं,
हाथ शिशुभार चक्र इखू ज्यों नखत्र हैं।
पत्रिन के प्रेरिबे तैं सव्य अपसव्य दोनों,
शत्रुपति पितृलोक प्रेरिबे के पत्र हैं।।४४।।
अर्जुन के दोनों हाथ सुकोमल कमल के पत्रदल जैसे हैं परन्तु युद्ध के समय वे ही हाथ वज्र के समान कठोर हो जाते हैं यह बड़ी विचित्र बात है। अर्जुन यों तो एक ही है पर जितने भी शत्रु लड़ रहे हैं उन्हें अनेक लगता है। अर्जुन के हाथ में पकड़ा हुआ धनुष, शिशुभार चक्र (जिसके आधार पर नक्षत्र घूमते हैं वह) के जैसा है और बाण नक्षत्रों की तरह चलायमान हैं, जो तूणीर से शत्रुओं में जाते हैं और शत्रुओं से लौट कर वापस तूणीर में आते हैं। अर्जुन के दाएं और बाएं हाथ से जो जो बाण छूटते हैं वे सभी जैसे अर्जुन की भेजी पत्रिकाएं न हो कर मानों शत्रुओं के पितृलोक में खबर देने वाली पत्रिकाएं हों। अर्थात् अर्जुन उन्हें वहाँ खबर भेज रहा हो कि तुम्हारा वंशज तुमसे मिलने अभी आने वाला है।

नाव निज सैन्य, लाभ भूमि रत्न लैन प्रेरि,
शत्रु-सैन्य-सिंधु मैं प्रवेश नैक पाये हैं।
युधिष्ठिर साह, वासुदेव से मलाह पाय,
तिनकी सलाह विघ्न-वृंद कौं मिटाये हैं।
त्रयोदश द्यौस बीच तरे सिंधु तीजो भाग,
पांच द्यौस बीच दोय भाग कौ न धाये हैं।
पुत्र के मरे तैं कोप पौन भो प्रचंड यातैं,
सव्य-अपसव्य वर्धमान से लखाये हैं।।४५।।
पाण्डवों ने पृथ्वी रूपी रत्नों का लाभ लेने के लिए स्वयं की सेना रूपी नाव को शत्रु-सैन्य रूपी समुद्र में चला कर थोड़ा सा प्रवेश लिया है। इस नौका में युधिष्ठिर जैसा शाह (व्यवसायी) है और श्री कृष्ण रूप खेवटिया है। जिनकी सलाह से कई विघ्नों को तो मिटा डाला है फिर भी तेरहवें दिन तक वे समुद्र का तीसरा भाग ही पार कर पाए हैं। शेष रहे पाँच दिनों में वे पूरा समुद्र नहीं तैर पाएंगे ऐसा लगता था पर पुत्र के वध के स्मरण से कोप रूपी प्रचंड पवन प्रकट हुआ है इससे अर्जुन के दोनों हाथ बायां और दायां, चप्पु जैसे वर्धमानक दिखने लगे हैं। कोप के पवन के सहायक बनने से अर्जुन के हाथ (चप्पु) आसानी से तेज-तेज चलने लगे हैं, यह आशय है।

छंद पद्धरी
करि क्रोध जुर्यो रिन सूतपुत्र, त्रसि सैन पांडवी जत्र तत्र।
करन प्रति लरन हित भिरत केक, उनके न शरन बिन मरन एक।।४६।।
शर बरन बरन कर छुटत सोय, जुत परन धरन बिच मगन होय।
जुध तरनि लखत थित धरनि ओर, सुत अरुन उतै नर भिरन घोर।।४७।।
संजय बताने लगा कि हे धृतराष्ट्र! इसके बाद कर्ण भी क्रोधित हो कर रणभूमि में लड़ने लगा और पाण्डवों की सेना कांपने लगी। कितने ही योद्धा कर्ण के सामने लड़ने के लिए टक्कर तो लेते हैं पर उन्हें मृत्यु के अतिरिक्त कहीं शरण नहीं मिलती। कर्ण के हाथों तरह-तरह के पंख वाले बाण छूटते हैं, वे शत्रुओं के धड़ों में गर्क हो जाते हैं। सूर्य पुत्र कर्ण और अर्जुन भयंकर युद्ध में संलग्न हैं, जिसे देखने को ऊपर आकाश में थोड़ी देर के लिए सूर्य भी ठहर गया है।

लखि करन चपलता अरिन मध्य, तव पुत्र विजय मानी प्रसिद्ध।
परि करन बान तैं करिन त्रास, चिक्करत भजत केउ होत नास।।४८।।
त्यों भीमसेन तव गज अनेक, शिशुमार बीच प्रेरे कितेक।
दुखहरन सखा जदुपति दयाल, केउ बार बचायो नर कृपाल।।४९।।
शत्रुओं में कर्ण की युद्ध चपलता देख कर, हे धृतराष्ट्र! तुम्हारे पुत्र (दुर्योधन) ने स्वयं की जीत पक्की समझ ली। कर्ण के बाणों से हाथियों में भी भय व्यास हो गया। इससे कुछ हाथी चिंक्कार कर भागने लगे हैं और कुछ उसी जगह ढेर हो रहे हैं। पर उधर भीमसेन ने भी तुम्हारे कुछ हाथियों को उत्तर दिशा से हो कर अंतरिक्ष में फेंक दिया। फिर हे महाराज! दुःख को मिटाने वाले अर्जुन के मित्र कृपालु यदुपति ने इस चलते युद्ध में कई बार अर्जुन को बचा दिया।

दोहा
खांडु जरत अहि बचि गयो, निगलि उडी तिहि मात।
एक जानि इक बान की, घात भई भई पात।।५०।।
पहले जब अर्जुन ने खाण्डव वन को जलाया था, उस समय वन में से एक सर्पिणी उसके पुत्र को गले में निगल कर उड़ गई। उसे अर्जुन ने एक सर्पिणी ही समझ कर, एक बाण मार कर उसके घाव कर दिया। उससे उस सर्पिणी का तो नाश हो गया पर वह सपोला बच गया था।

कवित्त
सोई बैर यादि किये कर्न बान व्यापक भो,
आगे थो अमोघ याके तेज तैं विशेष भो।
कर्न बिन जाने ताको कियो हैं सँधान देखि,
हाहाकार भूमि अंतरीक्ष देश देश भो।
जार्यो कंठ देश कृष्ण मचक लगाई अश्व,
गिरे भूमि बीच नर सीस पै प्रवेश भो।
जोर्यो है किरीट कटि रतन जर्यो है ताके,
विष तैं जर्यो है भै किरीटी कौं न लेश भो।।५१।।
संजय बताने लगा कि हे राजा! अपना पुराना वैर याद कर वह सर्प कर्ण के बाण में बैठ गया। एक तो कर्ण का बाण सत्य था (शत्रु को मारे बिना लौटता न था) और सर्प की उपस्थिति में वह विशेष अर्जित बल वाला हो गया। कर्ण ने बिना यह जाने उस बाण का संधान किया। यह देख कर पृथ्वी से लगा कर आकाश तक हाहाकार मच गया। कर्ण ने उसे अर्जुन के कंठ का निशाना बना कर चलाया परन्तु महाचतुर सारथी श्री कृष्ण ने यह देख कर अपने घोड़ों को दबाया, घोड़े पृथ्वी पर सपाट हो गए और वह तीर अर्जुन के सिर से हो कर निकल गया और वह स्वयं झटके से पृथ्वी पर आ रहा। बाण की झपट अर्जुन के मुकुट को लगी और उसमें जड़े रत्न पर बाण के सर्प की फूंक लगी, इससे मुकुट नीचे गिरते ही जल गया और अर्जुन का कुछ नहीं बिगड़ा।

दोहा
पुनि तूनीर प्रवेश करि, बोल्यो कर्न! सँभारि।
सांधहु तव मम शत्रु पै, लेहुँ प्रान निकारि।।५२।।
थोड़ी देर बार वह सर्प वापस कर्ण के तूणीर में प्रवेश कर कहने लगा हे कर्ण! ले मुझे फिर से तेरे और मेरे शत्रु पर संधान कर, जिससे मैं उसके प्राण हर सकूं।

कर्न कहै तुम कौन सोइ, कहत सर्प मोहि जान।
लेन वैर मम मातु को, आयो समय पिछान। ५३।।
तब कर्ण ने पूछा कि तू कौन है? यह सुन कर उसने कहा कि मैं सर्प हूं यह जान और अपनी माता की मृत्यु का बदला लेने हेतु यह उपयुक्त समय पा कर आया हूं।

कर्ण उवाच
कर्न जोर लै और को, जुध न करै अहिराज।
कपट बान जोरै नहीं, शत अर्जुन वध काज।।५४।।
यह सुन कर कर्ण ने कहा कि हे सर्पराज! यह कर्ण दूसरे का बल या सहारा ले कर युद्ध नहीं करता। ऐसा वह अर्जुन करता है, फिर भी कर्ण ऐसे अर्जुन को मारने के लिए कपट बाण नहीं छोड़ेगा।

जग बिच प्यारे दार-सुत, तिन तैं प्यारे प्रान।
प्रानन तैं जश मोहि प्रिय, स्वामि हि धर्म समान।।५५।।
मनुष्य को जगत में स्त्री तथा पुत्र प्यारे होते हैं उनसे भी प्यारा स्वयं का प्राण होता है पर मुझे अपने प्राणों से भी अधिक अपना यश और स्वामिभक्ति प्रिय है।

जय जिय रक्षा कवच अरु, कुंडल जश के काज।
दिये तबहि द्विज रूप धरि, जाचत भो सुरराज।।५६।।
मैंने अपने यश की खातिर जीवन ओर विजय की रक्षा करने वाले कवच और कुंडल तक इन्द्र को दे डाले, जब वह ब्राह्मण वेष में मेरे पास मांगने आया।

संजय उवाच
इह सुनि अहि शर रूप करि, लेन कपिध्वज प्रान।
चल्यो सु हरि उपदेश तैं, नर छेद्यो खट बान।।५७।।
संजय बताने लगा कि हे धृतराष्ट्र! यह सुन कर सर्प स्वयं बाण का रूप धर कर अर्जुन की ओर उसके प्राण लेने चला, उसे श्री कृष्ण के कहने से अर्जुन ने अपने छः बाणों से बेध डाला।

कर्न गरु द्विज श्राप तैं, ब्रह्म अस्त्र रथ भ्रष्ट।
उतर्यो चक्र निकार कौं, कृष्ण कह्यो करि नष्ट।।५८।।
इसके बाद कर्ण गुरु और ऋषि के शाप से ब्रह्मास्त्र की विद्या भूल कर तथा रथ भ्रष्ट हो रथ से, अपने रथ के पहिये को निकालने के लिए उतरा, इतने में श्री कृष्ण ने कहा कि हे अर्जुन! अब तू कर्ण का नाश कर!

श्र्लोक
निमग्ने रथचक्रे तु, कर्णस्य पृथिवीपतेः।
तं केचिद्यागते काले, इत्यूचुःस्म किरीटिनं।।५९।।
मा कर्णान्त धनुर्मुर्वी, कर्षयं कर्ण नालिकै।
कुरुणां कुल कर्णोसि, त्वं कर्णे करुणां कुरु।।६०।।

यथा दोहा
कर्ण रथांङ्ग निमग्न तैं, भो प्रज्ञाचक्ष भूप।
कितने पुरुष किरीटि कौं, कहत भये यह रूप।।६१।।
मति धनुज्या कर्णांत लौं, ऐंचहु घोर सबान।
कर्ण विषे करुणा करहु, तू कुरुभूषन भान।।६२।।
संजय आगे कहने लगा कि हे राजा! कर्ण का रथ चक्र पृथ्वी में धँस गया। इस समय सेना के कई योद्धा अर्जुन से कहने लगे कि हे अर्जुन! तू भयंकर बाण के साथ अपने गांडीव की प्रत्यंचा को अपने कान तक मत खींच, कुरुवंश का तू भूषण रूप सूर्य है, इसलिए कर्ण पर कृपा कर।

वद्ध करन अकरन समुझि, तजे पाथ धनु बान।
कृष्ण कहत हत शत्रु कौं, देखत कहा अज्ञान।।६३।।
यह सुन कर कि इस परिस्थिति में कर्ण का वध करना अकाज हैं। यह समझ कर अर्जुन ने धनुष बाण रख दिये। इतने में श्री कृष्ण ने कहा कि इस प्रकार अज्ञानवश क्या देख रहा है? शत्रु को मार!

करणोवाच
सुन्यो बेद तैं बड़न तैं, धर्म कष्ट तन त्रान।
सो हम साध्यो आज लौं, जथा शक्ति सुनि कान।।६४।।
श्री कृष्ण के वचन सुन कर कर्ण ने कहा कि शरीर के कष्ट को सह कर भी धर्म का पालन करना चाहिए ऐसा मैंने बुजुर्गों के मुँह से और वेद पढ़ने वालों से अपने स्वयं के कानों से सुना है और आज तक यथाशक्ति इसे मैंने निभाया है।

धर्म भक्ति धिक धर्म कौं, जे हम छीजत जात।
पांडव गुरु पितु कपट पथ, मारि बढ़त दिन रात।।६५।।
धर्मराज की भक्ति को तथा उसके धर्म को धिक्कार है कि जिससे हम क्षय होते जा रहे हैं और पाण्डव अपने गुरु (द्रोणाचार्य) को एवं पितामह (भीष्म) को कपट की राह से मार कर भी दिन रात वृद्धि को प्राप्त हो रहे हैं।

सरनागत हौं विप्र हौं, इती वदत रन मांहि।
कर्न धनंजय तैं कहत, तुम से हतत न ताहि।।६६।।
फिर कर्ण धनंजय (अर्जुन) से कहने लगा कि हे अर्जुन! कोई युद्ध में ऐसा कहे कि ‘मैं तुम्हारी शरण में आया हूं! ब्राह्मण हूं!’ उसे तुम्हारे जैसे मारते नहीं।

बिखरे कच रु विकवच पुनि, विधनु विरथ अरिचाहि।
बाल वृद्ध मूर्छित श्रमित, तुम से हतत न ताहि।।६७।।
जिसके बाल बिखरे हों (जो नंगे सिर हो), जो कवच हीन हो और जो शत्रु रथ विहीन, एवं शस्त्र रहित हो, फिर बालक, वृद्ध, मूर्च्छित और थका हुआ हो उन्हें हे अर्जुन! तेरे जैसे शूरवीर जान बूझ कर नहीं मारते।

मेरे तुव तैं कृष्ण तैं, नेक त्रास मति मानि।
छिनक छमा कर भूमि तैं, चक्र उधारत जानि।।६८।।
मुझे तुम से और तुम्हारे कृष्ण से जरा सा भी भय नहीं लगता ऐसा तू जान ले, पर मैं अपने रथ का पृथ्वी में धँसा हुआ पहिया निकालूं तब तक बाण मत चला।

श्रीकृष्णोवाच
विपत परे पर नीच नर, बनत धर्मि बरजोर।
धिक धिक निंदै धर्म कौं, कुकरम लखै न कोर।।६९।।
यह सुन कर श्री कृष्ण बोले कि हे कर्ण! दुःख पड़ने पर अधम मनुष्य भी जबरन (धर्मवान) धार्मिक बन जाता है। तू अपने कुकर्मों की ओर नहीं देखता और धर्मराज की निंदा करता है, इससे तुझे बार बार धिक्कार है।

छप्पय
ज दिन धर्म सुधि करिय, भीम कौं दियो विखम विख।
ज दिन धर्म सुधि करिय, लाखगृह जारि सुवत लख।
ज दिन धर्म सुधि करिय, स्त्रवत रज कूकत रानी।
ज दिन धर्म सुधि करिय, कपट करि ली रजधानी।
कह कृष्ण तहाँ सुधि न करिय, द्रुपदसुता बन विच हरिय।
अहोभाग्य बधाई धन्य दिन, कर्न धर्म दिस सुधि करिय।।७०।।
जिस दिन भीमसेन को जहर दिया था, उस दिन धर्म को याद किया था क्या? जिस दिन लाक्षागृह में सोये हुए पाण्डवों को आग लगाई, उस दिन धर्म का स्मरण किया था क्या? जिस दिन पाण्डवों की पटरानी द्रौपदी, वह भी रजस्वला जब दया की भीख मांग रही थी उस दिन धर्म को याद किया होता। जिस दिन कपट से पाण्डवों का राज्य छीना उस दिन धर्म को याद किया था क्या? श्री कृष्ण कहते हैं कि हे कर्ण! द्रौपदी का वन में हरण किया उस जगह धर्म को याद नहीं किया गया और आज तुमने धर्म की दिशा को याद किया उसकी दुहाई दे कर, इसलिए तेरा आज दिन धन्य है। बधाई योग्य है।

ज दिन धर्म सुधि करिय, श्राप कौं बिप्र पठायो।
ज दिन धर्म सुधि करिय, घोषयात्रा चढि आयो।
ज दिन धर्म सुधि करिय, त्यागि रन बिच नृप भज्जेउ।
ज दिन धर्म सुधि करिय, गाय घेरत नहिँ लज्जेउ।
कह कृष्ण तहाँ सुधि ना करिय, मिले बहुत अभिमन मर्यो।
दिन आज बधाई धन्य तुम, कर्न धर्म सुमरन कर्यो।।७१।।
फिर जिस दिन शाप देने को दुर्वासा ऋषि को भेजा, क्या उस दिन धर्म को याद किया था? जिस दिन तुम सभी घोष यात्रा में चढ़ कर आये थे, उस दिन धर्म का स्मरण था तुम्हें? जिस दिन दुर्योधन को छोड़ कर युद्ध से तुम भाग गए थे उस दिन धर्म कहाँ था तुम्हारा? जिस दिन मच्छ देश की गायों को घेरने में तुम्हें लज्जा नहीं आई? श्री कृष्ण कहने लगे कि जिस दिन तुम सारे लोगों ने मिल कर अकेले अभिमन्यू को मारा उस दिन धर्म याद नहीं आया पर आज तुमने धर्म का स्मरण किया इसके लिए बधाई। आज धर्म को याद करने के लिए हे कर्ण! तू धन्य है।

संजयोवाच
दोहा
कृष्ण बचन सुनि पार्थ के, क्रोधानल की ज्वाल।
श्रोनन नासा चखन तैं, बढी सधूम बिशाल।।७२।।
संजय बताने लगा कि हे धृतराष्ट्र! इस प्रकार कृष्ण के वचन सुन कर अर्जुन के कान, नाक और आंखों से भभकती हुई विशाल क्रोधाग्नि की ज्वाला फूटी।

कोप ज्वलित चख विजय तैं, कियो धनुष टंकार।
सो झँकार गुरुजन सुखद, दुर्जन हृदय बिदार।।७३।।
इस प्रकार क्रोध से धधकती आंखों से अर्जुन ने गांडीव की प्रत्यंचा का टंकार किया, इस झंकार को जब गुरुजनों (युधिष्ठिर आदि) ने सुनी तो उन्हें सुखदायक लगी और दुर्जनों (दुर्योधन आदि) को हृदय विदारक महसूस हुई।

कवित्त
शूर के आवाहन को कायर विसर्जन को,
बंधुन की रक्षा ही को जत्र तत्र जान्यो मैं।
इन्द्र के उछाह हू को रवि उर दाह हू को,
अच्छर विवाह हू को कारन पिछान्यो मैं।
गांधारी के आपदा को पृथा जू के संपदा को,
जुधिष्ठिर विजय प्रताप उर आन्यो मैं।
गांजिव की प्रतिंचा टँकार को अमोघ घोष,
इतने पदारथ को बीच-मंत्र मान्यो मैं।।७४।।
कवि कहता है कि गांडीव धनुष की यह टंकार शूरवीरों को आमंत्रित करने वाली, कायरों को भगाने वाली, और जहाँ-तहाँ पाण्डवों की रक्षा करने वाली है ऐसा मैंने जाना। इन्द्र का उत्साहवर्द्धन करने वाली, सूर्य को पुत्र शोक में जलाने वाली, और अप्सराओं के लिए विवाह रूप है यह मैंने जाना। यह टंकार गांधारी को दुर्योधन की मृत्यु की अग्रिम सूचना देने वाली, कुंती को पाण्डवों की संपदा दिलाने वाली, और युधिष्ठिर को विजय दिलाने वाली है इसे मैंने माना। मैंने इन सभी बातों के होने का बीज मंत्र गांडीव की प्रत्यंचा की टंकार को माना है।

पद्धरी छंद
वृषवाह हत्यो नर एक बान, सो महा बीर अभिमन समान।
पुनि हत्यो करन को दुतिय पुत्र, जुत कुंडल मस्तक गिर्यो जत्र।।७५।।
वृषवाह रु वृषपर्वा पछारि, पुनि कह्यो सुयोधन करि पुकारि।
तैं किय विरुद्ध यह दुष्ट हेतु, तिहि हतत अबहि किन राखि लेत।।७६।।
यों कहि रु कियो गांजिव सँधान, वज्र के रूप सोइ रुद्र बान।
इसी समय अर्जुन ने वृषवाह नामक कर्ण के पुत्र को एक बाण चला कर मारा, जो स्वयं अभिमन्यू जैसा महावीर था। इसके बाद दूसरे पुत्र वृषपर्वा का सिर काट डाला, जो कुण्डल सहित वहीं पृथ्वी पर आ रहा। वृषवाह और वृषपर्वा को मारने के बाद अर्जुन ने ऊंची आवाज में, दुर्योधन को सुना कर कहा कि हे दुर्योधन! तुम ने जिस (कर्ण) दुष्ट के लिए हमसे विरोध किया उसे अब मैं मार रहा हूं, तुम अब उसकी रक्षा क्यों नहीं करते? इतना कह कर वज्र रूप (रुद्र) महादेव का दिया शस्त्र था, उसका अर्जुन ने गांडीव पर संधान किया।

दोहा
ऐंचि बान कनात पुनि, तेजवान कनात।
मोख्यो शिर हरि करन को, कियो दीप सम शांत।।७७।।
और तेजस्वी कर्ण का अन्त करने वाले बाण को गांडीव की प्रत्यंचा सहित कान तक खींच अर्जुन ने छोड़ा। उस बाण ने कर्ण का सिर काट डाला और कर्ण रूपी दीपक की लौ बुझा दी।

दुर्योधन के गेह बिच, ता बिन भयो अँधार।
तेज निकसि रवि बीच भो, सब देखत संसार।।७८।।
उस कर्ण रूपी उजियारे के बिना दुर्योधन के आशा रूपी महल में अंधेरा हो गया और कर्ण के पराक्रम में जो ओज रूपी सूर्य का प्रतिबिंब था, वह सूर्य लोक में जा समाया।

देव दैत्य अहि जक्ष गिरि, सिंधु नदी धरि देह।
आये जुध लखि चकित भये, गये विजय लखिगेह।।७९।।
इस युद्ध को प्रत्यक्ष देखने के लिए देवता, दैत्य, सर्प, यक्ष, पर्वत, समुद्र और नदियां आदि जो देह धर कर आए थे, वे सभी युद्ध देख कर चकित हुए और अर्जुन की विजय देख कर सभी वापस अपने-अपने घर (स्थान पर) गए।

करन मरत भजि बल डरत, गिरत रु करत गुहार।
दुर्योधन दुखसिंधु कौं, तरत न पावत पार।।८०।।
कर्ण की मृत्यु हो गई, यह देख कर कौरवों की सेना सन्न रह गई। भय के मारे योद्धा गिरने-पड़ने लगे, गुहार करने लगे। उस समय दुर्योधन अपने शोक और दुःख रूपी पारावार को तैर कर पार करने में स्वयं को असमर्थ पा रहा था।

दुर्योधन वचन
कवित्त
क्षत्रीधर्म छोरिकै प्रहारे पिता भीषम कौं,
वैसे हते द्रौन कौं न ईश्वर कौं भावेगी।
त्यों ही भूरिश्रवा राधापुत्र हू असावधान,
मारे पृथानंद की का कीरति रहावेगी।
योंहि छल ही तैं भीमसेन तैं हमारो वध,
है भविष्य मृत्यु देहधारी कौं तौ आवेगी।
कर्न हू के मर्न ही तैं सबकौं दिखानी मैं हूं,
प्रानहानि मानी पै कहानी तो न जावेगी।।८१।।
उसके बाद दुर्योधन अपनी सेना के योद्धाओं को सम्बोधित कर कहने लगा कि देखो, पांडवों ने क्षत्रिय धर्म की मर्यादा का त्याग कर भीष्म पितामह को मारा। उसी तरह द्रोणाचार्य को छल पूर्वक मारा, ये अनहोनी और वर्जित घटनाएं ईश्वर के दरबार में पसन्द नहीं की जाएंगी। भूरिश्रवा तथा कर्ण को भी असावधान देख कर मारा है, इससे क्या पृथानन्द (अर्जुन) की कीर्ति रहेगी? इसी प्रकार लगता है छल-बल का सहारा ले कर भीमसेन मेरा वध भी कर दे इससे क्या, क्योंकि प्रत्येक देहधारी की मृत्यु तो निश्चित है। कर्ण को इस प्रकार मारने का दृश्य आप सभी ने देखा, कर्ण की मृत्यु की तरह मैंने भी अपने प्राणों की हानि मान ली पर यह बात तो भविष्य में सदा रहेगी। यह कहानी विलुप्त नहीं होगी।

संजय उवाच
राम अवतार ही तैं करि है विलोम रीति,
लघु शेष अंश यहां अग्रज कहायो है।
वहाँ अनुकूल रहै सदा एक पत्नीव्रत,
दच्छन व्है यहाँ व्यभिचार पद पायो है।
वहां नीति पथ कौं उलंघि पाव धर्यो नाहिँ,
यहां ऐसी रीति हू तैं काम कौं बनायो है।
वहाँ इन्द्रपुत्र कौं सँहारि राख्यो भानुनंद,
यहां वासवी कौं राखि रविज मिटायो है।।८२।।
संजय बताने लगा कि हे राजा धृतराष्ट्र! भगवान ने राम के अवतार से कृष्णावतार में उल्टी रीत की है। रामावतार में लक्ष्मण (शेषावतार) छोटा भाई था, यहाँ कृष्णावतार में शेषावतार बलभद्र बड़े भाई बने हैं। जहाँ रामचन्द्र जी स्वयं मर्यादित नायक के रूप में एक पत्निधारी रहे, वहीं श्रीकृष्ण ने बहुपत्निधारी हो कर व्यभिचारी की छवि पाई। जहाँ रामचन्द्र जी ने नीति के पंथ को उलांघ कर एक कदम भी नहीं भरा और यहाँ ऊपर वर्णित रीति के अनुसार श्री कृष्ण उजाड़ ही चले हैं। रामावतार में इन्द्रपुत्र (बालि) को मार कर सूर्यपुत्र (सुग्रीव) को बचाया था और यहाँ कृष्णावतार ने इन्द्र पुत्र (अर्जुन) को बचा कर सूर्य पुत्र (कर्ण) का संहार किया है।

दोहा
राजपुत्र हनि पंच शत, उभय सहस रथवार।
हते करन गज द्वै सहस, एक लक्ष पदचार।।८३।।
कर्ण ने पाँच सौ राजकुमारों को मारा, दो हजार रथियों का नाश किया, दो हजार हाथी मारे और अपने पूरे युद्ध में एक लाख पैदल सेना को विनष्ट किया।

कियो शल्य सेनापती, जय आशा सुत तोर।
फिर कहिहौं लखिहौं जथा, जुद्ध बनेगो घोर।।८४।।
संजय आगे बताने लगा कि हे राजा! तुम्हारे पुत्र ने इसके बाद भी विजय की आशा से शल्यराज को कौरव सेना का सेनापति बनाया। अब जिस प्रकार का संग्राम होगा, उसे देख कर मैं आपके पास यहाँ आ कर युद्ध का वर्णन करूंगा।

परे भीष्म द्रौनहु मरे, कट्यो करन बल त्रान।
पांडुन जीतहि शल्य अब, आशा नृप बलवान।।८५।।
संजय कहने लगा कि भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर पड़े हैं, द्रोणाचार्य मृत्यु को प्राप्त हो गए और सेना का कवच रूप कर्ण भी स्वर्ग सिधाया। अब क्या पांडवों को शल्य जीत लेगा? परन्तु हे राजा! आशा बड़ी बलवान होती है।

उतै एक अक्षोहिणी, तेरे सुत की तीन।
रही शल्य के जुद्ध मैं, सो सब व्हैहै लीन।।८६।।
अब पांडवों के पास एक अक्षौहिणी सेना शेष है, और आपके पुत्र के पास तीन अक्षौहिणी सेना बची है परन्तु अब शल्य के युद्ध में शेष सारी सेना मारी जाएगी।

मिलै राजसू जज्ञ में, धर्मपुत्र के पास।
तितै देश के तोर मत, भये रु व्हैहैं नाश।।८७।।
और हे राजा धृतराष्ट्र! धर्मराज के राजसूय यज्ञ में जितने देशों के राजा आये थे, उतने देशों के राजाओं का आपके मत से नाश हुआ, और बाकी रहे वे अब मरेंगे।

।।इति चतुर्दश मयूख।।

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